समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में NDTV इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रोहित विश्वकर्मा ने मीडिया के वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपनी बात रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में NDTV इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रोहित विश्वकर्मा ने मीडिया के वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अच्छी खबरें बनाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि आखिर दर्शक कौन है, वह किस प्लेटफॉर्म पर है और आने वाले वर्षों में उसकी पसंद कैसे बदलने वाली है। उन्होंने कहा कि मीडिया, विज्ञापन और न्यूज रूम से जुड़ी लगभग हर चुनौती की जड़ दर्शकों के बदलते व्यवहार में छिपी हुई है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि अक्सर मीडिया के बारे में तरह-तरह की बातें होती हैं। कोई कहता है कि मीडिया बदल गया है, कोई कहता है कि पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रही। लेकिन दिन के आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या लोग आपको देख रहे हैं या नहीं? क्या लोग आपकी खबरें सुन रहे हैं या नहीं? अगर दर्शक ही नहीं हैं, तो फिर अच्छी पत्रकारिता का असर भी सीमित रह जाएगा। उन्होंने कहा कि यही आज टीवी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दुविधा है।
उन्होंने बताया कि इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए उन्होंने अपनी डेटा टीम से कहा कि वह यह पता लगाए कि आखिर न्यूज चैनल सबसे ज्यादा कौन देखता है। जो आंकड़े सामने आए, वे काफी चौंकाने वाले थे। उनके मुताबिक, न्यूज चैनलों का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग 61 वर्ष से अधिक उम्र के लोग हैं, जिनकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, यही वर्ग सबसे अधिक समय तक न्यूज चैनल देखता भी है। उन्होंने कहा कि घरों में अक्सर दादा-दादी या बुजुर्ग टीवी चलाकर छोड़ देते हैं, जिससे न्यूज चैनल लगातार चलता रहता है।
उन्होंने आगे बताया कि 51 से 60 वर्ष की उम्र का वर्ग लगभग 18 प्रतिशत है। यानी दोनों वर्गों को मिलाकर करीब 40 प्रतिशत दर्शक ऐसे हैं, जिनकी उम्र 51 वर्ष से अधिक है। उन्होंने कहा कि यह वही वर्ग है जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देख लिया है। उसकी खरीदारी की क्षमता और समाज में निर्णय लेने की भूमिका कितनी प्रभावी है, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन टीवी न्यूज का सबसे बड़ा दर्शक यही वर्ग है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर जो युवा वर्ग न्यूज चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना करता था, वास्तविकता यह है कि वही वर्ग न्यूज चैनल सबसे कम देखता है। उन्होंने कहा कि 30 वर्ष तक की उम्र के दर्शकों की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है और उनका देखने का समय भी बहुत कम है। यह वर्ग अपनी राय टीवी देखकर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो देखकर बनाता है। वहीं उसका पूरा न्यूज कंजम्पशन होता है। उन्होंने कहा कि इससे साफ पता चलता है कि आज न्यूज चैनलों का वास्तविक दर्शक कौन है और कौन उनसे दूर जा चुका है।
इसके बाद उन्होंने भविष्य की तस्वीर सामने रखी। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी टीम से आगामी चुनावों का डेटा भी मंगवाया। उनके मुताबिक, 2029 के लोकसभा चुनावों में Gen Z वोटरों की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत होगी, जबकि मिलेनियल्स करीब 32 प्रतिशत होंगे। यानी आने वाले समय में देश का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग वही होगा, जो आज टीवी न्यूज सबसे कम देख रहा है। उन्होंने कहा कि आज 51 से 80 वर्ष की उम्र के लोग टीवी न्यूज के सबसे बड़े दर्शक हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से घटती जाएगी, जबकि युवा वर्ग लगातार बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि यही टीवी न्यूज इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा संकट है। मौजूदा दर्शक वर्ग धीरे-धीरे छोटा होता जाएगा, जबकि नया युवा दर्शक टीवी से दूर रहेगा। अगर मीडिया संस्थान अपने नए दर्शकों को पहचान ही नहीं पाएंगे तो उनके कंटेंट और उनके बाजार, दोनों पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यही आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
रेटिंग सिस्टम पर बात करते हुए रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि वह रेटिंग के विवाद में नहीं जाना चाहते, लेकिन इतना जरूर है कि रेटिंग एजेंसियां भी अपना गणित बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि BARC भी अब डिजिटल व्यूअरशिप को शामिल करने की दिशा में काम कर रहा है। आने वाले समय में इसके पैरामीटर कैसे तय होंगे, यह देखना होगा।
उन्होंने एक विदेशी अखबार का उदाहरण देते हुए कहा कि जब डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ने लगे और अखबार का कारोबार प्रभावित होने लगा, तब उस संस्थान ने काफी रिसर्च की। आखिरकार उसे यह समझ आया कि "हम अखबार के बिजनेस में नहीं हैं, हम न्यूज के बिजनेस में हैं।" रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि यही सोच टीवी न्यूज चैनलों को भी अपनानी होगी। उन्होंने कहा कि हम टेलीविजन के बिजनेस में नहीं हैं, हम न्यूज के बिजनेस में हैं। स्क्रीन बदल रही है, दर्शकों का कंटेंट देखने का तरीका बदल रहा है और मीडिया को भी उसी हिसाब से खुद को बदलना होगा।
उन्होंने कहा कि आज लगभग हर घर में डिजिटल कंजम्पशन बढ़ चुका है। लोग मोबाइल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय बिता रहे हैं। ऐसे में केवल टीवी रेटिंग देखकर मीडिया की स्थिति नहीं समझी जा सकती। दर्शक बदल चुका है, रेटिंग का पैटर्न बदल चुका है और अब न्यूज रूम को भी बदलना होगा।
विज्ञापन बाजार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आज करीब 65 से 67 प्रतिशत विज्ञापन खर्च डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो रहा है, जबकि टीवी को लगभग 18 प्रतिशत, प्रिंट को करीब 12 प्रतिशत और बाकी हिस्सा रेडियो तथा अन्य माध्यमों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अगर टीवी न्यूज को अपना विज्ञापन बाजार बढ़ाना है तो उसे उस युवा दर्शक तक पहुंचना होगा, जो इस समय उससे दूर है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि पिछले करीब दस वर्षों से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स लगातार मुख्यधारा के मीडिया को निशाना बनाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी पत्रकार, चैनल या संस्था की आलोचना करना हर व्यक्ति का अधिकार है और लोकतंत्र इसकी पूरी अनुमति देता है। लेकिन आलोचना और हिंसा में बहुत बड़ा फर्क है। उन्होंने कहा कि किसी को गालियां देना, विरोध करना या सवाल पूछना अलग बात है, लेकिन किसी पत्रकार के कपड़े फाड़ना, थप्पड़ मारना या धक्का देना किसी भी हालत में सही नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र किसी को ऐसा अधिकार नहीं देता।
NDTV इंडिया की संपादकीय नीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी संस्था का स्पष्ट सिद्धांत है कि उनका काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं है और न ही विपक्ष का प्रवक्ता या आलोचक बनना है। उनका काम सिर्फ इतना है कि जैसी खबर है, वैसी ही दर्शकों को दिखा दी जाए। उन्होंने कहा कि अपनी निजी राय या विचार खबरों पर थोपना पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हर मीडिया संस्थान अपनी संपादकीय रणनीति खुद तय करता है और वह इस पर किसी को सलाह नहीं देना चाहते।
उन्होंने कहा कि किसी भी मीडिया संस्थान की संपादकीय नीति चाहे जैसी हो, उसके रिपोर्टरों और पत्रकारों को निशाना बनाना बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा कि हाल की कुछ घटनाओं में जिन लोगों ने पत्रकारों पर हमला किया, संभव है कि उन्होंने कभी न्यूज चैनल देखा भी न हो। उनका पूरा मीडिया उपभोग सोशल मीडिया के जरिए होता है। यही आज मुख्यधारा के मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। स्क्रीन बदल चुकी है, इसलिए दर्शकों को समझने का तरीका भी बदलना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के दौर में मीडिया की प्रासंगिकता पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है, हर कोई वीडियो बना सकता है और मशीनें भी खबरें लिख रही हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़े मीडिया संस्थानों की जरूरत खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी इन्फ्लुएंसर या सोशल मीडिया टिप्पणीकार वह काम नहीं कर सकता जो एक संगठित न्यूज संगठन कर सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर देश के 100 गांवों में बाढ़ आ जाए या किसी बड़े हादसे की कवरेज करनी हो तो कोई अकेला इन्फ्लुएंसर वहां रिपोर्टर नहीं भेज सकता। बड़े मीडिया संस्थानों के पास रिपोर्टरों का नेटवर्क, संसाधन और व्यापक कवरेज की क्षमता होती है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि टिप्पणी करना अलग बात है और घटनास्थल पर जाकर व्यापक कवरेज करना बिल्कुल अलग। यही वजह है कि भविष्य में भी बड़े न्यूज संगठन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगे।
अपने संबोधन के अंत में रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि लोकतंत्र में हर मीडिया संस्थान को अपनी संपादकीय स्वतंत्रता है। जब तक कोई अपराध नहीं करता, तब तक अलग-अलग विचारों और संपादकीय दृष्टिकोण के लिए जगह है। यदि कोई कानून तोड़ता है तो उसके लिए कानूनी व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने कहा कि मीडिया निष्पक्ष रहकर आज भी अच्छा काम कर सकता है, पहले भी करता था और आगे भी करता रहेगा। अंत में उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ और युवा पत्रकारों का धन्यवाद करते हुए कहा कि पत्रकारिता की यह यात्रा आने वाले समय में भी जारी रहेगी।
Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ जो हुआ, उसने मुख्यधारा की मीडिया के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि कार्यक्रम में आने से पहले उनके मन में यह विचार था कि वे मीडिया के कल, आज और कल पर बात करेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार भी इसी मंच पर उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और मीडिया के बदलते स्वरूप जैसे विषयों पर अपनी बात रखी थी। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि अगर किसी एक मुद्दे पर सबसे पहले चर्चा होनी चाहिए, तो वह जंतर-मंतर पर हुआ वह विरोध प्रदर्शन है, जिसने खासतौर पर मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है।
उन्होंने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) पर सवाल पिछले कई वर्षों से उठते रहे हैं, लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने इस बहस को एक नए मोड़ पर ला दिया है। अपनी बात को समझाने के लिए राहुल सिन्हा ने दो पुराने अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि एक बार वह सूरत में बाढ़ की कवरेज के लिए पहुंचे थे। जैसे ही वह वहां उतरे, लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और कहा कि तीन दिन से लोग भूखे हैं, खाना नहीं मिल रहा और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों का गुस्सा पूरी तरह जायज था, क्योंकि उनकी मीडिया से उम्मीदें थीं। उन्हें भरोसा था कि मीडिया उनकी परेशानी देश तक पहुंचाएगी।
उन्होंने दूसरा उदाहरण केदारनाथ आपदा का दिया। उन्होंने कहा कि जब पत्रकार ऊपर की ओर जा रहे थे, तब नीचे लौट रहे लोग उनसे नाराज हो रहे थे। लोग कह रहे थे कि इतने लोग मारे गए और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि वहां तक पहुंचना बेहद मुश्किल था और पत्रकारों को पैदल चढ़ाई करके जाना पड़ रहा था। इसके बावजूद लोगों का गुस्सा इसलिए था क्योंकि उन्हें मीडिया से उम्मीद थी कि वह उनकी आवाज बनेगी।
राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना इन दोनों घटनाओं से पूरी तरह अलग थी। वहां लोगों के मन में मीडिया से कोई अपेक्षा या उम्मीद नहीं थी, बल्कि सीधे-सीधे नफरत दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि वह इसे केवल गुस्सा नहीं कहेंगे, बल्कि यह मीडिया के प्रति नफरत थी।
उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग रिपोर्टरों, एंकरों और एडिटरों को सिर्फ उनके हाथ में माइक देखकर गालियां दे रहे थे। उन्हें 'गोदी मीडिया' जैसे कई नामों से पुकारा जा रहा था। लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो उनके पास कोई ठोस तर्क नहीं था।
राहुल सिन्हा ने कहा कि पहले दिन वहां लगभग सभी बड़े न्यूज चैनलों के रिपोर्टर मौजूद थे। यह किसी एक चैनल का मामला नहीं था। Zee News, Aaj Tak, Times Now, Republic या किसी दूसरे चैनल के रिपोर्टर- लगभग हर चैनल के पत्रकारों के साथ वहां बदसलूकी हुई। उन्हें धक्का दिया गया, गालियां दी गईं और कई मामलों में मारपीट तक की गई।
उन्होंने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह थी कि ये सभी पत्रकार वहां प्रदर्शनकारियों की आवाज देश तक पहुंचाने के लिए गए थे। किसी भी रिपोर्टर ने उनकी बात दबाने की कोशिश नहीं की थी। किसी ने उनके सामने से माइक हटाकर अपनी बात थोपने की कोशिश नहीं की। इसके बावजूद पत्रकारों को वहां से भगाया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।
राहुल सिन्हा ने कहा कि यही सवाल सबसे ज्यादा गंभीर है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उस भीड़ का मामला नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर लगातार चल रहा है। मीडिया के भीतर ही लोग बार-बार कह रहे हैं कि टीवी पत्रकारिता खत्म हो गई है, टीवी में अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले लोगों के पास सोच या गंभीरता नहीं बची है। राहुल सिन्हा ने कहा कि इस सोच पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना पर जितनी चर्चा उस भीड़ को लेकर होनी चाहिए, उतनी ही मीडिया जगत को भी अपने भीतर झांकने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। अक्सर यह कहा जाता है कि टीवी पत्रकारिता की हालत खराब हो गई है, टीवी पर अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले पत्रकार गंभीर नहीं रह गए हैं।
उन्होंने कहा कि यह सवाल उठाने वाले अधिकतर वही लोग हैं, जो लंबे समय तक मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा रहे और अब उसके बाहर निकलने के बाद लगातार यह कह रहे हैं कि टेलीविजन पत्रकारिता खत्म हो चुकी है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उन्हें यह सोच एकतरफा लगती है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने वह दौर भी देखा है जब न्यूज चैनलों पर दिनभर अपराध की खबरें, फैशन टीवी की मॉडल्स, राखी सावंत, भूत-प्रेत, सांप, मदारी जैसे विषय खूब दिखाए जाते थे। उस समय भी यही पत्रकार इस इंडस्ट्री में काम कर रहे थे, लेकिन तब किसी ने यह नहीं कहा कि पत्रकारिता खत्म हो गई है। आज अचानक यह कहना कि टीवी पत्रकारिता में कुछ नहीं बचा, उचित नहीं है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि अगर देश में मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर टीवी न्यूज इंडस्ट्री को लगातार निशाना बनाया जाएगा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ पत्रकारों को नहीं होगा, बल्कि उन करोड़ों लोगों को होगा, जिनकी आवाज न्यूज चैनल देश तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि इस खतरे को सभी समाचार चैनलों को मिलकर समझना होगा।
उन्होंने कहा कि अगर जंतर-मंतर जैसी घटनाओं के बाद रिपोर्टर मैदान में जाने से डरने लगेंगे और उन्हें यह महसूस होने लगेगा कि भीड़ के बीच जाने पर उनकी लिंचिंग हो सकती है, तो यह पत्रकारिता के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी। ऐसे माहौल में वही लोग सफल होंगे जो चाहते हैं कि सिर्फ उनका नैरेटिव चले और वही बातें दिखाई जाएं, जिनसे वे सहमत हों।
राहुल सिन्हा ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकट यह है कि बिना किसी ठोस वजह के रिपोर्टरों और न्यूज चैनलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब लिंचिंग सिर्फ सड़क पर नहीं हो रही, बल्कि सोशल मीडिया पर भी शब्दों के जरिए पत्रकारों की लिंचिंग की जा रही है। वहीं जमीन पर रिपोर्टरों के साथ धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि अगर मीडिया के कल, आज और आने वाले कल की बात करें तो सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कैसे बचाया जाए। उन्होंने कहा कि इसके लिए मीडिया को हर बार खुद को ही दोषी ठहराना बंद करना होगा। बार-बार यह कहना कि हम गलत दिखाते हैं, हम पत्रकारिता नहीं करते, हम नैतिकता का पालन नहीं करते- यह सोच भी सही नहीं है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि लोग वही देखते हैं, जो उन्हें महत्वपूर्ण लगता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पत्रकारिता गंभीर मुद्दे नहीं उठाती। उन्होंने राणा यशवंत की बात का जिक्र करते हुए कहा कि पेपर लीक, नकल, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी या किसी बड़े मंत्री के बेटे से जुड़ा विवाद- ऐसा कौन-सा मुद्दा है जिसे टीवी चैनलों ने नहीं उठाया?
उन्होंने कहा कि वह किसी एक चैनल की नहीं, बल्कि पूरी टीवी इंडस्ट्री की बात कर रहे हैं। उन्होंने भरत तिवारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पुलिस गोलीकांड जैसी घटनाएं हुईं, तब न्यूज चैनलों ने उन्हें प्रमुखता से उठाया और उसके बाद कार्रवाई भी हुई। लेकिन इन सकारात्मक उदाहरणों का जिक्र शायद ही कभी किया जाता है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि अक्सर सिर्फ यह नैरेटिव बनाया जाता है कि टीवी चैनल बिके हुए हैं और उनके अपने हित जुड़े हुए हैं। जबकि यह आरोप लगाने वाले कई लोग खुद सिर्फ अपने सब्सक्राइबर बढ़ाने और अपनी पहुंच बढ़ाने में लगे रहते हैं। अगर उनके सब्सक्राइबर बढ़ना बंद हो जाएं, तो उनका पूरा मॉडल ही प्रभावित हो जाएगा। इसलिए नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले हर किसी को खुद का भी आकलन करना चाहिए।
S4M 40 अंडर 40 कार्यक्रम में ITV Network के एग्जिक्यूटिव एडिटर मनोज मनु ने पत्रकारिता के बदलते दौर, मीडिया इंडस्ट्री में रोजगार के संकट और नई पीढ़ी की बदलती कार्यशैली पर विस्तार से अपनी बात रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में ITV Network के एग्जिक्यूटिव एडिटर मनोज मनु ने पत्रकारिता के बदलते दौर, मीडिया इंडस्ट्री में रोजगार के संकट और नई पीढ़ी की बदलती कार्यशैली पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के भविष्य पर चर्चा करते समय सिर्फ मीडिया संस्थानों की चुनौतियों की बात करना काफी नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं की चिंता भी करनी होगी, जो हर साल पत्रकार बनने का सपना लेकर इस क्षेत्र में आते हैं।
अपने संबोधन की शुरुआत में मनोज मनु ने कहा कि उनसे पहले सभी वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे हैं और हर किसी की अपनी सोच और अनुभव है। उन्होंने कहा कि वर्तिका जी ने बहुत कम समय में कई महत्वपूर्ण बातें रखीं और "गागर में सागर भरने" की कोशिश की। उनके मुताबिक, इस विषय पर अलग-अलग लोगों की राय अलग हो सकती है और सभी अपनी-अपनी जगह सही भी हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि आज मीडिया जगत में एक तरह की दहशत का माहौल दिखाई देता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पीढ़ी और उनसे वरिष्ठ कुछ पत्रकारों के भीतर नई पीढ़ी को लेकर कहीं न कहीं ईर्ष्या का भाव भी नजर आता है।
मनोज मनु ने कहा कि अगर इस चर्चा में कुछ Gen Z के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाता, तो वे भी अपने विचार रखते और तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने आता। उन्होंने कहा कि अक्सर हम नई पीढ़ी के बारे में अपनी राय बना लेते हैं, लेकिन उनकी बात सुनने की कोशिश कम करते हैं।
उन्होंने कहा कि मीडिया देश की एक बहुत बड़ी इंडस्ट्री है। देश के दूर-दराज़ गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से बड़ी संख्या में युवा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में आते हैं। वे पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं, मेहनत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें मीडिया संस्थानों में अच्छी नौकरी मिलेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कभी किसी ने यह गंभीरता से सोचा कि सिर्फ दिल्ली-एनसीआर में ही कितने पत्रकारिता संस्थान हर साल नए छात्र तैयार कर रहे हैं और उनके मुकाबले नौकरियां कितनी उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि हर साल हजारों छात्र पत्रकारिता की डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए सैकड़ों नौकरियां भी उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने चर्चा के दौरान कही गई उस बात का भी जिक्र किया कि मीडिया संस्थानों में लगातार लोगों की छंटनी हो रही है और कई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया जाता है, लेकिन इस पर न तो कोई गंभीर बहस होती है और न ही ज्यादा चर्चा होती है।
मनोज मनु ने कहा कि जो युवा बड़े सपने लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई करने आते हैं, उन्हें लगता है कि कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें किसी अच्छे मीडिया संस्थान में नौकरी मिल जाएगी। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक नौकरी की तलाश में भटकते हैं, तब उन्हें एहसास होता है कि नौकरियां हैं ही नहीं। यह स्थिति आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
हालांकि उन्होंने कहा कि आज की Gen Z पहले की पीढ़ियों से अलग है। उनके भीतर जबरदस्त ऊर्जा है, कुछ नया करने का उत्साह है और अपना रास्ता खुद बनाने का साहस है। उन्होंने कहा कि आज का युवा किसी मीडिया संस्थान के बाहर नौकरी का इंतजार करते हुए खड़ा नहीं रहता। डिजिटल युग ने उसे एक नया रास्ता दिखा दिया है। वह कैमरा उठाता है और सीधे YouTube या सोशल मीडिया पर अपना मंच बना लेता है। यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में युवा पारंपरिक मीडिया के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपना करियर बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। कई बार इन युवाओं में अनुशासन की कमी दिखाई देती है। इसका कारण यह है कि या तो पत्रकारिता संस्थानों ने उन्हें पेशे की आचार संहिता और मर्यादाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी, या फिर वे उन बातों को ठीक तरह से समझ नहीं पाए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में सिर्फ कैमरा उठाकर रिपोर्टिंग करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके साथ पेशेवर जिम्मेदारियां और नैतिक आचरण भी उतना ही जरूरी है। इसलिए नई पीढ़ी को पत्रकारिता की आचार संहिता से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
इसके बाद मनोज मनु ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर आज हर कोई अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रहा है। उनके मुताबिक, मौजूदा दौर की सबसे बड़ी लड़ाई हिस्सेदारी की है। इसी संदर्भ से उन्होंने सरकारों के दबाव, मीडिया की बदलती भूमिका और पुराने अनुभवों का जिक्र करते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई।
इस दौरान मनोज मनु ने कहा कि आज मीडिया इंडस्ट्री में सबसे बड़ी लड़ाई हिस्सेदारी की है। हर व्यक्ति और हर समूह अपना-अपना हिस्सा चाहता है। उन्होंने कहा कि सरकारों का दबाव मीडिया पर हमेशा से रहा है। यह कोई नई बात नहीं है और इसे कोई नकार भी नहीं सकता।
मनोज मनु ने कहा कि अभी कुछ दिन पहले उन्होंने एक सांसद के साथ पॉडकास्ट किया था। बातचीत के दौरान उन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते (न्यूक्लियर डील) के समय हुए उस चर्चित मामले का जिक्र किया, जब संसद में नोटों से भरा बैग लाया गया था और आरोप लगा था कि सांसदों को खरीदने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने उस सांसद से जानना चाहा कि उस पूरे मामले का आखिर क्या हुआ।
उन्होंने बताया कि सांसद ने कहा कि उस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) भी बनाई गई थी, लेकिन आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि उस जांच का नतीजा क्या निकला। संसद के पटल पर जो एक करोड़ रुपये रखे गए थे, उनका क्या हुआ और वे किसके पास गए, इसकी जानकारी आज तक सामने नहीं आई। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय एक बड़े मीडिया संस्थान ने स्टिंग ऑपरेशन किया था, लेकिन वह स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित ही नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि उस पूरे घटनाक्रम में मीडिया के साथ भी धोखा हुआ।
मनोज मनु ने कहा कि उस समय 'गोदी मीडिया' जैसा शब्द प्रचलन में नहीं था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सत्ता और मीडिया के रिश्तों को लेकर सवाल नहीं उठते थे। उनके मुताबिक, परिस्थितियां तब भी थीं और आज भी हैं, केवल शब्द बदल गए हैं।
उन्होंने कहा कि आज जो लोग पहले व्यवस्था का हिस्सा थे और अब सिस्टम से बाहर हो चुके हैं, उन्होंने अपनी अलग दुनिया बना ली है। अब वही लोग मौजूदा व्यवस्था की लगातार आलोचना कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इसके पीछे कहीं न कहीं ईर्ष्या का भाव भी दिखाई देता है। उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि आज के समय में तो लोग मेट्रो, ट्रेन या बस में भी किसी दूसरे को सीट देने से बचते हैं। जब समाज के हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या मौजूद है, तो पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं रह सकती।
मनोज मनु ने कहा कि अगर "कल, आज और कल" की बात करें तो पहले का समय बिल्कुल अलग था। पहले जब किसी पत्रकार के साथ देश में कहीं भी कोई घटना होती थी, तो सभी पत्रकार संगठन एकजुट होकर उसके समर्थन में खड़े हो जाते थे। चाहे दिल्ली हो या कोई छोटा राज्य, पत्रकार एक साथ बैठते थे, चर्चा करते थे, ज्ञापन देते थे और जरूरत पड़ने पर प्रदर्शन भी करते थे। लेकिन आज ऐसा नहीं होता।
उन्होंने एक कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां किसी ने उनसे कहा कि एक प्रेस क्लब तो है, लेकिन वह एक विचारधारा विशेष का केंद्र बन चुका है, इसलिए दूसरा प्रेस क्लब बनाया जाना चाहिए। मनोज मनु ने कहा कि यह स्थिति बताती है कि पत्रकार भी अब अलग-अलग खेमों में बंट चुके हैं।
उन्होंने कहा कि पहले पत्रकार एक थे, लेकिन आज बंट गए हैं। अगर यही स्थिति जारी रही तो आगे और विभाजन होगा। उन्होंने कहा कि आजकल "बंटेंगे तो कटेंगे" जैसी बातें बहुत कही जा रही हैं, लेकिन उनका मानना है कि अगर समाज और मीडिया दोनों बंटेंगे, तो अंत में कोई भी सुरक्षित नहीं बचेगा। इसलिए जरूरत लोगों को जोड़ने की है, बांटने की नहीं।
मनोज मनु ने हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ हुई धक्का-मुक्की की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस घटना के बाद एक वरिष्ठ पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि "बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय।" उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि लोग एक-दूसरे के कपड़े फाड़ने तक पर उतर आए हैं। मीडिया बंट चुका है, संस्थान बंट चुके हैं और पत्रकारों के विचार भी अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं। ऐसे में अगर विभाजन पहले से मौजूद है तो इस पर गंभीर मंथन और भी जरूरी हो जाता है।
उन्होंने समाचार4मीडिया की सराहना करते हुए कहा कि यह एक अच्छा और गुटनिरपेक्ष मंच है, जहां अलग-अलग विचारों वाले लोग एक साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज सभी पत्रकार किसी न किसी गुट में हैं। सभी की अपनी-अपनी राय है। किसी पर दबाव हो सकता है, किसी पर प्रभाव हो सकता है। किसी ने उसका नाम 'गोदी मीडिया' रख दिया, लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के भीतर विभाजन मौजूद है।
मनोज मनु ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम लगातार होने चाहिए, जिनमें सभी विचारधाराओं और सभी गुटों के पत्रकार बिना किसी पूर्वाग्रह के एक मंच पर बैठें। उन्होंने कहा कि खुले मन से मंथन और चर्चा होगी, तभी पत्रकारिता के सामने खड़ी इन चुनौतियों का कोई समाधान निकल पाएगा। उनके मुताबिक, पहले इस तरह का माहौल नहीं था। पहले न तो इतनी वैचारिक दूरियां थीं और न ही पत्रकारिता के भीतर इतना विभाजन दिखाई देता था।
GTC नेटवर्क के फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर व प्रेजिडेंट रवींद्र नारायण के जन्मदिन पर उनके प्रेरणादायक और ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरे सफर को याद करते हैं।
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Samachar4media Bureau
GTC नेटवर्क के फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर व प्रेजिडेंट रवींद्र नारायण के जन्मदिन के अवसर पर आइए एक ऐसे करियर पर नजर डालते हैं, जो कई ऐतिहासिक उपलब्धियों और क्षेत्रीय कहानियों की ताकत पर अटूट विश्वास से भरा रहा है।
उन्होंने इस विश्वास के साथ एक मीडिया साम्राज्य खड़ा किया कि पंजाबी कहानियां सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें पूरी दुनिया तक पहुंचना चाहिए। फिर उन्होंने इस सोच को एक और नए मुकाम तक पहुंचाया। आज उनके जन्मदिन पर मीडिया जगत रवींद्र नारायण को सम्मान के साथ याद कर रहा है। गैलेक्टिक टेलीविजन एंड कम्युनिकेशंस (GTC नेटवर्क) के संस्थापक, प्रबंध निदेशक और अध्यक्ष रवींद्र नारायण का नाम भारत में क्षेत्रीय प्रसारण (रीजनल ब्रॉडकास्टिंग) के विकास का पर्याय बन चुका है।
रवींद्र नारायण को व्यापक रूप से "फादर ऑफ पंजाबी टेलीविजन" के रूप में जाना जाता है। प्रसारण जगत में उनका सफर करीब दो दशकों का रहा है, जिसमें उन्होंने देश के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय मीडिया इकोसिस्टम में से एक का निर्माण किया। वर्ष 2007 से उन्होंने PTC नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रेसिडेंट के रूप में इसकी कमान संभाली और इसे दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा नेटवर्क बनाया, जो पंजाबी भाषा में फिल्मों और संगीत से अलग मौलिक (ओरिजिनल) कंटेंट का सबसे बड़ा निर्माता है।
उनके नेतृत्व में नेटवर्क का विस्तार सात टेलीविजन चैनलों तक हुआ। इसके साथ ही दर्जनों फेसबुक पेजों पर मजबूत डिजिटल मौजूदगी, फिल्म निर्माण इकाई (फिल्म प्रोडक्शन आर्म) और एक ऑडियो लेबल भी स्थापित किया गया। नेटवर्क का संचालन भारत के अलावा कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तक फैल गया।
रवींद्र नारायण का करियर कई ऐतिहासिक उपलब्धियों से भी भरा रहा है। उनके नेतृत्व में दुनिया का पहला 360-डिग्री वर्चुअल रियलिटी (VR) लाइव टेलीकास्ट एक स्थायी स्थान से स्वर्ण मंदिर (गोल्डन टेंपल) से किया गया। इसके अलावा उन्होंने फेसबुक पर दुनिया का पहला 24x7 स्ट्रीमिंग टीवी चैनल भी लॉन्च किया। उनकी कहानी कहने की क्षमता सिर्फ टेलीविजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई और एक निर्माता के रूप में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (नेशनल फिल्म अवॉर्ड) भी हासिल किया।
पिछले वर्ष अगस्त में PTC नेटवर्क से अलग होने के बाद रवींद्र नारायण ने अपना नया उद्यम GTC नेटवर्क शुरू किया। अमृतसर में स्थापित यह नेटवर्क वैश्विक मीडिया के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सोच के साथ तैयार किया गया है। GTC के तहत उन्होंने "दुनिया का सबसे बड़ा ग्लोबल इंडियन क्रिएटर्स हब" बनाने का लक्ष्य रखा है। यह नया नेटवर्क पारंपरिक टेलीविजन, OTT, कनेक्टेड टीवी (CTV) और FAST चैनलों तक फैला होगा, लेकिन इसकी जड़ें पंजाबी और भारतीय कहानियों से ही जुड़ी रहेंगी। उनके नेतृत्व में हाल ही में GTC पंजाबी ने ब्रिटेन के बाजार में प्रवेश किया है। इसके अलावा हाल ही में 'जसविंदर भल्ला मेमोरियल GTC कॉमेडी अवॉर्ड्स' की भी घोषणा की गई, जो दिवंगत कॉमेडी कलाकार जसविंदर भल्ला की विरासत को सम्मानित करेगा।
रवींद्र नारायण को उनके योगदान के लिए वैश्विक स्तर पर भी सम्मान मिला है। वर्ष 2022 में लंदन में आयोजित ग्लोबल बिजनेस समिट में उन्हें 'ग्लोबल इंस्पिरेशनल लीडर्स' में शामिल किया गया था। इसके अलावा वे TEDx और WAVES समिट जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी अपने विचार रख चुके हैं। उन्हें मानद पीएचडी (Honorary PhD) से भी सम्मानित किया जा चुका है। आज भी वे भारत में क्षेत्रीय प्रसारण और डिजिटल रेडियो नीति के भविष्य को लेकर मुखर आवाज बने हुए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि हर कंटेंट क्रिएटर खुद को पत्रकार और संपादक मानने लगेगा, तो मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
उन्होंने हाल के आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि पूरे आंदोलन के दौरान मुख्यधारा के मीडिया को लगातार निशाना बनाया गया और उसकी आलोचना की गई। लेकिन जैसे ही आंदोलन सफल हुआ, वही लोग मुख्यधारा के न्यूज चैनलों पर इंटरव्यू देने पहुंच गए। सुधीर चौधरी ने कहा कि उन्होंने अपने शो में भी यह सवाल उठाया था कि जिन चैनलों के पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, उन्हीं चैनलों पर आंदोलन से जुड़े लोग बैठकर अपनी बात रखते दिखाई दिए। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह टीआरपी और व्युअरशिप की होड़ है।
सुधीर चौधरी ने कहा कि मीडिया संस्थानों को यह तय करना होगा कि वे अपने सिद्धांतों के लिए कितना त्याग करने को तैयार हैं। अगर किसी मुद्दे पर मजबूत रुख अपनाना है, तो उसके लिए कुछ कीमत भी चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि यदि मीडिया संस्थान न व्यूअरशिप का नुकसान उठाना चाहते हैं, न आर्थिक नुकसान और न ही किसी संघर्ष का सामना करना चाहते हैं, तो फिर उनके बचाव के लिए कोई बाहरी व्यक्ति आगे नहीं आएगा। उनके अनुसार इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी समस्या यही है कि अधिकांश लोग कठिन रास्ता चुनने से बचते हैं और अपने नुकसान की कीमत पर कोई सिद्धांत आधारित फैसला नहीं लेना चाहते।
उन्होंने मीडिया संस्थानों से आत्ममंथन करने की अपील करते हुए कहा कि हर न्यूज रूम में यह चर्चा होनी चाहिए कि क्या वे किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से स्टैंड लेने के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि जब वह जी न्यूज में थे, तब एक समय चैनल ने आम आदमी पार्टी के खिलाफ यह फैसला लिया था कि उसके नेताओं को मंच नहीं दिया जाएगा। उस समय आम आदमी पार्टी अपने सबसे मजबूत दौर में थी और लगातार चुनाव जीत रही थी। लेकिन इस फैसले में दूसरे मीडिया संस्थान साथ नहीं आए, क्योंकि इससे व्युअरशिप और विज्ञापन राजस्व प्रभावित होने का खतरा था।
इसके बाद सुधीर चौधरी ने मीडिया के बदलते स्वरूप पर बात करते हुए कहा कि आज मुख्यधारा के मीडिया का एजेंडा काफी हद तक सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं। पहले संपादक यह तय करते थे कि कौन-सी खबर महत्वपूर्ण है, लेकिन अब न्यूज मीटिंग में सबसे पहले यह देखा जाता है कि सोशल मीडिया पर क्या ट्रेंड कर रहा है। उन्होंने कहा कि जिस विषय पर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा होती है, उसी पर खबरें और टीवी कार्यक्रम बनाए जाते हैं। यानी अब मुख्यधारा का मीडिया सोशल मीडिया को दिशा नहीं दे रहा, बल्कि सोशल मीडिया मुख्यधारा के मीडिया को चला रहा है।
उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनलों के प्राइम टाइम कार्यक्रमों में भी बड़ी संख्या में वही वीडियो और विषय दिखाई देते हैं, जो पहले सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके होते हैं। इस कारण हैशटैग संपादकीय निर्णयों पर हावी हो गया है। पहले खबर का चयन संपादकीय समझ के आधार पर होता था, लेकिन अब ट्रेंड और वायरल कंटेंट ही खबरों का केंद्र बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि टीवी और सोशल मीडिया दोनों पर एक जैसी सामग्री और एक जैसा प्रस्तुतीकरण दिखाई देता है।
हाल के आंदोलन का उल्लेख करते हुए सुधीर चौधरी ने कहा कि यदि कोई आंदोलन कैमरे और पत्रकारों से डरने लगे, तो इसका मतलब है कि वह सवालों से भी डरने लगा है। उन्होंने कहा कि उनके जीवन में यह सबसे डरपोक आंदोलन रहा, क्योंकि उसमें रिपोर्टरों और कैमरों का सामना करने से बचने की कोशिश की गई। इसके बावजूद सोशल मीडिया ने उस आंदोलन का इतना महिमामंडन किया कि मुख्यधारा का मीडिया भी उसी धारा में बह गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मुख्यधारा का मीडिया भी सोशल मीडिया से मिलने वाली व्युअरशिप और ट्रैफिक का हिस्सा चाहता था।
उन्होंने कहा कि आज मुख्यधारा के मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि सोशल मीडिया का कंटेंट हटा दिया जाए, तो उसके पास अपना मौलिक कंटेंट कितना बचता है। उन्होंने अपने शुरुआती पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब सोशल मीडिया और इंटरनेट नहीं थे, तब संपादक और रिपोर्टर खुद सोचते थे, नए स्टोरी आइडिया खोजते थे और उन्हें न्यूज मीटिंग में लेकर आते थे। लेकिन अब सोशल मीडिया के प्रभाव ने मौलिक सोच को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया के कंटेंट में बहुत कम अंतर रह गया है। दोनों का लहजा, विषय और प्रस्तुति लगभग एक जैसी होती जा रही है। यह बदलाव पत्रकारिता की मौलिकता के लिए गंभीर चुनौती है और मीडिया को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
Zee Entertainment Enterprises (ZEEL) ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के अंतिम आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कंपनी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है।
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Samachar4media Bureau
Zee Entertainment Enterprises (ZEEL) ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के अंतिम आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कंपनी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है। साथ ही कंपनी का कहना है कि SEBI के इस आदेश का उसकी ₹3,144 करोड़ की फंड जुटाने की योजना पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा।
कंपनी के प्रवक्ता ने जारी बयान में कहा कि ZEEL को SEBI का अंतिम आदेश प्राप्त हो गया है और कंपनी इस मामले में कानूनी सलाह ले रही है। कंपनी का मानना है कि नियामक का यह आदेश प्रस्तावित फंड-रेजिंग प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करता।
ZEEL ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे स्टॉक एक्सचेंजों और 31 जुलाई 2026 को हुई असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों से फंड जुटाने की मंजूरी मिल चुकी है। ऐसे में कंपनी अब सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करते हुए इस फंड-रेजिंग योजना को सफलतापूर्वक पूरा करेगी। कंपनी का कहना है कि इस पूंजी जुटाने का उद्देश्य उसकी वित्तीय स्थिति को और मजबूत करना तथा सभी हितधारकों के लिए बेहतर मूल्य सृजित करना है।
कंपनी ने यह भी कहा कि उसके और उसके प्रमोटरों पर लगाए गए आरोपों के संबंध में वह कानून के मुताबिक सभी आवश्यक कदम उठाएगी, ताकि शेयरधारकों और अन्य हितधारकों के हित सुरक्षित रह सकें।
दरअसल, कुछ दिन पहले SEBI ने एक मामले में अपना अंतिम आदेश जारी किया था। यह मामला हैदराबाद स्थित ZEEL की एक अचल संपत्ति को प्रमोटर समूह से जुड़ी Essel Group की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए कथित तौर पर गिरवी रखे जाने से जुड़ा है।
SEBI के मुताबिक, कंपनी की इस संपत्ति को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, ऑडिट कमेटी और शेयरधारकों की जानकारी या मंजूरी के बिना गिरवी रखा गया। साथ ही इस व्यवस्था का आवश्यक खुलासा भी नहीं किया गया।
अपने अंतिम आदेश में SEBI ने ZEEL पर दो महीने तक प्रतिभूति बाजार में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। वहीं कंपनी के संस्थापक एवं चेयरमैन एमेरिटस Subhash Chandra और मैनेजिंग डायरेक्टर एवं CEO Punit Goenka को एक वर्ष तक प्रतिभूतियों में कारोबार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा कंपनी और दोनों अधिकारियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है।
हालांकि, ZEEL का कहना है कि वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे बढ़ेगी और उसकी फंड जुटाने की योजना तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी।
समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40 कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने मीडिया जगत के सामने मौजूद चुनौतियों, पत्रकारों की एकजुटता की कमी और बदलते मीडिया परिदृश्य पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने मीडिया जगत के सामने मौजूद चुनौतियों, पत्रकारों की एकजुटता की कमी और बदलते मीडिया परिदृश्य पर बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी समस्या बाहर नहीं, बल्कि भीतर है। पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने साथियों के साथ मजबूती से खड़े नहीं होते, जबकि दूसरे पेशों में ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया समय रहते नहीं चेता, तो आने वाले समय में रिपोर्टरों की जगह रोबोट कवरेज करते नजर आएंगे।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए सुधीर चौधरी ने कहा कि सुबह से कई वक्ता पत्रकारिता के अलग-अलग पहलुओं पर अपनी बात रख चुके हैं, इसलिए वह उन्हीं बातों को दोहराना नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि वह सीधे उस मुद्दे पर आना चाहते हैं, जो इस समय मीडिया जगत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के दौरान भी वह अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन उनका मानना है कि मौजूदा हालात पर खुलकर बात होना जरूरी है।
उन्होंने हाल ही में जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह के मंचों पर अक्सर पत्रकार अपनी शिकायतें रखते हैं कि उनके साथ क्या हुआ, क्या नहीं होना चाहिए था और आगे क्या किया जाना चाहिए। लेकिन केवल शिकायत करने से कोई बदलाव नहीं आने वाला। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे को अपने टीवी शो में भी उठाया था और साफ कहा था कि मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि इस पेशे से जुड़े लोग एक-दूसरे का साथ नहीं देते।
सुधीर चौधरी ने दूसरे पेशों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी डॉक्टर के साथ दुर्व्यवहार होता है, तो पूरे देश के डॉक्टर उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। इसी तरह किसी वकील के साथ कोई घटना हो जाए, तो सभी वकील एकजुट होकर विरोध करते हैं। लेकिन मीडिया में तस्वीर बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा कि अगर किसी पत्रकार या किसी चैनल के साथ कोई गलत घटना हो जाए, तो बाकी लोग भीतर ही भीतर खुश होते हैं। उन्हें लगता है कि उनका एक प्रतिस्पर्धी कम हो गया। ऊपर से सहानुभूति दिखाई जाती है, लेकिन अंदर ईर्ष्या बनी रहती है। उनके मुताबिक मीडिया जगत की यही सबसे बड़ी कमजोरी है।
उन्होंने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी संस्था एनबीडीए (पहले एनबीए) है और वह स्वयं उसके सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले भी उन्होंने इसकी बैठकों में यही सुझाव दिया था कि जब भी पत्रकारों पर हमला हो या किसी मीडिया संस्थान के साथ दुर्व्यवहार हो, तब सभी चैनलों के प्रबंधन और संपादकों को एक साथ बैठकर सामूहिक निर्णय लेना चाहिए।
सुधीर चौधरी ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना के बाद सभी चैनलों को एकजुट होकर संबंधित आंदोलन और उसके नेताओं के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सभी चैनल मिलकर यह फैसला कर सकते थे कि जब तक पत्रकारों से माफी नहीं मांगी जाती, तब तक उनके आंदोलन की कवरेज नहीं होगी और न ही उनके बारे में कोई खबर दिखाई जाएगी। अगर सभी चैनल एक साथ ऐसा नहीं कर सकते थे, तो कम से कम वे चैनल यह फैसला लेते, जिनके पत्रकारों के साथ बदसलूकी हुई थी। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि केवल मंचों से शिकायत करने या सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख देने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। जरूरत इस बात की है कि सभी चैनलों के संपादक, प्रबंधन और मालिक एक साथ बैठें और इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए ठोस नीति बनाएं। जब तक मीडिया खुद अपने लिए सामूहिक रणनीति नहीं बनाएगा, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।
अपने संबोधन में सुधीर चौधरी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का जिक्र करते हुए भविष्य की एक गंभीर तस्वीर भी पेश की। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया इंडस्ट्री ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदली, तो आने वाले एक-दो वर्षों में रिपोर्टरों की जगह रोबोट कवरेज करते दिखाई देंगे। उन्होंने कहा कि एआई बहुत तेजी से विकसित हो रहा है और जल्द ही ह्यूमनॉयड रोबोट भी मैदान में उतर सकते हैं। मीडिया संस्थान उन्हें अपने चैनल की जैकेट पहनाकर रिपोर्टिंग के लिए भेज देंगे। उन्होंने इस टिप्पणी के जरिए यह संदेश दिया कि यदि पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं किया गया, तो तकनीक इंसानी रिपोर्टिंग की जगह लेने लगेगी।
इसके बाद सुधीर चौधरी ने पत्रकारिता में प्रवेश के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठाते हुए कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में एक बहुत बड़ा 'लूपहोल' है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या आईटी प्रोफेशनल बनने के लिए डिग्री और तय योग्यता जरूरी होती है। अगर कोई बिना डिग्री के डॉक्टर बनकर काम करे, तो उसे झोलाछाप डॉक्टर कहा जाता है और उसके खिलाफ कार्रवाई होती है। बिना डिग्री वाला व्यक्ति अदालत में वकालत नहीं कर सकता और न ही किसी बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी पा सकता है। लेकिन पत्रकारिता शायद ऐसा अकेला पेशा है, जहां कोई भी व्यक्ति कैमरा और माइक लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर सकता है।
उन्होंने बताया कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन के दौरान उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा, जिनका किसी स्थापित मीडिया संस्थान से कोई संबंध नहीं था। उनके पास केवल अपना यूट्यूब चैनल, एक छोटा कैमरा या मोबाइल फोन था और वे खुद को मीडिया बता रहे थे। पुलिस भी उन्हें मीडिया मानकर कवरेज की अनुमति दे रही थी। उनके अनुसार यह स्थिति पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चुनौती है।
सुधीर चौधरी ने कहा कि अब समय आ गया है कि मीडिया इंडस्ट्री अपने स्तर पर 'चेक्स एंड बैलेंस' तैयार करे। यह तय होना चाहिए कि कौन पत्रकार कहलाने का अधिकार रखता है, कौन फील्ड रिपोर्टिंग कर सकता है और किन लोगों के लिए स्पष्ट मानक होने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि मीडिया इंडस्ट्री सरकार के सामने प्रस्ताव रख सकता है कि जिस तरह झोलाछाप डॉक्टरों की पहचान की जाती है, उसी तरह 'झोलाछाप पत्रकारों' की भी पहचान होनी चाहिए और उनके लिए नियम बनाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि उन्हें हैरानी होती है कि मीडिया इंडस्ट्री में इतने अनुभवी और बुद्धिमान लोग हैं, जो देश के प्रधानमंत्री और मंत्रियों को सलाह देते हैं कि क्या किया जाना चाहिए, लेकिन अपनी ही इंडस्ट्री की समस्याओं का समाधान निकालने में असफल दिखाई देते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी बातें कुछ लोगों को कड़ी या नाराज करने वाली लग सकती हैं, लेकिन उनका मानना है कि जो कदम बहुत पहले उठाए जाने चाहिए थे, वे अब तक नहीं उठाए गए हैं।
टेलीविजन मीजरमेंट (टीवी रेटिंग) से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
टेलीविजन मीजरमेंट (टीवी रेटिंग) से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) ने केरल हाई कोर्ट में दायर अपनी वह याचिका वापस ले ली है, जिसमें उसने केंद्र सरकार की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी-2026 को चुनौती दी थी।
इंडस्ट्री से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला ऐसे समय आया है, जब एक ओर ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाताओं की ओर से टीवी रेटिंग व्यवस्था में जल्द स्थिरता लाने का दबाव बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर अदालत द्वारा अंतरिम रोक (स्टे) हटाए जाने के बाद AIDCF की कानूनी स्थिति भी कमजोर पड़ गई थी।
भविष्य में फिर याचिका दायर करने का रखा अधिकार
28 जुलाई 2026 को एर्नाकुलम स्थित केरल हाई कोर्ट में दाखिल Withdrawal Memo के अनुसार, AIDCF ने अदालत से अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी है। हालांकि, संगठन ने यह अधिकार सुरक्षित रखा है कि जरूरत पड़ने पर वह भविष्य में इसी या इससे जुड़े किसी अन्य मुद्दे पर नई याचिका दाखिल कर सके।
क्या था पूरा विवाद?
AIDCF ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा 27 मार्च 2026 को जारी टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी-2026 के क्लॉज 5.4.1 के उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसमें टीवी लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्यूअरशिप को आधिकारिक टीवी रेटिंग में शामिल नहीं करने का फैसला लिया गया था।
फेडरेशन ने अपनी याचिका में मांग की थी कि इस प्रावधान को रद्द किया जाए और सरकार को इस नीति के तहत जारी परिचालन दिशानिर्देश (Operational Guidelines) लागू करने से रोका जाए।
हालांकि, याचिका वापस लेने के लिए दायर आवेदन में AIDCF ने कोई विस्तृत कारण नहीं बताया। उसमें सिर्फ इतना कहा गया कि "कुछ बाद के घटनाक्रमों और अन्य कारणों" की वजह से वह अब इस याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।
हाई कोर्ट ने हटाई थी अंतरिम रोक
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ दिन पहले ही केरल हाई कोर्ट ने उस अंतरिम रोक को हटा दिया था, जिसने सरकार को नई नीति लागू करने से रोक रखा था।
24 जुलाई के अपने आदेश में अदालत ने कहा था कि अंतिम फैसला आने तक भी सरकार लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को टीवी रेटिंग से बाहर रखने वाले प्रावधान को लागू कर सकती है। इस फैसले के बाद सरकार के लिए नई रेटिंग व्यवस्था लागू करने का रास्ता साफ हो गया था।
इंडस्ट्री का मानना- कानूनी रणनीति कमजोर पड़ गई थी
टेलीविजन इंडस्ट्री से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया कि AIDCF का यह फैसला कानूनी झटकों और इंडस्ट्री के बढ़ते दबाव, दोनों का नतीजा है।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि अंतरिम रोक हटने के बाद AIDCF की कानूनी स्थिति काफी कमजोर हो गई थी।
उन्होंने कहा, "जब अदालत ने अंतिम फैसला आने तक सरकार को नीति लागू करने की अनुमति दे दी, तब तुरंत न्यायिक हस्तक्षेप की मांग का आधार काफी हद तक कमजोर पड़ गया।"
एक अन्य अधिकारी का कहना था कि AIDCF को पूरे इंडस्ट्री का समर्थन भी नहीं मिल पाया, क्योंकि सरकार द्वारा लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को बाहर रखने के पीछे दिए गए तर्कों का विरोध करना लगातार मुश्किल होता जा रहा था।
उन्होंने कहा, "लैंडिंग पेज से किसी चैनल की पहुंच (Reach) कृत्रिम रूप से बढ़ जाती थी, जबकि दर्शक ने उसे देखने का कोई सक्रिय फैसला नहीं लिया होता था। जब विज्ञापनदाता और ब्रॉडकास्टर्स साफ और भरोसेमंद रेटिंग की मांग करने लगे, तब इस व्यवस्था का बचाव करना आसान नहीं रह गया।"
एक तीसरे वरिष्ठ अधिकारी ने इसे कानूनी जीत या हार नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक फैसला बताया।
उनके अनुसार, "पूरे इंडस्ट्री में अनिश्चितता खत्म करने का दबाव था। विज्ञापनदाता, ब्रॉडकास्टर्स और एजेंसियां सभी स्थिर टीवी रेटिंग का इंतजार कर रहे थे। स्टे हटने के बाद मुकदमा जारी रखने से सिर्फ अनिश्चितता बढ़ती, जबकि AIDCF के जीतने की संभावना बहुत कम रह गई थी।"
क्या होता है 'लैंडिंग पेज'?
'लैंडिंग पेज' टीवी रेटिंग प्रणाली का लंबे समय से विवादित विषय रहा है। जब कोई दर्शक अपना टीवी ऑन करता है, तो कई बार उसे अपनी पसंद का चैनल चुनने से पहले एक तय चैनल अपने आप दिखाई देता है। इसी को 'लैंडिंग पेज' कहा जाता है।
ब्रॉडकास्टर्स और विज्ञापनदाताओं का लंबे समय से कहना रहा है कि इससे किसी चैनल की दर्शक संख्या कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है, क्योंकि यह वास्तविक देखने (Intentional Viewing) के बजाय केवल अपने आप दिखाई देने (Passive Exposure) का आंकड़ा होता है।
इसी वजह से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नई टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी-2026 में तय किया कि लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्यूअरशिप को आधिकारिक टीवी रेटिंग का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। इसे हाल के वर्षों में भारत की टीवी रेटिंग प्रणाली में सबसे बड़े सुधारों में से एक माना जा रहा है। यह फैसला मंत्रालय, इंडस्ट्री और BARC India के बीच लंबे समय तक चली चर्चाओं के बाद लिया गया था।
हालांकि, केबल वितरण कंपनियों ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि इससे उनके कारोबारी मॉडल और ब्रॉडकास्टर्स के साथ व्यावसायिक समझौतों पर असर पड़ सकता है।
नई रेटिंग व्यवस्था लागू होने का रास्ता साफ
अब जबकि हाई कोर्ट अंतरिम रोक हटा चुका है और AIDCF ने भी अपनी याचिका वापस ले ली है, इंडस्ट्री के जानकार मानते हैं कि सरकार के सामने नई टीवी रेटिंग व्यवस्था लागू करने की सबसे बड़ी कानूनी बाधा लगभग खत्म हो गई है।
हालांकि AIDCF ने भविष्य में दोबारा याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित रखा है, लेकिन कई अधिकारियों का मानना है कि फिलहाल संगठन इस मामले को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं दिख रहा।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "याचिका वापस लेने से साफ है कि AIDCF को लगने लगा था कि मौजूदा कानूनी रणनीति से उसे मनचाहा परिणाम नहीं मिलेगा। अगर भविष्य में वह दोबारा अदालत जाता भी है, तो उसे नई कानूनी रणनीति और अधिक मजबूत संवैधानिक तर्कों के साथ जाना होगा।"
BARC के लिए भी आसान होगा आगे बढ़ना
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद BARC India अब बिना कानूनी अनिश्चितता के नई रेटिंग प्रणाली को लागू करने की दिशा में तेजी से काम कर सकेगा।
ब्रॉडकास्टर्स का मानना है कि लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को हटाने से टीवी रेटिंग पहले के मुकाबले अधिक भरोसेमंद और पारदर्शी होगी, क्योंकि अब रेटिंग उन चैनलों के आधार पर तैयार होगी जिन्हें दर्शकों ने वास्तव में देखने का फैसला किया होगा, न कि जो टीवी ऑन करते ही अपने आप दिखाई दिए।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अब ध्यान नई व्यवस्था को लागू करने की समयसीमा, रेटिंग की कार्यप्रणाली में सुधार और भविष्य में Connected TV (CTV) दर्शकों को भी टीवी मापन प्रणाली में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
आगरा स्थित Sea TV Network Limited के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही चुनौतीपूर्ण रही। कंपनी का घाटा बढ़ गया है, वहीं कंपनी सेक्रेटरी और कंप्लायंस ऑफिसर ने भी इस्तीफा दे दिया है।
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Samachar4media Bureau
आगरा स्थित Sea TV Network Limited के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही चुनौतीपूर्ण रही। कंपनी का घाटा बढ़ गया है, वहीं कंपनी सेक्रेटरी और कंप्लायंस ऑफिसर ने भी इस्तीफा दे दिया है। इन दोनों फैसलों को 25 जुलाई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई बोर्ड बैठक में मंजूरी दी गई।
कंपनी ने बताया कि कंपनी सेक्रेटरी और कंप्लायंस ऑफिसर करिश्मा जैन ने निजी कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया है। उनका इस्तीफा 28 जुलाई को कारोबार समाप्त होने के बाद प्रभावी होगा। 18 जुलाई को दिए गए अपने इस्तीफे में उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत कारणों के अलावा उनके इस्तीफे के पीछे कोई अन्य महत्वपूर्ण वजह नहीं है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि करिश्मा जैन के पास Sea TV Network के कोई शेयर नहीं हैं और कंपनी ने नए कंपनी सेक्रेटरी की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो जून 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी की स्टैंडअलोन ऑपरेशनल आय 169.71 लाख रुपये रही। यह पिछली मार्च तिमाही के 84.96 लाख रुपये से बेहतर है, लेकिन पिछले साल की समान तिमाही के 184.33 लाख रुपये से कम रही। अन्य आय 1.50 लाख रुपये जोड़ने के बाद कुल स्टैंडअलोन आय 171.21 लाख रुपये रही।
हालांकि कंपनी के खर्च आय से कहीं अधिक रहे। तिमाही के दौरान कुल स्टैंडअलोन खर्च 222 लाख रुपये रहा। इसमें 111.21 लाख रुपये सामग्री लागत और 104.14 लाख रुपये अन्य परिचालन खर्च शामिल हैं।
खर्च बढ़ने के कारण कंपनी का स्टैंडअलोन शुद्ध घाटा बढ़कर 50.78 लाख रुपये हो गया। इससे पिछली तिमाही में 48.24 लाख रुपये और एक साल पहले इसी तिमाही में केवल 1.75 लाख रुपये का घाटा हुआ था। प्रति शेयर घाटा (EPS) 0.42 रुपये रहा।
समेकित (कंसोलिडेटेड) आधार पर कंपनी की कुल आय 244.27 लाख रुपये रही, जबकि कुल खर्च 288.57 लाख रुपये दर्ज किया गया। इसके चलते कंपनी को 44.30 लाख रुपये का कंसोलिडेटेड शुद्ध घाटा हुआ। कंसोलिडेटेड प्रति शेयर घाटा 0.37 रुपये रहा।
कंपनी की चुकता इक्विटी शेयर पूंजी 1,202 लाख रुपये पर स्थिर रही। प्रत्येक शेयर का अंकित मूल्य 10 रुपये है।
Sea TV Network फिलहाल केबल ऑपरेशंस के एक ही बिजनेस सेगमेंट में काम करती है। इसकी सहायक कंपनियों Jain Telemedia Services Limited और Sea News Network Limited ने इस तिमाही में मिलकर 194.55 लाख रुपये का राजस्व अर्जित किया और 6.48 लाख रुपये का संयुक्त शुद्ध लाभ दर्ज किया।
इस बीच कंपनी के वैधानिक ऑडिटर Doogar & Associates ने वित्तीय नतीजों पर क्वालिफाइड रिव्यू (Qualified Review) दिया है। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी ने 3,382.81 लाख रुपये के असुरक्षित कर्ज पर 8% वार्षिक ब्याज के बावजूद ब्याज खर्च को अपने खातों में दर्ज नहीं किया।
ऑडिटर्स के अनुसार, जून तिमाही के लिए 66.49 लाख रुपये के ब्याज का प्रावधान नहीं किया गया, जो भारतीय लेखा मानक Ind AS-109 का पालन नहीं करता। यदि इस ब्याज खर्च को शामिल किया जाता, तो कंपनी का स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड दोनों तरह का घाटा 66.49 लाख रुपये और बढ़ जाता।
रिपोर्ट के मुताबिक ये असुरक्षित कर्ज कंपनी के निदेशकों, संबंधित पक्षों और कॉरपोरेट संस्थाओं से लिए गए हैं। ऐसे में कंपनी की अकाउंटिंग पद्धति और वित्तीय स्थिति पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
बोर्ड के सभी फैसलों और तिमाही नतीजों पर कंपनी के निदेशक नीरज जैन ने डिजिटल हस्ताक्षर किए हैं। अब नए कंप्लायंस ऑफिसर की नियुक्ति और ऑडिट से जुड़े मुद्दों के समाधान के साथ-साथ आने वाली तिमाहियों में कंपनी के परिचालन प्रदर्शन पर निवेशकों की खास नजर रहेगी।
केरल हाई कोर्ट से राहत मिलने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जल्द ही BARC को नई टीवी रेटिंग नीति लागू करने का निर्देश दे सकता है। नई व्यवस्था में लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को रेटिंग्स से बाहर रखा जाएगा।
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Samachar4media Bureau
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) जल्द ही ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया को टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी 2026 लागू करने का निर्देश दे सकता है। केरल हाई कोर्ट द्वारा पॉलिसी पर लगी अंतरिम रोक हटाए जाने के बाद अब टीवी रेटिंग्स से लैंडिंग पेज के जरिए मिलने वाली व्यूअरशिप को बाहर रखा जाएगा। उद्योग सूत्रों के अनुसार, BARC अगले सप्ताह नई पद्धति के तहत टीवी रेटिंग्स जारी कर सकता है।
नई व्यवस्था के लागू होने के बाद पहली बार भारत की टीवी ऑडियंस मेजरमेंट प्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। इससे विभिन्न चैनलों की रैंकिंग, विज्ञापन दरों और वितरण रणनीतियों पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है। पॉलिसी के अनुसार, यदि सेट-टॉप बॉक्स ऑन करते ही कोई चैनल अपने आप खुलता है, तो उस शुरुआती व्यूअरशिप को टीवी रेटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा। हालांकि, यदि दर्शक उसी चैनल को अपनी इच्छा से देखते रहते हैं, तो बाद की व्यूअरशिप को गिना जाएगा।
हालांकि, उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि BARC का लंबित लाइसेंस नवीनीकरण फिलहाल अलग प्रक्रिया है। इसमें बोर्ड का पुनर्गठन, गवर्नेंस सुधार और तेजी से बढ़ रही कनेक्टेड टीवी (CTV) व्यूअरशिप को मापने के लिए भविष्य की रणनीति जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं। इसलिए लाइसेंस नवीनीकरण में अधिक समय लग सकता है, लेकिन इससे नई रेटिंग प्रणाली लागू होने में कोई बाधा नहीं आएगी।
BARC ने अदालत में सरकार का समर्थन करते हुए कहा कि लैंडिंग पेज दर्शकों की वास्तविक पसंद नहीं बल्कि फोर्स्ड व्यूइंग (अनैच्छिक देखने) को बढ़ावा देते हैं, जिससे कुछ चैनलों की रेटिंग कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है। वहीं विज्ञापन एजेंसियों ने नई व्यवस्था का स्वागत करते हुए कहा कि इससे टीवी रेटिंग्स अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनेंगी तथा विज्ञापन निवेश वास्तविक दर्शक व्यवहार के आधार पर तय किया जा सकेगा।
हालांकि, कुछ प्रसारकों ने BARC की तकनीकी तैयारी और लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को पूरी तरह अलग करने की क्षमता पर सवाल भी उठाए हैं। उनका मानना है कि नीति लागू करना आसान है, लेकिन करोड़ों टीवी घरों में इसे तकनीकी रूप से सटीक तरीके से लागू करना बड़ी चुनौती होगी। इसके बावजूद सरकार की प्राथमिकता फिलहाल नई रेटिंग प्रणाली को जल्द लागू करना है, जबकि BARC में संरचनात्मक सुधार और लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
भारत में टेलीविजन विज्ञापनों की समय सीमा (Ad Duration) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत में टेलीविजन विज्ञापनों की समय सीमा (Ad Duration) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर विज्ञापन इंडस्ट्री तीन हिस्सों में बंटी नजर आ रही है। Advertising Agencies Association of India (AAAI) का कहना है कि विज्ञापनों की अवधि तय करने का फैसला मार्केट पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वहीं Indian Society of Advertisers (ISA) ने प्रति घंटे विज्ञापनों की सीमा बढ़ाकर 15 मिनट करने की मांग की है। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से इस पूरे मामले में किसी भी तरह के नियामकीय हस्तक्षेप (Regulatory Forbearance) को खत्म करने और पूरी आजादी देने की मांग दोहराई है।
ये अलग-अलग राय इस सप्ताह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और इंडस्ट्री से जुड़े प्रमुख संगठनों AAAI, ISA, Indian Broadcasting and Digital Foundation (IBDF) तथा News Broadcasters & Digital Association (NBDA) के बीच हुई बैठकों में सामने आई। मंत्रालय फिलहाल Cable Television Networks Rules के तहत लागू विज्ञापन अवधि के नियमों की समीक्षा कर रहा है।
बैठक से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ISA ने मौजूदा विज्ञापन सीमा को बढ़ाने का सुझाव दिया है। फिलहाल एक घंटे में 20 फीसदी यानी 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की अनुमति है। ISA का प्रस्ताव है कि इसे बढ़ाकर 25 फीसदी, यानी 15 मिनट प्रति घंटे किया जाए। विज्ञापनदाताओं के संगठन का कहना है कि इससे ब्रॉडकास्टर्स की कमाई बढ़ेगी और दर्शकों के देखने के अनुभव पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
बैठक में शामिल एक सूत्र ने बताया कि यह प्रस्ताव ब्रॉडकास्टर्स की आय और दर्शकों के हितों के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से दिया गया है। उनका कहना है कि टीवी इंडस्ट्री की मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए यह बढ़ोतरी बहुत अधिक नहीं है और इससे दर्शकों पर विज्ञापनों का बोझ भी नहीं बढ़ेगा।
हालांकि AAAI ने इस मुद्दे पर बिल्कुल अलग रुख अपनाया। संगठन ने मंत्रालय से कहा कि विज्ञापनों की अवधि सरकार तय न करे, बल्कि इसे पूरी तरह मार्केट की मांग और प्रतिस्पर्धा पर छोड़ दिया जाए।
AAAI का कहना है कि आज टेलीविजन चैनल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं। डिजिटल मीडिया पर विज्ञापन दिखाने की अवधि को लेकर कोई कानूनी सीमा नहीं है, जबकि टीवी पर अब भी सख्त नियम लागू हैं।
बैठक से जुड़े एक अन्य सूत्र के अनुसार, AAAI ने मंत्रालय से कहा कि जब डिजिटल मीडिया पर विज्ञापनों की कोई सीमा नहीं है, तो सिर्फ टेलीविजन पर सीमा लागू रखना प्रतिस्पर्धा के लिहाज से असमान स्थिति पैदा करता है। ऐसे में कंटेंट और विज्ञापनों के बीच संतुलन तय करने का अधिकार मार्केट को ही मिलना चाहिए।
AAAI ने मंत्रालय से यह भी आग्रह किया कि टेलीविजन ऑडियंस रेटिंग्स (TV Ratings) जल्द से जल्द दोबारा शुरू की जाएं। संगठन का कहना है कि विज्ञापनदाता और एजेंसियां मीडिया प्लानिंग और निवेश से जुड़े फैसले विश्वसनीय और पारदर्शी रेटिंग्स के आधार पर ही लेते हैं।
वहीं ब्रॉडकास्टर्स ने विज्ञापन सीमा बढ़ाने की मांग नहीं की, लेकिन सरकार से इस पूरे क्षेत्र में नियामकीय छूट देने की अपनी पुरानी मांग दोहराई।
IBDF का कहना है कि इस मामले में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, क्योंकि दर्शकों का व्यवहार खुद ही मार्केट को नियंत्रित करता है। संगठन के अनुसार, यदि कोई चैनल जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाता है तो दर्शक चैनल बदल देते हैं। इससे उसकी टीआरपी गिरती है और अंततः विज्ञापन से होने वाली कमाई भी कम हो जाती है।
बैठक में मौजूद एक सूत्र ने कहा कि दर्शकों के हाथ में रिमोट होता है। यदि उन्हें लगता है कि किसी चैनल पर जरूरत से ज्यादा विज्ञापन आ रहे हैं तो वे तुरंत दूसरा चैनल देखना शुरू कर देते हैं। यही मार्केट का प्राकृतिक संतुलन है और यह अपने आप एक प्रभावी सेल्फ-रेगुलेशन का काम करता है।
News Broadcasters & Digital Association (NBDA) ने भी नियामकीय छूट की मांग का समर्थन किया, लेकिन साथ ही न्यूज चैनलों की अलग आर्थिक चुनौतियों पर भी जोर दिया।
चर्चा में मौजूद लोगों के अनुसार, NBDA ने मंत्रालय को बताया कि मौजूदा विज्ञापन सीमा का ढांचा 2006 में बनाया गया था। उस समय टीवी इंडस्ट्री की परिस्थितियां आज की तुलना में बिल्कुल अलग थीं।
NBDA का कहना है कि मनोरंजन चैनलों के मुकाबले न्यूज चैनलों का कंटेंट बार-बार नहीं दिखाया जा सकता। उन्हें पूरे दिन लगातार लाइव रिपोर्टिंग, नई खबरें और ताजा कंटेंट तैयार करना पड़ता है, जिस पर भारी खर्च आता है। इसके अलावा चुनाव, प्राकृतिक आपदा, आपातकाल और राष्ट्रीय महत्व की अन्य घटनाओं के दौरान न्यूज चैनल सार्वजनिक सेवा की भी अहम भूमिका निभाते हैं।
एक सूत्र ने बताया कि NBDA का कहना था कि न्यूज चैनलों के खर्च पर तो कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन उनकी कमाई पर सख्त नियम लागू हैं। इससे एक असंतुलन पैदा होता है, खासकर तब जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय सभी पक्षों की राय जानने के बाद भविष्य की नीति पर फैसला लेना चाहता है। जहां विज्ञापनदाता सीमित बढ़ोतरी के पक्ष में हैं, वहीं विज्ञापन एजेंसियां पूरी तरह मार्केट आधारित व्यवस्था चाहती हैं। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स का मानना है कि प्रतिस्पर्धा और दर्शकों का व्यवहार ही जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाने पर स्वाभाविक रोक लगाने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए सरकारी सीमा तय करने की जरूरत नहीं है।
पृष्ठभूमि
साल 2012 में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की सीमा तय की थी। TRAI का कहना था कि यह फैसला दर्शकों के हितों की रक्षा करने और उनका देखने का अनुभव बेहतर बनाने के लिए लिया गया है।
ब्रॉडकास्टर्स ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि विज्ञापन का समय पूरी तरह व्यावसायिक फैसला है और इस मामले में TRAI अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चला गया है।
यह मामला एक बार फिर तब चर्चा में आया, जब मई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने TRAI के इस अधिकार को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि विज्ञापन सीमा तय करने का नियम व्यापक जनहित में है।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद टीवी इंडस्ट्री में विज्ञापन नियमों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। खासकर ऐसे समय में, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन अवधि को लेकर कोई समान प्रतिबंध लागू नहीं है। एक ओर विज्ञापनदाता सीमित बढ़ोतरी चाहते हैं, दूसरी ओर विज्ञापन एजेंसियां मार्केट आधारित व्यवस्था की मांग कर रही हैं, जबकि ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि दर्शकों की पसंद और मार्केट की प्रतिस्पर्धा ही इस क्षेत्र को संतुलित रखने के लिए पर्याप्त है।