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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की फैक्ट-चेकिंग यूनिट मामले में याचिका फिर से की बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उस याचिका को फिर से बहाल कर दिया है, जिसमें केंद्र ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 20 hours ago
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उस याचिका को फिर से बहाल कर दिया है, जिसमें केंद्र ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
दरअसल, बॉम्बे हाई कोर्ट ने सितंबर 2024 में केंद्र सरकार की फैक्ट-चेकिंग यूनिट (FCU) बनाने की कोशिश को रद्द कर दिया था। यह यूनिट IT Rules के तहत बनाई जानी थी, जो सरकार से जुड़ी “फर्जी या भ्रामक” जानकारी की पहचान करती।
मामला क्या है?
केंद्र सरकार ने IT Rules 2021 में 2023 में बदलाव कर यह प्रावधान जोड़ा था कि वह एक फैक्ट-चेेकिंग यूनिट बना सकेगी। मार्च 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट-चेक यूनिट को आधिकारिक FCU घोषित कर दिया था।
लेकिन इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई। मामला कुणाल वर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया समेत कई याचिकाओं से जुड़ा था। हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जनवरी 2024 में अलग-अलग राय दी- एक जज ने नियम को असंवैधानिक बताया, जबकि दूसरे ने उसे सही ठहराया।
बाद में तीसरे जज ने भी इसे असंवैधानिक माना। अदालत ने कहा कि “फेक, फॉल्स या मिसलीडिंग” जैसे शब्द बहुत अस्पष्ट हैं और इससे सरकार खुद ही अपने मामले में फैसला करने वाली बन जाती है। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की थी। लेकिन समय पर जरूरी औपचारिक खामियां दूर नहीं करने के कारण जून 2025 में याचिका खारिज हो गई थी। अब केंद्र ने दोबारा आवेदन देकर देरी माफ करने की अपील की। सरकार ने कहा कि अंदरूनी चर्चा और अलग-अलग विभागों से राय लेने में समय लगा, इसलिए देरी हुई। यह जानबूझकर नहीं था।
जस्टिस विजय बिश्नोई ने सरकार की दलील मानते हुए देरी माफ कर दी और याचिका को फिर से बहाल कर दिया। अब इस मामले की सुनवाई दोबारा होगी।
सरकार का क्या तर्क है?
केंद्र का कहना है कि जानबूझकर फैलाई गई गलत जानकारी को संविधान का संरक्षण नहीं मिल सकता। सरकार का दावा है कि FCU का मकसद केवल “इच्छा से फैलाई गई गलत जानकारी” को चिन्हित करना है, आलोचना या व्यंग्य को रोकना नहीं।
सरकार यह भी कह रही है कि “फेक”, “फॉल्स” और “मिसलीडिंग” जैसे शब्द सामान्य अर्थ में समझे जा सकते हैं और ये संविधान के तहत उचित प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं।
आगे क्या?
अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की विस्तार से सुनवाई करेगा। यह मामला सिर्फ एक नियम का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी, डिजिटल मीडिया की जिम्मेदारी और सरकार की भूमिका से जुड़ा बड़ा संवैधानिक सवाल बन चुका है।
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