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डिजिटल ऐड रेवेन्यू में कुछ ही कंपनियां हावी, अन्यायपूर्ण है शेयरिंग मॉडल: श्रेयम्स कुमार

विशेष बातचीत में एम.वी. श्रेयम्स कुमार ने इंडस्ट्री के सामने खड़ी चुनौतियों, जैसे- घटते विज्ञापन, लंबे समय से रुकी हुई इंडियन रीडरशिप सर्वे, बिग टेक की बढ़ती ताकत और AI के बढ़ते प्रभाव पर बात की

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago

कंचन श्रीवास्तव, सीनियर ए़डिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारतीय न्यूजपेपर सोसायटी (INS) के अध्यक्ष और 102 वर्षीय मीडिया समूह 'मातृभूमि' के मैनेजिंग डायरेक्टर एम.वी. श्रेयम्स कुमार इस वक्त भारतीय प्रिंट मीडिया की दिशा और दशा को लेकर एक अनोखे स्थान पर हैं। एक्सचेंज4मीडिया से विशेष बातचीत में उन्होंने न सिर्फ इंडस्ट्री के सामने खड़ी चुनौतियों, जैसे- घटते विज्ञापन, लंबे समय से रुकी हुई इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS), बिग टेक की बढ़ती ताकत और AI के बढ़ते प्रभाव पर बेझिझक बात की, बल्कि बताया कि मातृभूमि जैसे विरासत वाले ब्रैंड इस परिवर्तन के दौर में किस तरह अपनी मूल भावना को बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहे हैं।

विज्ञापन दरें और रेवेन्यू दबाव को लेकर

INS लगातार विज्ञापनदाताओं और AAAI जैसे इंडस्ट्री संगठनों से निष्पक्ष व्यवहार की मांग करता रहा है, लेकिन श्रेयम्स कुमार मानते हैं कि अखबारों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए जरूरी नीतिगत बदलावों की जिम्मेदारी अंततः प्रकाशकों पर ही आती है।

वे कहते हैं, "INS सलाह दे सकता है, लेकिन हर प्रकाशन की अपनी रणनीति, प्राथमिकताएं और बिजनेस मॉडल होते हैं।" 

फिलहाल, INS का ध्यान प्रिंट की विश्वसनीयता को मजबूत करने और संपादकीय मूल्यों से समझौता न करने पर है। कोविड के बाद सर्कुलेशन में गिरावट और विज्ञापनदाताओं की वापसी एक बड़ी चुनौती रही, लेकिन अब रिकवरी की शुरुआत हो चुकी है। वे बताते हैं, "केरल में असर उतना नहीं पड़ा और अब हम स्थिर हो चुके हैं।"  वे यह भी कहते हैं कि शिक्षा जैसे क्षेत्र, जो पूरी तरह डिजिटल हो चुके थे, अब फिर से प्रिंट में लौट रहे हैं, वह भी जैकेट और फुल-पेज जैसे हाई-इम्पैक्ट फॉर्मेट के साथ।

हालांकि, वे मानते हैं कि क्लासीफाइड जैसे कुछ विज्ञापन खंड शायद कभी वापस न आएं। ऐसे में मातृभूमि जैसे प्रकाशक रेवेन्यू में विविधता लाने के लिए इवेंट्स और हाइपरलोकल कंटेंट में उतर चुके हैं। "हम ग्राहकों के साथ मिलकर उनके सामने आ रही चुनौतियों को समझते हैं और उन्हें व्यवहारिक समाधान देने की कोशिश करते हैं। हर मीडिया हाउस को अपना रास्ता खुद तय करना होगा, लेकिन हमारी सामूहिक ताकत भरोसे को बनाए रखने में है।"

INS की राष्ट्रीय स्तर की प्रिंट-फेथ मुहिम की योजना

डिजिटल के बढ़ते दबदबे के बीच भी कुमार मानते हैं कि प्रिंट अब भी प्रासंगिक है। "INS लगातार सदस्यों को प्रेरित करता है कि वे विश्वसनीयता को बनाए रखें। भले ही खबरें एक दिन बाद मिलें, पाठकों को उसकी प्रामाणिकता पर भरोसा होता है। यही हमारी असली ताकत है।"

वे कहते हैं, "हम एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने की योजना बना रहे हैं ताकि लोगों का विश्वास प्रिंट में फिर से मजबूत किया जा सके। यह सिर्फ भावुकता की बात नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी से पेश की गई, प्रमाणित और संपादित सामग्री का सवाल है।"

IRS की देरी: एक बड़ी बाधा

विज्ञापनदाता अब डेटा पर ज्यादा निर्भर हैं, ऐसे में IRS की अनुपस्थिति प्रिंट मीडिया के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है। MRUC इस पर लंबे समय से विचार कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। माना जाता है कि कुछ बड़े प्रकाशक इसके खिलाफ हैं क्योंकि इससे उनकी घटती पाठक संख्या उजागर हो सकती है।

कुमार इस चिंता को मानते हैं, लेकिन इसे लॉजिस्टिक बाधाओं से भी जोड़ते हैं: "कोविड के बाद घरों, खासकर अपार्टमेंट्स में सर्वे एक्सेस कठिन हो गया है। शहरों में 80–90% लोग गेटेड बिल्डिंग्स में रहते हैं, जहां सर्वेयर घुस नहीं पाते। यह हकीकत है।"

हालांकि इस तर्क को लेकर संदेह है, लेकिन कुमार इस बात पर जोर देते हैं कि समाधान जल्द निकालना जरूरी है: "बिना रीडरशिप डेटा के विज्ञापनदाता अंधेरे में हैं। IRS एकमात्र मानक है जिससे पहुंच और पाठक प्रोफाइल का मूल्यांकन हो सकता है। यह सिर्फ बिजनेस प्लानिंग के लिए नहीं, बल्कि प्रिंट की प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए भी जरूरी है।"

INS बनाम बिग टेक

श्रेयम्स कुमार के नेतृत्व में INS लगातार इस मुद्दे को उठा रहा है कि डिजिटल विज्ञापन राजस्व (डिजिटल ऐड रेवेन्यू) का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने टेक दिग्गजों के पास ही जा रहा है।

वे बताते हैं, "डिजिटल का जबरदस्त विस्तार हुआ है, लेकिन ज्यादातर विज्ञापन राजस्व सिर्फ दो–तीन खिलाड़ियों को मिल रहा है। रेवेन्यू का कोई निष्पक्ष वितरण नहीं है और हम इस सच्चाई को भलीभांति जानते हैं। INS ने इसे CCI और संबंधित मंत्रालयों के समक्ष रखा है। लेकिन इसका समाधान आसान नहीं है।" 

"हमने यह मुद्दा कई बार उठाया है, लेकिन भारत जैसे देश में ऑस्ट्रेलिया के न्यूज मीडिया बार्गेनिंग कोड जैसा कानून बनाना आसान नहीं है। फिर भी सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। नहीं तो एकाधिकार बढ़ेगा और मीडिया परिदृश्य की विविधता सिमटती जाएगी, जो किसी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।"

विज्ञापन खर्चों में हो रहे बदलाव ने इस संकट को और गहरा बना दिया है। मैडिसन की रिपोर्ट के अनुसार, अगले साल डिजिटल को लगभग ₹1.2 लाख करोड़ मिलेंगे, जबकि प्रिंट को सिर्फ ₹23,000 करोड़, यानी करीब 16–17% हिस्सा। कुछ साल पहले तक प्रिंट का हिस्सा कहीं ज्यादा था, लेकिन अब वह तेजी से घट रहा है।

कुमार स्पष्ट करते हैं, "यदि प्रिंट इंडस्ट्री (चाहे वह बड़ी हो या छोटी) को जीवित रहना है, तो सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है। कुछ कंपनियां अनुचित रूप से बड़ा हिस्सा ले रही हैं और रेवेन्यू साझा करने का कोई पारदर्शी मॉडल मौजूद नहीं है। जब पूछा जाता है तो ये प्लेटफॉर्म्स कहते हैं कि प्रकाशकों को उनके कुल राजस्व का सिर्फ 2% मिलता है, लेकिन इसकी पुष्टि का कोई जरिया नहीं।"

वे इस पर आगे कहते हैं, "INS किसी न किसी रूप में इस असंतुलन को ठीक करने की कोशिश कर रहा है, भले ही फिलहाल मैं विस्तार से कुछ न कह पाऊं।" 

AI के दौर में खबरों का भविष्य

अब जब जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म खबरों को खोजने, सारांश देने और दिखाने का काम कर रहे हैं, वह भी बिना मूल प्रकाशकों को श्रेय या मुआवजा दिए, तो INS ने भी इसका संज्ञान लिया है। कुमार कहते हैं, "INS इस बात पर चर्चा कर रहा है कि AI खबरों के प्रसार में कैसे भूमिका निभा सकता है।"

दुनिया के कई बड़े मीडिया घराने पहले ही AI कंपनियों के साथ कंटेंट लाइसेंसिंग या एट्रिब्यूशन के करार कर चुके हैं, लेकिन कुमार मानते हैं कि भारतीय प्रिंट इंडस्ट्री अभी इस पर मंथन की शुरुआती अवस्था में है। ये बातचीत जरूरी हैं ताकि कंटेंट निर्माताओं को उनका वाजिब हक मिल सके।

"AI एक हकीकत है, और हम रणनीति बना रहे हैं कि इसे कहां और कैसे इस्तेमाल करें। फिलहाल इसका हमारी क्लिक दरों पर कोई असर नहीं दिखा है, लेकिन भविष्य में क्या होगा कहना मुश्किल है। इतना तय है कि AI की नींव कंटेंट पर टिकी है और हम कंटेंट निर्माता हैं। वह खुद से कुछ नहीं बनाता, वह तो उन्हीं पेजों से लेता है जो हम जैसे लोगों ने बनाए हैं। इसीलिए, माध्यम कोई भी हो (सोशल मीडिया हो या वॉट्सऐप) कंटेंट ही केंद्र में है।"

राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में संपादकीय निष्पक्षता

श्रेयम्स कुमार इस बात को लेकर भी सजग हैं कि मीडिया के प्रति लोगों का भरोसा घट रहा है। "मीडिया पर आज जबरदस्त दबाव है- विज्ञापनदाताओं का, राजनीति का और पाठकों का भी। लेकिन हमारी जवाबदेही सिर्फ पाठक के प्रति है। वह अखबार खरीदता है, तो उसे सच्चाई का अधिकार है।"

वे मीडिया की पक्षधरता को लेकर बेबाक हैं: "कई टीवी शो अब महज शोरगुल बन चुके हैं। एंकर खुलकर राजनीतिक पक्ष लेते हैं। इससे पेशे की साख को नुकसान पहुंचता है।"

एक राजनेता और प्रकाशक के रूप में अपनी दोहरी भूमिका पर वे कहते हैं, "मेरी राजनीति है, लेकिन वह मेरे न्यूजरूम में नहीं घुसती। जिस दिन ऐसा हुआ, मेरी साख खत्म हो जाएगी। पाठक मुझसे मुंह मोड़ लेंगे और ऐसा करना उनका अधिकार भी है।"

वे मातृभूमि की एक रिपोर्ट का उदाहरण देते हैं, जो बदलाव लाया: "केरल के एक पंचायत में पेयजल संकट पर हमारी रिपोर्ट के बाद ₹40 करोड़ स्वीकृत हुए। यही पत्रकारिता की ताकत है। कोई और माध्यम ऐसा असर नहीं कर सकता।"

मातृभूमि की योजना

INS अध्यक्ष की भूमिका से निकलकर जब  श्रेयम्स कुमार मीडिया मालिक की हैसियत से बात करते हैं तो मातृभूमि की यात्रा पर गर्व दिखता है। "हमारी स्थापना 1923 में मलाबार में स्वतंत्रता संग्राम की आवाज बनने के लिए हुई थी। हमारे स्तंभ हैं: सत्य, समानता और स्वतंत्रता और आज भी यही हमारे मार्गदर्शक हैं।"

"जैसे उपभोग की आदतें बदल रही हैं, वैसे हमें भी बदलना होगा- लेकिन मूल्यों से समझौता किए बिना।"

मीडिया समूह अब डिजिटल प्लेटफॉर्म, रीजनल मैगजीन और इवेंट IPs में निवेश कर रहा है ताकि पहुंच और रेवेन्यू दोनों बढ़ाया जा सके। "कुछ विज्ञापनदाता (जैसे एजुकेशन सेक्टर) प्रिंट में लौट रहे हैं, वह भी बड़े फॉर्मेट में। लेकिन क्लासीफाइड जैसे कुछ सेगमेंट पीछे छूट चुके हैं। अब हमारी नई ग्रोथ हाइपरलोकल कंटेंट और इवेंट्स में है।"

मातृभूमि अब विशेष रुचियों वाले कंटेंट (niche content) के क्षेत्रों में भी प्रयोग कर रही है। "हम हेल्थ, ट्रैवल और किड्स मैगजीन निकालते हैं, लेकिन अब हम समझना चाहते हैं कि अगली पीढ़ी क्या चाहती है। हम सिर्फ न्यूज के कारोबार में नहीं हैं, हम कंटेंट के कारोबार में हैं।" 


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