मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX ने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड इलाके में अपना नया 6-स्क्रीन सिनेमा शुरू किया है। यह सिनेमा वर्थुर रोड स्थित ब्रिगेड कॉर्नरस्टोन यूटोपिया में खोला गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX ने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड इलाके में अपना नया 6-स्क्रीन सिनेमा शुरू किया है। यह सिनेमा वर्थुर रोड स्थित ब्रिगेड कॉर्नरस्टोन यूटोपिया (Brigade Cornerstone Utopia) में खोला गया है। इसमें कुल 949 दर्शकों के बैठने की क्षमता है। कंपनी के मुताबिक, यह बेंगलुरु में उसका 28वां सिनेमा है।
Brigade Cornerstone Utopia के Arcadia में स्थित यह सिनेमा आसपास के रिहायशी इलाकों, ऑफिस, रिटेल और मनोरंजन केंद्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। कंपनी का कहना है कि इसका उद्देश्य लोगों को फिल्म देखने के साथ-साथ खाने-पीने और दोस्तों व परिवार के साथ समय बिताने का बेहतर अनुभव देना है।
लेटेस्ट तकनीक से लैस हैं सभी स्क्रीन
नए सिनेमा की सभी छह स्क्रीन में ऑल-लेजर प्रोजेक्शन, Dolby 7.1 सराउंड साउंड और Next-Gen 3D की सुविधा दी गई है। इनमें से दो ऑडिटोरियम में DTS:X इमर्सिव साउंड लगाया गया है, जिससे फिल्मों के दौरान ज्यादा बेहतर और चारों तरफ से आने वाली आवाज का अनुभव मिलेगा।
सिनेमा में दर्शकों के आराम का भी खास ध्यान रखा गया है। यहां Celebrity Recliners और Lounger Seats उपलब्ध हैं। इसके अलावा आधुनिक इंटीरियर और बेहतर हॉस्पिटैलिटी के साथ सिनेमा को प्रीमियम लुक दिया गया है।
Cinema Food Court भी शुरू किया
PVR INOX ने इस सिनेमा में अपना नया Cinema Food Court कॉन्सेप्ट भी पेश किया है। इसके जरिए कंपनी फिल्म देखने के अनुभव में खाने-पीने और सोशलाइजिंग को ज्यादा अहमियत दे रही है। दर्शक यहां फिल्म से पहले या बाद में खाना खा सकते हैं, आराम कर सकते हैं और दोस्तों या परिवार के साथ समय बिता सकते हैं।
नए सिनेमा की शुरुआत Yash स्टारर ‘Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups’ के साथ हुई है। इससे व्हाइटफील्ड और आसपास के दर्शकों को नई फिल्म को प्रीमियम माहौल में देखने का मौका मिलेगा।
बेंगलुरु में 28वां सिनेमा
PVR INOX के मैनेजिंग डायरेक्टर अजय बिजली ने कहा कि बेंगलुरु कंपनी के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण बाजार रहा है। व्हाइटफील्ड क्षेत्र में रिहायशी इलाकों, ऑफिस, रिटेल और मनोरंजन सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है। ऐसे में यहां नया सिनेमा कंपनी की मौजूदगी को और मजबूत करेगा।
उन्होंने कहा कि कंपनी ऐसे सिनेमा डेस्टिनेशन तैयार करने पर ध्यान दे रही है, जहां लोगों को आसानी से पहुंचने के साथ बेहतर फिल्म और मनोरंजन का अनुभव मिल सके।
PVR INOX के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर संजीव कुमार बिजली ने कहा कि सिनेमा सिर्फ फिल्म देखने की जगह नहीं है, बल्कि लोगों के साथ मिलने-जुलने और यादें बनाने की जगह भी है। नए सिनेमा में आधुनिक प्रोजेक्शन और साउंड, प्रीमियम सीटिंग और Cinema Food Court जैसे फीचर्स इसी सोच को ध्यान में रखकर जोड़े गए हैं।
1,786 स्क्रीन का हुआ PVR INOX नेटवर्क
इस नए सिनेमा के खुलने के साथ PVR INOX का नेटवर्क बढ़कर 1,786 स्क्रीन हो गया है। कंपनी अब भारत और श्रीलंका के 113 शहरों में 356 प्रॉपर्टीज संचालित करती है।
PVR और INOX के 2023 में हुए विलय के बाद बनी PVR INOX लगातार बड़े शहरी बाजारों और तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। कंपनी अब सिर्फ स्क्रीन बढ़ाने के बजाय टेक्नोलॉजी, आराम, भोजन और हॉस्पिटैलिटी को मिलाकर दर्शकों के लिए ज्यादा बेहतर और प्रीमियम सिनेमा अनुभव तैयार करने पर भी जोर दे रही है।
उन्हें डिजिटल मीडिया रणनीति और प्लानिंग के क्षेत्र में अनुभव है। उनके काम का दायरा सर्च, सोशल, डिस्प्ले और प्रोग्रामेटिक के साथ-साथ बिजनेस एनालिसिस और क्लाइंट रिलेशनशिप तक रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अभिषेक माथुर (Abhishek Mathur) को पब्लिसिस ग्रुप (Publicis Groupe) में Director – Digital Buying के पद पर पदोन्नत किया गया है। उन्होंने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए अपनी नई भूमिका की जानकारी साझा की।
माथुर ने 2024 में Publicis Groupe के साथ Associate Director – Digital Buying के तौर पर अपनी पारी शुरू की थी। करीब दो साल के कार्यकाल के बाद उन्हें अब बड़ी जिम्मेदारी दी गई है।
उन्हें डिजिटल मीडिया रणनीति और प्लानिंग के क्षेत्र में अनुभव है। उनके काम का दायरा सर्च, सोशल, डिस्प्ले और प्रोग्रामेटिक के साथ-साथ बिजनेस एनालिसिस और क्लाइंट रिलेशनशिप तक रहा है।
Publicis Groupe में शामिल होने से पहले माथुर करीब तीन साल तक माइंडशेयर (Mindshare) के साथ जुड़े रहे। इससे पहले उन्होंने ओएमडी वर्ल्डवाइड (OMD Worldwide), परफॉर्मिक्स कन्वोनिक्स (Performics.Convonix) और साइबेज (Cybage) जैसी कंपनियों में भी काम किया है।
नई भूमिका में माथुर डिजिटल बाइंग से जुड़े कार्यों और रणनीति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालेंगे। डिजिटल मीडिया के अलग-अलग क्षेत्रों में उनका अनुभव इस जिम्मेदारी में अहम भूमिका निभाएगा।
अपनी नई भूमिका में हरीश दक्षिण भारत में चैनल की एडिटोरियल कवरेज को और मजबूत करने पर फोकस करेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘सीएनएन-न्यूज18’ (CNN-News18) ने पत्रकार हरीश उपाध्याय को एडिटर-साउथ की नई जिम्मेदारी सौंपी है। अपनी नई भूमिका में हरीश दक्षिण भारत में चैनल की एडिटोरियल कवरेज को और मजबूत करने पर फोकस करेंगे। वह स्टोरी आइडिएशन, एडिटोरियल प्लानिंग, कोऑर्डिनेशन और एग्जीक्यूशन से जुड़े काम देखेंगे और इस क्षेत्र में काम कर रहे चैनल के रिपोर्टर्स के साथ करीबी समन्वय करेंगे।
बता दें कि दक्षिण भारत CNN-News18 के लिए एक अहम बाजार है और यहां चैनल का एक महत्वपूर्ण दर्शक वर्ग है। हरीश पहले से ही CNN-News18 के डेली और वीकेंड साउथ-केंद्रित प्रोग्रामिंग को एंकर करते हैं। वह दक्षिण भारत से जुड़े बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों और ब्रेकिंग न्यूज की कवरेज में भी करीब से शामिल रहे हैं।
हरीश को दक्षिण भारत की राजनीति, शासन और बड़े ब्रेकिंग न्यूज घटनाक्रमों की कवरेज का व्यापक अनुभव है। अपने करियर के दौरान उन्होंने क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों और न्यूज ब्रेक्स को कवर किया है। इसके अलावा उन्होंने बड़ी प्राकृतिक आपदाओं और अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं की कवरेज का नेतृत्व भी किया है।
वह पिछले एक दशक से अधिक समय से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और देश के स्पेस सेक्टर से जुड़े घटनाक्रमों को भी करीब से कवर करते आए हैं। इस दौरान उन्होंने भारत की अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े कई महत्वपूर्ण पड़ावों की रिपोर्टिंग की है।
हरीश को बेस्ट यंग टीवी जर्नलिस्ट के लिए प्रतिष्ठित न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड भी मिल चुका है। उन्हें रिपोर्टिंग के साथ-साथ टेलीविजन एंकरिंग का भी अनुभव है। फील्ड रिपोर्टिंग के अलावा उन्होंने अंग्रेजी और कन्नड़, दोनों भाषाओं में प्राइम-टाइम डिबेट्स और न्यूज प्रोग्राम्स को एंकर किया है।
सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी कंपनी ‘मेटा’ (Meta) की वाइस प्रेजिडेंट एवं हेड-इंडिया एंड साउथ ईस्ट एशिया संध्या देवनाथन ने एक दशक से ज्यादा समय बाद कंपनी से अलग होने का फैसला किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी कंपनी ‘मेटा’ (Meta) की वाइस प्रेजिडेंट एवं हेड-इंडिया एंड साउथ ईस्ट एशिया संध्या देवनाथन ने एक दशक से ज्यादा समय बाद कंपनी से अलग होने का फैसला किया है। उन्होंने लिंक्डइन पर एक पोस्ट के जरिए अपने इस फैसले की जानकारी दी।
अपनी लिंक्डइन पोस्ट में संध्या देवनाथन ने कहा कि मेटा में एक दशक से ज्यादा समय बिताने के बाद उन्होंने अपने अगले सफर की ओर बढ़ने का फैसला किया है। उन्होंने कंपनी और अपने सहयोगियों के प्रति आभार जताते हुए कहा कि इस शानदार कंपनी और अपने बेहतरीन सहयोगियों को अलविदा कहना उनके लिए मुश्किल रहा, लेकिन वह अपने साथ कृतज्ञता और आने वाले समय को लेकर उत्साह लेकर जा रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह कुछ समय का ब्रेक लेने के बाद अपने करियर के अगले अध्याय की ओर बढ़ेंगी और इसके बारे में जल्द जानकारी साझा करेंगी।
संध्या देवनाथन को दो दशक से ज्यादा का अनुभव है। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर बैंकिंग, पेमेंट्स और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में रहा है। वह 2016 में मेटा से जुड़ी थीं। मेटा में अपने शुरुआती दौर में उन्होंने सिंगापुर और वियतनाम के कारोबार और टीमों को तैयार करने में भूमिका निभाई। इसके साथ ही उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में मेटा की ई-कॉमर्स पहलों पर भी काम किया। 2020 में उन्होंने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मेटा के गेमिंग कारोबार की जिम्मेदारी संभाली। यह मेटा के वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े वर्टिकल्स में से एक है।
वर्ष 2022 में संध्या देवनाथन को मेटा इंडिया की वाइस प्रेजिडेंट नियुक्त किया गया। इस भूमिका में उन्होंने संगठन की बिजनेस और रेवेन्यू प्राथमिकताओं को एक साथ लाने पर काम किया, ताकि पार्टनर्स और क्लाइंट्स को बेहतर तरीके से सेवाएं दी जा सकें। साथ ही उनका फोकस भारत में मेटा के कारोबार की दीर्घकालिक वृद्धि और भारत के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाने पर रहा। बाद में उनकी जिम्मेदारी भारत के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया तक बढ़ी और वह वाइस प्रेसिडेंट एवं हेड-इंडिया एंड साउथ ईस्ट एशिया की भूमिका में रहीं।
मेटा में अपने सफर को याद करते हुए संध्या देवनाथन ने कहा कि जब वह 2016 में मेटा से जुड़ी थीं, तब सिंगापुर में कंपनी में करीब 300 कर्मचारी थे। उस समय डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की काफी चर्चा थी और कंपनी इसी बदलाव के बीच काम कर रही थी। उन्होंने कहा कि उस दौरान स्टार्टअप्स, कंपनियों, क्रिएटर्स और पूरे इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में मदद की गई और करोड़ों यूजर्स के लिए बेहतर अनुभव तैयार करने पर काम हुआ। संध्या देवनाथन ने कहा कि समय के साथ टीम बड़ी हुई और कंपनी के प्रोडक्ट्स भी विकसित हुए, लेकिन क्लाइंट्स के लिए सर्वश्रेष्ठ देने की प्रतिबद्धता लगातार बनी रही।
उन्होंने अपने सफर के दौरान एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ई-कॉमर्स और गेमिंग जैसे क्षेत्रों में काम करने और भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रतिभाशाली टीमों का नेतृत्व करने को अपने लिए विशेष अनुभव बताया।
सोशल मीडिया पर दावा है कि सुभाष चंद्रा ने ₹22,006 करोड़ का कर्ज लिया और सिर्फ ₹6.5 करोड़ में मामला खत्म हो गया। लेकिन इस दावे में गारंटी (Guarantee) की अहम भूमिका को नजरअंदाज किया गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
पलक शाह, खोजी पत्रकार ।।
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कुछ इस तरह वायरल हो रही है: सुभाष चंद्रा ने भारतीय बैंकों से ₹22,006 करोड़ उधार लिए, पैसे चुकाने से इनकार कर दिया, ट्रिब्यूनल में पहुंचे और सिर्फ ₹6.5 करोड़ देकर मामला खत्म हो गया। इसके साथ यह भी कहा जा रहा है कि वह बीजेपी सांसद थे, इसलिए उन्हें आसानी से राहत मिल गई। कहानी सुनने में सीधी और साफ लगती है, लेकिन इसमें एक अहम शब्द को गलत समझा गया है और वह शब्द है- गारंटी (Guarantee)।
इस दावे को जोर-शोर से आगे बढ़ाने वालों में विजय माल्या भी शामिल हैं। वही विजय माल्या, जो इस समय लंदन से अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और भारतीयों को बता रहे हैं कि बैंक की वसूली किस तरह होनी चाहिए।
असल में हुआ क्या था, आसान भाषा में समझिए
इसे इस तरह समझिए। मान लीजिए आपका कोई रिश्तेदार फैक्ट्री लगाने के लिए बैंक से लोन लेता है। बैंक आपसे उस लोन के लिए गारंटर बनने को कहता है। आपने उस पैसे में से एक रुपया भी नहीं लिया। बाद में फैक्ट्री घाटे में चली जाती है और बंद हो जाती है। अब बैंक उस गारंटी के आधार पर आपसे पैसे की वसूली कर सकता है।
सुभाष चंद्रा के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन बहुत बड़े औद्योगिक स्तर पर। उनके ग्रुप की कंपनियों ने लोन लिया था और सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत तौर पर उन लोन की गारंटी दी थी। जब ग्रुप आर्थिक संकट में फंस गया, तो कर्जदाताओं ने गारंटर यानी सुभाष चंद्रा की तरफ रुख किया।
₹22,006 करोड़ वह पैसा नहीं है जो सुभाष चंद्रा के बैंक खाते में गया था। यह उन सभी कर्जदाताओं के दावों का कुल आंकड़ा है, जिनके पास सुभाष चंद्रा की गारंटी थी। अलग-अलग लोन के ये दावे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और एक के ऊपर एक जमा होते गए। ये गारंटियां उन लोन के लिए थीं जो दूसरी कंपनियों ने लिए और इस्तेमाल किए थे।
यह मामला शुरुआत में ₹22,000 करोड़ का था ही नहीं। अप्रैल 2024 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने ₹170 करोड़ के एक लोन की गारंटी को लेकर सुभाष चंद्रा के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का दरवाजा खटखटाया था। यह लोन विवेक इंफ्राकॉन नाम की कंपनी को दिया गया था।
एक बार यह मामला खुला तो जिन-जिन कर्जदाताओं के पास सुभाष चंद्रा की गारंटी थी, उन्होंने भी अपने दावे दाखिल करने शुरू कर दिए। इसी तरह धीरे-धीरे कुल दावों की रकम बढ़कर ₹22,006 करोड़ तक पहुंच गई।
फिर सिर्फ ₹6.5 करोड़ क्यों?
क्योंकि उनके पास लगभग उतना ही बचा था। इंसॉल्वेंसी कोर्ट सजा देने वाली अदालत नहीं होती। यह संपत्ति के बंटवारे की प्रक्रिया होती है। यहां एक सीधा सवाल पूछा जाता है- इस व्यक्ति के पास वास्तव में कितना पैसा या संपत्ति बची है और उसे किस कर्जदाता को कितना हिस्सा दिया जा सकता है?
कोर्ट की ओर से नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने सुभाष चंद्रा की निजी संपत्ति का मूल्यांकन किया। निष्कर्ष यह था कि उनकी संपत्ति की कीमत ₹6.5 करोड़ की पेशकश से भी कम थी।
इस ₹6.5 करोड़ में से ₹6.25 करोड़ कर्जदाताओं को दिए जाने हैं, जबकि ₹25 लाख प्रक्रिया से जुड़े खर्चों के लिए रखे गए हैं। इसके बाद खुद बैंकों ने इस प्रस्ताव पर मतदान किया। इंसॉल्वेंसी कानून के तहत फैसला कर्जदाता लेते हैं, जज नहीं। नवंबर 2024 में वोटिंग में 80.81% हिस्सेदारी रखने वाले कर्जदाताओं ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके बाद 2026 में ट्रिब्यूनल ने भी इसे मंजूरी दे दी। यह फैसला पहले बंटा हुआ था, जिसे तीसरे सदस्य के जरिए अंतिम रूप दिया गया।
ट्रिब्यूनल की दलील साफ थी- सिर्फ इसलिए कि बैंकों को मिलने वाली रकम बहुत कम दिखाई दे रही है और यह फैसला शर्मनाक लग सकता है, अदालत बैंकों के व्यावसायिक फैसले को खारिज नहीं कर सकती।
अगर यह प्रस्ताव खारिज कर दिया जाता तो सुभाष चंद्रा पूरी तरह दिवालिया प्रक्रिया में चले जाते। ऐसे में जिन कर्जदाताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था, उन्हें संभवतः इससे भी कम पैसा मिलता। जिस संपत्ति में ₹32 करोड़ ही हों, वहां से ₹22,000 करोड़ की वसूली नहीं की जा सकती। किसी भी अदालत के पास ऐसी कोई मशीन नहीं है जो गायब पैसा पैदा कर सके।
"उन्होंने एक रुपया भी वापस नहीं किया" - यह भी पूरी सच्चाई नहीं है
IL&FS संकट के बाद जब भारत के क्रेडिट मार्केट पर बड़ा दबाव आया, तब एस्सेल ग्रुप पर करीब ₹20,000 करोड़ का कर्ज था। परिवार के पास मौजूद Zee के शेयर कर्जदाताओं के पास गिरवी रखे गए थे। अगर घबराहट में Zee के शेयरों की बिक्री शुरू हो जाती, तो पूरा कारोबार बिखर सकता था।
सुभाष चंद्रा के परिवार ने खुद Zee में अपनी हिस्सेदारी कम की। उन्होंने उस कारोबार को भी बेचने का रास्ता अपनाया जिसे उन्होंने खड़ा किया था और जिसे वह अपना 'क्राउन ज्वेल' यानी सबसे कीमती कारोबार मानते थे। इसके साथ ही अन्य कंपनियों को भी बेचकर कर्जदाताओं का पैसा चुकाया गया।
2021 में सुभाष चंद्रा ने कहा था कि 43 कर्जदाताओं और 110 खातों से जुड़े कुल कर्ज का 91.2% निपटाया जा चुका था।
इसलिए इसे ऐसे व्यक्ति के तौर पर पेश करना सही नहीं है जिसने पैसा लिया और विजय माल्या की तरह देश से भाग गया। उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए अपना कारोबारी साम्राज्य तक बेच दिया। इसके बाद जो बचा, वह व्यक्तिगत गारंटियां थीं, जो लगभग खाली हो चुकी निजी संपत्ति के ऊपर थीं।
और बीजेपी सांसद होने वाली बात?
सुभाष चंद्रा कभी बीजेपी सांसद नहीं थे। वह 2016 से 2022 के बीच हरियाणा से निर्दलीय राज्यसभा सांसद थे। उन्हें बीजेपी के समर्थन से चुनाव में जीत मिली थी। 2022 में वह दोबारा राज्यसभा के लिए चुने नहीं जा सके। उनके खिलाफ इंसॉल्वेंसी केस 2024 में शुरू हुआ। रिजॉल्यूशन प्लान को 2026 में मंजूरी मिली। यानी इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के शुरू होने से कई साल पहले ही वह संसद से बाहर हो चुके थे।
अब वह हिस्सा जो वाकई चिंता पैदा करता है।
इसे क्लीन चिट समझने की गलती न करें-
कर्जदाताओं ने यह सवाल जरूर उठाया कि पुराने नेट-वर्थ सर्टिफिकेट में कभी सुभाष चंद्रा की संपत्ति की कीमत ₹40,000 करोड़ से ज्यादा बताई गई थी। जबकि इस मामले में उन्होंने अपनी नेट वर्थ करीब ₹32 करोड़ बताई। इन दोनों आंकड़ों के बीच इतना बड़ा अंतर निश्चित रूप से जांच की मांग करता है।
ट्रिब्यूनल ने भी माना कि यह सवाल उठाना उचित है। लेकिन साथ ही कहा कि इंसॉल्वेंसी कानून के तहत किसी रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी देने से पहले फॉरेंसिक ऑडिट कराना जरूरी नहीं है।
इसके अलावा यह आरोप भी लगाए गए कि 'हां' में वोट करने वाले कुछ कर्जदाता या संस्थाएं सुभाष चंद्रा के करीबी हो सकते हैं। अगर अपील में यह आरोप कभी साबित हो जाता है, तो 80% से ज्यादा की मंजूरी की पूरी तस्वीर काफी ज्यादा गंभीर हो सकती है। इस मामले की कीमत भी वास्तविक है। LIC Housing Finance ने इस प्लान के खिलाफ वोट किया था। उसका ₹1,322 करोड़ का स्वीकार किया गया दावा इस प्रक्रिया में करीब ₹38 लाख ही वापस ला पाएगा।
इंसॉल्वेंसी कानून के तहत असहमति जताने वाले कर्जदाता भी बहुमत से लिए गए फैसले से बंधे होते हैं।
सीधी और सच्ची बात
सुभाष चंद्रा ने अपने ग्रुप के कर्ज के लिए जरूरत से ज्यादा गारंटी दी। ग्रुप आर्थिक संकट में फंस गया। उन्होंने ज्यादातर कर्जदाताओं का पैसा चुकाने के लिए Zee पर अपना नियंत्रण तक बेच दिया। इसके बाद जो बचा, वह एक ऐसी निजी संपत्ति थी जो बहुत कम थी, जबकि उसके ऊपर बड़ी-बड़ी व्यक्तिगत गारंटियां थीं।
बैंकों ने खुद यह फैसला किया कि ₹6.5 करोड़ लेना उन संपत्तियों के पीछे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से बेहतर है, जिनकी कीमत शायद इससे भी कम होती। यह बहुत बड़ा हेयरकट है और भारत में व्यक्तिगत गारंटरों से जुड़े इंसॉल्वेंसी कानून की व्यवस्था में एक गंभीर खामी की तरफ भी इशारा करता है। लेकिन यह इस बात का सबूत नहीं है कि किसी पूर्व निर्दलीय सांसद ने ₹22,000 करोड़ चुराए और राजनीतिक फायदे के कारण खुद को छूट दिला ली।
अगर आपको इस मामले पर गुस्सा आ रहा है, तो सख्त जांच की मांग कीजिए। यह एक गंभीर और जिम्मेदारी भरा सवाल है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कहानी सिर्फ आंकड़ों को देखकर बनाई गई कहानी है, पूरी फाइल को समझकर नहीं।
(यह लेख मूल रूप से BW Businessworld में प्रकाशित हुआ था। बता दें कि पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं। करीब दो दशकों के पत्रकारिता अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के बीच के गठजोड़ को उजागर किया है। उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं।)
भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट कारोबार लंबे समय से ज्यादा सब्सक्राइबर, ज्यादा डाउनलोड और ज्यादा दर्शक जुटाने की होड़ में रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट कारोबार लंबे समय से ज्यादा सब्सक्राइबर, ज्यादा डाउनलोड और ज्यादा दर्शक जुटाने की होड़ में रहा है। लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। PwC India के Global Entertainment and Media Outlook के मुताबिक, भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री अब सिर्फ बड़े पैमाने पर दर्शक जुटाने के बजाय टिकाऊ कमाई और लंबे समय तक बने रहने वाली वैल्यू पर ज्यादा ध्यान दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का Entertainment & Media (E&M) बाजार 2025 में करीब 25.7 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 36.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इस दौरान बाजार की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वैश्विक मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की करीब 4 प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि दर से लगभग दोगुनी है।
इंटरनेट विज्ञापन सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन
भारत के मीडिया कारोबार की इस ग्रोथ में इंटरनेट विज्ञापन सबसे अहम भूमिका निभा रहा है। PwC के मुताबिक, इंटरनेट विज्ञापन बाजार 2025 के 7.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 14.3 अरब डॉलर हो सकता है। यानी इसमें करीब 13.9 प्रतिशत की CAGR से बढ़ोतरी का अनुमान है।
सर्च और वीडियो विज्ञापन इसके प्रमुख ग्रोथ ड्राइवर होंगे। कंपनियां डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सिर्फ ज्यादा लोगों तक पहुंचने के बजाय अब विज्ञापन से बेहतर कमाई और ज्यादा प्रभावी नतीजे हासिल करने पर जोर दे रही हैं।
OTT में सब्सक्राइबर से आगे बढ़ी सोच
OTT कारोबार भी तेजी से परिपक्व हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का OTT बाजार 2.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 3.6 अरब डॉलर हो सकता है। हालांकि, OTT प्लेटफॉर्म के लिए अब सिर्फ सब्सक्राइबर बढ़ाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य नहीं रह गया है। प्लेटफॉर्म विज्ञापन आधारित प्लान, यूजर्स को लंबे समय तक जोड़े रखने और प्रति यूजर ज्यादा कमाई (Revenue Per User) पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
इसका मतलब है कि OTT कंपनियों के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उनके पास कितने सब्सक्राइबर हैं, बल्कि यह भी है कि वे उन यूजर्स से कितनी टिकाऊ कमाई कर पा रही हैं।
गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स भी तेजी से बढ़ेंगे
भारत में गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स का बाजार भी लगातार मजबूत हो रहा है। PwC के अनुमान के मुताबिक, यह बाजार 2025 के 1.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 2.6 अरब डॉलर हो सकता है।
इन-गेम विज्ञापन और स्पॉन्सरशिप आधारित मॉडल के बढ़ने से इस क्षेत्र में कमाई के नए रास्ते खुल रहे हैं। यह सेक्टर अभी मीडिया कारोबार के दूसरे बड़े हिस्सों से छोटा है, लेकिन इसकी ग्रोथ की रफ्तार काफी तेज है।
AI बनेगा मीडिया कारोबार का अहम हिस्सा
PwC India के मीडिया, एंटरटेनमेंट और स्पोर्ट्स लीडर Sethi के मुताबिक, भारत ने बड़ी संख्या में दर्शक जुटाने की क्षमता पहले ही साबित कर दी है। अब असली चुनौती इस जुड़ाव को लंबे समय तक टिकने वाली कमाई में बदलने की है।
इस बदलाव के केंद्र में Artificial Intelligence (AI) तेजी से अपनी जगह बना रहा है। AI का इस्तेमाल कंटेंट बनाने और उसे दर्शकों तक पहुंचाने के तरीके को बदल रहा है। इसमें डी-एजिंग, अलग-अलग भाषाओं में आवाज तैयार करना, पर्सनलाइजेशन और Generative Engine Optimisation जैसे क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
यानी AI अब सिर्फ एक नई तकनीक या प्रयोग नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे मीडिया कारोबार के पूरे सिस्टम का हिस्सा बन रहा है और कंटेंट बनाने से लेकर उसे खोजने और उससे कमाई करने तक की प्रक्रिया को बदल रहा है।
TV और प्रिंट की पकड़ अभी भी कायम
डिजिटल के तेजी से बढ़ने के बावजूद भारत में पारंपरिक मीडिया को खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। PwC के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में टेलीविजन की कमाई 2025 के 7.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 7.5 अरब डॉलर हो सकती है। इसी तरह प्रिंट मीडिया का कारोबार भी 3.0 अरब डॉलर से बढ़कर 3.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के दर्शकों और विज्ञापनदाताओं के भरोसे की वजह से टीवी और प्रिंट अभी भी अपनी जगह बनाए हुए हैं। कई दूसरे विकसित बाजारों में जहां पारंपरिक मीडिया पर दबाव बढ़ा है, वहीं भारत में इन माध्यमों की पकड़ पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
कनेक्टिविटी पर भी बढ़ेगा बड़ा खर्च
मीडिया और एंटरटेनमेंट के साथ-साथ कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, फाइबर, ब्रॉडबैंड और 5G के विस्तार के साथ कनेक्टिविटी से जुड़ा बाजार 36.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 58.6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी का सीधा फायदा OTT, गेमिंग, डिजिटल विज्ञापन और ऑनलाइन कंटेंट जैसे क्षेत्रों को मिलेगा। ज्यादा लोगों तक तेज इंटरनेट पहुंचने से इन सेवाओं के लिए संभावित दर्शकों और ग्राहकों का आधार भी बढ़ेगा।
क्षेत्रीय भाषाओं और प्रीमियम अनुभवों पर जोर
भारत के मीडिया कारोबार में क्षेत्रीय भाषाओं का कंटेंट भी बड़ा बदलाव ला रहा है। लंबे समय तक जिन दर्शकों को बड़े पैन-इंडिया प्लेटफॉर्म पर्याप्त ध्यान नहीं देते थे, अब वही ऑडियंस नए अवसर पैदा कर रही है।
इसके साथ ही प्रीमियम लाइव इवेंट और खास अनुभवों के लिए भुगतान करने वाले दर्शकों की संख्या भी बढ़ रही है। इससे कंपनियों को यह समझने में मदद मिल रही है कि भारतीय उपभोक्ता सिर्फ मुफ्त कंटेंट ही नहीं चाहता, बल्कि सही कंटेंट और खास अनुभव के लिए भुगतान भी कर सकता है।
अब सिर्फ ग्रोथ नहीं, सही तरीके से ग्रोथ जरूरी
PwC की रिपोर्ट से साफ संकेत मिलता है कि भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। पहले जहां ज्यादा से ज्यादा दर्शक और सब्सक्राइबर जुटाना प्राथमिकता थी, वहीं अब कमाई, यूजर को बनाए रखना, तकनीक, क्षेत्रीय कंटेंट और उपभोक्ता का भरोसा ज्यादा अहम हो गया है।
आने वाले वर्षों में वही कंपनियां बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं, जो नई तकनीक और कंटेंट के साथ मजबूत कारोबारी अनुशासन बनाए रखें और अपने दर्शकों का भरोसा कायम रखें। यानी भारतीय मीडिया इंडस्ट्री की अगली कहानी सिर्फ Scale की नहीं, बल्कि Sustainable Value की होगी।
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने प्रमोटर ग्रुप की कंपनी Sunbright Mauritius Investments Limited को 2,40,59,266 पूरी तरह कन्वर्टिबल वारंट आवंटित किए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE) ने प्रमोटर ग्रुप की कंपनी Sunbright Mauritius Investments Limited को 2,40,59,266 पूरी तरह कन्वर्टिबल वारंट आवंटित किए हैं। कंपनी ने यह आवंटन तरजीही आधार (Preferential Issue) पर किया है। इस आवंटन के तहत ZEE को वारंट सब्सक्रिप्शन के रूप में ₹75.78 करोड़ मिले हैं।
कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि यह आवंटन 27 अगस्त 2026 को Preferential Issue and Allotment Committee के प्रस्ताव के आधार पर किया गया। इससे पहले कंपनी के बोर्ड ने 1 जुलाई 2026 को प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जबकि सदस्यों ने 31 जुलाई 2026 को हुई Extra Ordinary General Meeting में विशेष प्रस्ताव के जरिए इसे मंजूरी दी थी।
₹126 प्रति वारंट की कीमत
ZEE ने प्रत्येक वारंट की कीमत ₹126 तय की है। इसमें ₹31.50 का वारंट सब्सक्रिप्शन मूल्य और ₹94.50 का वारंट एक्सरसाइज मूल्य शामिल है। कंपनी को वारंट जारी करते समय कुल कीमत का 25 प्रतिशत यानी ₹31.50 प्रति वारंट मिल चुका है। 2,40,59,266 वारंट के हिसाब से कंपनी को कुल ₹75,78,66,879 प्राप्त हुए हैं। बाकी 75 प्रतिशत यानी ₹94.50 प्रति वारंट का भुगतान वारंट धारक को वारंट को शेयर में बदलते समय करना होगा।
एक वारंट के बदले मिलेगा एक शेयर
हर वारंट को भविष्य में ZEE के एक पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर में बदला जा सकेगा। वारंट धारक 27 अगस्त 2026 से अधिकतम 18 महीने के भीतर एक या कई चरणों में इन वारंट को शेयरों में बदलने का अधिकार रखता है।अगर वारंट धारक 18 महीने की तय अवधि में इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं करता है, तो ऐसे वारंट समाप्त हो जाएंगे और सब्सक्रिप्शन के समय कंपनी को दी गई रकम जब्त हो जाएगी।
अभी शेयर पूंजी में कोई बदलाव नहीं
ZEE ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इन वारंट के आवंटन से कंपनी की चुकता शेयर पूंजी (Paid-up Share Capital) में कोई बदलाव नहीं हुआ है। शेयर पूंजी में बदलाव तब होगा, जब वारंट को इक्विटी शेयरों में बदला जाएगा।
वारंट के पूरी तरह कन्वर्ट होने पर कंपनी के 2,40,59,266 नए इक्विटी शेयर जारी होंगे। प्रत्येक शेयर का अंकित मूल्य ₹1 होगा और जारी कीमत ₹126 प्रति शेयर होगी, जिसमें ₹125 का प्रीमियम शामिल है।
Sunbright Mauritius Investments को मिला आवंटन
इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ एक निवेशक शामिल है। Sunbright Mauritius Investments Limited को सभी 2.40 करोड़ वारंट आवंटित किए गए हैं।
कंपनी के अनुसार, 21 अगस्त 2026 को हुए पिछले आवंटन के बाद Sunbright Mauritius Investments Limited के नाम 20,94,47,805 शेयर थे, जो पूरी तरह कमजोर आधार (Fully Diluted Basis) पर 17.90 प्रतिशत हिस्सेदारी के बराबर हैं। 27 अगस्त को आवंटित किए गए नए वारंट के पूरी तरह शेयरों में बदलने के बाद इसकी हिस्सेदारी में 1.40 प्रतिशत का अतिरिक्त हिस्सा जुड़ेगा।
कंपनी ने यह गणना इस आधार पर की है कि वर्तमान में जारी सभी कन्वर्टिबल वारंट भविष्य में पूरी तरह इक्विटी शेयरों में बदल जाएंगे।
₹126 की कीमत तय करने में वैल्यूएशन रिपोर्ट का इस्तेमाल
ZEE ने बताया कि वारंट की ₹126 प्रति यूनिट कीमत तय करते समय SEBI के नियमों के मुताबिक रजिस्टर्ड वैल्यूअर से प्राप्त प्राइसिंग रिपोर्ट और वैल्यूएशन रिपोर्ट को ध्यान में रखा गया है। यह पूरा इश्यू Preferential Issue on Private Placement Basis के तहत किया गया है और इसके लिए Companies Act, 2013 तथा SEBI ICDR Regulations के लागू प्रावधानों का पालन किया गया है।
कंपनी के लिए क्या मायने रखता है?
इस सौदे से ZEE को अभी ₹75.79 करोड़ की रकम मिली है। हालांकि, वारंट के शेयरों में बदलने पर कंपनी को बाकी 75 प्रतिशत राशि भी मिलेगी। इससे भविष्य में कंपनी की इक्विटी पूंजी बढ़ेगी और प्रमोटर ग्रुप की हिस्सेदारी भी बढ़ सकती है।
वर्ष 2026 में जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के डर से नौकरियों की चिंता में डूबी है, भारत का एक सेक्टर उलटी दिशा में चल रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वर्ष 2026 में जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के डर से नौकरियों की चिंता में डूबी है, भारत का एक सेक्टर उलटी दिशा में चल रहा है। एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स और Extended Reality, यानी AVGC-XR, का यह उद्योग न सिर्फ टिका हुआ है, बल्कि रफ्तार से दौड़ रहा है।
फरवरी 2026 में बेंगलुरु में आयोजित GAFX-2026 के उद्घाटन पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जो आंकड़ा पेश किया, वह चौंकाने वाला था, GAFX सेक्टर अकेले अगले पांच साल में 20 लाख नौकरियां पैदा कर सकता है। यह सिर्फ एक राज्य की बात थी। राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर और बड़ी है।
कितना बड़ा है मार्केट?
आज भारत का AVGC-XR सेक्टर 2.5 से 3 अरब डॉलर (करीब 25,000 करोड़ रुपये) का है। 2030 तक इसके 26 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, यानी करीब नौ गुना की छलांग। अगर सिर्फ एनिमेशन और VFX की बात करें, तो CII-GT की रिपोर्ट के अनुसार यह सेगमेंट 2026 तक 2.2 अरब डॉलर तक पहुंचने की राह पर है।
एनिमेशन मार्केट पर लंबी नजर डालें तो, भारत का एनिमेशन मार्केट 2025 में 2.4 अरब डॉलर था और 2034 तक 13.95 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, यानी 21.6% सालाना वृद्धि दर (CAGR)।
गेमिंग अकेला एक उदाहरण है: भारतीय गेमिंग मार्केट 2025 में 5.91 अरब डॉलर था और 2034 तक 16.72 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, यानी 14.6% CAGR।
इससे भी बड़ी बात, इस पूरे सेक्टर में अभी सिर्फ 2.6 लाख प्रोफेशनल काम कर रहे हैं, जबकि मांग इससे कहीं ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत फिलहाल वैश्विक AVGC-XR मार्केट में सिर्फ 0.5% हिस्सेदारी रखता है, यानी संभावना अपार है।
नौकरियों का विस्फोट: संख्याएं क्या कहती हैं?
केंद्र सरकार के AVGC Promotion Task Force की रिपोर्ट के अनुसार, यह सेक्टर आने वाले दस साल में 20 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा करेगा। ORF (Observer Research Foundation) की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट इस अनुमान को और ऊपर रखती है, 2032 तक 23 लाख नौकरियां। स्क्लि इंडिया मिशन का लक्ष्य अगले दस वर्षों में इस सेक्टर के लिए 20 लाख प्रोफेशनल तैयार करना है।
हर साल, अकेले एनिमेशन और VFX सेक्टर में 1.6 लाख नए पद बनने का अनुमान है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, सिर्फ रिटायरमेंट और करियर बदलाव की वजह से हर साल करीब 6,700 एनिमेशन पद रिक्त होते हैं, और यह मार्केट विस्तार से अलग है।
मार्च 2026 में तमिलनाडु ने अपनी AVGC-XR Policy 2026 जारी की, जिसका लक्ष्य 2030 तक 200 नए स्टार्टअप खड़े करना और राष्ट्रीय AVGC-XR मार्केट का 20% हिस्सा, यानी करीब 2 लाख नौकरियां, हासिल करना है। जनवरी 2026 में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घोषणा की कि राजधानी में AVGC-XR का पहला National Centre of Excellence (NCoE) का क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किया जाएगा।
AI का खतरा, असलियत क्या है?
यहां सबसे बड़ा सवाल है जो हर छात्र और प्रोफेशनल पूछता है: क्या AI मेरी नौकरी ले लेगा?
उत्तर जटिल है, हां और नहीं, दोनों।
एनिमेशन Guild (IATSE Local 839) द्वारा कराए गए CVL Economics अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर फिल्म, टेलीविजन और एनिमेशन सेक्टर में करीब 1,18,500 नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं, यानी खत्म होंगी, समेकित होंगी, या बदल जाएंगी। यही आंकड़ा बताता है कि 21.4% Film, TV और एनिमेशन नौकरियों पर AI का सीधा असर पड़ेगा।
कौन-सी नौकरियां सबसे ज्यादा खतरे में हैं?
2D एनिमेशन में In-betweening, Rotoscoping, Background Generation और Lip-sync जैसे काम AI तेजी से करने लगा है। Luminate Intelligence की एनिमेशन + AI Special Report (2025) में Concept Artists, Storyboard Artists, VFX Artists और Game Developers को सबसे अधिक प्रभावित होने वाली भूमिकाओं में गिना गया है।
लेकिन भारत की कहानी अलग है।
भारतीय एनिमेशन स्टूडियो AI टूल्स को वर्कफोर्स घटाने के लिए नहीं, बल्कि प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, स्टूडियो अधिक काम ले रहे हैं, कम लोग नहीं रख रहे। नतीजा: नेट हायरिंग बढ़ रही है।
कौन-सी नई नौकरियां बन रही हैं?
AI के आने से कुछ नई भूमिकाएं तेजी से उभर रही हैं, AI एनिमेशन Tool Specialist, Technical Director (TD), VFX Supervisor और Generative AI Pipeline Engineer। जो प्रोफेशनल Adobe Firefly, Runway ML, Houdini और Unreal Engine जैसे AI टूल्स के साथ काम कर सकते हैं, उनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
Generative AI का एनिमेशन सेगमेंट वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रहा है, विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार यह मार्केट 2023 में लगभग 1.3 से 1.8 अरब डॉलर का था और 2033 तक 36–40% CAGR की दर से बढ़ने का अनुमान है। यह वृद्धि नौकरियां हटाने की नहीं, नए अवसर बनाने की कहानी है।
सैलरी: कितना मिलता है?
2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

3D एनिमेशन में Fresher को ₹2.5–4.5 LPA मिलते हैं, जबकि अनुभवी 3D Animator ₹10 LPA से अधिक कमा सकते हैं। VFX Supervisor जैसे पदों पर ₹25 LPA से ऊपर के पैकेज सामान्य होते जा रहे हैं।
किन स्किल्स की सबसे अधिक मांग है?
2026 में इंडस्ट्री इन्हें तलाश रही है: Unreal Engine, Houdini, Maya, Nuke, Python Scripting, AI-assisted एनिमेशन workflows, Real-time Rendering, और AR/VR Development। सिर्फ डिग्री नहीं, पोर्टफोलियो ही असली पहचान है।
छोटे शहरों का नया करियर
"एनिमेशन के लिए मुंबई या बेंगलुरु ही जाना होगा", यह धारणा तेजी से टूट रही है।
5G नेटवर्क के विस्तार और सस्ते स्मार्टफोन की बदौलत टियर-2 और टियर-3 शहरों में गेमिंग और Digital Content तेजी से फैल रहे हैं। AIGDF (All India Game Developers Forum) के सर्वे के अनुसार, अहमदाबाद, कोच्चि, सूरत और राजकोट जैसे शहर नए Game Development Hub बन रहे हैं। महाराष्ट्र की AVGC-XR Policy 2025 में Nashik, Kolhapur और Nagpur जैसे टियर-2 शहरों में भी AVGC-XR Park बनाने की योजना है। मुरादाबाद, कानपुर, इंदौर, या जयपुर जैसे शहरों में बैठकर Freelancing, Work From Home और Remote Project लेना अब व्यावहारिक हकीकत है।
Freelancing प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय Animators और VFX Artists की मांग इसलिए बढ़ रही है क्योंकि भारत वैश्विक स्तर पर 40 से 60% सस्ती एनिमेशन और VFX सेवाएं देता है, और यह आंकड़ा सरकार की NewsOnAir रिपोर्ट (नवंबर 2025) में भी दर्ज है।
सरकार क्या कर रही है?
सरकारी तंत्र इस बार पीछे नहीं है:
केंद्र स्तर पर: AVGC Promotion Task Force (अप्रैल 2022) ने रोडमैप तैयार किया। 2024 में मुंबई में Indian Institute of Creative Technologies (IICT) को National Centre of Excellence के रूप में स्थापित किया गया, Google, YouTube, Meta, Adobe, Microsoft, NVIDIA और Netflix ने इसके पाठ्यक्रम में साझेदारी की है। Union Budget 2026-27 में ₹250 करोड़ की राशि से 15,000 माध्यमिक स्कूलों और 500 कॉलेजों में AVGC Content Creator Labs खोलने की घोषणा की गई।
राज्य स्तर पर: कर्नाटक की AVGC-XR Policy 2024–2029 पहले से लागू है। महाराष्ट्र ने सितंबर 2025 में ₹3,268 करोड़ के वित्तीय समर्थन के साथ AVGC-XR Policy 2025 पारित की, लक्ष्य 25 साल में ₹50,000 करोड़ का निवेश और 2 लाख नौकरियां। तमिलनाडु की AVGC-XR Policy 2026 में ₹50 करोड़ की लागत से ELCOT Viyan AVGC-XR Centre of Excellence का ऐलान हुआ। दिल्ली में जनवरी 2026 में NCoE का क्षेत्रीय केंद्र बनाने की घोषणा हुई।
स्किल गैप: सबसे बड़ी चुनौती
यहां एक कड़वी सच्चाई है। भारत वैश्विक AVGC-XR मार्केट में महज 0.5% हिस्सेदारी रखता है, और इसकी सबसे बड़ी वजह है प्रशिक्षित प्रतिभा की कमी।
IICT मुंबई जैसे संस्थान इस गैप को भरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अधिकांश कॉलेज वही पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं जो इंडस्ट्री की जरूरतों से पिछड़ा है। Unreal Engine, AI-powered workflows और Real-time Rendering, जिनकी इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा जरूरत है, वे अभी भी ज्यादातर कॉलेजों में नदारद हैं।
हॉलीवुड से Netflix तक, भारतीय Animators की बढ़ती मांग
भारतीय Animators की वैश्विक मांग इसलिए है क्योंकि यहां तीन चीजें एक साथ मिलती हैं, कुशल कार्यबल, कम लागत, और बड़े प्रोजेक्ट्स संभालने की क्षमता। Brahmastra जैसी फिल्म में 4,500 से अधिक VFX Shots थे और बजट का 25–30% हिस्सा VFX पर खर्च हुआ। FICCI-EY रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय VFX स्टूडियो का करीब 70% राजस्व अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों से आता है।
एनिमेशन, भारत का अगला IT सेक्टर?
IT इंडस्ट्री ने 1990 के दशक में जो किया, लाखों युवाओं को घर बैठे वैश्विक मार्केट से जोड़ा, वही AVGC-XR सेक्टर 2020 के दशक में कर सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार माध्यम Code नहीं, Creativity है।
आंकड़े साफ बोलते हैं कि मार्केट बढ़ रहा है, सरकार सक्रिय है, वैश्विक मांग है, और नौकरियां आ रही हैं। AI खतरा नहीं बल्कि नई स्किल की मांग है। टियर-2 शहरों के युवाओं के लिए यह फील्ड अब दूर नहीं।
बस एक काम बाकी है, स्किल गैप भरना। जो युवा आज Unreal Engine, Houdini और AI एनिमेशन Tools सीख रहे हैं, वही कल की इस इंडस्ट्री की रीढ़ बनेंगे।
मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX Limited अपने इक्विटी शेयरों के बायबैक यानी शेयरों की वापस खरीद पर विचार करने जा रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मल्टीप्लेक्स कंपनी PVR INOX Limited अपने इक्विटी शेयरों के बायबैक यानी शेयरों की वापस खरीद पर विचार करने जा रही है। कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंजों को दी जानकारी में बताया कि इस प्रस्ताव पर फैसला लेने के लिए 31 अगस्त 2026, सोमवार को कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक होगी।
कंपनी ने बताया कि बैठक में 10 रुपये अंकित मूल्य वाले इक्विटी शेयरों के बायबैक के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। इसके साथ ही बायबैक से जुड़े अन्य जरूरी और संबंधित मामलों पर भी चर्चा होगी।
PVR INOX ने यह जानकारी SEBI Listing Regulations, 2015 के Regulation 29(1)(b) के तहत दी है। कंपनी ने कहा है कि 31 अगस्त को होने वाली बोर्ड बैठक खत्म होने के तुरंत बाद इसके नतीजे और लिए गए फैसले के बारे में स्टॉक एक्सचेंजों को जानकारी दी जाएगी।
2 सितंबर तक ट्रेडिंग विंडो बंद
शेयर बायबैक से जुड़े बोर्ड फैसले को देखते हुए कंपनी ने अपने अधिकारियों और संबंधित लोगों के लिए सिक्योरिटीज में ट्रेडिंग विंडो भी बंद कर दी है। कंपनी के मुताबिक, 25 अगस्त से 2 सितंबर 2026 तक कंपनी के नामित व्यक्तियों और उनके करीबी रिश्तेदारों के लिए कंपनी की सिक्योरिटीज में कारोबार की अनुमति नहीं होगी।
यह कदम SEBI (Prohibition of Insider Trading) Regulations, 2015 और कंपनी की इनसाइडर ट्रेडिंग को लेकर बनी आचार संहिता के तहत उठाया गया है।
निवेशकों की नजर बोर्ड के फैसले पर
PVR INOX के बायबैक प्रस्ताव की खबर के बाद अब निवेशकों की नजर 31 अगस्त को होने वाली बोर्ड बैठक पर रहेगी। हालांकि, कंपनी ने अभी यह नहीं बताया है कि अगर बायबैक को मंजूरी मिलती है तो कितने शेयर वापस खरीदे जाएंगे, बायबैक की कीमत क्या होगी या इसके लिए कितनी रकम खर्च की जाएगी।
इन सभी जानकारियों पर बोर्ड की बैठक में फैसला होने के बाद स्थिति साफ होगी। कंपनी के मुताबिक, बैठक के नतीजे की जानकारी बैठक समाप्त होने के तुरंत बाद स्टॉक एक्सचेंजों को दी जाएगी।
कुछ प्रोफेशनल करियर बनाते हैं। लेकिन विवेक मल्होत्रा जैसे लोग विरासत गढ़ते हैं- ब्रैंड्स, रणनीतियों और विचारों की ऐसी विरासत, जो इंडस्ट्री और दर्शकों दोनों पर एक स्थायी छाप छोड़ती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कुछ प्रोफेशनल करियर बनाते हैं। लेकिन विवेक मल्होत्रा जैसे लोग विरासत गढ़ते हैं- ब्रैंड्स, रणनीतियों और विचारों की ऐसी विरासत, जो इंडस्ट्री और दर्शकों दोनों पर एक स्थायी छाप छोड़ती है। उनके जन्मदिन पर आज यह सही समय है कि हम ठहरकर उस सफर का जश्न मनाएं, जो कभी साधारण नहीं रहा।
विवेक मल्होत्रा आज इंडिया टुडे ग्रुप में ग्रुप CMO और COO (स्ट्रैटेजी) के रूप में वह शख्सियत हैं, जिनका सफर मीडिया और मार्केटिंग की दुनिया में एक दशक से भी ज़्यादा गहरे अनुभव और नेतृत्व का साक्षी रहा है। उनके करियर की कहानी सिर्फ पदों और जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं, बल्कि उस जुनून की दास्तान है जिसने हर भूमिका को एक नई दिशा दी। चाहे टीवी टुडे में मार्केटिंग और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को नई पहचान देना हो, या फिर कंज़्यूमर रेवेन्यू को मज़बूत बनाना, विवेक मल्होत्रा ने हर बार साबित किया है कि वह बदलाव के दौर में सिर्फ परिस्थितियों को संभालते नहीं, बल्कि उन बदलावों को गढ़ते भी हैं। उनकी सोच और रणनीतियां हमेशा यह बताती हैं कि असली लीडर वही है, जो रास्ता बनने से पहले ही उसे देख ले और दूसरों के लिए वह राह आसान कर दे।
विवेक मल्होत्रा को अलग पहचान उनकी क्रॉस-मीडिया विजन देती है। उन्होंने ऐसे उपक्रमों का नेतृत्व किया है जो टेलीविजन, प्रिंट, डिजिटल, कनेक्टेड डिवाइसेज और ब्रैंड अनुभवों में इनोवेशन तक फैले हुए हैं। उनका काम मीडिया के हर कोने को छू चुका है- BloombergUTV में उन्होंने मार्केटिंग, पीआर और रिसर्च को संभाला, Star News में उन्होंने इनसाइट जनरेशन को उपभोक्ता अनुप्रयोग के साथ जोड़ने की शक्ति को खोजा। वहीं CNBC-TV18 में उन्होंने रणनीति, राजस्व और मार्केटिंग के बीच भारत की सबसे स्पष्ट कार्यात्मक सीमाओं में से एक को आकार देने में मदद की, जिससे दीर्घकालिक इनोवेशन को दिशा मिली।
डेटा-आधारित इनसाइट में गहरा विश्वास रखने वाले विवेक मल्होत्रा IAMAI के डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग काउंसिल का हिस्सा रहे हैं, IRS तकनीकी समिति के सदस्य रहे हैं और भारत के सबसे बड़े उपभोक्ता शोध अध्ययनों में योगदान दिया है। वह ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के बोर्ड में भी सेवा दे चुके हैं और न्यूयॉर्क में ऐडवर्टाइजिंग रिसर्च फाउंडेशन से भी जुड़े रहे हैं।
उनका ट्रैक रिकॉर्ड कई साहसी पहलों से भरा है- भारत का पहला कनेक्टेड डिवाइसेज स्ट्रीम लॉन्च करना, हिन्दुस्तान टाइम्स काला घोड़ा फेस्टिवल और एजेंडा आजतक जैसी पहल की शुरुआत करना और इंडिया टुडे तथा न्यूजX जैसे प्रतिष्ठित ब्रैंड्स को विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर विस्तार देना। चाहे वह IPL जैसी स्पॉन्सरशिप हो, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में इनोवेशन हो या YouTube, Facebook और उभरते डिजिटल इकोसिस्टम्स पर उपभोक्ता यात्राओं को नए सिरे से परिभाषित करना- विवेक ने लगातार ऐसे रास्ते खोजे हैं जिनसे ब्रैंड्स हमेशा आगे बने रहें।
बोर्डरूम की चर्चाओं, समितियों की बैठकों और रणनीति के भारी-भरकम कागज़ों से आगे बढ़कर, विवेक मल्होत्रा की असली पहचान उनकी निरंतर खुद को नया गढ़ने की क्षमता है। वे सिर्फ ब्रांड्स को नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली यादों और अनुभवों को भी नया जीवन देते हैं।
समाचार4मीडिया की ओर से विवेक मल्होत्रा को उनके जन्मदिन की ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने जी ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की संशोधित रिपेमेंट योजना को मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने जी ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा की संशोधित रिपेमेंट योजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले सिर्फ ₹6.5 करोड़ का भुगतान किया जाएगा। इस फैसले से कर्जदाताओं को उनके स्वीकार किए गए बकाये का करीब 0.03 प्रतिशत ही वापस मिलेगा।
NCLT के सदस्य (न्यायिक) निलेश शर्मा ने मंगलवार को ट्रिब्यूनल के तीसरे सदस्य के तौर पर यह आदेश पारित किया। इसके साथ ही Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) की धारा 114 के तहत रिपेमेंट योजना को लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।
यह फैसला NCLT की मूल दो सदस्यीय बेंच के विभाजित फैसले के बाद आया है। दोनों सदस्यों की राय अलग होने के बाद NCLT के अध्यक्ष ने निलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया, ताकि विवादित मुद्दों पर फैसला किया जा सके।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रिब्यूनल ने कर्जदाताओं की आपत्तियों के बावजूद समाधान योजना को मंजूरी दी है। कर्जदाताओं ने योजना के तहत प्रस्तावित बेहद कम रिकवरी पर सवाल उठाए थे। यह आदेश यह भी बताता है कि IBC के तहत जरूरी कर्जदाता मंजूरी मिलने के बाद किसी रिपेमेंट योजना की समीक्षा करते समय NCLT की भूमिका कितनी सीमित है।
कर्जदाताओं ने ₹6.5 करोड़ के भुगतान को दी चुनौती
LIC Housing Finance (LICHFL) ने इस योजना के खिलाफ सबसे प्रमुख आपत्ति दर्ज कराई थी। कंपनी ने दलील दी थी कि प्रस्तावित रिकवरी “व्यवहारिक नहीं है और कानूनन भी सही नहीं है।”
NCLT के आदेश में दर्ज दलीलों के अनुसार, डॉ. चंद्रा के खिलाफ स्वीकार किए गए कुल दावे करीब ₹22,006.57 करोड़ थे। इसके मुकाबले रिपेमेंट योजना में कर्जदाताओं के लिए ₹6.25 करोड़ और प्रक्रिया से जुड़े खर्च के लिए ₹25 लाख का प्रस्ताव रखा गया था। इस तरह कुल प्रस्तावित राशि ₹6.5 करोड़ थी।
LICHFL के लिए स्वीकार किए गए दावे और प्रस्तावित भुगतान के बीच अंतर काफी बड़ा था। उसका स्वीकार किया गया दावा ₹1,322.39 करोड़ था, जबकि प्रस्तावित भुगतान सिर्फ ₹38.09 लाख था। यह उसके कुल स्वीकार किए गए बकाये का करीब 0.028 प्रतिशत है।
LICHFL ने दलील दी कि इतनी मामूली रिकवरी योजना को मंजूरी देने का आधार नहीं बन सकती।
कर्जदाता ने प्रस्तावित ₹6.5 करोड़ के भुगतान की निश्चितता पर भी सवाल उठाया। उसने बताया कि रिपेमेंट योजना में इस राशि को अंतिम राशि के बजाय केवल संकेतात्मक बताया गया था। कर्जदाता के अनुसार, इससे प्रस्ताव अस्थायी और अंतिम रूप से तय नहीं माना जा सकता और इसलिए ट्रिब्यूनल इसे मंजूरी नहीं दे सकता।
NCLT ने कर्जदाताओं के व्यावसायिक फैसले को माना अहम
हालांकि, तीसरे सदस्य वाली बेंच ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया और कर्जदाताओं के वोटिंग परिणाम को काफी महत्व दिया। विरोध करने वाले कर्जदाताओं के पास कुल वोटिंग शेयर 20 प्रतिशत से भी कम था, जबकि रिपेमेंट योजना को 80.81 प्रतिशत वोटिंग शेयर रखने वाले कर्जदाताओं का समर्थन मिला था।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि उसकी भूमिका कर्जदाताओं के व्यावसायिक फैसले को अपनी इस राय से बदलना नहीं है कि समझौते के तहत मिलने वाली राशि पर्याप्त है या नहीं।
NCLT ने कहा, “कर्जदाताओं का व्यावसायिक फैसला कानून के दायरे में रहता है, उससे बाहर नहीं।”
144 पन्नों के इस आदेश में यह भी कहा गया कि दिवालिया समाधान प्रक्रिया में Adjudicating Authority की भूमिका निगरानी करने, सुधारात्मक कार्रवाई करने और न्यायिक समीक्षा तक सीमित है। जब तक कानून विशेष रूप से इसकी मांग न करे, उसकी भूमिका जांच करने वाली संस्था की नहीं है।
ट्रिब्यूनल ने कहा, “NCLT कर्जदाताओं की व्यावसायिक समझ को अपनी समझ से नहीं बदलता और न ही ऐसे आरोपों की व्यापक जांच करता है, जिनके समर्थन में भरोसेमंद सामग्री मौजूद नहीं है। उसकी भूमिका निगरानी, सुधारात्मक और न्यायिक है, न कि जांच करने वाली, जब तक कानून इसकी मांग न करे।”
व्यक्तिगत दिवालियापन और डॉ. चंद्रा की संपत्ति की वैल्यू
ट्रिब्यूनल ने यह भी देखा कि डॉ. चंद्रा की निजी संपत्ति की कीमत कितनी है और प्रस्तावित समाधान से कर्जदाताओं को कितना फायदा मिल सकता है। आदेश के अनुसार, Resolution Professional की ओर से किए गए मूल्यांकन में डॉ. चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति की कीमत रिपेमेंट योजना के तहत दी जा रही राशि से काफी कम बताई गई थी।
ट्रिब्यूनल ने माना कि रिपेमेंट योजना को खारिज करने से जरूरी नहीं कि विरोध करने वाले कर्जदाताओं को इससे ज्यादा पैसा मिल जाए। इसके बजाय, डॉ. चंद्रा को दिवालिया प्रक्रिया में भेजा जा सकता है, जिससे वित्तीय स्थिति सुधारकर कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता और सीमित हो सकती है।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर रिपेमेंट योजना मंजूर होती है और डॉ. चंद्रा का दिवालियापन मामला सुलझ जाता है, जिससे वह दोबारा वित्तीय स्थिरता की स्थिति में आ सकें, तो कर्जदाताओं के पास मुख्य कर्जदारों से अपनी रकम वसूलने का बेहतर मौका हो सकता है।
NCLT ने कहा, “अगर योजना मंजूर होती है और कर्जदार का दिवालियापन सुलझ जाता है और वह दोबारा अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है, तो आपत्ति करने वाले कर्जदाताओं के पास मुख्य कर्जदारों से अपना कर्ज सीधे वसूलने का बेहतर मौका होगा।” इस सोच में योजना के तहत मिलने वाली तत्काल रिकवरी की तुलना दिवालिया प्रक्रिया से मिलने वाली कम या अनिश्चित रिकवरी की संभावना से की गई है।
मंजूर योजना का पालन विरोध करने वाले कर्जदाताओं को भी करना होगा
इस आदेश का एक अहम हिस्सा IBC की धारा 115 के तहत मंजूर रिपेमेंट योजना के सभी कर्जदाताओं पर लागू होने से जुड़ा है। NCLT ने कहा कि एक बार योजना मंजूर हो जाने के बाद यह इसमें शामिल सभी कर्जदाताओं पर लागू होगी, जिसमें वे कर्जदाता भी शामिल हैं जिन्होंने योजना के खिलाफ वोट किया था। इसका मतलब है कि विरोध करने वाले कर्जदाता मंजूर की गई भुगतान शर्तों को खारिज करके योजना से बाहर अपने पूरे पुराने दावे की अलग से वसूली नहीं कर सकते।
ट्रिब्यूनल ने कहा, “एक बार धारा 114 के तहत रिपेमेंट योजना मंजूर हो जाने के बाद, उसका बाध्यकारी प्रभाव कोड की धारा 115 के तहत तय होता है। Adjudicating Authority यानी NCLT ऐसी योजना को केवल उन कर्जदाताओं पर लागू नहीं कर सकता, जिन्होंने इसके पक्ष में वोट किया है और विरोध करने वाले कर्जदाताओं को अपने पूरे मूल कर्ज की स्वतंत्र रूप से वसूली करने की अनुमति नहीं दे सकता।”
आदेश में आगे कहा गया कि धारा 115 मंजूर रिपेमेंट योजना को चुनिंदा कर्जदाताओं पर लागू करने की अनुमति नहीं देती।
ट्रिब्यूनल ने कहा, “इसलिए मंजूर योजना में शामिल सभी कर्जदाताओं पर यह लागू होगी, चाहे उन्होंने इसका समर्थन किया हो या विरोध। विरोध करने वाले कर्जदाताओं को योजना से बाहर जाकर पूरा कर्ज वसूलने की छूट देना कानून की व्यवस्था को कमजोर करेगा और कर्जदाताओं के साथ असमान व्यवहार होगा।”
इस फैसले से उन कर्जदाताओं के लिए स्थिति काफी स्पष्ट हो जाती है, जो जरूरी वोटिंग सीमा हासिल कर चुकी रिपेमेंट योजना के खिलाफ वोट करते हैं। एक बार ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिलने के बाद योजना में शामिल सभी कर्जदाताओं पर समान रूप से लागू होगी।
कर्जदाताओं की संशोधित सूची तैयार होगी
योजना को मंजूरी देते हुए ट्रिब्यूनल ने Resolution Professional को निर्देश दिया कि आदेश में बताए गए बाहर किए गए दावों को हटाने के बाद कर्जदाताओं की संशोधित और अंतिम सूची तैयार करके रिकॉर्ड पर रखी जाए। Resolution Professional को मंजूर रिपेमेंट योजना की राशि के दोबारा वितरण से जुड़े जरूरी कदम भी उठाने होंगे।
NCLT ने कहा, “ऊपर दिए गए निष्कर्षों को देखते हुए, Personal Guarantor की ओर से पेश की गई रिपेमेंट योजना को मेरी राय में Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 114 के तहत मंजूरी दी जानी चाहिए।” ट्रिब्यूनल ने दोहराया कि IBC की धारा 115 के अनुसार मंजूर योजना सभी कर्जदाताओं पर लागू होगी, चाहे उन्होंने इसका समर्थन किया हो या विरोध। अब मामला मूल डिवीजन बेंच के पास जाएगा, जो Companies Act, 2013 की धारा 419(5) के तहत बहुमत की राय के आधार पर औपचारिक आदेश जारी करेगी।
सुभाष चंद्रा से जुड़ा यह फैसला भारत में तेजी से विकसित हो रहे व्यक्तिगत दिवालियापन और बैंकruptcy के व्यापक ढांचे के बीच आया है। खास तौर पर कॉरपोरेट कर्ज के प्रमोटर्स और Personal Guarantors पर इसके इस्तेमाल को लेकर यह मामला महत्वपूर्ण है। यह फैसला कर्जदाताओं की ज्यादा रिकवरी की उम्मीद और IBC के सामूहिक कर्जदाता निर्णय तथा ऐसे समाधान पर जोर के बीच के अंतर को दिखाता है, जहां लिक्विडेशन या दिवालियापन से शायद ज्यादा फायदा न मिले।
हालांकि, डॉ. चंद्रा के मामले में कर्जदाताओं के लिए तत्काल रिकवरी उनके कुल स्वीकार किए गए दावों का बेहद छोटा हिस्सा है। ₹22,006.57 करोड़ के मुकाबले ₹6.5 करोड़ की रिकवरी होगी। यानी रिकवरी करीब 0.03 प्रतिशत है, जबकि करीब 99.97 प्रतिशत राशि का हेयरकट होगा।