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अब इस अंतरराष्ट्रीय अखबार के लिए चलेगी बरखा दत्त की कलम...

अभिषेक मेहरोत्रा ।। एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त की कलम वैसे तो द

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अभिषेक मेहरोत्रा ।।

एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त की कलम वैसे तो देश के कई बड़े अखबारों के लिए चलती है और उनके लिखे कई कॉलम्स पर चर्चा भी होती है। पर अब ये कलम अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक प्लेटफार्म के लिए भी चलने लगी है।

‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ अमेरिका लोकप्रिय दैनिक अखबार है और इसने अब बरखा को अपना कंट्रीब्यूटिंग कॉलमनिस्ट बना लिया है। यानी बरखा अब इसी अखबार के लिखेंगी। वैसे उनका पहला कॉलम आज डिजिटल विंग ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ के ग्लोबल ओपिनियंस पेज पर प्रकाशित हुआ, जिसका टाइटल है ‘Why India-Pakistan could be a big headache for the next U.S. president’। इस कॉलम आप हेडिंग पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

समाचार4मीडिया डॉट कॉम से बात करते हुए बरखा ने कहा कि उनका ये कॉलम हर महीने प्रकाशित होगा, पर अगर कोई बड़ी घटना घटती है तो वे महीने में एक कॉलम से ज्यादा भी लिखेंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित होने वाला उनका साप्ताहिक कॉलम पहले की ही तरह चलेगा और उसका कंटेंट अलग ही होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि कॉलम का विषय जरूरी नहीं है कि हर बार अंतरराष्ट्रीय ही हो।

बरखा ने इस उपलब्धि के बारे में ट्वीट किया-

बरखा दत्त ने साल की शुरुआत में वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता के साथ मिलकर एक नया न्यूज मीडिया वेंचर ‘द प्रिंट’ लॉन्च किया। बरखा इस वेंचर की को-फाउंडर हैं।

टीवी जर्नलिज्म के क्षेत्र में जो चेहरे यंग जेनेरशन को बहुत लुभाते हैं, उनमें से एक हैं बरखा दत्त। बरखा एक मिसाल हैं। उनकी बेबाकी और जज्बे को सभी सलाम करते हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें पद्मश्री से नवाजा जा चुका है लेकिन इस सफलता को हासिल करने का उनका सफर काफी लंबा है।

बरखा का जन्म 18 दिसबंर 1971 में नई दिल्ली में हुआ। उनके पिता एस.पी. दत्त एयर इंडिया में काम करते थे और मां एक मशहूर पत्रकार थीं- प्रभा दत्त। वह हिन्दुस्तान टाइम्स में काम करती थीं। बरखा खुद बताती हैं कि जब औरतें सिर्फ फ्लॉवर शो कवर करती थीं, तब उनकी मां ने जंग तक की कवरेज की। इसीलिए बरखा को न्यूज में शुरू से दिलचस्पी थी।

बरखा ने दिल्ली के मशहूर कॉलेज सेंट स्टीफंस से अंग्रेजी लिटरेचर की पढ़ाई की और इसके बाद मास्टर्स इन मास कम्युनिकेशन के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया पहुंच गईं। इस दौरान उन्हें लगा कि उन्हें टीवी प्रड्यूसर बनना चाहिए। जामिया के बाद नौकरी के सिलसिले में वह प्रणॉय रॉय से मिली तो उन्होंने बरखा को रिपोर्टर बनने का न्यौता दिया। कुछ महीनों तक रिपोर्टिंग के साथ-साथ बरखा ने प्रडक्शन का काम भी किया। यह ट्रेनिंग उनके लिए अच्छी साबित हुई और वह पूरी तरह पत्रकार बन गईं। वैसे उन्होंने बाद में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की मास्टर्स डिग्री भी हासिल की। बरखा की मानें तो वह खुद कभी पत्रकार नहीं बनना चाहती थीं। वह तो डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर या वकील बनना चाहती थी। वह कहतीं हैं कि वकील बनने का ख्वाब मैं अब भी देखती हूं। यह बात और है कि पत्रकारिता ने उन्हें बहुत कुछ दिया है।

पत्रकारिता में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के लिए बरखा ने अपनी नौकरी से डेढ़ साल की छुट्टी ली। वह बताती हैं कि कोलंबिया में दुनिया का बेहतरीन पत्रकारिता स्कूल है इसीलिए उन्हें लगा कि उन्हें वहां जाना चाहिए। जब बरखा लौटकर आईं तो उसके आठ महीने बाद ही करगिल युद्ध शुरू हो गया। यह उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। उन्हें वॉर कवर करने के लिए कारगिल भेजा गया।

बरखा कहती हैं, अपनी इतने साल की नौकरी में उन्हें कारगिल की रिपोर्टिंग जैसा अनुभव कभी नहीं हुआ। वह याद करती हैं, उनके साथ वॉर कवर करने के लिए तीन और लोग गए थे। वे लोग जिस गाड़ी में घूमते थे उस गाड़ी पर गोलाबारी हो गई। उन लोगों ने कई रातें एक बड़े से पत्थर के पीछे गुजारी। कारगिल वॉर के 15 दिन वे लोग सड़कों पर ही रहे। इस हालत में स्टोरी शूट करके भेजना और मुश्किल था। तब ओबी वैन नहीं होती थी। इसलिए जो हेलीकॉप्टर्स डेडबॉडीज लेकर जाते थे, उनके साथ वे लोग अपना टेप भेजा करते थे। टाइगर हिल पर गोलीबारी के दौरान बरखा बंकर में रही और वहीं से सेटेलाइट फोन के जरिए रिपोर्टिंग की। 40 घंटे बंकर में बिताने के बाद बरखा की जिंदगी ही बदल गई। शहीद विक्रम बत्रा के साथ बिताया वक्त बरखा कभी नहीं भूल सकतीं। वह बताती हैं कि वह कारगिल वॉर के दौरान भावुक नहीं हुई। अगर वह रो पड़तीं तो लोग कहते, लड़की है इसलिए उन्होंने खुद को भावुक होने नहीं दिया। कारगिल युद्ध के बाद बरखा को कश्मीर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इराक में रिपोर्टिंग का मौका भी मिला।

बाद में बॉलिवुड की फिल्म ‘लक्ष्य’ में प्रीति जिंटा का कैरेक्टर बरखा को बेस करके लिखा गया। इसके अलावा आनंद कुरियन के नॉवेल ‘द पेडलर्स ऑफ सोप्स’ की प्रोटेगॉनिस्ट भी बरखा दत्त से इंस्पायर्ड है।

टीवी जर्नलिज्म में महिलाओं की स्थिति को बरखा के डेटरमिनेशन ने मजबूत किया है। हालांकि टीवी चैनलों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है लेकिन दबदबा पुरुषों का ही है। इस स्थिति में बरखा दत्त ने लड़कियों को इस क्षेत्र में सहज बनाया है। कारगिल युद्ध के दौरान जोखिमपरक परिस्थितियों में की गई रिपोर्टिंग ने बरखा दत्त को प्रसिद्धि दी। लेकिन इसके साथ ही लड़कियों को यह हिम्मत भी दी कि वे किसी भी क्षेत्र में मेहनत से सफलता हासिल कर सकती हैं।

बरखा को तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। 2008 में उन्हें मोस्ट इंटेलिजेंट न्यूज शो होस्ट का इंडियन न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड दिया गया। उन्हें कॉमनवेल्थ ब्राडकास्टिंग एसोसिएशन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है। ‘वी द पीपुल’ जैसे प्रोग्राम के लिए उन्हें बेस्ट टीवी न्यूज एंकर का सम्मान दिया जा चुका है। अपने साहस और शानदार रिपोर्टिंग के कारण बरखा ने ये सम्मान हासिल किए हैं।

 


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