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अतुल माहेश्वरी, एक संस्था-एक मील के पत्थर का नाम: अर्जुन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

<p>ये बात वर्ष 1999 की है। जालंधर से अमर उजाला के साथ साथ दैनिक जागरण की भी लांचिंग थी। जालंधर के मी

समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

ये बात वर्ष 1999 की है। जालंधर से अमर उजाला के साथ साथ दैनिक जागरण की भी लांचिंग थी। जालंधर के मीडिया जगत में अच्छी खासी हलचल थी। करीब दस दिन बाद अमर उजाला प्रबंधन द्वारा लांचिंग से पूर्व की तैयारी के लिए भेजे गए वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ किरमानी जी का फोन आया। उन्होंने प्रेस कटिंग्स व बायोडाटा सहित आधे घंटे में अपने आफिस बुलाया था। मैंने अपनी फाईल उठाई। उसमें बायोडाटा की फोटोकॉपी मौजूद थी। मिलाप चौक में अमर उजाला का ऑफिस था। दोपहर की गर्मी के तेवर काफी तीखे थे। वहां एक लंबे कद के व्यक्ति से मेरा परिचय करवाते हुए यूसुफ जी ने बताया, ये अतुल महेश्वरी जी हैं, अमर उजाला के संपादक व प्रबंध निदेशक। अतुल जी काफी सहज थे। उन्होंने अहसास ही नहीं होने दिया कि वे इतने प्रतिष्ठित पत्र समूह के शीर्षस्थ लोगों में से हैं। उन्होंने बातचीत शुरू की। पंजाब के लोगों की पसंद, नापसंद से बात शुरू होकर पंजाब केसरी तक आ पहुंची। वे चेन स्मोकर थे। एक सिगरेट बुझती तो दूसरी सुलगा लेते। दस मिनट में मेरी हालत खराब हो गई। मैं भी सिगरेट का खूब धुआं उड़ाने वाला था। मैंने शर्माते हुए उनसे इज़ाजत मांगी कि क्या मैं आपके सामने सिगरेट पीने की धृष्टता कर सकता हूं? उन्होंने हंस कर कहा, श्योर, मैं भी स्मोकिंग में खुद को अकेला महसूस कर रहा था। मैंने भी सिगरेट  सुलगा ली व सहज हो गया। वे पंजाब केसरी की ताकत को जानना चाहते थे। वे ले-आऊट से लेकर खबरों के प्रस्तुतिकरण में पंजाब केसरी को एक कमज़ोर प्राडक्ट मानते थे, फिर भी हैरत में थे कि ट्रिब्यून ग्रुप का दैनिक ट्रिब्यून, एक्सप्रेस ग्रुप के जनसत्ता जैसे अखबारों ने पंजाब केसरी के सामने पानी भी नहीं मांगा। अतुल माहेश्वरी जल्दी ही अमर उजाला को जालंधर लाना चाहते थे। पर पंजाब केसरी के प्रभाव से थोड़ा असहज भी महसूस कर रहे थे। मेरी एक ही दलील थी कि पंजाब केसरी को आप कमज़ोर प्राडक्ट कह रहे हो पर ये अखबार कोई प्राडक्ट तो है ही नहीं। ठीक है कि सामने कोई चुनौती नहीं है जिसके चलते उनका कामकाज का तरीका निजता पर आधारित है पर इस ग्रुप के मालिकान में से कोई भी किसी से कम नहीं है। आपके अखबार में प्रोफैशनल्स की फौज है पर पंजाब केसरी जैसी प्रिंटिंग किसी की भी नहीं। इसके पीछे विजय कुमार चोपड़ा के छोटे बेटे अमित चोपड़ा का मास्टर ब्रेन है। अमित तकनीकी क्षेत्र में बाकी लोगों से बहुत आगे की सोच रखते हैं। विजय जी इतने कुशल प्रबंधक है कि अखबार को समाज के साथ जोड़ कर संतुलन साधने की जो कारिगिरी उनमें हैं, उस विशेषता को दूसरे अखबारी घराने काफी हल्के से लेते हैं। पर असल में हर वर्ग के साथ जुडऩे व पाठक से सीधा संवाद रखने वाली नीति उनकी बहुत बड़ी ताकत है। विजय जी के बड़े बेटे अविनाश चोपड़ा अपने पिता से बहुत कुछ सीख चुके हैं व मैदान में उतर कर अपनी अखबार को संभालने, सजाने व सहेजने के लिए जुनून की हद तक चले जाते हैं। मिलाप व वीर प्रताप की विफलता का सबसे बड़ा कारण मालिकों की अखबार के सारे तंत्र के प्रति विशेष रुचि न लेना व बदलते जमाने के साथ अखबार की जरूरतों को न समझ पाना रहा है। जबकि जिस पंजाब केसरी की प्रसार संख्या कई अखबारी घरानों के मुंह में पानी ला देती है, उसके पीछे मालिकों की खुद की बहुत ज्यादा मेहनत है। कहीं से भी आया अन्जान व्यक्ति जिस मालिक से चाहे आसानी से मिल सकता है। इन लोगों ने खुद को प्रोटोकोल के बंधनों में जकडऩे के बजाए हर समय हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध रहने की नीति को ही लागू किया है, इनकी कामयाबी का यही सबसे बड़ा कारण है। उपर से ये लोग समाज में अपने अखबार के ब्रांड अम्बैस्डर भी खुद ही हैं व पाठक वर्ग में इनकी ये छवि मान्य भी है।

मुझे लगा कि अतुल जी मेरे पर नाराज़ हो जाएंगे क्योंकि मैं देख रहा था कि युसूफ थोड़ा असुविधाजनक सा महसूस कर रहे थे। पर अतुल जी आंखें बंद करके सिगरेट के हौले हौले कश लगाते हुए मेरी बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। एकाएक उन्होंने आंखें खोलीं। वे कहने लगे कि इस बारीक विश्लेषण ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने घड़ी देखी हमें बातचीत करते दो घंटे बीत चुके थे।  उन्होंने कहा, हमें कहा गया था कि पंजाब में पत्रकारों की बहुत कमी है पर आपसे मिल कर अच्छा लगा, आपकी जानकारी अच्छी है। युसूफ किरमानी की जैसे जान में जान आई। दो घंटे की बातचीत में अतुल महेश्वरी बेहद सहज थे। ये तो बाद में पता चला कि वे कितनी व्यस्त दिनचर्या के स्वामी थे। इसके बाद भी उनसे मुलाकातें होती रहीं। वे अमर उजाला के जालंधर संस्करण को लेकर काफी गंभीर थे। उनमें सबसे बड़ी खूबी संपादक व पत्रकार नामक संस्था को बचाए रखना था। कई बार ऐसा हुआ जब किसी बड़े घराने के सेठ ने विज्ञापन देने में कुछ ऐसी शर्तें लगाने की कोशिश की जिससे अमर उजाला के भीतरी संदर्भों में हस्तक्षेप माना जा सकता तो बिना ये देखे कि विज्ञापनदाता की बात न मानने से प्रबंधन को कितना नुक्सान हो सकता है,उनका दो लाईन का निर्देश फैक्स पर आता कि फलां घराने का विज्ञापन अमर उजाला में प्रतिबंधित कर दिया गया है। उनकी यही विशेषता उन्हें दूसरे अखबारी घरानों के मालिकों से बिल्कुल अलग खड़ा करने वाली थी। उनके साथ काम करना अपने आप में गौरव की बात रही। उनके असमायिक निधन से सचमुच पत्रकारिता को बहुत बड़ा धक्का लगा है जिसकी क्षतिपूर्ति शायद ही हो सके।

 


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