AAAI लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड को लेकर शुरू हुई चर्चा ने भारतीय विज्ञापन जगत के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है- आखिर भारत का विज्ञापन उद्योग किस तरह की उपलब्धियों का सम्मान करता है?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
AAAI लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड को लेकर शुरू हुई चर्चा ने भारतीय विज्ञापन जगत के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है- आखिर भारत का विज्ञापन उद्योग किस तरह की उपलब्धियों का सम्मान करता है?
हम अच्छे विचारों, शानदार कैंपेन और उन्हें बनाने वाले क्रिएटिव लोगों का सम्मान करते हैं, और यह बिल्कुल सही भी है। लेकिन विज्ञापन एजेंसियां सिर्फ क्रिएटिव संस्थान नहीं होतीं, वे बड़े कारोबार भी होती हैं। उन्हें ऐसे लीडर्स की जरूरत होती है, जो प्रतिभा को बड़े स्तर तक ले जा सकें, रचनात्मक महत्वाकांक्षा को मजबूत आर्थिक आधार दे सकें, ग्राहकों के लिए नई क्षमताएं विकसित कर सकें और भारतीय मैनेजमेंट की सोच और नेतृत्व को दुनिया भर में स्थापित कर सकें।
यही वजह है कि निर्विक सिंह का सम्मान भारतीय विज्ञापन उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी और योग्य लीडर का योगदान कम है। सम्मान किसी एक के हिस्से की चीज नहीं होता। बल्कि यह योगदान की व्यापक और अधिक न्यायपूर्ण परिभाषा को स्वीकार करने की बात है। अगर भारतीय एजेंसी कारोबार के आधुनिक इतिहास और उसे बेहतर ढांचा, व्यावसायिक अनुशासन तथा वैश्विक महत्वाकांक्षा देने वाले भारतीय लीडर्स की चर्चा होगी, तो निर्विक सिंह का नाम उसके बिना अधूरा रहेगा।
मेरा निर्विक सिंह के साथ कई वर्षों का जुड़ाव रहा है और कई महत्वपूर्ण मौकों पर हमारे बीच भरोसे का रिश्ता बना। उनके प्रति मेरा सम्मान सिर्फ इसलिए नहीं है कि उन्होंने बड़े-बड़े पद संभाले। मैंने यह भी देखा है कि जिन लोगों और संस्थानों पर उन्हें भरोसा होता है, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए वह अपनी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा लगाने से भी पीछे नहीं हटते।
साल 2009 में जब एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ने भारत में उस समय क्रेन कम्युनिकेशंस के स्वामित्व वाली प्रतिष्ठित पत्रिका Advertising Age के साथ कंटेंट पार्टनरशिप की थी, तब निर्विक सिंह और प्रसून जोशी ने इस साझेदारी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। निर्विक ने उस समय क्रेन कम्युनिकेशंस के अध्यक्ष और Advertising Age के एडिटर-इन-चीफ रेंस क्रेन से हमारे बारे में सकारात्मक बात की। उनकी सिफारिश का काफी महत्व था और उसने बड़ा फर्क पैदा किया।
ऐसा ही उनका स्वभाव साल 2013 के आखिर में भी देखने को मिला, जब मैं ABP से BW बिजनेसवर्ल्ड के अधिग्रहण की प्रक्रिया में था। उस समय निर्विक सिंह ने मेरा समर्थन किया और ABP के प्रमोटर्स से मेरे बारे में सकारात्मक बात की। ऐसा करना उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि गंभीर और दूरदर्शी लीडर जानते हैं कि उद्योग तभी आगे बढ़ता है, जब भरोसेमंद लोग दूसरे भरोसेमंद लोगों का साथ देते हैं और अपने संगठन से आगे बढ़कर भी संस्थाओं को मजबूत बनाने में योगदान करते हैं।
ये भले ही मेरी निजी यादें हों, लेकिन इनसे मिलने वाला सबक पूरी तरह पेशेवर है। नेतृत्व सिर्फ इस बात का नाम नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने लिए क्या बनाता है। असली नेतृत्व यह भी है कि वह दूसरों के लिए क्या संभव बनाता है।
विज्ञापन कारोबार को नई दिशा देने वाले लीडर
निर्विक सिंह ने अपने करियर की शुरुआत लिप्टन इंडिया से की। इसके बाद उन्होंने HTA में काम किया और फिर उनका सबसे महत्वपूर्ण सफर त्रिकाया और ग्रे (Grey) के साथ जुड़ा।
रवि गुप्ता ने जब त्रिकाया का नया कोलकाता कार्यालय खोला, तब केवल 26 वर्ष की उम्र में उसकी जिम्मेदारी निर्विक सिंह को सौंपी गई। उनके नेतृत्व में यह कार्यालय तेजी से आगे बढ़ा और लगातार चार वर्षों तक एजेंसी ऑफ द ईयर का खिताब जीतने में सफल रहा।
इन उपलब्धियों ने उनके उस गुण को सामने ला दिया, जिसने आगे चलकर उनके पूरे करियर को परिभाषित किया- लोगों, ग्राहकों, नए विचारों और व्यावसायिक प्रदर्शन को एक साथ जोड़ने की उनकी क्षमता।
साल 1997 में रवि गुप्ता के निधन के बाद निर्विक सिंह को त्रिकाया ग्रे की जिम्मेदारी ऐसे समय मिली, जब कंपनी आर्थिक रूप से बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही थी। आसान रास्ता यह था कि एजेंसी की बड़ी बिलिंग्स को बनाए रखा जाए और यह दिखाया जाए कि आकार ही ताकत है। लेकिन उन्होंने कठिन रास्ता चुना।
उन्होंने ग्राहकों का भरोसा कायम रखा, खर्चों में कटौती की, कर्मचारियों की संख्या कम की और उन दर्जनों खातों (Accounts) को छोड़ दिया, जिनसे एजेंसी को लाभ नहीं हो रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि साल 2000 तक कंपनी घाटे से बाहर निकल आई।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारतीय विज्ञापन उद्योग को एक नई सोच दी। अगर बिलिंग्स से वास्तविक मूल्य नहीं बनता, तो उनका कोई मतलब नहीं है। कमजोर आर्थिक आधार पर कोई एजेंसी लंबे समय तक बेहतरीन काम नहीं कर सकती, अच्छे लोगों को आकर्षित नहीं कर सकती और नई क्षमताओं में निवेश भी नहीं कर सकती। निर्विक सिंह ने विज्ञापन को हमेशा एक गंभीर कारोबार की तरह देखा, लेकिन उसे केवल आंकड़ों और स्प्रेडशीट तक सीमित नहीं किया।
वे टोटल कम्युनिकेशंस कंपनी की अवधारणा के शुरुआती समर्थकों में भी थे। उनका मानना था कि विज्ञापन, पब्लिक रिलेशंस, डायरेक्ट मार्केटिंग, इंटरएक्टिव, इवेंट्स, हेल्थकेयर और अन्य विशेषज्ञ सेवाएं अलग-अलग हिस्सों में नहीं रह सकतीं, क्योंकि ग्राहकों की जरूरतें लगातार जटिल होती जा रही थीं।
उनके इस दृष्टिकोण ने भारतीय विज्ञापन उद्योग को संस्थापक-आधारित एजेंसियों से आगे बढ़ाकर आधुनिक और एकीकृत कम्युनिकेशन ग्रुप्स की दिशा में ले जाने में मदद की। यही कारण है कि उन्हें केवल एजेंसी लीडर नहीं, बल्कि एक सच्चा बिजनेस लीडर भी कहा जाता है। वे उत्पाद को भी समझते थे और उस उत्पाद के पीछे खड़े पूरे कारोबार को भी।
भारतीय लीडर से वैश्विक नेतृत्व तक का सफर
महज 33 वर्ष की उम्र में निर्विक सिंह ग्रे इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) बन गए। इसके बाद उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं और उन्होंने दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, एशिया-प्रशांत, मध्य पूर्व और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों का नेतृत्व किया।
साल 2019 में उन्हें ग्रे ग्रुप का नए पद ग्लोबल चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) बनाया गया। बाद में उन्होंने प्रेसिडेंट इंटरनेशनल की जिम्मेदारी भी संभाली, जिसके तहत यूरोप, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया-प्रशांत जैसे बड़े बाजार उनके नेतृत्व में आए।
उनका यह सफर सिर्फ व्यक्तिगत पदोन्नति की कहानी नहीं है। उन्होंने साबित किया कि भारत में विकसित व्यावसायिक समझ और रणनीतिक नेतृत्व दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में भी सफल हो सकता है, बड़े ग्राहकों के साथ काम कर सकता है और कई महाद्वीपों में नई क्षमताओं का निर्माण कर सकता है।
उन्होंने चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में अधिग्रहण (Acquisitions) का नेतृत्व किया। इससे ग्रे की डिजिटल, ई-कॉमर्स, डेटा, शॉपर मार्केटिंग और मार्केटिंग टेक्नोलॉजी जैसी क्षमताएं और मजबूत हुईं।
उन्होंने ऐसे समय में ग्रे के बॉर्डरलेस और इंटीग्रेटेड मॉडल को आगे बढ़ाया, जब ग्राहक और उपभोक्ता एजेंसियों की भौगोलिक सीमाओं और पारंपरिक कार्यक्षेत्रों को महत्व देना छोड़ चुके थे।
भारतीय विज्ञापन जगत ने पियूष पांडे और प्रसून जोशी को वैश्विक स्तर पर भारतीय रचनात्मक नेतृत्व के शानदार उदाहरण के रूप में सम्मान दिया है। निर्विक सिंह इस कहानी के दूसरे और उतने ही महत्वपूर्ण पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने यह साबित किया कि भारत सिर्फ विश्वस्तरीय क्रिएटिव लीडर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर के एजेंसी और बिजनेस लीडर भी तैयार कर सकता है। वे वैश्विक विज्ञापन और मार्केटिंग सेवाओं के क्षेत्र में भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधियों में से एक हैं।
उनका नेतृत्व सिर्फ संगठनात्मक ढांचे तक सीमित नहीं रहा। निर्विक हमेशा लोगों से जुड़कर काम करने वाले लीडर रहे हैं। वे दृढ़ फैसले लेने की क्षमता को आत्मीयता के साथ जोड़ते हैं और बड़ी महत्वाकांक्षा के साथ यह भी सुनिश्चित करते हैं कि उनके सहयोगियों को लगे कि वे भी उसी यात्रा का हिस्सा हैं।
बड़े संगठन सिर्फ आदेश देकर नहीं बढ़ते। वे तब आगे बढ़ते हैं, जब कोई लीडर प्रतिभाओं को आकर्षित करे, लोगों में विश्वास पैदा करे और जवाबदेही तय करते हुए भी संगठन की ऊर्जा को बनाए रखे।
उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान मिले हैं, जिनमें Advertising Club Calcutta Hall of Fame में शामिल किया जाना और कई APAC Agency of the Year सम्मान शामिल हैं। लेकिन ये पुरस्कार उनके प्रभाव का प्रमाण भर हैं, उनकी उपलब्धियों का सार नहीं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वे लोग, कारोबार और बाजार हैं, जिन्हें उन्होंने विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अभी भी बाकी है बहुत कुछ
ग्रे और WPP के साथ उनका लंबा सफर साल 2024 में जरूर समाप्त हुआ, लेकिन उनकी भूमिका और प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई।
आज दुबई में रहते हुए निर्विक सिंह Shoppers Stop और Hype Luxury के चेयरमैन हैं। वे S4Capital में स्वतंत्र गैर-कार्यकारी निदेशक (Independent Non-Executive Director) हैं और उसकी Nomination and Remuneration Committee के चेयरमैन भी हैं। इसके अलावा वे Gulf Oil Lubricants India के स्वतंत्र निदेशक भी हैं।
यह किसी औपचारिक सेवानिवृत्ति का दौर नहीं है। Shoppers Stop में वे अपने दशकों के ब्रांड, उपभोक्ता और बोर्ड स्तर के अनुभव को भारत के प्रमुख रिटेल संस्थानों में से एक के साथ साझा कर रहे हैं।
Hype Luxury में वे भारत, UAE और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार की महत्वाकांक्षा रखने वाले डिजिटल-फर्स्ट लग्जरी मोबिलिटी प्लेटफॉर्म की रणनीति और व्यावसायिक साझेदारियों का नेतृत्व कर रहे हैं।
S4Capital में WPP, एशिया और मध्य पूर्व में अपने लंबे संचालन अनुभव के आधार पर वे नई पीढ़ी की मार्केटिंग सर्विसेज कंपनी के कॉरपोरेट गवर्नेंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वहीं Gulf Oil में वे ब्रांड निर्माण, ग्राहक-केंद्रित सोच और परिवर्तन (Transformation) के अपने अनुभव का उपयोग एक स्थापित कंपनी को और मजबूत बनाने में कर रहे हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो निर्विक सिंह दुनिया के सबसे बड़े एजेंसी नेटवर्क में से एक का संचालन करने के बाद अब रिटेल, लग्जरी, मोबिलिटी, कंज्यूमर ब्रांड्स और नई पीढ़ी की मार्केटिंग सर्विसेज कंपनियों में अपने अनुभव का उपयोग कर रहे हैं। यह उनके योगदान का अंत नहीं, बल्कि उसका अगला अध्याय है।
लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड किसी व्यक्ति के पूरे जीवन के काम का सम्मान जरूर करता है, लेकिन इसका मतलब यह कभी नहीं होना चाहिए कि उसके सबसे महत्वपूर्ण योगदान अब पीछे छूट चुके हैं।
निर्विक सिंह का करियर अपने आप में सम्मान के योग्य है। उन्होंने भारत में एजेंसी कारोबार को अधिक पेशेवर बनाया, इंटीग्रेटेड मॉडल को उस समय अपनाया जब यह लोकप्रिय नहीं था, अलग-अलग बाजारों में कारोबार और प्रतिभाओं को विकसित किया और यह साबित किया कि एक भारतीय लीडर वैश्विक विज्ञापन उद्योग के सर्वोच्च स्तर पर भी प्रभावी नेतृत्व कर सकता है।
उन्हें सम्मानित करने की एक और बड़ी वजह भी है। युवा पेशेवरों को ऐसे उदाहरणों की जरूरत होती है, जो सफलता की उनकी सोच को और व्यापक बनाएं। नेतृत्व केवल किसी पद का नाम नहीं है। नेतृत्व वह क्षमता है, जिससे मजबूत और टिकाऊ कारोबार खड़े किए जाएं, लोगों को साथ लेकर चला जाए, अपनी प्रतिष्ठा का उपयोग अच्छे संस्थानों को मजबूत करने में किया जाए और बदलती दुनिया में भी लगातार उपयोगी बने रहा जाए।
निर्विक सिंह ने यह सब करके दिखाया है। और मेरा मानना है कि उनका सबसे बेहतरीन दौर अभी आना बाकी है।
पिडिलाइट इंडस्ट्रीज (Pidilite Industries) ने कश्यप गाला (Kashyap Gala) को प्रेसिडेंट नियुक्त किया है। वह अप्रैल 2026 से नई जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
पिडिलाइट इंडस्ट्रीज (Pidilite Industries) ने कश्यप गाला (Kashyap Gala) को कंपनी का प्रेसिडेंट (President) नियुक्त किया है। उनके लिंक्डइन (LinkedIn) प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने अप्रैल 2026 में यह नई जिम्मेदारी संभाली।
नई नियुक्ति से पहले कश्यप गाला (Kashyap Gala) अक्टूबर 2022 से मार्च 2026 तक कंपनी में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (Senior Vice President) के पद पर कार्यरत थे। इस दौरान उन्होंने विभिन्न रणनीतिक और कारोबारी पहलों का नेतृत्व किया।
कश्यप गाला उपभोक्ता उत्पाद (Consumer Products) उद्योग के अनुभवी पेशेवर हैं। पिडिलाइट इंडस्ट्रीज (Pidilite Industries) से जुड़ने से पहले उन्होंने जॉनसन एंड जॉनसन (Johnson & Johnson) में लगभग 12 वर्षों तक विभिन्न नेतृत्वकारी भूमिकाओं में काम किया।
नई भूमिका में कश्यप गाला कंपनी की विकास रणनीति, कारोबार विस्तार और परिचालन उत्कृष्टता (Operational Excellence) को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पिडिलाइट इंडस्ट्रीज की दीर्घकालिक कारोबारी योजनाओं को गति देने पर फोकस करेंगे।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने पत्रकारिता के मौजूदा दौर, मीडिया की बदलती सोच और संवाद की घटती संस्कृति पर विस्तार से अपनी बात रखी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने पत्रकारिता के मौजूदा दौर, मीडिया की बदलती सोच और संवाद की घटती संस्कृति पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि लोग बोल नहीं रहे, बल्कि यह है कि लोग सुनना ही नहीं चाहते। हर व्यक्ति को लगता है कि वही जो कह रहा है, वही सही है। यही सोच आज मीडिया और समाज दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
अपने संबोधन की शुरुआत में राणा यशवंत ने कहा कि सुनना बहुत जरूरी है, क्योंकि आज सबसे बड़ा संकट यही है कि कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता। हर व्यक्ति अपनी बात को ही अंतिम सच मान बैठा है। उन्होंने बारिश का जिक्र करते हुए कहा कि बाहर इतनी तेज बारिश हो रही थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इसी दौरान किसी ने उनसे कहा कि आंखों को बरसात देखे हुए भी काफी समय हो गया है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मौसम की बात नहीं है, बल्कि हमारे समय की भी एक तस्वीर है, जहां धुंध इतनी बढ़ गई है कि चीजें साफ दिखाई देना बंद हो गई हैं।
राणा यशवंत ने कहा कि आज हम लगातार टकराव (कॉन्फ्लिक्ट) के दौर में जी रहे हैं। समाज और मीडिया दोनों एक तरह की वैचारिक खींचतान, द्वंद्व और बाइनरी सोच में फंस गए हैं। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि हम पहले अपने मन में सवाल खड़े करते हैं और फिर उन्हीं सवालों के जवाब भी खुद ही तलाशने लगते हैं। इतना ही नहीं, हम अपने हर फैसले और हर काम को सही साबित करने के लिए दलीलें भी खुद ही तैयार कर लेते हैं। उनके मुताबिक, यह केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री और पत्रकार बिरादरी की स्थिति बन चुकी है।
उन्होंने कहा कि वह पूरे कार्यक्रम के दौरान सभी वक्ताओं की बातें ध्यान से सुन रहे थे। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद जी ने अपने संबोधन में कहा कि पत्रकारिता में कंटेंट पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है और इसमें कोई दो राय नहीं कि "Content is King"। इसके बाद जगदीश जी ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) होती है और हर पत्रकार के लिए यह जरूरी है कि उसकी पहचान एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में हो।
राणा यशवंत ने आगे कहा कि कार्यक्रम में संकेत ने भी एक महत्वपूर्ण बात कही कि आज के दौर में ओपिनियन यानी राय पूरी तरह हावी हो गई है, जबकि तथ्य (फैक्ट) पीछे छूटते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अगर कार्यक्रम का विषय "कल, आज और कल" है, तो फिर हमें उस सबसे बड़े संकट पर भी खुलकर बात करनी चाहिए, जिससे आज पूरी पत्रकार बिरादरी जूझ रही है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के सामने एक ऐसा गंभीर संकट खड़ा है, जिसका सामना करने से हम लगातार बचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि हम कोई ऐसा रास्ता या गलियारा तलाश रहे हैं, जहां हमें इस कठिन सवाल का सामना ही न करना पड़े। लेकिन अब समय आ गया है कि इस चुनौती से आंखें चुराने के बजाय उसका सीधे सामना किया जाए।
राणा यशवंत ने कहा कि इस पूरे संदर्भ में उनके लिए सबसे बड़ा संदर्भ बिंदु इस बार का जंतर-मंतर आंदोलन है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन को लेकर कई लोगों ने कहा कि यह Gen Z का आंदोलन था। लोगों ने एक-दूसरे को इंस्टाग्राम के जरिए जाना, आंदोलन के बारे में जानकारी हासिल की और धीरे-धीरे यही प्लेटफॉर्म इतना प्रभावशाली बन गया कि देश के प्रधानमंत्री को भी पहली बार इंस्टाग्राम पर आना पड़ा। उन्होंने कहा कि इससे यह साफ होता है कि आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि वह जनमत तैयार करने और लोगों को एकजुट करने की बड़ी ताकत बन चुका है।
राणा यशवंत ने कहा कि वह वर्ष 2023 से लगातार एक पत्रकार के तौर पर NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) के कामकाज पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना था कि NTA जैसी संस्था, जिसके जिम्मे देश के लगभग सभी बड़े प्रोफेशनल कोर्स और विश्वविद्यालयों की प्रवेश परीक्षाएं हैं, क्या केवल सीमित संसाधनों और बेहद कम लोगों के सहारे इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा सकती है? उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को लेकर छात्रों के भीतर जो असंतोष था, वह धीरे-धीरे आक्रोश में बदल गया। जब उन्हें सोशल मीडिया के रूप में एक साझा मंच मिला, तो बड़ी संख्या में छात्र वहां एकत्र हुए और आंदोलन की मांग करने लगे।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का श्रेय किसे दिया जाए, यह बहस का विषय हो सकता है। कोई इसे किसी राजनीतिक दल से जोड़ सकता है और कोई इसे छात्रों के स्वाभाविक आक्रोश का परिणाम मान सकता है। लेकिन उनके अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्रों का सवाल पूरी तरह जायज था और उस आंदोलन का होना भी जरूरी था।
वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन, मेनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि छात्रों के आंदोलन का मुद्दा पूरी तरह जायज था, लेकिन इसके साथ यह भी समझना जरूरी है कि मीडिया की भूमिका को केवल सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में बांटकर नहीं देखा जा सकता।
राणा यशवंत ने कहा कि जब जंतर-मंतर के आंदोलन को देखा जाता है तो अक्सर कहा जाता है कि अब मेनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका खत्म हो गई है। लेकिन वह इस सोच से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अखबार और टेलीविजन चैनल आज भी मेनस्ट्रीम मीडिया हैं और उनकी अपनी एक अलग अहमियत है। अगर ऐसा नहीं होता तो जिन चैनलों और पत्रकारों का कुछ लोग विरोध करते हैं, उन्हीं चैनलों पर राजनीतिक दलों के प्रवक्ता जाकर अपनी बात भी नहीं रखते। इससे साफ है कि मेनस्ट्रीम मीडिया की उपयोगिता आज भी बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि आज एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। लोग जिस मंच पर होते हैं, उसी को सबसे मजबूत और सबसे प्रभावशाली बताने लगते हैं और बाकी सभी मंचों को खारिज करने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में कहा था कि आज सबसे ज्यादा जरूरत एक-दूसरे को सुनने की है। अगर हम केवल अपने मंच को सही और बाकी सबको गलत मानेंगे तो पत्रकारिता का संतुलन बिगड़ जाएगा।
राणा यशवंत ने कहा कि अगर इस पूरे आंदोलन को समझना है तो इसकी शुरुआत केवल आज से नहीं, बल्कि वर्ष 2011 से देखनी होगी। उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे का आंदोलन देश का पहला बड़ा सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन था, जो सोशल मीडिया के जरिए तेजी से लोगों तक पहुंचा। लेकिन उस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत केवल सोशल मीडिया नहीं थी, बल्कि मेनस्ट्रीम मीडिया भी उसके साथ मजबूती से खड़ा था।
उन्होंने कहा कि उस समय टीवी चैनलों ने अपने स्टूडियो तक आंदोलन स्थल पर लगा दिए थे। रिपोर्टर लगातार मौके से रिपोर्टिंग कर रहे थे। पूरे देश में जो माहौल बना और जिस तरह सरकार पर दबाव बढ़ा, उसमें मेनस्ट्रीम मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका थी। लेकिन आज, वर्ष 2026 में, जब जंतर-मंतर पर इतना बड़ा आंदोलन हुआ तो सवाल यह उठता है कि आखिर मेनस्ट्रीम मीडिया वहां से दूर क्यों दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब तलाशना बेहद जरूरी है।
राणा यशवंत ने कहा कि अगर कोई आंदोलन किसी राजनीतिक दल का हो, उसका अपना चुनावी एजेंडा हो, किसी राज्य में सत्ता हासिल करने का लक्ष्य हो या किसी राजनीतिक यात्रा और प्रदर्शन का हिस्सा हो, तो उस राजनीति को समझा जा सकता है। लेकिन जब कोई मुद्दा देश के लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा हो, जिसे लगभग हर व्यक्ति सही मान रहा हो और जिस पर अखबारों और टीवी चैनलों ने भी लगातार आवाज उठाई हो, तब उस आंदोलन के दौरान मेनस्ट्रीम मीडिया को घेरना और उसका विरोध करना समझ से परे है।
उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस मुद्दे पर मीडिया खुद लगातार बहस कर रहा था, उसी मुद्दे पर जब पत्रकार मैदान में पहुंचे तो उन्हें वहां खड़ा तक नहीं होने दिया गया। पत्रकारों से सबसे पहले यह पूछा गया कि वे किस तरफ हैं। उन्होंने कहा कि यही आज की सबसे बड़ी बाइनरी है—या तो आप इस तरफ हैं या फिर उस तरफ। बीच का रास्ता जैसे खत्म होता जा रहा है।
राणा यशवंत ने कहा कि इसका सबसे खतरनाक असर यह है कि अगर कोई पत्रकार आम लोगों के जरूरी मुद्दों को लेकर भी मैदान में उतरता है, तब भी उसकी पहले से बनी हुई पहचान उसके खिलाफ इस्तेमाल की जाती है। लोगों के लिए उसे किसी एक खांचे में डाल देना आसान हो जाता है। फिर कहा जाता है कि यह तो उसी विचारधारा का पत्रकार है, इसलिए इसकी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि असलियत यह है कि जिस मुद्दे पर पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहा होता है, वह केवल उसका मुद्दा नहीं होता, बल्कि पूरे समाज का मुद्दा होता है। इसलिए पत्रकार को पहले से तय खांचों में बांधकर देखना पत्रकारिता के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
राणा यशवंत ने आगे कहा कि आज राजनीतिक दल मीडिया के साथ एक अलग तरह का खेल खेल रहे हैं। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि जंतर-मंतर पर एक रात करीब 12 बजे कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन लोगों को लगा कि शायद वह "गोदी मीडिया" से जुड़े हैं। उनसे कहा गया कि पहले यह बताइए कि आप गोदी मीडिया नहीं हैं। उन्होंने बार-बार यही कहा कि वह केवल एक पत्रकार हैं और उनके लिए यही पहचान पर्याप्त होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने उन्हें घेरा हुआ था, उन्हें देखकर उन्हें नहीं लगा कि उनका पढ़ने-लिखने या छात्रों के आंदोलन से कोई सीधा संबंध है। उनके मुताबिक, ऐसा महसूस हो रहा था कि कुछ लोग केवल माहौल बनाने और भीड़ बढ़ाने के लिए वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जो भी लोग उस आंदोलन में गए होंगे, उन्होंने यह जरूर महसूस किया होगा कि वहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी थे, जिनका मकसद छात्रों के मुद्दे से ज्यादा भीड़ बनाए रखना और कुछ खास तरह के पत्रकारों का विरोध करना था।
फिलहाल उन्होंने अपने अगले कदम या नई जिम्मेदारी के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
WPP प्रोडक्शन इंडिया (WPP Production India) के सीईओ कार्तिक नागराजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस बारे में जानकारी उन्होंने खुद लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की।
कार्तिक नागराजन ने अपनी पोस्ट में लिखा कि WPP प्रोडक्शन (पूर्व में Hogarth) में इंडिया CEO के रूप में करीब साढ़े तीन साल का उनका कार्यकाल बेहद संतोषजनक रहा। अब वह नए अवसरों और नई चुनौतियों की ओर बढ़ रहे हैं।
उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि यह उनके प्रोफेशनल जीवन के सबसे परिवर्तनकारी चरणों में से एक रहा। इस दौरान उनके साथ काम करने वाली पूरी टीम को उन्होंने इसका श्रेय दिया। नागराजन ने लिखा कि उन्हें ऐसे सहयोगियों के साथ काम करने का अवसर मिला, जो रचनात्मकता (Craft) और तकनीक (Technology) के संगम पर शानदार काम कर रहे हैं और उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अभी बाकी है।
गौरतलब है कि कार्तिक नागराजन ने WPP प्रोडक्शन इंडिया के CEO के रूप में करीब चार वर्षों तक जिम्मेदारी निभाई। फिलहाल उन्होंने अपने अगले कदम या नई जिम्मेदारी के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है।
एस्सेल ग्रुप ने अपनी 100 साल की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली है। इस खास उपलब्धि का जश्न बड़े ही भव्य अंदाज में मनाया गया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एस्सेल ग्रुप ने अपनी 100 साल की ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली है। इस खास उपलब्धि का जश्न बड़े ही भव्य अंदाज में मनाया गया। एक सदी के इस सफर को दूरदृष्टि, नवाचार (इनोवेशन) और मजबूत रिश्तों की मिसाल बताते हुए ग्रुप ने अपने सहयोगियों, शुभचिंतकों और वर्षों से साथ जुड़े लोगों के साथ इस उपलब्धि को साझा किया।
इस विशेष अवसर को यादगार बनाने के लिए हिंदी Z5 की ओर से एक खास समारोह का आयोजन किया गया। यह शाम यादों, आभार और उत्सव को समर्पित रही, जिसमें उन सभी मेहमानों और शुभचिंतकों को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने एस्सेल ग्रुप की इस शानदार यात्रा में किसी न किसी रूप में योगदान दिया है।
1 अगस्त को मुंबई में आयोजित इस समारोह में एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा मुख्य रूप से मौजूद रहे। उन्होंने कार्यक्रम में आए सभी मेहमानों का स्वागत किया और वर्षों से मिले उनके सहयोग, विश्वास और शुभकामनाओं के लिए दिल से आभार व्यक्त किया।
यह आयोजन केवल पिछले 100 वर्षों की उपलब्धियों का जश्न नहीं था, बल्कि भविष्य की नई योजनाओं, नए संकल्प और आगे की यात्रा के प्रति समूह की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक रहा। समारोह के दौरान एस्सेल ग्रुप की एक सदी लंबी विरासत, उसके योगदान और आने वाले समय के विजन को भी साझा किया गया।
कार्यक्रम में मौजूद मेहमानों ने एस्सेल ग्रुप की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर शुभकामनाएं दीं और समूह की भविष्य की सफलता के लिए अपनी शुभेच्छाएं व्यक्त कीं।
यहां देखें, कार्यक्रम की कुछ खास झलकियां:








भारती एयरटेल (Bharti Airtel) के Upper North CEO अनुपम अरोड़ा (Anupam Arora) दो दशक से अधिक का कार्यकाल पूरा करने के बाद कंपनी छोड़ रहे हैं। वह जल्द ही अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी संभालेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारती एयरटेल (Bharti Airtel) के अपर नॉर्थ (Upper North) क्षेत्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer-CEO) अनुपम अरोड़ा (Anupam Arora) ने दो दशक से अधिक समय तक कंपनी के साथ जुड़े रहने के बाद आगे बढ़ने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वह जल्द ही एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी (International Assignment) संभालेंगे।
एयरटेल (Airtel) में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान अनुपम अरोड़ा (Anupam Arora) ने कई महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने अपर नॉर्थ क्षेत्र में कंपनी के कारोबार के विस्तार, ग्राहक अनुभव (Customer Experience), नेटवर्क विस्तार (Network Expansion) और समग्र व्यावसायिक प्रदर्शन (Business Performance) को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई।
हाल के वर्षों में वह पंजाब (Punjab), हरियाणा (Haryana), हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) और जम्मू-कश्मीर (Jammu & Kashmir) में एयरटेल (Airtel) के परिचालन और व्यवसाय का नेतृत्व कर रहे थे। उनके नेतृत्व में कंपनी ने क्षेत्र में अपने नेटवर्क और ग्राहक सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल कीं।
अनुपम अरोड़ा (Anupam Arora) को बिजनेस डेवलपमेंट (Business Development), ऑपरेशंस (Operations), प्रॉफिट एंड लॉस मैनेजमेंट (Profit and Loss Management), उपभोक्ता अनुभव और नेटवर्क संचालन (Network Operations) का व्यापक अनुभव है। उनके कंपनी छोड़ने के साथ एयरटेल (Bharti Airtel) के एक लंबे और सफल नेतृत्व अध्याय का समापन होगा।
एक्सचेंज4मीडिया ने नई दिल्ली में उर्दू जर्नलिज्म 40 अंडर 40 कॉन्क्लेव व अवॉर्ड्स का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ संपादकों, लेखकों, नीति-निर्माताओं और उभरते हुए पत्रकारों ने हिस्सा लिया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एक्सचेंज4मीडिया (e4m) ने नई दिल्ली में उर्दू जर्नलिज्म 40 अंडर 40 कॉन्क्लेव व अवॉर्ड्स का आयोजन किया। इस पूरे दिन चले कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ संपादकों, लेखकों, नीति-निर्माताओं और उभरते हुए पत्रकारों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में मुख्य वक्तव्य, फायरसाइड चैट और विभिन्न पैनल चर्चाओं के माध्यम से भारत में उर्दू पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और उसके भविष्य पर गंभीर चर्चा की गई।
कॉन्क्लेव की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, शायर और अभिनेता तहसीन मुनव्वर के मुख्य वक्तव्य (कीनोट एड्रेस) से हुई। उन्होंने समकालीन भारत में उर्दू मीडिया की प्रासंगिकता, उसकी बदलती भूमिका और नए दौर में उसके पुनर्निर्माण की जरूरत पर खुलकर अपने विचार रखे और पूरे कार्यक्रम की दिशा तय की।
इसके बाद 'क्या उर्दू मीडिया आज भी जनमत को प्रभावित करता है?' विषय पर एक पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें इस बात पर विचार किया गया कि क्या उर्दू प्रकाशनों का आज भी सार्वजनिक विमर्श और जनमत पर पहले जैसा प्रभाव बना हुआ है।
इसके बाद आयोजित स्पॉटलाइट सेशन 'न्याय की भाषा: भारतीय अदालतों में उर्दू की स्थायी विरासत' में भारतीय न्याय व्यवस्था और कानूनी शब्दावली में उर्दू भाषा की ऐतिहासिक और आज भी मौजूद भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में 'मोदी युग में उर्दू, पहचान और शासन' विषय पर एक फायरसाइड चैट भी आयोजित हुई। इसमें दिल्ली हज कमेटी की अध्यक्ष कौसर जहां ने exchange4media और BW Businessworld के वरिष्ठ संपादक रुहैल अमीन के साथ बातचीत की। इस चर्चा में उर्दू समाज के संदर्भ में पहचान और शासन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका रोहिनी सिंह ने एक विशेष सत्र को संबोधित किया। वहीं दिन का समापन 'क्या उर्दू पत्रकारिता अगली पीढ़ी को आकर्षित कर सकती है?' विषय पर आयोजित पैनल चर्चा के साथ हुआ।
कार्यक्रम के दौरान सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि उर्दू पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर कभी सवाल नहीं उठा। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि समय के साथ इस माध्यम को लगातार बदलते रहना होगा।
वक्ताओं का कहना था कि उर्दू अखबारों को डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए और नए पाठकों से जुड़ने के लिए बिजनेस न्यूज और निवेश संबंधी साप्ताहिक कार्यक्रम भी शुरू करने चाहिए।
कई वक्ताओं ने उर्दू की धर्मनिरपेक्ष और साझा सांस्कृतिक पहचान को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही सुझाव दिया कि शैक्षणिक संस्थानों में उर्दू को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया जाए, ताकि नई पीढ़ी इस भाषा को सीखे और अपनाए।
पूरे दिन की चर्चा में एक बात बार-बार सामने आई कि भाषा कभी खत्म नहीं होती, केवल उसका माध्यम बदलता है। तथ्य हमें बताते हैं कि क्या हुआ, लेकिन भाषा यह समझाती है कि उसका अर्थ क्या है। इसलिए उर्दू पत्रकारिता को आज के पाठकों और दर्शकों से जुड़ने के लिए अपनी बातचीत और संपादकीय शैली में भी बदलाव लाने की जरूरत है।
इस अवसर पर BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा, "उर्दू पत्रकारिता हमेशा अपनी खास गरिमा, अभिव्यक्ति की गहराई और भाषा की खूबसूरती के लिए जानी जाती रही है। इसने केवल लोगों को जानकारी ही नहीं दी, बल्कि यह भी तय किया कि लोग उस जानकारी को किस नजरिए से देखें। तकनीक, पाठकों की बदलती पसंद और राजस्व के उतार-चढ़ाव के बावजूद उर्दू पत्रकारिता इसलिए कायम रही, क्योंकि लोगों का उस पर भरोसा कभी कम नहीं हुआ। आज जब दुनिया भर के न्यूजरूम डिजिटल और तेज़ी से बदलती ऑडियंस के मुताबिक खुद को बदल रहे हैं, तब उर्दू पत्रकारिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उसे अपनी समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हुए नई पीढ़ी से उसकी अपनी भाषा और शैली में संवाद करना होगा। आज जिन पत्रकारों को सम्मानित किया जा रहा है, वे इस बात का प्रमाण हैं कि यदि भाषा को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए तो वह कभी पुरानी नहीं होती, बल्कि उसे हमेशा नए पाठक मिलते रहते हैं।"
इसके बाद आयोजित पुरस्कार समारोह में इस वर्ष के e4m उर्दू जर्नलिज्म 40 अंडर 40 सम्मान से उन युवा पत्रकारों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने प्रिंट, टेलीविजन, डिजिटल और फ्रीलांस उर्दू पत्रकारिता में प्रभावशाली रिपोर्टिंग के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है।
e4m उर्दू जर्नलिज्म 40 अंडर 40 विजेता
| विजेता | समाचार संगठन |
|---|---|
| आदिल सलाम (Aadil Salaam) | Srinagar Jang |
| अबुल कलाम (Abul Kalam) | NGTV Delhi |
| अदीब अहमद (Adeeb Ahmed) | Network 18 |
| आमिर अहसान (Amir Ahsan) | ZEE J&K Ladakh |
| अंसारी मसूद आलम (Ansari Masood Alam) | DD Girnar (Doordarshan Ahmedabad) |
| अस्फहानी खान (Asfahani Khan) | Salaam TV (Zee Media) |
| बशारत राशिद (Basharat Rashid) | Meem TV / Srinagar Mail |
| बिलाल अहमद बाली (Bilal Ahmed Bali) | Network 18 |
| डॉ. अजमल अली खान (Dr Ajmal Ali Khan) | Freelance |
| एरम खान (Eram Khan) | Salaam TV |
| इरफान रैना (Erfan Raina) | Network 18 |
| गुफरान सिद्दीकी (Guffran Siddique) | Zee Media, Salaam TV |
| एमडी रेजाउल्लाह (MD Rezaullah) | Salaam TV |
| एमडी जकारिया (MD Zakariya) | NC Media Networks (Newschecker) |
| मोहम्मद दानिश (Mohammed Danish) | Salaam TV |
| मोहम्मद सबूर अली (Mohd Saboor Ali) | United News of India |
| मोहम्मद समीर (Mohd Sameer) | UNI (United News of India) |
| रहमतुल्लाह (Rahmatullah) | DNN24 |
| राशिद रासपोल मगरे (Rashid Raspol Magray) | ANN News Channel Kashmir |
| सेहबा अली सैफी (Sehba Ali Saifi) | Salaam TV |
| शोएब सलमानी (Shoib Salmani) | Salaam TV |
| सुहैल अख्तर (Suhail Akhtar) | Al Arabiya English |
| यासमीन (Yasmeen) | Awaz The Voice |
ड्राइवट्रेन एआई (Drivetrain AI) ने निवास रविचंद्रन (Nivas Ravichandran) को Director of Marketing नियुक्त किया है। वह कंपनी की मार्केटिंग रणनीति और ब्रांड ग्रोथ का नेतृत्व करेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ड्राइवट्रेन एआई (Drivetrain AI) ने निवास रविचंद्रन (Nivas Ravichandran) को डायरेक्टर ऑफ मार्केटिंग (Director of Marketing) नियुक्त किया है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के जरिए अपनी नई भूमिका की जानकारी साझा करते हुए कंपनी की विकास यात्रा का हिस्सा बनने पर उत्साह जताया।
निवास रविचंद्रन (Nivas Ravichandran) ने अपने पोस्ट में बताया कि Drivetrain AI एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence-AI) आधारित एफपी एंड ए (Financial Planning & Analysis-FP&A) प्लेटफॉर्म है, जिसने अपने मजबूत उत्पाद, उच्च ग्राहक संतुष्टि और तेजी से बढ़ती ऑर्गेनिक ग्रोथ के दम पर बाजार में मजबूत पहचान बनाई है।
नई भूमिका में वह कंपनी की समग्र मार्केटिंग रणनीति का नेतृत्व करेंगे। उन्होंने कहा कि Drivetrain AI के मजबूत उत्पाद, ग्राहकों का भरोसा और वर्ड-ऑफ-माउथ (Word of Mouth) के जरिए हो रही ग्रोथ उनके कंपनी से जुड़ने के प्रमुख कारण रहे।
निवास रविचंद्रन (Nivas Ravichandran) को मार्केटिंग, ब्रांड निर्माण (Brand Building) और ग्रोथ स्ट्रैटेजी (Growth Strategy) के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है। उन्होंने अपने करियर के दौरान टेक्नोलॉजी (Technology) और सॉफ्टवेयर-एज़-ए-सर्विस (Software as a Service-SaaS) कंपनियों के साथ काम करते हुए मार्केट पोजिशनिंग, डिमांड जेनरेशन (Demand Generation) और रणनीतिक मार्केटिंग अभियानों के माध्यम से कारोबार को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कंपनी ने संदीप कुमार सिंह को वाइस प्रेजिडेंट-सेल्स, अमित किशोर गुप्ता को जनरल मैनेजर-सेल्स (नॉर्थ) और दर्शन पितले को असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट-सेल्स (वेस्ट) नियुक्त किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ग्लोबल मल्टीकास्ट न्यूज हब लाइव टाइम्स (Live Times) ने अपनी नेशनल सेल्स लीडरशिप को मजबूत करने के लिए तीन नियुक्तियों की घोषणा की है। कंपनी ने संदीप कुमार सिंह को वाइस प्रेजिडेंट-सेल्स, अमित किशोर गुप्ता को जनरल मैनेजर-सेल्स (नॉर्थ) और दर्शन पितले को असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट-सेल्स (वेस्ट) नियुक्त किया है।
कंपनी के अनुसार, ये नियुक्तियां लाइव टाइम्स की विस्तार स्ट्रैटेजी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य लीनियर टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंपनी की व्यावसायिक क्षमताओं को मजबूत करना और विज्ञापनदाताओं के लिए एकीकृत (इंटीग्रेटेड) समाधान उपलब्ध कराना है।
अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में ये तीनों अधिकारी लीनियर टेलीविजन, डिजिटल, ब्रैंडेड कंटेंट, स्पॉन्सरशिप, स्पेशल प्रोजेक्ट्स, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज (आईपी), गवर्नमेंट बिजनेस और इंटीग्रेटेड मार्केटिंग सॉल्यूशंस से जुड़े राजस्व को बढ़ाने पर काम करेंगे। साथ ही देशभर में विज्ञापनदाताओं, मीडिया एजेंसियों और कॉरपोरेट ग्राहकों के साथ स्ट्रैटेजिक पार्टनरिशप्स को भी मजबूत करेंगे।
लाइव टाइम्स के फाउंडर एवं चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर दिलीप सिंह ने नई नियुक्तियों का स्वागत करते हुए कहा कि लाइव टाइम्स केवल एक न्यूज चैनल नहीं, बल्कि भारत का पहला ग्लोबल मल्टीकास्ट न्यूज हब बना रहा है, जो टेलीविजन, डिजिटल और उभरते प्लेटफॉर्म्स के जरिए दर्शकों को जोड़ता है। उन्होंने कहा कि बदलते मीडिया परिदृश्य में विज्ञापनदाता अब एकीकृत, मापने योग्य और इनोवेशन आधारित संचार समाधान चाहते हैं। ऐसे में मजबूत कमर्शियल लीडरशिप कंपनी की रणनीतिक प्राथमिकता है। उनके अनुसार, संदीप कुमार सिंह, अमित किशोर गुप्ता और दर्शन पितले का अनुभव, बाजार की गहरी समझ और मीडिया-विज्ञापन जगत में मजबूत नेटवर्क कंपनी की विकास यात्रा को नई गति देगा।
कंपनी का कहना है कि ये नियुक्तियां ऐसे समय में हुई हैं, जब लाइव टाइम्स अपने लीनियर टेलीविजन और डिजिटल कारोबार का तेजी से विस्तार कर रहा है। इसकी ग्लोबल मल्टीकास्ट वितरण रणनीति के जरिए ब्रैंड्स को टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, ओटीटी, कनेक्टेड टीवी, फास्ट चैनल्स और उभरते मीडिया इकोसिस्टम तक एकीकृत पहुंच उपलब्ध कराई जा रही है।
आज वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा का जन्मदिन है। यह महज एक तारीख नहीं, बल्कि उस आवाज का उत्सव है जो वर्षों से देश की सियासत, समाज और सिस्टम से सवाल पूछती रही है- बेबाकी से, लेकिन गरिमा के साथ।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आज वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर सुशांत सिन्हा का जन्मदिन है। यह महज एक तारीख नहीं, बल्कि उस आवाज का उत्सव है जो वर्षों से देश की सियासत, समाज और सिस्टम से सवाल पूछती रही है- बेबाकी से, लेकिन गरिमा के साथ। सुशांत सिन्हा उन पत्रकारों में शुमार हैं, जिनकी भाषा में तल्खी नहीं, लेकिन सवालों में तपिश होती है।
वर्तमान में वह 'न्यूज18 इंडिया' में बतौर कंसल्टिंग एडिटर कार्यरत हैं और यहां प्राइम टाइम शो 'देश की पाठशाला' होस्ट करते हैं। सुशांत सिन्हा दर्शकों के बीच एक भरोसेमंद चेहरा बन चुके हैं। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी यात्रा आसान नहीं रही। यह कहानी सिर्फ करियर ग्राफ की नहीं, बल्कि समर्पण, संघर्ष और उस जज्बे की है, जिसमें पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं बल्कि जिम्मेदारी बन जाती है।
पत्रकारिता की नींव से राष्ट्रीय पहचान तक
पटना के सेंट जेवियर्स हाई स्कूल से शुरुआती शिक्षा लेने वाले सुशांत ने इग्नू से सूचना प्रौद्योगिकी में स्नातक किया। टेक्नोलॉजी की दुनिया से उनका मन जल्द ही सवालों की दुनिया में रम गया। पत्रकारिता में उनकी शुरुआत 2002 में 'जैन टीवी' से हुई और फिर उन्होंने लाइव इंडिया में लगभग छह वर्षों तक एंकर और प्रड्यूसर के तौर पर काम किया।
इसके बाद न्यूज24, NDTV इंडिया, इंडिया न्यूज, और फिर इंडिया टीवी- हर मंच पर उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। कहीं डिबेट शो को नई धार दी, तो कहीं जमीनी मुद्दों को बहस की मेज तक लाकर लोगों को सोचने पर मजबूर किया।
उनके बहुचर्चित शो ‘प्रश्नकाल’, ‘सुनो इंडिया’, ‘जवाब तो देना होगा’ और 'न्यूज की पाठशाला' जैसे कार्यक्रमों ने देशभर में एक सजग दर्शक वर्ग तैयार किया, जो खबरों को केवल देखना नहीं, समझना चाहता है।
डिजिटल दौर की बेबाक आवाज
2021 में उन्होंने 'Sushant Sinha' नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया। यह केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं था, बल्कि एक ऐसा मंच बना, जहां लाखों लोग उन्हें सुनते नहीं, महसूस करते हैं। आज इस चैनल पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं और सैकड़ों वीडियो अपलोड हो चुके हैं, जिनमें सुशांत समाज के हर उस सवाल को उठाते हैं, जिसे मुख्यधारा की बहस अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
इस मंच ने सुशांत को न सिर्फ एक स्वतंत्र आवाज दी, बल्कि उन्हें उन दर्शकों से जोड़ा जो बिना लाग-लपेट के खबरें सुनना और समझना चाहते हैं।
सम्मान, सवाल और संवेदनशीलता
पत्रकारिता के क्षेत्र में सुशांत सिन्हा को कई सम्मान मिल चुके हैं। लेकिन उनसे जुड़ी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद ये है कि वह दर्शकों के बीच सिर्फ एक एंकर नहीं, एक संवेदनशील विचार की तरह देखे जाते हैं। वह न शोर मचाते हैं, न दिखावे की आक्रामकता लाते हैं, बल्कि तथ्य, सवाल और दृष्टिकोण को सामने रखते हैं।
एक निजी स्पर्श, एक सार्वजनिक जिम्मेदारी
जो लोग सुशांत सिन्हा को सिर्फ टीवी पर देखते हैं, उन्हें यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि कैमरे के पीछे वह बेहद सरल, विनम्र और विचारशील व्यक्ति हैं। क्रिकेट के शौकीन, किताबों के प्रेमी और विचारों के सजग संवाददाता- सुशांत का व्यक्तित्व जितना प्रोफेशनल है, उतना ही निजी तौर पर संतुलित और सधा हुआ।
उनका ट्विटर और यूट्यूब अकाउंट इस बात का सबूत है कि वह संवाद में विश्वास रखते हैं- वह संवाद जो बहस नहीं, समझदारी पैदा करता है।
आज उनके जन्मदिन पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुशांत सिन्हा उस पत्रकारिता की मिसाल हैं जो आवाज तो बनती है, लेकिन शोर नहीं। जो सवाल तो पूछती है, लेकिन गरिमा के साथ। जो पक्षधर होती है, लेकिन सच के।
जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं, सुशांत सिन्हा! आप यूं ही पत्रकारिता की रोशनी बनकर देश को सवालों की दिशा दिखाते रहें और सच के पक्ष में, देश की आवाज बने रहें- निडर, निष्पक्ष और निर्भीक।
'S4M पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ने युवा पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता का भविष्य उन लोगों का है, जो प्रमाणित सच के साथ खड़े रहेंगे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ने युवा पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता का भविष्य उन लोगों का है, जो प्रमाणित सच के साथ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि आज सूचना हर पल उपलब्ध है, लेकिन सबसे बड़ी कमी सत्य की है। ऐसे समय में पत्रकारों की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में की। उन्होंने कहा कि सुबह तेज बारिश देखकर उन्हें लगा कि देश की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की राजधानी के चौराहे शायद पानी में डूब गए होंगे और कार्यक्रम तक पहुंचना मुश्किल होगा। लेकिन उन्होंने मन बना लिया कि जब आने का वादा किया है तो उसे निभाना ही है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "तैरना तो नहीं आता, लेकिन कोशिश करेंगे, पहुंच ही जाएंगे।"
इसके बाद उन्होंने कहा कि आज जब '40 अंडर 40' के युवा पत्रकारों को सम्मानित किया जा रहा है, तो उन्हें अपना शुरुआती पत्रकारिता का दौर याद आ रहा है। उन्होंने बताया कि करीब 40 साल पहले, मात्र 25 वर्ष की उम्र में वह 'आज' अखबार के इलाहाबाद संस्करण के स्थानीय संपादक थे। उस समय देश में तीन बड़ी घटनाएं हुई थीं—शाहबानो मामला, राम जन्मभूमि का ताला खुलना और बोफोर्स सौदा। उन्होंने कहा कि उस समय शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि ये घटनाएं आगे चलकर भारत की राजनीति और समाज की दिशा बदल देंगी।
शशि शेखर ने कहा कि आज वर्ष 2026 में भी दुनिया और देश तेजी से बदल रहे हैं। संभव है कि आज जो घटनाएं हमारे सामने घट रही हैं, वे आने वाले वर्षों में इतिहास की दिशा तय करें। इसलिए पत्रकारों का काम केवल खबर लिखना नहीं, बल्कि समय की नब्ज को पहचानना भी है। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें 1986 में यह अहसास होता कि वे इतिहास के एक निर्णायक दौर के गवाह हैं, तो शायद वे और बेहतर रिपोर्टिंग करते, ज्यादा गंभीरता से नोट्स बनाते और समय के ज्यादा काम आते। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने युवा पत्रकारों से अपील की कि वे आज की हर बड़ी घटना को गंभीरता से देखें और समझें।
मीडिया के बदलते स्वरूप पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था, जब सूचना के बहुत सीमित स्रोत थे। यदि कोई कह देता था कि "बीबीसी में सुना है", तो लोग उसे लगभग अंतिम सत्य मान लेते थे। उस दौर में आकाशवाणी और दूरदर्शन ही प्रमुख माध्यम थे। लेकिन आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण हर व्यक्ति सूचना का स्रोत बन गया है। ऐसे माहौल में पत्रकार की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है, क्योंकि अब सूचना से ज्यादा जरूरी उसकी सत्यता है।
उन्होंने हाल की एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लाठीचार्ज जैसी घटनाओं के दौरान लोगों की प्रतिक्रिया अलग होती थी, लेकिन अब माहौल बदल गया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे दृश्य देखे, जहां लाठीचार्ज के दौरान भी कुछ लोग वीडियो बनाने और रील रिकॉर्ड करने में लगे थे। कोई कह रहा था कि रील ठीक से नहीं बनी, तो कोई आंसू गैस की बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह केवल समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं है, बल्कि व्यवस्था और कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को भी इस नई मानसिकता को समझना होगा।
हालांकि उन्होंने सुरक्षा बलों के प्रति गहरा सम्मान भी व्यक्त किया। उन्होंने मणिपुर में बिताए अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बहुत करीब से देखा है कि किस तरह जवान अपनी जान की परवाह किए बिना देश की सुरक्षा करते हैं। उन्होंने एक पुलिस अधिकारी का किस्सा सुनाया, जिसने बेहद कठिन परिस्थितियों में सीमित संसाधनों के बावजूद डटे रहने की बात कही थी। शशि शेखर ने कहा कि ऐसे अनुभवों के बाद वह कभी भी सुरक्षा बलों के त्याग और साहस को कम करके नहीं आंकते।
उन्होंने प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यंग्य अक्सर एक छोटी क्रांति की शुरुआत होता है। उनके अनुसार सोशल मीडिया आने के बाद नेताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की भाषा और व्यवहार भी बदल गया है, क्योंकि अब हर बात रिकॉर्ड हो सकती है और तुरंत लोगों तक पहुंच सकती है। यही बदलाव आज लोकतंत्र और संवाद की नई वास्तविकता बन चुका है।
टेलीविजन पत्रकारिता के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में जब वह एक नए समाचार चैनल की लॉन्चिंग से जुड़े थे, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि वह देश का सबसे बड़ा और सबसे तेज चैनल बन जाएगा। उसी दौरान गुजरात भूकंप, अमेरिका में 9/11 आतंकी हमला, भारतीय संसद पर हमला और नेपाल राजपरिवार की हत्या जैसी कई बड़ी घटनाएं हुईं। उन्होंने कहा कि वह समय टेलीविजन पत्रकारिता के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण और सीख देने वाला था।
उन्होंने कहा कि उस समय खबर जुटाने पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते थे। वर्ष 2002 में केवल न्यूज़ गैदरिंग पर लगभग 16 करोड़ रुपये का खर्च आया था। गुजरात भूकंप और अफगानिस्तान जैसे स्थानों पर रिपोर्टिंग के लिए चार्टर्ड विमान तक लेने पड़े थे। लेकिन आज मीडिया संस्थानों के लिए उस स्तर पर संसाधन जुटाना आसान नहीं है।
अफगानिस्तान में रिपोर्टिंग के दौरान अपने सहयोगी प्रभात शुंगलू का जिक्र करते हुए शशि शेखर भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि प्रभात जिस झोपड़ी में रह रहे थे, उसके बगल वाले हिस्से में एक फ्रांसीसी पत्रकार ठहरा हुआ था, जिसकी उसके दुभाषिए ने हत्या कर दी थी। यह जानने के बाद उन्होंने प्रभात से वापस लौट आने को कहा, लेकिन प्रभात ने जवाब दिया कि अभी लौटना नहीं है, पहले काम पूरा करना है। शशि शेखर ने कहा कि पत्रकारिता ऐसे ही समर्पित और साहसी लोगों की वजह से मजबूत बनी हुई है और उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी बताते हुए कहा कि आज हर पल खबर सामने आ रही है, लेकिन सबसे बड़ा संकट सच का है। उन्होंने कहा, "अगर कोई मुझसे पूछता है कि पत्रकारिता क्या है, तो मेरा जवाब यही होता है कि पत्रकारिता वही है, जिसमें हम ऐसा सच कहें जिसे प्रमाणित किया जा सके। जब तक यह सिद्धांत जीवित रहेगा, तब तक पत्रकारिता भी जीवित रहेगी।"
उन्होंने युवा पत्रकारों से कहा कि यदि वे सच के साथ खड़े रहेंगे, तो आने वाले समय में लोग उन्हें खोजकर पढ़ेंगे, सुनेंगे और उन पर भरोसा करेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि भविष्य उन्हीं पत्रकारों का होगा, जो तथ्यों, ईमानदारी और विश्वसनीयता के साथ समाज के सामने सच्चाई रखेंगे। अपने संबोधन का समापन उन्होंने सभी युवा पत्रकारों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए किया