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क्या बच्चों के लिए बदलेगा सोशल मीडिया का नियम? IT मंत्री ने दिए ये संकेत
देश में बच्चों पर सोशल मीडिया के बढ़ते असर को लेकर अब सरकार खुलकर चिंता जता रही है। मोबाइल और इंटरनेट आज हर घर तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके साथ कई खतरे भी सामने आए हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 2 days ago
देश में बच्चों पर सोशल मीडिया के बढ़ते असर को लेकर अब सरकार खुलकर चिंता जता रही है। मोबाइल और इंटरनेट आज हर घर तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके साथ कई खतरे भी सामने आए हैं। खासकर नाबालिग बच्चों के लिए ऑनलाइन दुनिया कितनी सुरक्षित है, इस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इसी मुद्दे पर हाल ही में हुए AI समिट के दौरान केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव से सवाल पूछा गया कि क्या सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की सोच रही है।
मंत्री ने सीधे तौर पर “बैन” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन यह जरूर कहा कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग सोशल मीडिया कंपनियों के साथ बातचीत चल रही है। चर्चा इस बात पर हो रही है कि बच्चों को किस तरह सुरक्षित रखा जाए और उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से ही कंटेंट दिखाया जाए।
उम्र के हिसाब से कंटेंट पर जोर
आईटी मंत्री ने कहा कि सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र-आधारित एक्सेस कंट्रोल मजबूत हो। यानी अगर कोई बच्चा है, तो उसे वही कंटेंट दिखे जो उसकी उम्र के लिए सही हो।
उन्होंने यह भी कहा कि डीपफेक जैसी तकनीकें बहुत खतरनाक रूप ले रही हैं। फर्जी वीडियो और फोटो बनाकर किसी को भी बदनाम किया जा सकता है। ऐसे में बच्चों और युवाओं को इन खतरों से बचाना जरूरी है।
कानून में पहले से हैं प्रावधान
मंत्री ने बताया कि Digital Personal Data Protection Act यानी DPDP कानून में बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रावधान पहले से मौजूद हैं। इस कानून के तहत कंपनियों को बच्चों का डेटा संभालने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।
सरकार का साफ कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। हालांकि अभी तक पूरी तरह से सोशल मीडिया बैन करने का कोई औपचारिक ऐलान नहीं किया गया है।
कंपनियों को मानने होंगे भारतीय कानून
आईटी मंत्री ने सख्त लहजे में कहा कि भारत में काम करने वाली हर डिजिटल कंपनी को भारतीय कानून और संविधान का पालन करना होगा। उन्होंने साफ किया कि Meta, X, YouTube और Netflix जैसी बड़ी कंपनियां भी भारत की संप्रभुता और सुरक्षा नियमों से ऊपर नहीं हैं।
उनका कहना था कि अगर कोई प्लेटफॉर्म भारत में कारोबार करता है, तो उसे यहां के नियम मानने ही होंगे।
डीपफेक पर सख्ती की तैयारी
डीपफेक तकनीक को लेकर सरकार खास तौर पर चिंतित है। मंत्री ने कहा कि मौजूदा नियम शायद इस नई तकनीक से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत पड़ी तो संसद में व्यापक सहमति बनाकर और कड़े कानून लाए जाएंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि एक संसदीय समिति इस मुद्दे पर अध्ययन कर चुकी है और अपनी रिपोर्ट दे चुकी है। सरकार उस रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति बना रही है।
सरकार का मकसद क्या है?
सरकार का उद्देश्य सोशल मीडिया को बंद करना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित बनाना है। तकनीक से देश को फायदा मिले, लेकिन समाज को नुकसान न पहुंचे — यही संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।
आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नए नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है। इनमें उम्र की सख्त जांच, पैरेंटल कंसेंट और कंटेंट मॉनिटरिंग जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।
दूसरे देशों में क्या हो रहा है?
आईटी मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी दिए। उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू कर दिया है। वहीं फ्रांस और यूके में भी उम्र सीमा और पैरेंटल अनुमति को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं। इन देशों के अनुभवों को देखते हुए भारत भी अपने हालात के मुताबिक फैसला लेना चाहता है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल सरकार किसी भी बड़े फैसले से पहले सभी पहलुओं पर विचार कर रही है। टेक्नोलॉजी कंपनियों, विशेषज्ञों और समाज के अलग-अलग वर्गों से राय ली जा रही है।
साफ है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा अब एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले महीनों में इस विषय पर नए दिशा-निर्देश या सख्त नियम सामने आ सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो भारत में सोशल मीडिया के इस्तेमाल का तरीका बदल सकता है, खासकर बच्चों और किशोरों के लिए। सरकार का फोकस यही है कि डिजिटल दुनिया सुरक्षित हो, जिम्मेदार हो और आने वाली पीढ़ी के लिए नुकसानदेह न बने।
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