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अखबारों के डिजिटल सबस्क्रिप्शन की दिशा में आगे बढ़ने को लेकर अब उठने लगा है ये सवाल

हालांकि कुछ अखबार पहले से ऑनलाइन एडिशन के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल (paywall) अपना रहे हैं, जबकि कुछ अन्य अखबार इस नक्शे कदम पर चलने की तैयारी में हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

देश-दुनिया में आतंक मचा रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) ने मार्केट ट्रेंड और उपभोग के पैटर्न्स (consumption patterns) को काफी बदल दिया है। कोरोनासंक्रमण के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन का असर प्रिंट मीडिया पर भी पड़ रहा है। इस दौरान कई अखबारों की प्रिंटिंग प्रभावित हुई है। कोरोनावायरस के अखबारों पर पड़ रहे प्रभावों के बीच पाठकों की एक नई कैटेगरी उभरकर सामने आई है। हालांकि, ये ऐसे नए पाठक नहीं हैं, जिन्हें रोजाना सुबह-सुबह अखबार पढ़ने की आदत है, लेकिन वे उस माध्यम के लिए नए हैं जो उन्होंने हाल ही में अपने समाचार पत्रों को पढ़ने के लिए इस्तेमाल किया है।

हालांकि, न्यू मीडिया के तमाम समर्थकों का लंबे समय से कहना है कि देश में प्रिंट मीडिया जल्द ही खत्म हो जाएगा, लेकिन प्रिंट मीडिया की स्थिति को देखें और इंडस्ट्री से जुड़े तमाम शीर्ष अधिकारियों की मानें तो फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है। पिछले तीन सालों में सर्कुलेशन के हिसाब से सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार (इंडियन रीडरशिप सर्वे के अनुसार) अपनी रीडरशिप यानी पाठक संख्या को 6.8 करोड़ से सात करोड़ के बीच में बनाए रखने में कामयाब रहा है। इस बात से साफ पता चलता है कि देश में अभी भी प्रिंट माध्यम लोगों की पसंद बना हुआ है।

अब सवाल उठता है कि क्या जो लोग ऑनलाइन अखबार पढ़ते हैं, वे भी इसके लिए भुगतान करने के लिए तैयार हैं? इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक धीमी प्रक्रिया है लेकिन जो अखबार को महत्व देते हैं वे देर-सवेर इसके लिए भुगतान करने के लिए तैयार हो जाएंगे। विश्लेषकों के अनुसार, यह आने वाले समय में रेवेन्यू के हिसाब से न्यूज ऑपरेशंस के लिए भी काफी फायदेमंद होगा। हालांकि, बहुत सारे समाचार पत्र जैसे बिजनेस स्टैंडर्ड (Business Standard) लंबे समय से ऑनलाइन अखबार पढ़ने के लिए भुगतान का मॉडल अपना रहे हैं, कई अन्य ब्रैंड्स भी हाल ही में इस दौड़ में शामिल हुए हैं।

देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) ने पिछले हफ्ते ही अपने ई-पेपर को पढ़ने के लिए इस पर सबस्क्रिप्शन मॉडल लागू किया है। यानी अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए हर महीने 199 रुपए शुल्क भी चुकाना होगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि धीमी अर्थव्यवस्था के बावजूद इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4)  में जिन अखबारों की रीडरशिप में बढ़ोतरी देखी गई है, वे आखिर क्यों सबस्क्रिप्शन मॉडल अपना रहे हैं? ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) की एग्जिक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन शिवकुमार सुंदरम का कहना है, ‘लॉकडाउन के कारण हमारे अखबार की डिलीवरी हमारे सभी पाठकों तक सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, ऐसे में हमारी ड्यूटी है कि लोगों तक हम प्रमाणिक खबरें पहुंचाएं। ऐसे में मुफ्त में ई-पेपर उपलब्ध होने पर शरारत करने वाले तत्व समाचारों को डाउनलोड कर उनसे साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं अथवा फेक न्यूज को प्रसारित कर सकते हैं। ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाकर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो पाठक न्यूज का ऑरिजिनल वर्जन पढ़ना चाहते हैं वे इसकी प्रमाणिकता पर पूरा भरोसा कर सकते हैं।’

शिवकुमार सुंदरम का यह भी कहना है, ‘इस तरह हम अखबार के डाउनलोड किए गए और फॉरवर्ड किए गए वर्जन की खपत (consumption) को हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि इस नाजुक समय में यह हमारे समाज के लिए भ्रामक और खतरनाक हो सकता है।’ सुंदरम के अनुसार, ‘वॉट्सऐप ग्रुप्स पर जो भी मुफ्त में और फॉरवर्ड होकर मिलता है, उसका कोई महत्व नहीं है। अखबार द्वारा सबस्क्रिप्शन का यह मॉडल रेवेन्यू जुटाने के लिए नहीं अपनाया गया है, हालांकि इसकी घोषणा के बाद से इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।’

हालांकि, सिर्फ ‘बीसीसीएल’ ही नहीं है, जिसके पाठक कंटेंट हासिल करने के लिए अखबार द्वारा लगाए गए शुल्क का समर्थन कर रहे हैं, ‘द हिंदू’ भी अपने ई-पेपर को लंबे समय से सबस्क्रिप्शन मॉडल पर उपलब्ध करा रहा है और वह भी इसके परिणाम से खुश है। ‘द हिंदू’ ग्रुप के वाइस प्रेजिडेंट और बिजनेस हेड (डिजिटल मीडिया) प्रदीप गैरोला (Pradeep Gairola) का कहना है, ‘हमारे सबस्क्रिप्शन के आंकड़े काफी उत्साहित करने वाले हैं। द हिंदू की सफलता ने हमें अपने अन्य ब्रैंड्स को सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित किया है। अब इस ब्रैंड के सभी प्रॉडक्ट जैसे- BusinessLine, Frontline, Sportstar और Young World Club आदि भुगतान वाले सबस्क्रिप्शन मॉडल पर हैं। लॉकडाउन ने ब्रैंड के लिए इन नंबरों को बढ़ाने में वास्तव में मदद की है। यह दर्शाता है कि इस ट्रेंड को न सिर्फ मीडियम द्वारा बल्कि पाठकों द्वार भी स्वीकार किया जा रहा है।’

गैरोला का कहना है, ‘लॉकडाउन के दौरान हमें अपने सबस्क्राइबर बेस में काफी उछाल देखने को मिला है। हालांकि हमने द हिंदू की वेबसाइट पर फ्री आर्टिकल्स की संख्या दोगुनी कर दी है, ई-पेपर के फ्री ट्रायल के दिनों की संख्या को बढ़ा दिया है और कई अन्य कवायद भी की है, अधिकांश लोग हमारी पत्रकारिता को पसंद कर रहे हैं और कंटेंट के लिए भुगतान कर रहे हैं। कोविड-19 के दौरान न्यूज का उपभोग (consumption) पूरी दुनिया में बढ़ा है। इसने लोगों को समाचार के भरोसेमंद स्रोतों को चुनने के लिए भी मजबूर किया है। इसलिए हमारा मानना है कि लॉकडाउन के बाद भी यह ट्रेंड जारी रहेगा।’

यह सिर्फ अंग्रेजी अखबारों की बात नहीं है, हिंदी और अन्य प्रादेशिक अखबार भी इस कदम का समर्थन कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश भी इस मॉडल को अपनाने के रास्ते पर हैं। इस बारे में ‘जागरण प्रकाशन’ के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (स्ट्रैटेजी, ब्रैंड और बिजनेस डेवलपमेंट) बसंत राठौड़ का कहना है, ‘तमाम अखबारों ने अपने डिजिटल कंटेंट को एक्सेस करने के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया है और यह सही है। कंटेंट को तैयार करने में काफी खर्च आता है, यदि कंटेंट निर्माता उसके लिए शुल्क लेने का निर्णय लेते हैं तो यह पूरी तरह सही है। देश के लोग भी डिजिटल सबस्क्रिप्शन के भुगतान के लिए तैयार है, लेकिन अभी बड़े पैमाने पर ऐसा नहीं है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा और लोग अखबार के डिजिटल सबस्क्रिप्शन के लिए भुगतान करेंगे।’

वहीं, ‘मातृभूमि’ ग्रुप के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर एमवी श्रेयम्स कुमार का कहना है कि हालांकि कुछ समय से उनका अखबार डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल पर है लेकिन उन्होंने इसे ज्यादा प्रमोट नहीं किया है। उनका कहना है, ‘लोग फ्री कंटेंट के आदी हैं, ऐसे में हमें यह नहीं भूलना चाहे कि 80 प्रतिशत डिजिटल एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू दुनिया में दो बड़ी कंपनियों को जाता है। अखबार यहां टिके हुए हैं और यदि इन्हें ऑनलाइन पढ़ने के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल पर लाया जाता है तो देर-सवेर पाठक इसके लिए भुगतान करेंगे।’


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