शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स में कमाई की जंग: ब्रैंड्स के लिए कौन सबसे फायदेमंद?

2026 की शॉर्ट वीडियो इकोनॉमी की यही असली तस्वीर है। एक तरफ व्युअरशिप और एंगेजमेंट रिकॉर्ड स्तर पर है, वहीं दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म से मिलने वाला रेवेन्यू अभी भी सीमित है।

Vikas Saxena by
Published - Wednesday, 29 April, 2026
Last Modified:
Wednesday, 29 April, 2026
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शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स की दुनिया में आज एक दिलचस्प ट्रेंड साफ दिखाई दे रहा है। Youtube Shorts जैसे प्लेटफॉर्म पर करोड़ों व्यूज हासिल करने के बावजूद क्रिएटर्स की सीधी कमाई अभी भी काफी सीमित है। लाखों से लेकर करोड़ों व्यूज पर भी आमतौर पर कमाई कुछ हजार रुपये तक ही सिमटी रहती है।

इसके उलट, Instagram Reels जैसे प्लेटफॉर्म पर ब्रैंड्स की ओर से मिलने वाले स्पॉन्सर्ड डील्स में कहीं ज्यादा पैसा है। एक ही वीडियो के लिए क्रिएटर्स को दसियों हजार रुपये तक मिल रहे हैं, जो प्लेटफॉर्म की कमाई से कई गुना ज्यादा है।

2026 की शॉर्ट वीडियो इकोनॉमी की यही असली तस्वीर है। एक तरफ व्युअरशिप और एंगेजमेंट रिकॉर्ड स्तर पर है, वहीं दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म से मिलने वाला रेवेन्यू अभी भी सीमित है। ऐसे में क्रिएटर्स की कमाई का मुख्य जरिया अब ब्रैंड डील्स बन चुका है, जहां हर प्लेटफॉर्म अपनी अलग रणनीति और अवसर लेकर सामने आ रहा है।

भारत में शॉर्ट वीडियो का विस्फोट- तस्वीर कितनी बड़ी है?

2026 में भारत शॉर्ट वीडियो का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। YouTube India पर अकेले 50 करोड़ यूजर्स हैं, जोकि दुनिया में सबसे ज्यादा (Statista, October 2025) हैं। Youtube Shorts दुनिया भर में 200 बिलियन व्यूज प्रतिदिन बना रहा है- YouTube के CEO नील मोहन ने पहली बार जून 2025 में Cannes Lions Festival में इस बड़ी उपलब्धि की जानकारी दी थी। इसके बाद 21 जनवरी 2026 को अपने YouTube ब्लॉग में इसे फिर से कन्फर्म किया। इसमें भारत की हिस्सेदारी करीब 25% है, यानी इस मामले में भारत सबसे आगे है।

Instagram पर भारत में 40 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं (DataReportal, April 2026) और IPSOS Survey के अनुसार Instagram Reels भारत में सबसे लोकप्रिय शॉर्ट फॉर्म वीडियो फार्मेट है। Moj (ShareChat का प्लेटफॉर्म) और Josh मिलाकर देश के Tier 2-3 शहरों में 35 करोड़ से ज्यादा एक्टिव यूजर्स तक पहुंच रखते हैं।

FICCI-EY 2026 रिपोर्ट (मार्च 2026) के अनुसार भारत में ऑनलाइन वीडियो व्युअर्स की संख्या 57.2 करोड़ तक पहुंच चुकी है। Dentsu की Digital Advertising Report 2026 (फरवरी 2026) बताती है कि देश का Online Video Advertising 2025 में ₹20,004 करोड़ का हो चुका है- जो कुल Digital Advertising का 28% है।

इस विशाल बाजार में तीन तरह के खिलाड़ी हैं: Youtube Shorts (Google का), Instagram Reels (Meta का), और Moj (भारत का अपना)। तीनों के मॉनेटाइजेशन मॉडल बिल्कुल अलग हैं और ब्रैंड्स के लिए हर प्लेटफॉर्म का ROI भी अलग।

Youtube Shorts- सबसे बड़ा स्टेज, सबसे छोटा चेक

YouTube Shorts का स्केल भारत में बाकी सभी प्लेटफॉर्म से बड़ा है। हर दिन करीब 200 बिलियन व्यूज और 2 बिलियन मंथली यूजर्स (Q1 2026) के साथ यह शॉर्ट वीडियो का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। लेकिन क्रिएटर्स के लिए सच्चाई यह है कि यहां से सीधी कमाई अभी भी काफी कम है।

CPM और Creator Payouts की हकीकत:

YouTube Shorts पर कमाई का तरीका थोड़ा अलग है। यहां सभी Shorts Ads से आने वाला पैसा एक Pool में जाता है, और फिर क्रिएटर्स को उनके व्यूज के हिसाब से हिस्सा मिलता है। इसमें से पहले म्यूजिक का खर्च कटता है, फिर क्रिएटर को करीब 45% हिस्सा मिलता है (जबकि Long Video में 55% मिलता है)।

अब बात कमाई की- Shorts पर 1,000 व्यूज के लिए सिर्फ $0.03 से $0.10 मिलते हैं। यानी 10 लाख व्यूज पर करीब ₹2,500 से ₹8,400 ही बनते हैं। वहीं Long Videos में यही कमाई करीब 30–60 गुना ज्यादा होती है। 

भारत में यह कमाई और भी कम है। यहां 1,000 व्यूज पर करीब ₹5 से ₹30 मिलते हैं। मतलब यदि किसी वीडियो पर 1 करोड़ व्यूज भी आ जाएं, तो कमाई सिर्फ ₹5,000 से ₹30,000 तक ही रहती है। 

YPP (YouTube Partner Program) की जरूरत: YouTube Shorts से कमाई शुरू करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। इसके लिए 1,000 सब्सक्राइबर्स जरूरी हैं। साथ ही या तो 90 दिनों में 1 करोड़ Shorts व्यूज होने चाहिए, या फिर Long Videos के जरिए 4,000 घंटे का वॉच टाइम पूरा होना चाहिए।

ब्रैंड्स के लिए Youtube Shorts का CPM: ब्रैंड्स की बात करें तो शॉर्ट्स पर उनका खर्च भी कम होता है। यहां विज्ञापनदाता हर व्यू के लिए करीब $0.10 से $0.30 तक देते हैं। यह Long YouTube Videos के मुकाबले कम है, जहां प्रति व्यू $0.50 से $3 तक मिल सकता है। लेकिन शॉर्ट्स का फायदा इसका बहुत बड़ा स्केल है, जहां व्यूज करोड़ों में आते हैं।

Youtube Shorts बनाम Long Form- एक स्पष्ट फैसला:

Inventiva (फरवरी 2026) की रिपोर्ट के मुताबिक YouTube की सबसे बड़ी ताकत है लंबा एंगेजमेंट टाइम। यानी 10 मिनट का वीडियो किसी 30 सेकंड की Reel के मुकाबले ब्रैंड को ज्यादा यादगार बनाता है। खासकर Finance, Tech और Education जैसे सेक्टर में YouTube पर वीडियो लंबे समय तक सर्च में दिखते रहते हैं, क्योंकि यह सिर्फ वीडियो प्लेटफॉर्म नहीं, एक सर्च इंजन भी है।

upGrowth (अप्रैल 2026) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में ब्रैंड डील के रेट कुछ इस तरह हैं:

  • Micro Creator (10 हजार से 1 लाख सब्सक्राइबर्स) के लिए एक YouTube Short: ₹8,000 से ₹80,000
  • 1 मिलियन+ सब्सक्राइबर्स वाले क्रिएटर के लिए YouTube Short: ₹60,000 से ₹2 लाख
  • Long Form वीडियो (60–90 सेकंड ब्रैंड इंटीग्रेशन): ₹2.5 लाख से ₹6 लाख

Instagram Reels- ब्रैंड डील्स में आगे, डायरेक्ट अर्निंग में पीछे

Instagram Reels की कहानी Youtube Shorts से एकदम उलटी है। प्लेटफॉर्म सीधे तो लगभग कुछ नहीं देता, लेकिन ब्रैंड डील्स (Brand Deals) के लिए यह अब भी सबसे प्रीमियम प्लेटफॉर्म है।

Reels Play Bonus का अंत:

Instagram का Reels Play Bonus Program, जो 2021 में शुरू हुआ था और व्यूज के आधार पर क्रिएटर्स को पैसा देता था, मार्च 2023 से नए क्रिएटर्स के लिए बंद कर दिया गया। अब मार्च 2026 तक इसे पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। Instagram ने माना कि सीधे पैसे देने वाला मॉडल ज्यादा बड़ा नहीं बन पाया, इसलिए अब कंपनी क्रिएटर्स की कमाई को Brand Deals और Partnerships की तरफ बढ़ा रही है।

Direct Ad Revenue की हकीकत:

Instagram Reels पर जो प्लेटफॉर्म से सीधी कमाई होती है, वह काफी कम है। Ads Program के तहत 1,000 व्यूज पर करीब $0.01 से $0.10 मिलते हैं। यानी 10 लाख व्यूज पर लगभग ₹8,400 से ₹50,000 तक की कमाई हो सकती है। लेकिन यह सुविधा सभी के लिए नहीं है- यह सिर्फ Invite-Only है और भारत में बहुत कम क्रिएटर्स तक पहुंची है।

fluxnote.io के March 2026 के India-specific Analysis के अनुसार, भारत में रील्स पर प्रति व्यू कमाई $0.002 से $0.008 के बीच रहती है, जबकि अमेरिका में यह $0.01 से $0.05 तक होती है। यानी भारतीय क्रिएटर्स को अमेरिकी क्रिएटर्स के मुकाबले करीब 5–10 गुना कम पैसा मिलता है।

Brand Deals में Reels का दबदबा:

upGrowth की April 2026 Influencer Pricing Report के अनुसार, India में Instagram Brand Deal Rates:

  • Instagram Reels पर ब्रैंड डील की कमाई फॉलोअर्स के हिसाब से बढ़ती है।

  • 10 हजार से 1 लाख फॉलोअर्स वाले क्रिएटर एक Reel के लिए करीब ₹15,000 से ₹80,000 तक लेते हैं।

  • 1 लाख से 5 लाख फॉलोअर्स वाले क्रिएटर की फीस ₹75,000 से ₹3.5 लाख तक होती है।

  • वहीं 5 लाख से 20 लाख फॉलोअर्स वाले बड़े क्रिएटर एक Reel के लिए ₹2.5 लाख से ₹8 लाख तक चार्ज करते हैं।

  • अगर ब्रैंड को “Whitelisting Rights” भी दिए जाते हैं (यानि ब्रैंड उस कंटेंट को अपने एड्स में इस्तेमाल कर सकता है), तो यही रकम 1.5 से 2 गुना तक बढ़ जाती है।

Instagram Reels की Reach:

Instagram Reels का एल्गोरिद्म वीडियो को करीब 72 घंटों के अंदर तेजी से वायरल करने में मदद करता है। Explore Page के जरिए यह कंटेंट को उन लोगों तक भी पहुंचाता है जो आपको फॉलो नहीं करते- यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। हालांकि, Sprout Social और Hootsuite (2025) के मुताबिक Instagram का कुल औसत एंगेजमेंट रेट घटकर 0.50% रह गया है। इसलिए Reels को सबसे बेहतर तरीके से “Discovery Tool” यानी नए लोगों तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन एक कमी यह है कि Reels में Direct Purchase Links का सपोर्ट नहीं है, इसलिए सीधी कन्वर्जन (conversion) के मामले में यह YouTube Shorts से थोड़ा पीछे रह जाता है।

वहीं Loopexdigital.com के Q1 2026 के आंकड़ों के अनुसार YouTube Shorts की एंगेजमेंट रेट 5.91% है, जो शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स में सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद ब्रैंड डील्स के मामले में रील्स अभी भी आगे है, क्योंकि यहां की ऑडियंस ज्यादा Urban और Aspirational मानी जाती है, जिसे प्रीमियम ब्रैंड्स ज्यादा पसंद करते हैं।

Moj – देसी प्लेटफॉर्म, लोकल ऑडियंस और नया एक्सपेरिमेंट

Moj, जो ShareChat का शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म है, उसे शहरी मार्केटिंग एजेंसियां अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन असल में यह भारतीय क्षेत्रीय (vernacular) मार्केटिंग का एक बड़ा और अनदेखा मौका है।

Moj की ताकत:

Moj पर 15 से ज्यादा भारतीय भाषाओं में कंटेंट बनाया और देखा जाता है। इसकी ऑडियंस का बड़ा हिस्सा हिंदी, तमिल, तेलुगु और बंगाली जैसे क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट पसंद करता है। खास बात यह है कि Tier-2, Tier-3 शहरों और गांवों में इसकी पहुंच कई बड़े प्रीमियम प्लेटफॉर्म्स से भी ज्यादा है।

मॉनेटाइजेशन मॉडल:

Moj का सीधे Ads से कमाई वाला सिस्टम अभी YouTube जितना मजबूत नहीं है। यहां क्रिएटर्स ज्यादातर तीन तरीकों से कमाते हैं- ब्रैंड डील्स, Moj Creator League (जहां हफ्ते में ₹5 लाख तक का प्राइज पूल मिलता है) और लाइव स्ट्रीम के दौरान मिलने वाले वर्चुअल गिफ्ट्स।

Moj का 2026 का सबसे बड़ा कदम:

जनवरी 2026 में Moj ने Micro Drama Challenge लॉन्च किया। यह एक तरह का Accelerator Program है, जिसके लिए कंपनी ने सालाना ₹20 करोड़ का बजट रखा है। इसके तहत 10 चुने हुए स्टूडियो को ₹10 लाख-₹10 लाख का ग्रांट दिया गया, ताकि वे Vertical Micro Drama Series बना सकें। हर सीरीज कम से कम 1 घंटे की होगी और हर एपिसोड 1–2 मिनट का होगा। यह भारत का पहला ऐसा संगठित क्रिएटर फंड है, जो खास तौर पर Short Form Drama पर फोकस कर रहा है।

ब्रैंड्स के लिए Moj का Value:

Moj और Josh पर एक माइक्रो इन्फ्लुएंसर (5K-50K Followers) का Sponsored Post ₹5,000-₹30,000 में मिलता है- जो Instagram पर उसी Tier के क्रिएटर से 40-60% सस्ता है। FMCG, Telecom, और सरकारी कैंपेंस के लिए Moj एक Cost-Effective High Reach प्लेटफॉर्म है।

Case Study: IPL और Viral Campaigns में शॉर्ट वीडियो का रोल

IPL 2026 में शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और प्लानिंग के साथ किया गया।

JioHotstar के आंकड़ों के मुताबिक IPL 2026 के ओपनिंग वीकेंड पर टीवी और डिजिटल मिलाकर करीब 51.5 करोड़ दर्शक जुड़े। इस दौरान Fantasy Gaming Apps, FMCG ब्रैंड्स और टेलीकॉम कंपनियों ने नई मल्टी-प्लेटफॉर्म रणनीति अपनाई- YouTube Shorts पर लंबे समय तक दिखने वाला कंटेंट, Instagram Reels पर 72 घंटे का वायरल पुश, और Moj पर क्षेत्रीय (vernacular) ऑडियंस तक पहुंच।

Otbox Media Solutions (फरवरी 2026) की एक केस स्टडी में सामने आया कि जिन ब्रैंड्स ने हफ्ते में 3 Reels और 1 YouTube Short की रणनीति अपनाई, उन्हें 8 हफ्तों में करीब 25% तक बिक्री में बढ़ोतरी मिली।

सिर्फ ब्रैंड्स ही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में भी शॉर्ट वीडियो का जमकर इस्तेमाल हुआ था। खासकर क्षेत्रीय पार्टियों ने Moj और Josh जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए उन इलाकों तक पहुंच बनाई, जहां Instagram की पहुंच कम थी। 2026 में यह ट्रेंड और मजबूत होता दिख रहा है।

भारत का Influencer Marketing बाजार- 2026 का आँकड़ा

भारत में Influencer Marketing का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। 2024 में यह करीब ₹2,200 करोड़ था, जो 2025 में ₹2,850 करोड़ और 2026 में बढ़कर ₹3,375 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यानी करीब 25% की सालाना ग्रोथ, जो पारंपरिक डिजिटल विज्ञापन (12–15%) से कहीं ज्यादा है (Otbox Media Solutions, नवंबर 2025)।

इस बाजार में ब्रैंड्स अपना बजट अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस तरह खर्च कर रहे हैं (upGrowth, अप्रैल 2026):

  • Instagram Reels पर करीब 70% बजट जाता है, खासकर Fashion, Beauty, FMCG और Lifestyle कैटेगरी में।
  • YouTube Shorts और Long Videos को 20–25% बजट मिलता है, जहां Finance, Tech और EdTech जैसे सेक्टर एक्टिव हैं।
  • वहीं Moj और Josh जैसे क्षेत्रीय प्लेटफॉर्म्स को 5–10% बजट मिलता है, जिसमें FMCG, Telecom और सरकारी कैंपेन शामिल हैं।

Dentsu Digital Advertising Report 2026 के मुताबिक, टीवी का एड शेयर लगातार घट रहा है। 2024 में जहां यह 28% था, वहीं 2025 में घटकर 21% (₹25,964 करोड़) रह गया। इसका साफ मतलब है कि बड़े विज्ञापनदाता अब तेजी से डिजिटल और खासकर शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स की ओर बढ़ रहे हैं।

तीन प्लेटफॉर्म्स की चुनौतियां-  

Youtube Shorts की समस्या: YouTube Shorts से सीधी कमाई इतनी कम है कि ज्यादातर क्रिएटर्स इसे सिर्फ ग्रोथ का जरिया मानते हैं, कमाई का नहीं। उदाहरण के तौर पर, 1 करोड़ व्यूज पर Shorts से सिर्फ ₹5,000 से ₹30,000 तक मिलते हैं, जबकि उसी रीच के लिए एक ब्रैंड डील ₹5 लाख तक दे सकती है। यानी कमाई में 15 से 100 गुना तक का फर्क है और यही बात कई क्रिएटर्स के लिए निराशा की वजह बन रही है।

Instagram Reels की समस्या: Instagram Reels पर अब सीधी कमाई लगभग खत्म हो चुकी है। Reels Play Bonus बंद हो गया है और प्लेटफॉर्म से मिलने वाला डायरेक्ट पैसा बहुत कम रह गया है। ऐसे में अगर किसी क्रिएटर के पास ब्रैंड डील्स नहीं हैं, तो करोड़ों व्यूज आने के बावजूद कमाई ना के बराबर रहती है।

इसके अलावा, Instagram में Direct Purchase Links का सही सपोर्ट नहीं है, जिससे किसी प्रोडक्ट की सीधी बिक्री (conversion) करना भी मुश्किल हो जाता है।

Moj की समस्याMoj का मोनेटाइजेशन सिस्टम अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। यहां ब्रैंड डील्स का नेटवर्क भी उतना मजबूत नहीं है। साथ ही, क्रिएटर्स के लिए सही और भरोसेमंद डेटा (third-party verified tools) की कमी है, जिससे ब्रैंड्स यहां बड़े स्तर पर निवेश करने में हिचकते हैं।

Moj फिलहाल बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंच बनाने का प्लेटफॉर्म है, लेकिन प्रीमियम कमाई के लिए अभी उतना मजबूत नहीं माना जाता।

पूरे Ecosystem की समस्या: भारत का CPM- Cost Per Mille (यानी 1,000 व्यूज या इम्प्रेशन पर विज्ञापनदाता कितना पैसा देता है) दुनिया में सबसे कम है। ऑस्ट्रेलिया का Average YouTube CPM $36.21 है, US का $32.75- जबकि भारत का $0.70-$0.83 है। इसका मतलब है कि 50 करोड़ यूट्यूब यूजर्स होने के बावजूद भारतीय क्रिएटर्स को वैश्विक स्तर पर बेहद कम कीमत मिलती है। अमेरिका के मुकाबले लगभग 40-50 गुना कम।

भविष्य की दिशा- 2026 के बाद क्या होगा?

YouTube का दांवYouTube Shorts पर दिखने वाले Vertical Video Ads, Long Videos के मुकाबले 10–20% ज्यादा कन्वर्जन दे रहे हैं। इसके साथ ही Connected TV (CTV) पर Shorts देखने वालों की संख्या एक साल में दोगुनी हो गई है, यानी लोग अब टीवी पर भी शॉर्ट वीडियो ज्यादा देखने लगे हैं। वहीं YouTube ने अपने Partner Program के जरिए अब तक क्रिएटर्स को $100 बिलियन से ज्यादा का कुल भुगतान किया है, जो किसी भी दूसरे क्रिएटर प्लेटफॉर्म से ज्यादा है।

Instagram का दांव: Meta ने Reels को अब E-commerce से और ज्यादा जोड़ दिया है। Instagram Shopping, Collab Shops और Allowlisting जैसे फीचर्स के जरिए कमाई के नए रास्ते बन रहे हैं, जहां ब्रैंड सीधे क्रिएटर के अकाउंट से Ads भी चला सकते हैं।

भारत में Social Commerce भी तेजी से बढ़ रहा है। Meesho और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म वीडियो-फर्स्ट स्ट्रेटेजी अपना रहे हैं, जिससे 20–30% तक ज्यादा कन्वर्जन देखने को मिल रहा है।

Moj का दांव: माइक्रो ड्रामा फॉर्मेट भारत में तेजी से एक नया कंटेंट सेगमेंट बनता जा रहा है। FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2028 तक इसका मार्केट करीब ₹2,300 करोड़ तक पहुंच सकता है।

आज कई शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म जैसे Dolby Vision सपोर्ट और AI आधारित रीजनल कंटेंट रिकमेंडेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यूजर्स को उनकी भाषा और पसंद के हिसाब से कंटेंट मिल रहा है और यह पूरा फॉर्मेट धीरे-धीरे प्रीमियम कंटेंट की तरफ बढ़ रहा है।

कौन जीत रहा है असली मॉनेटाइजेशन की जंग?

YouTube Shorts, Instagram Reels और दूसरे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म में से कोई एक अकेला “सबसे आगे” नहीं है। असल में ये तीनों मिलकर एक नई डिजिटल इकोनॉमी बना रहे हैं।

क्रिएटर के नजरिए से:

YouTube Shorts, Instagram Reels और Moj- तीनों का कमाई मॉडल अलग-अलग तरह से काम करता है।

  • YouTube Shorts: इसे सबसे ज्यादा stable long-term income वाला माना जाता है, क्योंकि यहां कमाई सिर्फ ads से नहीं होती, बल्कि platform revenue + brand deals + merchandise तीनों मिलकर एक मजबूत income system बनाते हैं।
  • Instagram Reels: यहां creators को अक्सर brand deals से सबसे ज्यादा पैसा मिलता है, लेकिन यह पूरी तरह उनके audience size और niche (कौन सा content बनाते हैं) पर depend करता है।
  • Moj: यह अभी भी डेवलपिंग फेज में है, यानी इसका मोनेटाइजेशन सिस्टम और कमाई के अवसर अभी पूरी तरह मैच्योर नहीं हुए हैं।

ब्रैंड के नजरिए से:

YouTube Shorts, Instagram Reels और Moj- तीनों का फोकस अलग ऑडियंस और अलग मार्केटिंग गोल पर है।

  • YouTube Shorts: यह long-term search discovery के लिए सबसे मजबूत है। यहां लोग intent के साथ content ढूंढते हैं, इसलिए audience ज्यादा high-intent होती है और content लंबे समय तक चलता है।
  • Instagram Reels: यह तेजी से viral awareness बनाने के लिए बेहतर है। यहां ज्यादातर urban, premium audience मौजूद है, जो trends और lifestyle content पर जल्दी react करती है।
  • Moj: यह mainly vernacular India को target करता है। यानी छोटे शहरों और regional language audience तक पहुंच बनाने के लिए यह एक cost-effective platform है।

शॉर्ट वीडियो अब सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक मजबूत कमर्शियल (व्यापार) प्लेटफॉर्म बन चुका है। आज इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का बाजार करीब ₹3,375 करोड़ तक पहुंच चुका है। वहीं ऑनलाइन वीडियो एड स्पेंड भी लगभग ₹20,004 करोड़ के स्तर पर है। इसके साथ ही भारत में करीब 57.2 करोड़ वीडियो व्यूअर्स हैं, जो इस इकोसिस्टम की बड़ी ताकत दिखाते हैं।

इन आंकड़ों से साफ है कि यह सिर्फ शुरुआत है। आने वाले समय में वही प्लेटफॉर्म आगे रहेगा जो क्रिएटर्स को बेहतर कमाई देगा, ब्रैंड्स को ज्यादा बेहतर रिजल्ट (ROI) देगा और भारत के हर छोटे-बड़े इलाके तक अपनी पहुंच बना सकेगा।

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AI व डेटा आधारित OOH ऐडवर्टाइजिंग: क्या अब होर्डिंग्स भी 'स्मार्ट' हो गए हैं?

होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 21 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 21 May, 2026
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दिल्ली के कनॉट प्लेस में लगी एक डिजिटल स्क्रीन सुबह ऑफिस जाने वालों को कॉफी और ब्रेकफास्ट ऑफर दिखाती है। दोपहर होते-होते उसी स्क्रीन पर फूड डिलीवरी और लंच कॉम्बो के विज्ञापन आने लगते हैं। शाम को ट्रैफिक बढ़ते ही कैब ऐप्स और क्विक कॉमर्स ब्रैंड्स के ऐड दिखाई देने लगते हैं। अगर मौसम अचानक बदल जाए, तो विज्ञापन भी तुरंत बदल जाते हैं। यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि 2026 का AI और डेटा आधारित स्मार्ट OOH ऐडवर्टाइजिंग है।

होर्डिंग और बिलबोर्ड को हम हमेशा से एक 'पुराना' विज्ञापन माध्यम मानते रहे हैं, जो हफ्तों या महीनों तक एक ही तस्वीर दिखाता रहता है। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), लोकेशन डेटा, मौसम के आंकड़े और ऑडियंस एनालिटिक्स की मदद से डिजिटल आउट-ऑफ-होम (DOOH) स्क्रीनें इतनी 'समझदार' हो गई हैं कि वे हर पल सही व्यक्ति को सही समय पर सही विज्ञापन दिखा सकती हैं। यह बदलाव न केवल विज्ञापन इंडस्ट्री को बल्कि हमारी सार्वजनिक जगहों की पूरी तस्वीर को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।

तेजी से बढ़ता विशाल मार्केट

DOOH का ग्लोबल मार्केट 2026 में लगभग $20 से $22.5 अरब डॉलर के बीच आंका जा रहा है। Fortune Business Insights के अनुसार 2025 में यह मार्केट $20.17 अरब डॉलर था और 2026 में $22.51 अरब डॉलर तक पहुंचेगा, 2034 तक $56.1 अरब डॉलर होने का अनुमान है, 12.09% CAGR के साथ। Mordor Intelligence (जनवरी 2026) के मुताबिक 2026 में वैश्विक DOOH मार्केट $20.22 अरब डॉलर है और 2031 तक $32.98 अरब तक पहुंचेगा।

यह अंतर इसलिए है क्योंकि अलग-अलग रिसर्च कंपनियां अलग-अलग तरीके से आंकड़े तैयार करती हैं। लेकिन सभी की राय एक जैसी है कि यह मार्केट तेजी से बढ़ रहा है।

भारत की तस्वीर: MarkNtel Advisors के अनुसार भारत का DOOH मार्केट 2024 में लगभग $284 मिलियन (करीब ₹2,350 करोड़) था और 2030 तक $620 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, लगभग 14% CAGR पर। PwC की Global Entertainment & Media Outlook 2025–29 रिपोर्ट बताती है कि भारत का कुल OOH राजस्व 2024 में $568 मिलियन था, जो 13.4% की दर से बढ़ा और 2029 तक $798 मिलियन तक पहुंचेगा। Adonmo के इंडस्ट्री आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल OOH मार्केट (डिजिटल और पारंपरिक दोनों) 2025 में ₹6,500 करोड़ से ऊपर था।

प्रोग्रामेटिक DOOH: जब होर्डिंग बोलने लगे एल्गोरिद्म की भाषा

DOOH की इस क्रांति के केंद्र में है प्रोग्रामेटिक DOOH, यानी ऑटोमेटेड, डेटा-संचालित तरीके से विज्ञापन खरीदना और चलाना। पहले एक बिलबोर्ड बुक करने में 5-7 दिन लगते थे, मैनेजर को फोन, कॉन्ट्रैक्ट साइनिंग, इंतजार। अब प्रोग्रामेटिक DOOH के जरिए उसी जगह पर 24 घंटे से भी कम समय में कैंपेन लाइव हो सकती है। 

VIOOH के द्वारा 2026 में किए अध्ययन (1,050 विज्ञापनदाताओं पर) के अनुसार हाल के प्रोग्रामेटिक DOOH खरीदारों में से, पिछले 18 महीनों में औसतन 34% कैंपेन में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा था और यह अगले 18 महीनों में 48% तक पहुंचने का अनुमान है। Google DV360 और The Trade Desk जैसे प्रमुख DSP प्लेटफॉर्म अब OOH इन्वेंटरी को डिजिटल चैनलों के साथ एक ही मीडिया प्लान में खरीदने की सुविधा दे रहे हैं।

भारत की तस्वीर बिल्कुल अलग है। PwC की रिपोर्ट और एक्सचेंज4मीडिया के इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार भारत में प्रोग्रामेटिक DOOH का हिस्सा OOH खर्च का महज 1-2% है। PwC इसके पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, कॉस्ट-शेयरिंग की चिंताएं और ऐडवर्टाइजिंग Agencies Association of India (AAAI) की formal स्वीकृति का न मिलना बताता है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में यह आंकड़ा 3-5% तक पहुंच सकता है और 2028 तक 15-20%।

मौसम, ट्रैफिक और वक्त के हिसाब से बदलते विज्ञापन

स्मार्ट DOOH की सबसे रोचक बात यह है कि ये स्क्रीनें आसपास के माहौल को 'पढ़' सकती हैं। इसके कई तरीके हैं:

मौसम आधारित विज्ञापन: जैसे ही तापमान एक तय सीमा से ऊपर जाता है, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम का विज्ञापन चल पड़ता है। बारिश होते ही छाते या रेनकोट की ब्रैंड दिखने लगती है। Aperol ने एक कैंपेन में यह तय किया कि उनका विज्ञापन केवल तभी दिखे जब तापमान 19°C से ऊपर हो, और वह भी गुरुवार से रविवार, दोपहर 1 बजे से रात 8 बजे के बीच। Rain-X ने कनाडा में बर्फ, बारिश और ओले के लिए अलग-अलग क्रिएटिव तैयार किए जो मौसम के हिसाब से अपने आप बदल जाते थे। Dulux पेंट ने मौसम-ट्रिगर कैंपेन के जरिए अपने स्टोर में 130% अधिक ट्रैफिक दर्ज किया।

ट्रैफिक और समय आधारित विज्ञापन: सुबह की भीड़ में कॉफी का विज्ञापन, दोपहर में फास्ट फूड स्पेशल, शाम को मनोरंजन। हाईवे पर ट्रैफिक जाम में प्रीमियम ब्रैंड विज्ञापन, मेट्रो स्टेशनों पर सुबह की सवारी में फिनटेक ऐप। EMARKETER के AI in OOH FAQ (मई 2026) के अनुसार AI अब स्पोर्ट्स स्कोर्स, लोकल इवेंट्स और ट्रैफिक कंडिशंस के आधार पर contextual creative selection करता है।

लोकेशन और इवेंट आधारित विज्ञापन: मैच वाले दिन स्टेडियम के आसपास लगी स्क्रीन पर स्पोर्ट्स ड्रिंक के विज्ञापन दिखने लगते हैं। वहीं मॉल के अंदर लगे डिजिटल कियोस्क लोगों को उसी समय चल रहे ऑफर्स और डील्स दिखाते हैं। Amazon जैसे ब्रांड भी अब रियल-टाइम ऑफर्स दिखाकर ग्राहकों को तुरंत खरीदारी के लिए आकर्षित कर रहे हैं।

Blindspot के मुताबिक, मौसम के हिसाब से बदलने वाले DOOH विज्ञापनों को लोग ज्यादा याद रखते हैं। कंपनी का दावा है कि ऐसे विज्ञापनों में ब्रैंड रिकॉल करीब 90% तक पहुंच जाता है, जबकि सामान्य स्थिर विज्ञापनों में यह करीब 65% रहता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि करीब 80% लोग उन विज्ञापनों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो उनके आसपास की स्थिति या माहौल से जुड़े होते हैं।

फेस डिटेक्शन और ऑडियंस एनालिटिक्स: होर्डिंग जो 'देखती' है

DOOH में अब AI आधारित ऑडियंस डिटेक्शन तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इसके जरिए डिजिटल स्क्रीन के आसपास मौजूद लोगों की अनुमानित उम्र, जेंडर या भीड़ के प्रकार को समझकर विज्ञापन बदले जाते हैं। इस तकनीक में आमतौर पर कैमरों और सेंसर की मदद ली जाती है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि इसका मकसद किसी व्यक्ति की पहचान करना नहीं, बल्कि ऑडियंस पैटर्न को समझना होता है।

यह तकनीक फेशियल डिटेक्शन कहलाती है, जो फेशियल रिकग्निशन से अलग मानी जाती है। फेशियल रिकग्निशन किसी व्यक्ति की पहचान करने और डेटा सेव करने से जुड़ी होती है, जबकि फेशियल डिटेक्शन केवल सामने मौजूद लोगों की अनुमानित जनसांख्यिकीय जानकारी समझने की कोशिश करती है।

उदाहरण के तौर पर, कुछ कंपनियां टैबलेट स्क्रीन और डिजिटल डिस्प्ले के जरिए यह समझने की कोशिश करती हैं कि सामने किस तरह की ऑडियंस मौजूद है, ताकि उसी हिसाब से विज्ञापन दिखाए जा सकें।

इसके अलावा Affectiva और Hume AI जैसी कंपनियां अब इमोशन AI तकनीक पर भी काम कर रही हैं। यह तकनीक चेहरे के हावभाव के आधार पर लोगों की प्रतिक्रिया समझने में मदद करती है, ताकि विज्ञापनों को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके।

MarketsandMarkets की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इमोशन डिटेक्शन और रिकग्निशन मार्केट के 2026 तक 37.1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। वहीं Fortune Business Insights के मुताबिक यह मार्केट 2025 में 42.83 अरब डॉलर का था और आने वाले वर्षों में इसके और तेजी से बढ़ने की संभावना है।

क्या DOOH अब डिजिटल जैसा Measurable हो गया?

DOOH की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा यह रही है कि इसे मापना मुश्किल था। ऑनलाइन विज्ञापन में क्लिक, इंप्रेशन, कन्वर्जन, सब कुछ सटीक आंका जा सकता है। होर्डिंग के साथ यह सुविधा नहीं थी।

लेकिन 2025-26 में यह समस्या धीरे-धीरे कम हो रही है। अब कंपनियां मोबाइल लोकेशन डेटा की मदद से यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि विज्ञापन देखने के बाद कितने लोग स्टोर तक पहुंचे। इसके अलावा QR कोड स्कैन, ब्रांड सर्वे और रिटेल फुटफॉल स्टडी जैसे तरीकों से भी यह मापा जा रहा है कि विज्ञापन का असर कितना हुआ और कंपनियों को उससे कितना फायदा मिला।

IAB ने जुलाई 2025 में DOOH Measurement Guide जारी की थी, जिसका मकसद डिजिटल आउट-ऑफ-होम विज्ञापनों के लिए एक जैसे मापन मानक तय करना है। हालांकि, इसका इस्तेमाल अभी शुरुआती स्तर पर ही है।

Broadsign के एक सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर विज्ञापनदाता उन DOOH प्लेटफॉर्म्स में ज्यादा निवेश करना चाहते हैं, जहां डायनेमिक और कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से विज्ञापन दिखाने की सुविधा हो।

भारत में भी OOH इंडस्ट्री तेजी से तकनीक अपना रही है। Indian Outdoor Advertising Association (IOAA) ने 2024 में GPS आधारित ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम शुरू किया था। इसका उद्देश्य देशभर में OOH विज्ञापनों की पहुंच और दर्शकों को बेहतर तरीके से मापना है।

हालांकि, इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी एक समान मापन प्रणाली की कमी है। अलग-अलग कंपनियां विज्ञापनों की पहुंच और प्रभाव को अलग-अलग तरीके से मापती हैं, जिससे पूरे बाजार के लिए एक कॉमन स्टैंडर्ड बनाना मुश्किल हो रहा है।

प्राइवेसी की चिंता: क्या 'स्मार्ट' होर्डिंग हमें देख रहे हैं?

जैसे-जैसे DOOH स्मार्ट होती जा रही है, सवाल उठ रहे हैं, क्या यह हमारी निजता का उल्लंघन है? यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, और दुनिया भर की सरकारें इस पर कड़े नियम बना रही हैं।

चीन ने अप्रैल 2026 में Personal Information Protection Law के तहत सख्त नियमों का नया रोडमैप जारी किया। इसके तहत Cyberspace Administration of China (CAC), Ministry of Industry and Information Technology (MIIT) और Ministry of Public Security (MPS) ने मिलकर कई अभियान शुरू किए हैं। इनमें इंटरनेट विज्ञापनों और यूजर डेटा के इस्तेमाल पर खास फोकस किया गया है।

नए नियमों में यूजर्स को पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन बंद करने का आसान विकल्प देना और बिना फोन नंबर दिए बेसिक सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी किया गया है। इससे डिजिटल विज्ञापन इंडस्ट्री के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

अमेरिका में Illinois का Biometric Information Privacy Act (BIPA) सबसे सख्त कानूनों में माना जाता है। इसके उल्लंघन के मामलों में Facebook पर 650 मिलियन डॉलर और Google पर 100 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। वहीं Connecticut में 2026 में एक नया बिल पास हुआ, जिसमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम और लोकेशन डेटा शेयरिंग पर सख्त नियम प्रस्तावित किए गए हैं।

हालांकि, DOOH इंडस्ट्री में ज्यादातर तकनीक फेशियल डिटेक्शन पर आधारित होती है, न कि फेशियल रिकग्निशन पर। कंपनियों का कहना है कि इसमें किसी व्यक्ति की पहचान या डेटा स्टोर नहीं किया जाता।

अब Edge Computing जैसी तकनीक भी तेजी से इस्तेमाल हो रही है। इसमें डेटा को क्लाउड पर भेजने के बजाय उसी डिवाइस पर प्रोसेस किया जाता है, जिससे निजता बेहतर तरीके से सुरक्षित रहती है।

भारत में DOOH: महानगरों से टियर-2 शहरों तक की यात्रा

भारत में DOOH अभी मुख्यतः शीर्ष 12 मेट्रो शहरों में केंद्रित है। Adonmo के अनुसार 2024 तक देश में करीब 1.5 लाख डिजिटल स्क्रीनें थीं, जिनमें से 75% इन्हीं 12 शहरों में थीं। Adonmo के इंडस्ट्री डेटा के अनुसार भारत में DOOH कुल OOH मार्केट का महज 12% है, जबकि अमेरिका में 40% और चीन में 90%।

Mordor Intelligence के अनुसार भारत के OOH इंडस्ट्री में static OOH का 2024 में 68% हिस्सा था, जबकि DOOH सालाना 7.2% की दर से बढ़ रहा है, जो कुल OOH मार्केट वृद्धि से दोगुना है। PwC के अनुसार DOOH भारत में 16.5% CAGR से बढ़ेगा, पारंपरिक OOH के 2% CAGR से आठ गुना तेज, और 2029 तक OOH का 44.1% हिस्सा होगा, जो 2024 में 28.8% था।

बदलाव आ रहा है:

  • सरकार की Smart Cities Mission के तहत 100 शहरों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो रहा है।
  • दिसंबर 2024 तक भारत का operational metro network 993 किलोमीटर पार कर गया, जबकि 51 शहरों में 997 किलोमीटर और निर्माणाधीन है।
  • Times OOH ने मुंबई मेट्रो लाइन 3 का विज्ञापन अधिकार हासिल किया (जुलाई 2024)।
  • AdOnMo ने सितंबर 2024 में $25 मिलियन की फंडिंग जुटाई। AdOnMo, जो भारत के elevator media मार्केट में अग्रणी है, के पास 26 शहरों में 50,000 से अधिक स्मार्ट स्क्रीनें हैं।
  • FICCI और EY की 2024 रिपोर्ट के अनुसार 2026 तक digital media भारत के OOH मार्केट के कुल राजस्व का 15% बन जाएगी, जिसमें transit media 40% हिस्सा रखेगी।

भारत में DOOH की मार्केट साइज को लेकर इंडस्ट्री विशेषज्ञों में मतभेद हैं। Adgully की जनवरी 2026 की in-depth रिपोर्ट के अनुसार DOOH 2024 में कुल OOH खर्च का 28-30% था और 2026 तक 35% से अधिक होने का अनुमान है।  

छोटे शहरों तक पहुंचने की चुनौती: एक DOOH face की स्थापना लागत $10,000 से $50,000 के बीच है और बिजली खर्च ऑपरेटिंग कॉस्ट का 20% तक हो सकता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में बिजली की अनिश्चितता और connectivity की कमी बड़ी बाधा है। फिर भी LED panel की गिरती कीमतें और 5G का विस्तार इस रास्ते को धीरे-धीरे खोल रहे हैं।

AI Creatives: जब मशीन खुद बनाती है विज्ञापन

DOOH का अगला मोर्चा है, AI-generated creatives। अब विज्ञापन डिजाइन करने के लिए हफ्तों की जरूरत नहीं। AI प्लेटफॉर्म रिलय टाइम डेटा (मौसम, ट्रैफिक, स्पोर्ट्स स्कोर्स) के आधार पर खुद-ब-खुद अलग-अलग creative तैयार करते हैं।

डायनेमिक क्रिएटिव ऑप्टिमाइजेशन (DCO) की मदद से अब एक ही कैंपेन के कई अलग-अलग विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं। यानी अलग ऑडियंस, अलग जगह और अलग समय के हिसाब से विज्ञापन अपने आप बदल सकते हैं। JCDecaux ने फरवरी 2026 में एक नया प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिसकी मदद से 80 देशों में प्रोग्रामेटिक DOOH विज्ञापनों को एक ही सिस्टम से मैनेज किया जा सकता है। इसमें रियल-टाइम बिडिंग, बदलते विज्ञापन और कार्बन रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।

वहीं Clear Channel Outdoor के EVP और CMO Dan Levi ने EMARKETER की जनवरी 2026 की रिपोर्ट में कहा कि जैसे-जैसे एजेंसियां अपने प्लानिंग टूल्स में एआई को शामिल कर रही हैं, वैसे-वैसे उन्हें तेजी से बेहतर और काम की जानकारियां मिल रही हैं।

OOH और डिजिटल का संगम: Omnichannel का नया युग

2026 में DOOH का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब यह अकेले काम नहीं करता। अब एक उपभोक्ता सुबह सड़क पर किसी ब्रैंड का होर्डिंग देखता है, फिर दोपहर में उसी ब्रैंड का विज्ञापन उसके मोबाइल पर दिखाई देता है और रात में वही संदेश किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी नजर आता है। यानी अब विज्ञापन हर प्लेटफॉर्म पर आपस में जुड़े हुए तरीके से दिखाए जा रहे हैं।

OAAA और Harris Poll की 2024 की एक स्टडी के मुताबिक, 73% लोगों ने कहा कि उन्हें DOOH विज्ञापन पसंद आते हैं। वहीं टीवी विज्ञापनों को पसंद करने वालों की संख्या 50% और ऑनलाइन विज्ञापनों के लिए सिर्फ 37% रही। इसी स्टडी में 76% लोगों ने माना कि OOH विज्ञापन देखने के बाद उन्होंने किसी न किसी तरह की प्रतिक्रिया दी।

चुनौतियां अभी भी बाकी हैं

स्मार्ट DOOH तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।

सबसे बड़ी समस्या मापन की है। अभी तक इंडस्ट्री में ऐसा कोई एक समान सिस्टम नहीं है, जिससे सभी कंपनियां विज्ञापनों का असर एक ही तरीके से माप सकें। भारत में यह समस्या और बड़ी है, क्योंकि यहां प्रोग्रामेटिक DOOH अभी शुरुआती दौर में है।

दूसरी चुनौती यह है कि अभी भी ज्यादातर आउटडोर विज्ञापन पारंपरिक होर्डिंग्स पर ही आधारित हैं। OAAA के मुताबिक, OOH बाजार का बड़ा हिस्सा अब भी स्टैटिक बिलबोर्ड्स का है। यानी एआई और स्मार्ट तकनीक का फायदा फिलहाल सिर्फ डिजिटल स्क्रीन तक सीमित है।

डेटा प्राइवेसी और नियम-कानून भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं। चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में डेटा सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बनाए जा रहे हैं, जिसका असर एआई आधारित विज्ञापनों पर पड़ सकता है।

भारत में एक और दिक्कत यह है कि OOH इंडस्ट्री काफी बंटी हुई है। यहां हजारों छोटे-छोटे वेंडर्स हैं, अलग-अलग शहरों के अलग नियम हैं और कोई एक केंद्रीय मानक नहीं है। इसी वजह से पूरे देश में एक जैसी तकनीक लागू करना आसान नहीं है।

अब होर्डिंग सिर्फ तस्वीर नहीं रहे

2026 तक आते-आते DOOH ने यह साफ कर दिया है कि अब होर्डिंग सिर्फ दीवार पर लगी तस्वीर नहीं रह गए हैं। अब वे मौसम, ट्रैफिक और आसपास के माहौल के हिसाब से विज्ञापन बदल सकते हैं और सही समय पर सही संदेश दिखा सकते हैं।

भारत जैसे देश में, जहां स्मार्ट सिटी, मेट्रो और हाईवे तेजी से बढ़ रहे हैं, वहां स्मार्ट DOOH का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। हालांकि प्राइवेसी, मापन और तकनीकी ढांचे जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, लेकिन इंडस्ट्री जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उससे साफ है कि आने वाले समय में आउटडोर विज्ञापन पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और डेटा आधारित होने वाले हैं।

 

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गूगल ने सर्च इंजन में जोड़े नए AI फीचर्स: हुआ और ताकतवर

गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म में बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। नए फीचर्स में AI Mode, Search Agents, Agentic Coding और Personal Intelligence जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 21 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 21 May, 2026
google

गूगल (Google) ने अपने Search प्लेटफॉर्म के लिए बड़े AI अपग्रेड की घोषणा की है। Google I/O इवेंट में पेश किए गए नए फीचर्स का उद्देश्य Search को अधिक बातचीत आधारित, पर्सनलाइज्ड और टास्क-ओरिएंटेड बनाना है। कंपनी के मुताबिक AI Mode अब हर महीने 1 अरब से ज्यादा यूजर्स तक पहुंच चुका है। गूगल ने बताया कि इसके लॉन्च के बाद AI आधारित सर्च क्वेरी हर तिमाही में दोगुनी से ज्यादा बढ़ रही हैं।

इस अपडेट के तहत गूगल (Google) ने Gemini 3.5 Flash को AI Mode का डिफॉल्ट मॉडल बना दिया है। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल एजेंट और कोडिंग से जुड़े कार्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगा। गूगल ने Search बॉक्स में पिछले 25 वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव भी पेश किया है। नया AI-पावर्ड Search बॉक्स टेक्स्ट, इमेज, वीडियो, फाइल्स और Chrome Tabs के जरिए जटिल सवालों को बेहतर तरीके से समझ सकेगा।

कंपनी ने “Search Agents” नाम के नए AI एजेंट्स भी लॉन्च किए हैं। ये एजेंट ब्लॉग, न्यूज साइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को स्कैन कर यूजर्स को फाइनेंस, शॉपिंग और स्पोर्ट्स जैसी कैटेगरी में लगातार अपडेट देंगे। इसके अलावा Search में Agentic Booking फीचर भी जोड़ा गया है, जिसके जरिए यूजर्स लोकल सर्विस और एक्टिविटी बुक कर सकेंगे। कुछ मामलों में गूगल खुद बिजनेस से संपर्क भी करेगा।

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साइबर फ्रॉड पर सरकार का बड़ा एक्शन: तीन करोड़ से अधिक मोबाइल नंबर बंद

विश्व दूरसंचार दिवस पर दूरसंचार विभाग (DoT) ने बताया कि साइबर फ्रॉड रोकने के लिए 3.4 करोड़ मोबाइल नंबर बंद किए गए हैं। जल्द ही बायोमेट्रिक सिम वेरिफिकेशन अनिवार्य किया जाएगा।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 19 May, 2026
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2026
cybersecurities

विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर मुंबई में दूरसंचार विभाग (DoT) के अधिकारियों ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में देशभर में साइबर फ्रॉड से जुड़ी करीब 60 लाख शिकायतें दर्ज हुई हैं। इनमें से 3 हजार से अधिक मामलों का समाधान किया जा चुका है, जबकि साइबर अपराध में शामिल 6 बड़े गैंग्स को भी पकड़ा गया है।

अधिकारियों के अनुसार साइबर धोखाधड़ी पर लगाम लगाने और नेटवर्क सुरक्षा मजबूत करने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही नया टेलीकॉम एक्ट 2023 और टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स 2024 लागू होने के बाद डिजिटल सुरक्षा ढांचे को और मजबूत किया गया है।

फर्जी सिम कार्ड के खिलाफ सरकार जल्द ही बायोमेट्रिक आइडेंटिटी वेरिफिकेशन सिस्टम ड्राफ्ट रूल्स 2025 लागू करने जा रही है। इसके तहत सिम लेने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य होगा। किसी और की पहचान का गलत इस्तेमाल कर सिम लेने पर 3 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।

DoT ने बैंक, यूपीआई प्लेटफॉर्म और पुलिस एजेंसियों के साथ मिलकर बड़ी कार्रवाई भी की है। इसके तहत 3.4 करोड़ संदिग्ध मोबाइल नंबर स्थायी रूप से डिस्कनेक्ट किए गए हैं। वहीं साइबर फ्रॉड से जुड़े 16.97 लाख व्हाट्सएप अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाया गया है।

सरकार के ‘संचार साथी’ पोर्टल के जरिए करीब 10 लाख खोए या चोरी हुए मोबाइल फोनों को ट्रैक और ब्लॉक किया गया है। साथ ही देशभर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में 100 से ज्यादा 5G लैब स्थापित की गई हैं।

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ENIL के मुनाफे पर दबाव : डिजिटल बिजनेस में दिखी मजबूत ग्रोथ

एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ENIL) ने FY26 की चौथी तिमाही में कमजोर प्रदर्शन दर्ज किया। कंपनी की आय और मुनाफे में गिरावट रही, जबकि डिजिटल कारोबार में 84% की मजबूत ग्रोथ देखने को मिली।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 18 May, 2026
Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
enil

एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (Entertainment Network India Ltd-ENIL) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में दबाव वाला प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी की आय और मुनाफे दोनों में गिरावट देखने को मिली, हालांकि डिजिटल कारोबार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की।

31 मार्च 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी की कुल आय 153.48 करोड़ रुपये रही। यह पिछले क्वार्टर के मुकाबले 10.6% और पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 9.6% कम रही। कंपनी का शुद्ध मुनाफा चौथी तिमाही में 8.27 करोड़ रुपये रहा। हालांकि पिछली तिमाही में कंपनी को 6.31 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था, लेकिन सालाना आधार पर मुनाफा 32% से अधिक गिरा है। पिछले साल इसी अवधि में कंपनी ने 12.17 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था।

वहीं पूरे वित्त वर्ष FY26 की बात करें तो ENIL की कुल आय 597.89 करोड़ रुपये रही, जो FY25 की तुलना में 2.7% अधिक है। इसके बावजूद कंपनी पूरे साल में 7.39 करोड़ रुपये के घाटे में चली गई, जबकि पिछले वित्त वर्ष में उसे 11.95 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यतीश मेहरिषी (Yatish Mehrishi) ने कहा कि FY26 मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। उन्होंने बताया कि डिजिटल कारोबार में 84% की ग्रोथ दर्ज हुई है और अब डिजिटल बिजनेस कंपनी के रेडियो रेवेन्यू का लगभग 50% तक पहुंच गया है।

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IWMBuzz ने किया Bengal's Most Stylish Season 3 का आयोजन, सितारों ने बिखेरा जलवा

IWMBuzz Media ने कोलकाता में ‘Bengal’s Most Stylish Season 3’ का भव्य आयोजन किया।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 18 May, 2026
Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
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IWMBuzz Media ने कोलकाता में 'बंगाल के मोस्ट स्टाइलिश सीजन 3' (Bengal’s Most Stylish Season 3) का भव्य आयोजन किया। फैशन और ग्लैमर से भरी इस शाम में बंगाली फिल्म और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के कई बड़े सितारे शामिल हुए।

यह कार्यक्रम TRENDS द्वारा प्रस्तुत किया गया, जबकि Himalaya Purifying Neem Face Wash, Polycrol और VZY Smart TV इसके पावर्ड पार्टनर रहे। आयोजन के दौरान बंगाली मनोरंजन जगत की सबसे स्टाइलिश और प्रभावशाली हस्तियों को सम्मानित किया गया।

इस इवेंट में जीत, प्रसेनजीत चटर्जी, ऋतुपर्णा सेनगुप्ता, नुसरत जहां, यश दासगुप्ता, पाओली दाम, अबीर चटर्जी, सृजित मुखर्जी, मोनामी घोष समेत कई चर्चित सितारों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। सितारों के ग्लैमरस लुक्स और फैशन स्टाइल ने कार्यक्रम को खास बना दिया।

IWMBuzz Media के फाउंडर सिद्धार्थ लाइक ने कहा कि ‘Bengal’s Most Stylish’ अब सिर्फ एक फैशन इवेंट नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति, स्टाइल और आत्मविश्वास का बड़ा मंच बन चुका है। उन्होंने सभी पार्टनर्स और मेहमानों का धन्यवाद भी किया।

कार्यक्रम से जुड़े ब्रांड्स का कहना था कि आज के दौर में फैशन सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास और लाइफस्टाइल से भी जुड़ा है। इसी सोच के साथ उन्होंने इस इवेंट से जुड़ने का फैसला किया।

ग्लैमर, फैशन और एंटरटेनमेंट से सजी इस शाम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ‘Bengal’s Most Stylish’ बंगाल के सबसे बड़े स्टाइल और फैशन आयोजनों में अपनी खास पहचान बना चुका है।

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'ChatGPT' की प्राइवेसी पर सवाल: डेटा शेयरिंग को लेकर 'OpenAI' पर मुकदमा

OpenAI पर अमेरिका में क्लास एक्शन मुकदमा दायर हुआ है। आरोप है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा Google और Meta के साथ बिना उचित सहमति के साझा किया गया।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 16 May, 2026
Last Modified:
Saturday, 16 May, 2026
openai

OpenAI एक नए कानूनी विवाद में घिर गया है। अमेरिका में कंपनी के खिलाफ क्लास एक्शन मुकदमा दायर किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ChatGPT यूजर्स का डेटा बिना उचित सहमति के Google और Meta के साथ साझा किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट में दायर किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि ChatGPT.com पर Meta Pixel और Google Analytics जैसे ट्रैकिंग टूल्स का इस्तेमाल किया गया, जिनकी मदद से यूजर्स की जानकारी थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच सकती थी।

मुकदमे में दावा किया गया है कि यूजर्स के सवाल, ईमेल एड्रेस और अन्य निजी जानकारी ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए प्रोसेस की गई हो सकती है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि लोग AI चैटबॉट्स को निजी और सुरक्षित बातचीत की जगह मानते हैं, जहां वे स्वास्थ्य, वित्तीय और कानूनी मुद्दों तक पर चर्चा करते हैं।

याचिका में कहा गया है कि ChatGPT, Claude, Gemini और Perplexity जैसे AI प्लेटफॉर्म्स इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को गोपनीयता की उचित उम्मीद थी, लेकिन वेबसाइट पर मौजूद एनालिटिक्स और विज्ञापन संबंधी कोड ने इस भरोसे को कमजोर किया।

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TikTok से बेटिंग ऐप्स पर बैन तक- क्या भारत विकसित कर रहा अपना डिजिटल मॉडल?

आज 2026 में भारत में ऐप बैन एक "नया सामान्य" बन चुका है- राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी लोन ऐप्स से लेकर डेटा चोरी तक, सरकार का डिजिटल हथौड़ा लगातार चल रहा है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 16 May, 2026
Last Modified:
Saturday, 16 May, 2026
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जून 2020 की एक शाम करोड़ों भारतीयों के मोबाइल से अचानक TikTok गायब हो गया। उसी रात भारत सरकार ने 59 चीनी ऐप्स पर बैन लगा दिया और इसके साथ ही देश की डिजिटल दुनिया में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हुई। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। 2026 तक आते-आते भारत में ऐप बैन अब आम बात बन चुकी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी लोन ऐप्स से लेकर डेटा चोरी तक, सरकार का डिजिटल हथौड़ा लगातार चल रहा है।

कितने ऐप्स बैन हुए?- एक चौंकाने वाला आंकड़ा

भारत सरकार ने जून 2020 से अब तक IT अधिनियम की धारा 69A के तहत हजारों ऐप्स और वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया है। पहली बड़ी कार्रवाई 29 जून 2020 को हुई जब गलवान घाटी संघर्ष के बाद 59 चीनी ऐप्स- जिनमें TikTok, UC Browser, SHAREit, CamScanner, WeChat शामिल थे, एक झटके में बैन कर दिए गए। इसके बाद जुलाई 2020 में 47 और सितंबर 2020 में 118 और नवंबर 2020 में 43 और ऐप्स बैन हुए। 2020 के अंत तक 267 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लग चुका था।

फरवरी 2022 में एक और बड़ी कार्रवाई हुई जब 54 और चीनी ऐप्स, जिनमें Garena Free Fire भी शामिल था, बैन हुए। MeitY ने तब स्पष्ट रूप से कहा था कि ये ऐप्स "कैमरे, माइक्रोफोन और GPS के जरिए जासूसी कर रहे थे और यूजर का डेटा विदेशी सर्वर पर भेज रहे थे।" इस तरह 2020 से फरवरी 2022 तक कुल 321 चीनी ऐप्स भारत में बैन हो चुके थे।

लेकिन 2025 में तो सारे रिकॉर्ड टूट गए। अप्रैल-मई 2025 के बीच- पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़े भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच- MeitY ने धारा 69A के तहत तीन अलग-अलग आदेशों में Google को 3,000 से अधिक ऐप्स हटाने के निर्देश दिए। इस सूची में VPN, इस्लामिक धार्मिक ऐप्स, AI टूल्स, कैलकुलेटर तक शामिल थे- और अधिकांश पाकिस्तानी डेवलपर्स से जुड़े पाए गए। इससे पहले फरवरी 2025 में 119 और ऐप्स बैन किए गए, जिनमें ज्यादातर चीन और हांगकांग से जुड़े वीडियो-वॉयस चैट प्लेटफॉर्म थे।

धारा 69A- IT अधिनियम की यह धारा ही सरकार का सबसे बड़ा डिजिटल हथियार है। इसके तहत "राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था" के नाम पर किसी भी ऐप या वेबसाइट को बिना न्यायिक समीक्षा के बंद किया जा सकता है। आदेश गोपनीय रखे जाते हैं- यानी न यूजर को पता, न डेवलपर को स्पष्टीकरण।

सरकार ऐप्स क्यों बंद करती है?

सरकार किसी ऐप को बंद करने का फैसला कई वजहों से करती है। हर बार कारण एक जैसा नहीं होता। सुरक्षा एजेंसियां और अलग-अलग सरकारी विभाग ऐप्स की जांच के बाद कार्रवाई करते हैं।

चीनी ऐप्स पर कार्रवाई के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी का था। सरकार को चिंता थी कि भारतीय यूजर्स का डेटा चीन के सर्वर पर जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

ऑनलाइन सट्टेबाजी और मनी लॉन्ड्रिंग भी बड़ा कारण बनकर सामने आए। ED की जांच में पता चला कि कई बेटिंग ऐप्स के जरिए करोड़ों रुपये का अवैध लेनदेन हो रहा था। इसके बाद सरकार ने ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर सख्ती बढ़ाई।

फर्जी लोन ऐप्स की वजह से भी सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। RBI और गृह मंत्रालय को बड़ी संख्या में शिकायतें मिलीं। कई लोगों ने आरोप लगाया कि लोन ऐप्स उनके फोन का डेटा लेकर ब्लैकमेल और परेशान कर रहे थे।

कुछ ऐप्स पर अश्लील और गैरकानूनी कंटेंट दिखाने के आरोप भी लगे। सरकार का कहना था कि ऐसे प्लेटफॉर्म बच्चों और युवाओं पर गलत असर डाल सकते हैं। इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव भी ऐप बैन की बड़ी वजह बना। पहलगाम हमले के बाद हजारों ऐप्स पर कार्रवाई यह दिखाती है कि भारत अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी सुरक्षा और रणनीति के नजरिए से देख रहा है। इन मामलों में CERT-In, आईटी मंत्रालय (MeitY), RBI, ED और गृह मंत्रालय मिलकर जांच और कार्रवाई करते हैं।

TikTok बैन- जब 20 करोड़ यूजर्स एक रात में बेघर हो गए

TikTok बैन शायद भारत के डिजिटल इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। बैन के समय भारत में TikTok के 20 करोड़ से अधिक एक्टिव यूजर्स थे- चीन के बाहर यह दुनिया का सबसे बड़ा TikTok मार्केट था। एक झटके में इन 20 करोड़ लोगों के पास कोई प्लेटफॉर्म नहीं रहा। छोटे शहरों और गांवों के लाखों क्रिएटर्स- जो TikTok पर अपनी आवाज और आजीविका ढूंढ रहे थे- रातोरात बेरोजगार हो गए।

लेकिन इस खाली जगह को भरने की होड़ मच गई। मेटा ने एक हफ्ते के भीतर Instagram Reels लॉन्च किया। Google ने YouTube Shorts उतारा। भारतीय ऐप्स- Moj, Josh, Chingari, Roposo- अरबों की फंडिंग के साथ मैदान में आए।

आंकड़े बताते हैं कि Moj ने दो साल से भी कम समय में 16 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर्स हासिल कर लिए। Josh के 17.9 करोड़ यूजर्स हो गए। Instagram Reels में 2021-22 के बीच 171% की वृद्धि हुई और 2.2 अरब इंटरेक्शन दर्ज हुए। YouTube Shorts 2022 में भारत में 3,940% बढ़ा और 1.5 अरब एंगेजमेंट तक पहुंचा। लेकिन 2023 आते-आते तस्वीर साफ हो गई- भारतीय ऐप्स पिछड़ गए और असली फायदा Meta और Google को हुआ। आज 2026 में भारत YouTube का सबसे बड़ा मार्केट है (लगभग 50 करोड़ मंथली यूजर्स) और Instagram के 48 करोड़ से अधिक यूजर्स यहां हैं।

TikTok 2026 में भी बैन है। 2025 में एक बार वेबसाइट कुछ यूजर्स को खुलती दिखी तो सोशल मीडिया पर "TikTok वापस आ गया" ट्रेंड हो गया- लेकिन MeitY ने तुरंत स्पष्ट किया: "कोई अनब्लॉकिंग ऑर्डर जारी नहीं हुआ है। ऐसी खबरें गलत और भ्रामक हैं।"

बेटिंग ऐप्स- अरबों का अंडरवर्ल्ड

अगर चीनी ऐप्स का बैन सुर्खियों में रहा, तो बेटिंग ऐप्स के खिलाफ कार्रवाई की असली कहानी और भी चौंकाने वाली है।

Mahadev Online Book मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ED की जांच में सामने आया कि यह ऐप दुबई से चलाए जाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजी सिंडिकेट का हिस्सा था- Tiger Exchange, Gold365 और Laser247 जैसे कई डोमेन इसी नेटवर्क से जुड़े थे। ED की chargesheet के अनुसार सिंडिकेट की मासिक कमाई करीब 450 करोड़ रुपये आंकी गई। 2023 में ED ने पहली बड़ी कार्रवाई में 417 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की। नवंबर 2023 में MeitY ने Mahadev समेत 22 अवैध बेटिंग ऐप्स को बैन किया।

मार्च 2026 में ED ने ताजा कार्रवाई में मुख्य प्रमोटर सौरभ चंद्राकर की दुबई स्थित संपत्तियां- जिनमें Burj Khalifa के फ्लैट भी शामिल हैं- कुर्क कीं, जिनकी कीमत करीब 1,700 करोड़ रुपये है। इस मामले में अब तक कुल जब्ती, सीज़र और फ्रीजिंग मिलाकर 4,336 करोड़ रुपये हो चुके हैं।

बड़े बदलाव की बात करें तो PROGA- Promotion and Regulation of Online Gaming Act, 2025 ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया। यह कानून अगस्त 2025 में संसद के दोनों सदनों से पास हुआ और राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इसके तहत भारत में सभी रियल-मनी ऑनलाइन गेमिंग- चाहे स्किल आधारित हो या भाग्य आधारित पर प्रतिबंध है। हालांकि ई-स्पोर्ट्स और नॉन-मॉनेटरी सामाजिक गेम्स इससे अलग लीगल कैटेगरी में हैं। Betway, 1xBet, Parimatch, MELBET जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म अब भारत में अवैध हैं। 2026 की शुरुआत तक अधिकारियों ने 7,800 से अधिक अवैध बेटिंग और जुए की वेबसाइट्स ब्लॉक की हैं- एक ही कार्रवाई में 242 साइट्स एक साथ ब्लॉक की गईं। IPL और क्रिकेट मैचों के दौरान बेटिंग ऐप्स के surrogate विज्ञापनों पर भी सख्त रोक लगाई गई है।

फर्जी लोन ऐप्स- जब कर्ज बना जाल

फर्जी लोन ऐप्स का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा है। ये ऐप्स पहले लोगों को तुरंत लोन देने का लालच देते थे। इसके बाद मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट, फोटो गैलरी और दूसरे डेटा तक पहुंच मांग लेते थे। फिर शुरू होता था लोगों को डराने-धमकाने और ब्लैकमेल करने का खेल।

तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां लोगों को इतना परेशान किया गया कि कुछ ने आत्महत्या तक कर ली।

जांच में पता चला कि इन फर्जी ऐप्स के पीछे कई शेल कंपनियां थीं, जिनका संबंध चीन से जुड़ा बताया गया। ये कंपनियां एक ही सिस्टम से कई नकली लोन ऐप्स चला रही थीं। ED ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार भी किया।

सरकार ने सख्ती दिखाते हुए एक अभियान में 94 फर्जी लोन ऐप्स को एक साथ बंद किया। वहीं Google ने भी अपनी नीति बदल दी। पिछले दो साल में Play Store से 4,700 से ज्यादा अवैध लोन ऐप्स हटाए गए। अब सिर्फ RBI से जुड़े या रजिस्टर्ड संस्थानों के ऐप्स को ही Play Store पर रहने की अनुमति है।

दिसंबर 2025 में सिर्फ एक महीने के भीतर 87 अवैध लोन ऐप्स बंद किए गए। वहीं मार्च 2026 में RBI ने 47 और फर्जी ऐप्स हटवाए।

RBI ने जुलाई 2025 से Digital Lending Directory को जरूरी कर दिया है। इसके तहत हर वैध लोन ऐप का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। हालांकि, फर्जी ऐप्स नए नाम से फिर लौट आते हैं। इसी वजह से Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) लगातार इन ऐप्स पर नजर रखता है।

ऐड इंडस्ट्री पर असर- बजट का नया ठिकाना

ऐप बैन ने भारत के डिजिटल ऐड इंडस्ट्री की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

TikTok बैन से पहले ब्रांड्स के पास short-form video पर खर्च करने का एक सस्ता और viral माध्यम था। TikTok के जाने के बाद वह पूरा बजट Instagram Reels और YouTube Shorts की तरफ शिफ्ट हो गया- और Meta व Google और ताकतवर हो गए।

Dentsu-e4m के Digital Advertising Report 2026 के अनुसार, 2025 में भारत का डिजिटल विज्ञापन मार्केट ₹71,621 करोड़ का था- जो 19% की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है। 2026 में यह ₹84,977 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। डिजिटल विज्ञापन अब कुल भारतीय विज्ञापन मार्केट का 59% हिस्सा बन चुका है- 2016 में यह महज 12% था।

इंफ्लुएंसर मार्केटिंग भी एक बड़ा सेक्टर बन चुकी है। 2025 में यह इंडस्ट्री 3,000-3,500 करोड़ रुपये का था और 22% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है। 2027 तक यह 4,500-5,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। EY की रिपोर्ट के अनुसार influencer marketing का वैश्विक मार्केट 2026 में लगभग 40 करोड़ डॉलर हो सकता है।

बेटिंग ऐप्स पर क्रैकडाउन ने surrogate advertising को भी झटका दिया। IPL जैसे क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान फैंटेसी गेमिंग और बेटिंग ऐप्स करोड़ों का विज्ञापन खर्च करते थे- अब यह दरवाजा बंद हो चुका है।

डिजिटल स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा- यह बहस खत्म नहीं हुई

ऐप बैन के मुद्दे पर दो पक्ष हमेशा से आमने-सामने रहे हैं।

सरकार का पक्ष: राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा संप्रभुता और नागरिक संरक्षण सर्वोपरि है। जब विदेशी सर्वर पर करोड़ों भारतीयों का डेटा जा रहा हो, जब ऐप्स आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल हों, तो कार्रवाई अनिवार्य है।

आलोचकों का पक्ष: धारा 69A की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। बैन के आदेश गोपनीय रखे जाते हैं। यूजर्स और डेवलपर्स को कोई स्पष्टीकरण नहीं मिलता। 3,000 ऐप्स को एक साथ बैन करना और उसकी वजह न बताना- यह चिंताजनक है। Access Now जैसी डिजिटल अधिकार संस्थाओं ने चेताया है कि TikTok बैन ने भारत में सरकारी सेंसरशिप को बढ़ावा दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने Shreya Singhal मामले में धारा 69A को वैध माना था लेकिन गोपनीयता की आलोचना भी की थी। Shein जैसे ऐप्स को Reliance के साथ साझेदारी में वापसी की इजाजत मिली, लेकिन हजारों छोटे ऐप्स बिना स्पष्टीकरण बंद पड़े हैं- यह असमानता भी सवाल उठाती है।

भारतीय ऐप इकोसिस्टम- जीत या हार?

जब-जब चीनी ऐप्स बैन हुए, "Atmanirbhar App Ecosystem" का नारा बुलंद हुआ। लेकिन हकीकत क्या है?

भारतीय ऐप्स की कहानी मिली-जुली रही। Moj और Josh ने तेज शुरुआत की लेकिन लंबे समय में Instagram और YouTube के आगे टिक नहीं पाए। Koo- जिसे Twitter का भारतीय विकल्प कहा जाता था- 2023 में बंद हो गया। Chingari, Roposo जैसे ऐप्स हाशिए पर हैं।

दूसरी तरफ, सरकारी ऐप्स ने जरूर अच्छा प्रदर्शन किया- DigiLocker, BHIM, CoWIN, ONDC जैसे प्लेटफॉर्म ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत को मजबूत किया।

असली सवाल यह है: TikTok के बैन से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ? Meta और Google को- दोनों अमेरिकी कंपनियां भारत में और बड़ी हो गईं। "Atmanirbhar" के नाम पर खाली जगह भरी एक और विदेशी Big Tech ने।

क्या भारत डिजिटल संप्रभुता का नया मॉडल बना रहा है?

2020 से 2026 के बीच भारत ने जो डिजिटल नीति अपनाई है, वह दुनिया में अपनी तरह का मॉडल है। चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध, फर्जी लोन ऐप्स के खिलाफ कार्रवाई, बेटिंग इंडस्ट्री को कानून से बांधना, भू-राजनीतिक तनाव के जवाब में हजारों ऐप्स ब्लॉक करना- यह सब मिलकर एक ऐसे भारत की तस्वीर बनाते हैं जो अपने डिजिटल स्पेस को भी संप्रभु क्षेत्र मानता है।

लेकिन इस मॉडल की सफलता के लिए जरूरी है पारदर्शिता- कि बैन क्यों हुआ, किसके कहने पर हुआ, और इसे कैसे चुनौती दी जा सकती है। बिना इसके, "डिजिटल सार्वभौमिता" और "डिजिटल सेंसरशिप" के बीच की रेखा धुंधली पड़ती रहेगी।

भारत का डिजिटल मार्केट 102 करोड़ इंटरनेट यूजर्स का है (सितंबर 2025 तक)। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ऑनलाइन मार्केट है। इसकी सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसकी आजादी भी। 

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दैनिक जागरण डिजिटल में अनिल पांडेय का प्रमोशन, बने मैनेजिंग एडिटर

दो दशक से अधिक के पत्रकारिता अनुभव वाले अनिल पांडेय की प्रिंट और डिजिटल मीडिया दोनों क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 15 May, 2026
Last Modified:
Friday, 15 May, 2026
Anil Pandey JNM

जागरण समूह की डिजिटल कंपनी 'दैनिक जागरण डिजिटल' (Jagran New Media) ने वरिष्ठ पत्रकार अनिल पांडेय को हाल ही में प्रमोशन का तोहफा देते हुए मैनेजिंग एडिटर के पद पर पदोन्नत किया है। इससे पहले वे एग्जिक्यूटिव एडिटर के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

दो दशक से अधिक के पत्रकारिता अनुभव वाले अनिल पांडेय की प्रिंट और डिजिटल मीडिया दोनों क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है। डिजिटल न्यूजरूम मैनेजमेंट, कंटेंट स्ट्रैटेजी, ऑडियंस ग्रोथ, ऑडियो-विजुअल स्ट्रैटेजी, टीम बिल्डिंग और प्लेटफॉर्म डेवलपमेंट में उन्हें खास विशेषज्ञता हासिल है।

वर्तमान में वह नेटवर्क के फ्लैगशिप डिजिटल प्लेटफॉर्म jagran.com के साथ-साथ naidunia.com, punjabijagran.com, inextlive.com, thedailyjagran.com, gujaratijagran.com, marathijagran.com, onlymyhealth.com, herzindagi.com और जागरण समूह के यूट्यूब चैनल्स जैसे विभिन्न लैंग्वेज और नॉन-न्यूज वर्टिकल्स का नेतृत्व कर रहे हैं।

अनिल पांडेय ‘जागरण न्यू मीडिया’ के साथ नवंबर 2021 से जुड़े हुए हैं। दैनिक जागरण से पहले वे ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ के पोर्टल ‘जनसत्ता‘, और अमर उजाला डिजिटल में लंबे समय तक कार्य कर चुके हैं। यहां उन्होंने पूरी वेबसाइट के साथ-साथ डिजिटल हाइपरलोकल नेटवर्क को नए सिरे से स्ट्रक्चर एवं अलाइन किया था।

डिजिटल मीडिया में लगभग दो दशक से कार्यरत अनिल पांडेय ‘अमर उजाला‘ डिजिटल से पहले ‘जागरण न्यू मीडिया‘ की वेबसाइट ‘नईदुनिया डॉट कॉम‘ में कार्यरत थे। उनके नेतृत्व में ही इस वेबसाइट को बनाया गया था। इससे पहले वह ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ डिजिटल, ‘दैनिक भास्कर अखबार और डिजिटल‘ एवं ‘वेबदुनिया डॉट कॉम‘ में भी रह चुके हैं।

अनिल पांडेय को बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर समाचार4मीडिया की ओर से ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।

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यूट्यूब ने लॉन्च किए AI और कनेक्टेड टीवी आधारित नए 'Ad Tools'

YouTube ने Brandcast 2026 में नए विज्ञापन टूल्स लॉन्च किए हैं। इनमें AI आधारित Sponsorships, Connected TV Shopping और Affiliate Partnerships शामिल हैं।

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Published - Friday, 15 May, 2026
Last Modified:
Friday, 15 May, 2026
YouTube Brandcast 2026

YouTube ने Brandcast 2026 इवेंट में विज्ञापनदाताओं के लिए कई नए AI और कॉमर्स आधारित एड प्रोडक्ट्स लॉन्च किए हैं। कंपनी का कहना है कि अब ब्रांड्स को ब्रांड बिल्डिंग और परफॉर्मेंस मार्केटिंग के बीच चुनाव करने की जरूरत नहीं होगी। सबसे बड़ा ऐलान “Buy with Google Pay” फीचर का रहा। इसके जरिए Connected TV पर विज्ञापन देखते समय यूजर्स सिर्फ दो क्लिक में सीधे खरीदारी कर सकेंगे।

YouTube का उद्देश्य टीवी विज्ञापनों को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय उन्हें शॉपिंग आधारित अनुभव में बदलना है। कंपनी ने “Custom Sponsorships” नामक AI आधारित टूल भी पेश किया है। यह फीचर ब्रांड्स के लिए ट्रेंडिंग और सांस्कृतिक पलों से जुड़े वीडियो को ऑटोमैटिक तरीके से सामने लाएगा। इसके अलावा YouTube ने Affiliate Partnerships Boost लॉन्च किया है, जिससे ब्रांड्स उन क्रिएटर्स के ऑर्गेनिक कंटेंट को प्रमोट कर सकेंगे, जहां उनके प्रोडक्ट पहले से टैग हैं।

क्रिएटर्स YouTube Shopping affiliate links के जरिए कमाई भी कर पाएंगे। वीडियो विज्ञापन निर्माण को आसान बनाने के लिए कंपनी ने Multimodal Video Creation टूल पेश किया है। यह Gemini, Veo और Nano Banana जैसे Google AI मॉडल्स की मदद से कुछ टेक्स्ट प्रॉम्प्ट्स के जरिए पूरा वीडियो तैयार करेगा।

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दिल्ली हाई कोर्ट ने '4PM' यूट्यूब चैनल को दी राहत

दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूब चैनल “4PM” को बड़ी राहत देते हुए उसके चैनल को अस्थायी तौर पर फिर से बहाल करने का आदेश दिया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 13 May, 2026
Last Modified:
Wednesday, 13 May, 2026
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दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूब चैनल “4PM” को बड़ी राहत देते हुए उसके चैनल को अस्थायी तौर पर फिर से बहाल करने का आदेश दिया है। करीब दो महीने पहले केंद्र सरकार ने इस चैनल को “राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था” से जुड़ी चिंताओं का हवाला देते हुए ब्लॉक कर दिया था।

यह आदेश दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने 5 मई को सुनवाई के दौरान दिया। यह याचिका संजय शर्मा और एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से केंद्र सरकार और यूट्यूब के खिलाफ दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि सरकार ने न तो चैनल ब्लॉक करने के कारण साफ तौर पर बताए और न ही ब्लॉकिंग ऑर्डर की कॉपी उपलब्ध कराई। साथ ही इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) के अंतिम आदेश की जानकारी भी नहीं दी गई। याचिकाकर्ताओं ने IDC की कार्यवाही को भी पारदर्शी नहीं बताया।

हालांकि अदालत ने चैनल को राहत देते हुए यह भी कहा कि 26 ऐसे वीडियो, जिन्हें सरकार ने “आपत्तिजनक” बताया है, फिलहाल ब्लॉक ही रहेंगे।

कोर्ट ने मामले में नई IDC सुनवाई कराने का निर्देश भी दिया है। अदालत ने कहा कि कमेटी साफ तौर पर बताए कि चैनल पर कौन-सा कंटेंट आपत्तिजनक माना जा रहा है। साथ ही यदि याचिकाकर्ता अपने कंटेंट का पक्ष रखना चाहते हैं तो उन्हें पर्याप्त समय दिया जाए।

दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को यह छूट भी दी कि वह चैनल की निगरानी जारी रख सकता है और भविष्य में किसी भी कथित आपत्तिजनक सामग्री पर कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि IDC की सिफारिशें और मंत्रालय के अंतिम फैसले की जानकारी याचिकाकर्ताओं को दी जाए।

केंद्र सरकार ने अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि 4PM चैनल को आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत ब्लॉक किया गया था। सरकार के मुताबिक इस प्रक्रिया की शुरुआत Ministry of External Affairs और एक सुरक्षा एजेंसी के समन्वय से हुई थी, जिसके बाद इलेक्ट्रॉनि एवं सूचना प्रौद्योगिक मंत्रालय ने ब्लॉकिंग निर्देश जारी किए।

सरकार का आरोप है कि चैनल “डिजिटल लॉबिंग” के जरिए ऑनलाइन कंटेंट के माध्यम से जनमत और नीति से जुड़े मुद्दों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था। केंद्र ने यह भी कहा कि चैनल ने पहलगाम आतंकी हमले, मणिपुर की स्थिति और भारत की विदेश नीति व सैन्य कार्रवाई को लेकर भ्रामक और साजिश जैसे नैरेटिव फैलाए।

सरकार ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि यूट्यूब का विज्ञापन और रिकमेंडेशन सिस्टम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देता है जो लोगों को अलग-अलग विचारधाराओं के “इको चैंबर” में ले जाता है और इससे संगठित प्रभाव अभियान चलाने में मदद मिल सकती है।

वहीं 4PM के एडिटर-इन-चीफ संजय शर्मा ने पहले भी आरोप लगाया था कि उनकी संस्था को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा था कि उन पर आपराधिक मानहानि के केस, इनकम टैक्स विभाग, आर्थिक अपराध शाखा और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियों की जांच हुई, यहां तक कि उनके दफ्तर पर हमला भी किया गया।

संजय शर्मा ने यह भी दावा किया कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनका यूट्यूब चैनल कुछ समय के लिए हटाया गया था, लेकिन बाद में उसे बहाल कर दिया गया। पहलगाम हमले के बाद सरकार ने फिर चैनल ब्लॉक करने का आदेश दिया था और उन्हें “एंटी-नेशनल” बताया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके बाद सरकार ने अपना आदेश वापस ले लिया।

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