इमरान फ़ज़ल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
पिछले कुछ सालों से भारत की रियल मनी गेमिंग इंडस्ट्री एक बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ रही थी। इंडस्ट्री का कहना था कि भारी GST और सख्त नियमों से ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों का पूरा बिजनेस मॉडल खतरे में पड़ सकता है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसलों ने इस सेक्टर की दिशा ही बदल दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों को सही ठहराया, जिनमें पैसे लगाकर खेले जाने वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक और रेगुलेशन की व्यवस्था की गई है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी गेम में पैसे का दांव लगाया जा रहा है, तो राज्य सरकारें उस पर नियंत्रण या प्रतिबंध लगा सकती हैं, भले ही वह स्किल बेस्ड गेम ही क्यों न हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मद्रास और कर्नाटक हाई कोर्ट के उन फैसलों को पलट दिया, जिनमें इन कानूनों के कुछ हिस्सों को रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “बेटिंग और गैंबलिंग” यानी सट्टेबाजी और जुए की संवैधानिक परिभाषा को सिर्फ किस्मत वाले खेलों तक सीमित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, जैसे ही किसी खेल में पैसे लगते हैं, वहां जुए का तत्व जुड़ जाता है, फिर यह मायने नहीं रखता कि खेल स्किल का है या चांस का।
कोर्ट ने कहा, “जब पैसे दांव पर लगते हैं, तो खेल की प्रकृति कम महत्वपूर्ण हो जाती है। लालच, लत और ज्यादा कमाने की चाह मुख्य मुद्दा बन जाते हैं।”
यह फैसला ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री के लिए इसलिए बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि कंपनियां अब तक पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर यह तर्क देती रही थीं कि स्किल गेम्स को जुए की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि राज्य सरकारों को ऐसे गेम्स को रेगुलेट या बैन करने का पूरा अधिकार है, अगर उनमें पैसे का दांव शामिल हो।
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के GST मामले में भी सरकार के पक्ष को मजबूती दी। वहीं, कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने बेहद आक्रामक तरीके से पैरवी की।
दरअसल, कोर्ट में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या स्किल बेस्ड गेम्स, यानी कौशल आधारित खेल, पैसे लगने के बाद भी सिर्फ गेम माने जाएंगे या फिर उन्हें जुए की श्रेणी में रखा जाएगा। सरकार की ओर से वेंकटरमण ने साफ कहा कि जैसे ही किसी खेल में पैसे का दांव लगता है, उसका कानूनी स्वरूप बदल जाता है।
उन्होंने कोर्ट में “जुए के सात सूत्र” पेश किए। उनका तर्क था कि जुआ बिना दांव के हो ही नहीं सकता और अगर किसी खेल में पैसे लगाए जा रहे हैं, तो फिर यह मायने नहीं रखता कि वह स्किल का खेल है या किस्मत का। उनके मुताबिक, स्किल गेम्स अपने आप में जुआ नहीं हैं, लेकिन जब उन पर पैसे लगाए जाते हैं तो वह जुए की श्रेणी में आ जाते हैं।
सुनवाई के दौरान वेंकटरमण ने फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि अगर मेसी खुद इस बात पर दांव लगाएं कि वह मैच में चार गोल करेंगे, तब भी यह जुआ ही माना जाएगा क्योंकि नतीजा अनिश्चित है। इसी तरह उन्होंने घुड़दौड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि भले ही यह स्किल गेम माना जाता हो, लेकिन इस पर दांव लगाना जुआ ही है।
कोर्ट में उनका एक बयान काफी चर्चा में रहा- “पासे का खेल आखिरकार बुराइयों के खेल तक पहुंचता है।” इस लाइन के जरिए सरकार ने ऑनलाइन बेटिंग और गेमिंग को सिर्फ तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जोखिम के तौर पर पेश करने की कोशिश की।
वेंकटरमण ने गेमिंग कंपनियों के उस तर्क को भी चुनौती दी, जिसमें कंपनियां खुद को सिर्फ टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बताती थीं। उन्होंने कहा कि ये कंपनियां सिर्फ खिलाड़ियों को जोड़ने का काम नहीं करतीं, बल्कि पैसे के पूरे लेनदेन, प्राइज वितरण और नियम तय करने में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
GST को लेकर भी सरकार ने साफ किया कि टैक्स कानून स्किल और चांस गेम्स में कोई फर्क नहीं करता। सरकार का कहना था कि यहां मुद्दा जुए का नहीं, बल्कि पैसे लगाकर खेले जाने वाले गेम्स पर टैक्स का है। सुप्रीम कोर्ट ने अब सरकार की इसी व्याख्या को सही माना है।
इस फैसले के बाद ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर टैक्स और नियमों का दबाव और बढ़ सकता है। इंडस्ट्री पहले ही बढ़े हुए GST, निवेशकों की चिंता और बढ़ती लागत से जूझ रही है। वहीं कानूनी हलकों में इस फैसले को एन. वेंकटरमण की बड़ी जीत माना जा रहा है, जिन्होंने कोर्ट में सरकार का पक्ष बेहद रणनीतिक तरीके से रखा।