भारत में विज्ञापन क्षेत्र तेजी से बदल रहा है, जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। पारंपरिक मीडिया जैसे टेलीविजन, प्रिंट और रेडियो पर विज्ञापन खर्च में गिरावट दर्ज की जा रही है
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जागृति वर्मा, प्रिंसिपल कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
भारत में विज्ञापन क्षेत्र तेजी से बदल रहा है, जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। पारंपरिक मीडिया जैसे टेलीविजन, प्रिंट और रेडियो पर विज्ञापन खर्च में गिरावट दर्ज की जा रही है, जबकि डिजिटल विज्ञापन का बजट लगातार बढ़ रहा है।
dentsu-e4m डिजिटल विज्ञापन रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में टेलीविजन विज्ञापन खर्च (AdEx) में 5.95% की गिरावट आई, प्रिंट में 6.02% और रेडियो में 7.44% की कमी देखी गई। इसके विपरीत, डिजिटल विज्ञापन में 21.05% की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की गई।
डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में लगातार हो रहे सुधार और तकनीकी विकास डिजिटल विज्ञापन के विस्तार को गति दे रहे हैं। यही कारण है कि ओटीटी, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन भुगतान, सोशल मीडिया, गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स एप्लिकेशन का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। उपभोक्ताओं के बीच डिजिटल मीडिया सबसे अधिक पहुंच वाला, भरोसेमंद और प्रभावी माध्यम बन गया है, जिससे विभिन्न ब्रांड अपने वार्षिक विज्ञापन बजट का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर खर्च कर रहे हैं।
पारंपरिक मीडिया का विज्ञापन बाजार में घटता दबदबा
2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 और 2024 के बीच टेलीविजन का बाजार हिस्सेदारी 32% से घटकर 28% हो गई और 2025 में इसके 24% तक गिरने की संभावना है। रियल एस्टेट सेक्टर ने 2024 में अपने कुल विज्ञापन बजट का 49% टेलीविजन पर खर्च किया, जो 2023 में 54% था। एफएमसीजी सेक्टर ने 2024 में टेलीविजन पर 40% बजट खर्च किया, जबकि 2023 में यह आंकड़ा 47% था। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं (Consumer Durables) के विज्ञापन खर्च में भी गिरावट आई, जो 2023 में 44% से घटकर 2024 में 37% रह गया।
प्रिंट मीडिया भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं रहा। 2024 के अंत तक इसकी हिस्सेदारी 20% से घटकर 17% हो गई, और 2025 तक इसके 15% तक पहुंचने की संभावना है। सरकारी विज्ञापनों का 2024 में 73% बजट प्रिंट मीडिया पर खर्च हुआ, जो 2023 में 79% था। खुदरा क्षेत्र (Retail) ने भी 2023 में 58% से घटाकर 2024 में 52% विज्ञापन खर्च प्रिंट पर किया। हालांकि, शिक्षा क्षेत्र (Education) ने प्रिंट विज्ञापन का बजट 2023 के 56% से बढ़ाकर 2024 में 60% कर दिया।
रेडियो की स्थिति भी कमजोर होती जा रही है। 2024 में इसकी हिस्सेदारी 2% बनी रही, लेकिन 2025 के अंत तक इसके 1% तक गिरने की उम्मीद है। 2023 में पर्यटन और खुदरा क्षेत्रों ने अपने विज्ञापन बजट का 7% रेडियो पर खर्च किया था, जो 2024 में क्रमशः 5% और 6% तक गिर गया। मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र ने 2023 की तुलना में 2024 में भी रेडियो पर 5% विज्ञापन बजट खर्च किया।
डिजिटल विज्ञापन की बढ़ती मांग
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि आने वाले वर्षों में विज्ञापन का फोकस डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ता रहेगा। यह बदलाव उपभोक्ताओं की बदलती आदतों, तकनीकी प्रगति और डेटा-ड्रिवन तथा व्यक्तिगत विज्ञापन समाधानों की बढ़ती मांग के कारण हो रहा है। इंटरैक्टिव और डेटा-ड्रिवन प्लेटफॉर्म पर ध्यान केंद्रित करने वाले विज्ञापनदाता डिजिटल माध्यमों को प्राथमिकता दे रहे हैं। पारंपरिक मीडिया को इस बदलाव से मुकाबला करने के लिए नवाचार को तेज करना होगा ताकि वे विज्ञापन बजट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकें।
dentsu इंडिया के एवीपी – कंज्यूमर इनसाइट्स, अभीक बिस्वास के अनुसार, डिजिटल मीडिया का तेजी से विस्तार विज्ञापनदाताओं के लिए डिजिटल चैनलों को प्राथमिकता देने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है। वह कहते हैं, "प्रिंट और रेडियो की स्थिति कमजोर हो रही है क्योंकि वे वास्तविक समय में जुड़ाव (Engagement) और टार्गेटेड विज्ञापन देने में सक्षम नहीं हैं।"
पारंपरिक मीडिया में गिरावट के कारण
उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव – डिजिटल मीडिया की ओर बढ़ता झुकाव मुख्य रूप से उपभोक्ताओं की बदलती आदतों के कारण हो रहा है, खासकर मिलेनियल्स और जेनरेशन Z के बीच, जो सोशल मीडिया, ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म और ओटीटी सेवाओं के प्रति अधिक आकर्षित हैं। डिजिटल माध्यमों की इंटरैक्टिव और व्यक्तिगत प्रकृति उपभोक्ताओं और विज्ञापनदाताओं को पारंपरिक मीडिया से दूर कर रही है।
तकनीकी विकास – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित टूल्स, प्रोग्रामेटिक बाइंग और रियल-टाइम ऑप्टिमाइजेशन डिजिटल विज्ञापन की वृद्धि के प्रमुख कारक हैं। रिटेल मीडिया 2.0 और यूनिफाइड कॉमर्स जैसी नवीन तकनीकों के माध्यम से ऑनलाइन और ऑफलाइन अनुभवों का एकीकरण हो रहा है, जिससे ब्रांड्स को अधिक प्रभावी समाधान मिल रहे हैं।
मापनीयता और निवेश पर रिटर्न (ROI) – डिजिटल विज्ञापन प्लेटफॉर्म बेहतर एनालिटिक्स और सटीक ROI ट्रैकिंग प्रदान करते हैं, जो डेटा-संचालित मार्केटिंग के लिए आवश्यक है। विज्ञापनदाता डिजिटल माध्यमों की ओर इसलिए भी शिफ्ट हो रहे हैं क्योंकि ये प्लेटफॉर्म सटीक प्रदर्शन मापने और रणनीति को वास्तविक समय में समायोजित करने की सुविधा देते हैं।
डिजिटल विज्ञापन की यह बढ़ती ताकत आने वाले वर्षों में भारत के विज्ञापन उद्योग के परिदृश्य को पूरी तरह से बदल सकती है।
साप्ताहिक BARC रेटिंग उपलब्ध नहीं होने के बावजूद इस फेस्टिव सीजन में टेलीविजन स्क्रीन पर विज्ञापनों की कमी होने की संभावना कम है। हालांकि, इसका असर ब्रॉडकास्टर्स की कमाई पर पड़ सकता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तसमयी लाहा रॉय, एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
साप्ताहिक BARC रेटिंग उपलब्ध नहीं होने के बावजूद इस फेस्टिव सीजन में टेलीविजन स्क्रीन पर विज्ञापनों की कमी होने की संभावना कम है। हालांकि, इसका असर ब्रॉडकास्टर्स की कमाई पर पड़ सकता है। दरअसल, रेटिंग की कमी के कारण उन्हें विज्ञापन के हर सेकंड के लिए मिलने वाला वह प्रीमियम नहीं मिल पाएगा, जो उन्हें आमतौर पर मिलता रहा है।
रेटिंग ब्लैकआउट को दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान विज्ञापनदाताओं, मीडिया बायर्स और इंडस्ट्री के अनुभवी लोगों से हुई बातचीत से संकेत मिलता है कि टेलीविजन विज्ञापन बाजार अभी भी चल रहा है, लेकिन इसकी पूरी अर्थव्यवस्था बदल गई है।
एक्सचेंज4मीडिया के साथ साझा किए गए इंडस्ट्री अनुमानों के मुताबिक, बड़े चैनल अपने विज्ञापन इन्वेंट्री को लगभग पूरी तरह बेचने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। हालांकि, चैनलों की रैंकिंग में नीचे जाने के साथ विज्ञापन इन्वेंट्री की बिक्री यानी sell-through लगातार कमजोर होती जा रही है। प्रीमियम प्रॉपर्टीज को भी अभी विज्ञापनदाता मिल रहे हैं। इसलिए अब सवाल यह नहीं रह गया है कि फेस्टिव सीजन की विज्ञापन इन्वेंट्री बिकेगी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि उसे किस कीमत पर बेचा जाएगा।
dentsu X की चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर सुजाता द्विबेदी ने कहा कि इस फेस्टिव सीजन में चुनौती विज्ञापनदाताओं को ढूंढने की कम और बिकने वाले विज्ञापन के हर सेकंड की वैल्यू बचाने की ज्यादा है।
उन्होंने कहा, “BARC ब्लैकआउट की वजह से फेस्टिव इन्वेंट्री पूरी तरह बिके बिना रह जाने की संभावना नहीं है, लेकिन इसका ब्रॉडकास्टर्स की यील्ड पर काफी असर पड़ेगा। आमतौर पर फेस्टिव सीजन में टेलीविजन नेटवर्क को विज्ञापन की मांग में 20–25% की बढ़ोतरी देखने को मिलती है और वे अपनी सालाना कमाई का एक बड़ा हिस्सा इसी दौरान हासिल करते हैं। इस साल ब्रॉडकास्टर्स को काफी ज्यादा बातचीत करनी पड़ रही है। उन्हें रेटिंग के आधार पर तय कीमतों पर निर्भर रहने के बजाय अतिरिक्त इन्वेंट्री, स्पॉन्सरशिप, इंटीग्रेशन और दूसरी कमर्शियल सुविधाएं देनी पड़ रही हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “मेरा अनुमान है कि ब्रॉडकास्टर्स अपनी अनुमानित फेस्टिव इन्वेंट्री का करीब 75–80% बेच सकते हैं, लेकिन इस स्तर तक पहुंचना भी आसान नहीं रहा है। विज्ञापनदाताओं को टेलीविजन पर बनाए रखने के लिए उन्हें काफी ज्यादा मेहनत करनी पड़ी है। इसका असर सभी चैनलों पर एक जैसा नहीं होगा। बड़े नेटवर्क और प्रमुख चैनल, जिनकी ऑडियंस डिलीवरी ऐतिहासिक रूप से स्थिर रही है, अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेंगे क्योंकि विज्ञदाताओं को उनकी पहुंच पर भरोसा है। वहीं छोटे, निचले स्तर के और रीजनल चैनलों पर ज्यादा दबाव पड़ने की संभावना है, क्योंकि उन्हें कीमत तय करने के लिए नई रेटिंग की ज्यादा जरूरत होती है।”
फेस्टिव टीवी की यील्ड की समस्या
यील्ड पर यह दबाव ऐसे समय में आया है, जब टेलीविजन का विज्ञापन बाजार पहले से ही बदलाव के दौर से गुजर रहा है। Pitch Madison Advertising Report 2026 के मुताबिक, Linear TV AdEx 2024 के 34,453 करोड़ रुपये से 2025 में 5% घटकर 32,855 करोड़ रुपये रह गया। यानी इसमें 1,598 करोड़ रुपये की सीधी गिरावट आई। वहीं, विज्ञापन की मात्रा यानी advertising volumes में इससे भी ज्यादा 10% की गिरावट दर्ज की गई।
टेलीविजन विज्ञापन में अभी भी 46% हिस्सेदारी रखने वाले FMCG सेक्टर का विज्ञापन खर्च 4% घटकर 15,183 करोड़ रुपये रह गया। वहीं, ई-कॉमर्स का खर्च 4% घटकर 5,125 करोड़ रुपये रहा। Consumer Durables में 8% और Telecom में 10% की गिरावट आई।
रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञापन खर्च में आई गिरावट और विज्ञापन वॉल्यूम में आई ज्यादा गिरावट के बीच का अंतर इस वजह से रहा कि औसत यील्ड में सुधार हुआ। विज्ञापनदाताओं ने अपना खर्च बेहतर और प्रीमियम इन्वेंट्री पर केंद्रित किया। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि प्रीमियम GEC प्रॉपर्टीज ने अपनी स्थिति बनाए रखी, जबकि सामान्य GEC इन्वेंट्री पर दबाव आया।
हालांकि, बड़े और खास टीवी शो अभी भी अपनी स्थिति बनाए हुए दिखाई दे रहे हैं। मौजूदा इंडस्ट्री अनुमानों के मुताबिक, KBC की कीमत करीब 4.5 लाख रुपये प्रति 10 सेकंड, India’s Best Dancer की करीब 4 लाख रुपये और Bigg Boss की करीब 5 लाख रुपये प्रति 10 सेकंड है।
इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि ये दरें पिछले सीजन की समान प्रीमियम इन्वेंट्री के मुकाबले मोटे तौर पर बराबर हैं। इससे संकेत मिलता है कि सामान्य विज्ञापन इन्वेंट्री के लिए बातचीत भले ही कठिन हो गई हो, लेकिन टेलीविजन की सबसे बड़ी प्रॉपर्टीज अभी तक अपनी कीमत तय करने की ताकत बचाए हुए हैं।
ऊपर के चैनल बिक चुके, नीचे वाले चैनलों पर दबाव
हालांकि, टेलीविजन की पूरी विज्ञापन इन्वेंट्री पर इसका असर एक जैसा नहीं पड़ रहा है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती फेस्टिव खरीदारी में प्रीमियम प्रॉपर्टीज और सामान्य इन्वेंट्री के बीच अंतर तेजी से दिखाई दे रहा है। इसी तरह, सबसे बड़े चैनलों और टेलीविजन की रैंकिंग में नीचे आने वाले चैनलों के बीच भी अंतर बढ़ रहा है।
आखिरकार कितनी इन्वेंट्री बिकेगी, इसको लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन इंडस्ट्री के अधिकारियों की इस बात पर काफी हद तक सहमति है कि सबसे ज्यादा दबाव सामान्य इन्वेंट्री और नीचे के चैनलों पर दिखाई दे रहा है।
एक वरिष्ठ मीडिया बायर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि नई रेटिंग उपलब्ध नहीं होने के बावजूद प्रीमियम प्रॉपर्टीज में विज्ञापनदाताओं की दिलचस्पी बनी हुई है। हालांकि, सामान्य इन्वेंट्री के लिए बातचीत काफी मुश्किल हो गई है।
उन्होंने कहा, “प्रीमियम इन्वेंट्री की मांग अभी भी काफी ज्यादा है। उदाहरण के लिए KBC के पास 27 स्पॉन्सर्स हैं। असली दबाव सामान्य इन्वेंट्री पर है, जहां आमतौर पर रेटिंग GRPs, CPRPs और कीमत तय करने के बेंचमार्क को स्थापित करने में मदद करती है। टॉप 50 चैनलों ने अपनी इन्वेंट्री पहले ही बेच दी है, मिड-टियर चैनल करीब 80% पर हैं, जबकि टेल यानी निचले स्तर के चैनल लगभग 65% पर हैं। आखिरकार इन्वेंट्री पूरी तरह बिक सकती है, लेकिन यील्ड कम होगी क्योंकि विज्ञापनदाता प्रभावी दरों और अतिरिक्त वैल्यू को लेकर ज्यादा बातचीत कर रहे हैं।”
इससे जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इन्वेंट्री संकट से ज्यादा प्राइसिंग की अलग-अलग सीढ़ियों की है। जिन प्रॉपर्टीज और चैनलों की पहुंच विज्ञापनदाता पहले से जानते हैं, वे अपने पुराने प्रदर्शन के आधार पर मांग बनाए रख सकते हैं। लेकिन जैसे-जैसे चैनलों की रैंकिंग नीचे जाती है, नई रेटिंग की कमी ब्रॉडकास्टर्स की डिलीवरी साबित करने की क्षमता को कमजोर करती है और इसी वजह से उनके लिए अपनी कीमत बचाना मुश्किल हो जाता है।
Rediffusion Brand Solutions के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. संदीप गोयल के मुताबिक, ब्लैकआउट ने टीवी मार्केट को समझने की विज्ञापनदाताओं की क्षमता को खत्म नहीं किया है, लेकिन इसने बातचीत के आधार को बदल दिया है और छोटे चैनलों की घटती bargaining power को उजागर किया है।
उन्होंने कहा, “ईमानदारी से कहूं तो ज्यादातर खरीदारों और क्लाइंट्स को मोटे तौर पर पता है कि अलग-अलग चैनल और उनका कंटेंट किस तरह और कहां खड़ा होता है। इसके लिए पर्याप्त मार्केट और ट्रेड फीडबैक मौजूद है। इसलिए CPRP डील्स अब वॉल्यूम डील्स में बदल जाती हैं, जहां जब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं होता, तब तक काम चलता रहता है। फेस्टिव सीजन अब पहले जैसा बड़ा पीक नहीं रहा, क्योंकि क्लाइंट्स अब टीवी के मुकाबले डिजिटल में ज्यादा निवेश कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि चैनलों के पास अब पहले जैसी जबरदस्त bargaining power नहीं रही। बड़े चैनल अभी भी अपनी स्थिति बनाए हुए हैं, जबकि छोटे चैनलों पर दबाव बढ़ रहा है।”
गोयल जिस बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं, वह विज्ञापन बाजार के व्यापक आंकड़ों में भी दिखाई देता है।
Pitch Madison की विस्तारित परिभाषा के अनुसार, भारत का कुल विज्ञापन बाजार 2025 में 1.55 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसमें डिजिटल की हिस्सेदारी 60% रही। इसी साल CTV विज्ञापन दोगुना होकर अनुमानित 6,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और 2026 में इसके 8,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
इसलिए BARC ब्लैकआउट ऐसे समय आया है, जब टेलीविजन खरीदारों के पास पिछली रेटिंग बाधाओं के मुकाबले अब कहीं ज्यादा ऐसे वीडियो विकल्प मौजूद हैं, जिन्हें मापा और ट्रैक किया जा सकता है।
ब्रैंड्स ने टीवी से मुंह नहीं मोड़ा
हालांकि, विज्ञापनदाताओं के लिए तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। नई रेटिंग उपलब्ध नहीं होने से बातचीत की टेबल पर उनकी स्थिति जरूर मजबूत हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ब्रैंड्स ने टेलीविजन के लिए तय अपना विज्ञापन खर्च वापस लेना शुरू कर दिया है।
पुराने BARC आंकड़े, चैनलों का पिछला प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर पहुंच की लगातार जरूरत टीवी को अभी भी फेस्टिव मीडिया प्लान का हिस्सा बनाए हुए हैं। हालांकि, ब्रैंड्स अब टीवी, डिजिटल और CTV के बीच अपने बजट का बंटवारा पहले से ज्यादा लचीला रख रहे हैं।
Dabur India के Vice President, Head of Media और Head of Brand Activations राजीव दुबे ने कहा, “रेटिंग ब्लैकआउट कुछ अनिश्चितता जरूर पैदा करता है, लेकिन इसके कारण टीवी पर होने वाले खर्च को काफी हद तक रोकना सही नहीं होगा। पुराने BARC आंकड़े, चैनलों का प्रदर्शन और पिछले फेस्टिव सीजन के ट्रेंड अभी भी प्लानिंग के लिए मजबूत आधार देते हैं। हालांकि, टीवी, डिजिटल और CTV के मिश्रण को ज्यादा डायनेमिक रखा जाएगा।”
हालांकि, अगर ब्लैकआउट लंबे समय तक जारी रहता है तो इस भरोसे को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। नई माप उपलब्ध नहीं होने से ऐसे प्लेटफॉर्म को अतिरिक्त फायदा मिलता है, जो ज्यादा निश्चित तरीके से टारगेटिंग और attribution की सुविधा देते हैं।
उन्होंने आगे कहा, “नई रेटिंग के अभाव में कीमत, इन्वेंट्री की फ्लेक्सिबिलिटी और डिलीवरी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर BARC ब्लैकआउट जारी रहता है, तो टीवी इंडस्ट्री को CTV जैसे ज्यादा deterministic mediums से लगातार मौके गंवाने पड़ेंगे, जहां ऑडियंस टारगेटिंग और मापन ज्यादा भरोसा देते हैं।”
टीवी से दूर जाने का हर बदलाव BARC की वजह से नहीं
हालांकि, BARC ब्लैकआउट की वजह से मापे जा सकने वाले प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, लेकिन विज्ञापनदाता यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि Linear Television से होने वाले हर बदलाव के लिए BARC रेटिंग की कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कई ब्रैंड्स के लिए मीडिया मिक्स में बदलाव पहले ही शुरू हो चुका था। इसकी वजह कैंपेन के बदलते उद्देश्य, ऑडियंस के बदलते व्यवहार और ज्यादा टारगेटेड कम्युनिकेशन की जरूरत थी।
Crompton Greaves Consumer Electricals के CMO तन्मय प्रुस्टी ने कहा कि कंपनी का मीडिया बजट BARC रेटिंग की उपलब्धता से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस मार्केटिंग समस्या को हल करना चाहती है।
उन्होंने कहा, “हमारे मीडिया मिक्स से जुड़े फैसले खास तौर पर BARC ब्लैकआउट से प्रभावित नहीं हैं। Crompton पहले से ही कई तरह के माध्यमों को तलाश रहा था, क्योंकि अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी के लिए अलग-अलग और कई बार जियो-टारगेटेड समाधान की जरूरत होती है। इससे डिजिटल और Connected TV को लेकर बातचीत बढ़ी है। साथ ही, हमने प्रिंट और आउटडोर पर भी अपना फोकस बढ़ाया है।”
उन्होंने आगे कहा, “इसलिए अगर टीवी की हिस्सेदारी ज्यादा माध्यमों में बंट रही है, तो मैं इसे जरूरी तौर पर BARC की वजह नहीं मानूंगा। यह ज्यादा इस बात से जुड़ा है कि किसी कैंपेन को किस मार्केटिंग समस्या का समाधान करना है और ब्रैंड को अलग पहचान दिलाने की जरूरत क्या है। बड़ा बदलाव एक ज्यादा diversified media mix की ओर है, न कि सिर्फ ratings blackout की प्रतिक्रिया के तौर पर।”
यह अंतर महत्वपूर्ण है। रेटिंग ब्लैकआउट ने टेलीविजन की मूल समस्या पैदा नहीं की है। विज्ञापन बजट पहले से ही अलग-अलग माध्यमों में बंट रहे थे, डिजिटल टेलीविजन से आगे निकल चुका था और CTV तेजी से बढ़ रहा था। कम से कम अभी तक ब्लैकआउट ने विज्ञापनदाताओं को Linear TV से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए मजबूर नहीं किया है।
हालांकि, ब्लैकआउट ने ठीक उस समय टेलीविजन की साझा माप व्यवस्था को हटा दिया है, जब ब्रॉडकास्टर्स आम तौर पर फेस्टिव सीजन में अपनी सबसे मजबूत कीमत वसूलने की कोशिश करते हैं। बड़े चैनलों और प्रमुख प्रॉपर्टीज को उनकी पुरानी पहुंच और विज्ञापनदाताओं के भरोसे से कुछ सुरक्षा मिल रही है। लेकिन चैनलों की रैंकिंग में नीचे जाने के साथ यह सुरक्षा काफी कमजोर हो जाती है।
इसलिए इस फेस्टिव सीजन में असली परीक्षा यह नहीं होगी कि टेलीविजन कितने विज्ञापन सेकंड बेच पाता है, बल्कि यह होगी कि उन विज्ञापन सेकंड से कितनी कमाई होती है और उन्हें बेचने के लिए ब्रॉडकास्टर्स को कितनी अतिरिक्त चीजें मुफ्त में या कम कीमत पर देनी पड़ती हैं।
कनेक्टेड टेलीविजन (CTV) भारत के विज्ञापन उद्योग का नया ग्रोथ एरिया बन रहा है। अब इसका इस्तेमाल सिर्फ बड़े ब्रांड नहीं, बल्कि छोटे और मझोले कारोबार यानी MSMEs भी तेजी से कर रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
कनेक्टेड टेलीविजन (CTV) भारत के विज्ञापन उद्योग के लिए अगला बड़ा ग्रोथ एरिया बनकर उभर रहा है। लेकिन अब इसका फायदा सिर्फ बड़े राष्ट्रीय विज्ञापनदाताओं तक सीमित नहीं है। छोटे और मझोले कारोबार यानी MSMEs भी तेजी से CTV का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि CTV उन्हें टीवी की पहुंच और असर के साथ डिजिटल विज्ञापन जैसी टारगेटिंग, बजट में लचीलापन और नतीजों को मापने की सुविधा देता है।
यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब CTV तेजी से देश के बड़े शहरों से बाहर भी पहुंच बना रहा है। WPP Media और The Trade Desk ने Ormax Media के साथ मिलकर एक नई रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक भारत में CTV दर्शकों की संख्या 20.7 करोड़ तक पहुंच गई है और ये दर्शक 6.2 से 6.5 करोड़ घरों में हैं। 2022 के मुकाबले CTV दर्शकों की संख्या करीब तीन गुना बढ़ी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में ग्रामीण भारत में CTV देखने वालों की संख्या 110% बढ़ी है। वहीं छोटे शहरों में 55%, मिनी-मेट्रो शहरों में 46% और मेट्रो शहरों में 21% की बढ़ोतरी हुई है। MSMEs के लिए यह विस्तार काफी अहम है, क्योंकि CTV अब पारंपरिक टीवी विज्ञापन की बजाय परफॉर्मेंस आधारित डिजिटल मीडिया जैसा नजर आने लगा है।
सेल्स स्ट्रैटेजिस्ट और कनेक्टेड टेलीविजन एक्सपर्ट विशाल खन्ना ने कहा, “दो साल पहले किसी MSME के लिए टेलीविजन का मतलब 50 लाख रुपये का चेक और ऐसा सेल्स रिप्रेजेंटेटिव होता था, जो दोबारा फोन नहीं करता था। आज इसका मतलब एक डैशबोर्ड है।”
उन्होंने कहा, “JioHotstar, YouTube CTV और Samsung Ads पर सेल्फ-सर्व एक्सेस ने टेलीविजन के साथ वही किया है जो UPI ने पेमेंट के साथ किया था- बीच के गेटकीपर को हटा दिया, लेकिन प्रोडक्ट को नहीं।”
विशाल खन्ना के मुताबिक MSMEs अब डिजिटल विज्ञापन की तरह CTV पर भी विज्ञापन खरीद रहे हैं। इसमें जियोग्राफिकल टारगेटिंग, विज्ञापन दिखाने की फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करना, QR कोड और नतीजों के आधार पर माप जैसे तरीके शामिल हैं।
उन्होंने कहा, “MSMEs जिस तरह से अलग तरीके से काम कर रहे हैं, वह काफी कुछ बताता है। वे CTV को उसी तरह खरीद रहे हैं जैसे Meta पर विज्ञापन खरीदते हैं- पिनकोड के हिसाब से जियो-फेंसिंग, विज्ञापन दिखाने की तय फ्रीक्वेंसी, हर क्रिएटिव पर QR कोड और GRPs की बजाय प्रति लीड लागत के आधार पर नतीजों का आकलन।”
विशाल खन्ना के मुताबिक, उदाहरण के तौर पर नासिक की कोई सोलर इंस्टॉलेशन कंपनी या कोयंबटूर का कोई मैट्रेस ब्रैंड अब अपने जिले के घरों को टारगेट करते हुए 15 सेकंड के विज्ञापन चला सकता है और इसके लिए महीने का 1-2 लाख रुपये का बजट रख सकता है।
उन्होंने कहा, “यह टेलीविजन विज्ञापन नहीं है। यह टीवी की पोशाक पहने हुए परफॉर्मेंस मार्केटिंग है।”
MSME विज्ञापन का बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार
इस अवसर को MSME डिजिटल विज्ञापन बाजार का तेजी से बढ़ता आकार भी मजबूत कर रहा है। PMAR 2026 के मुताबिक 2025 में MSME डिजिटल विज्ञापन बाजार 35,814 करोड़ रुपये का था, जो 2024 के मुकाबले 21% ज्यादा है। 2026 में इस सेगमेंट के करीब 20% बढ़कर लगभग 42,976 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
यह रकम पूरे प्रिंट विज्ञापन बाजार से भी ज्यादा है और उभरते डिजिटल वीडियो तथा CTV प्लेटफॉर्म के लिए अतिरिक्त विज्ञापन खर्च की एक बड़ी संभावना को दिखाती है।
यह बदलाव भारत के विज्ञापन बाजार की व्यापक दिशा से भी मेल खाता है, जिसकी पहचान WPP Media के This Year Next Year (TYNY) फोरकास्ट में की गई है। फरवरी 2026 में जारी भारत के पूर्वानुमान में विज्ञापन से होने वाली आय 2026 में 9.7% बढ़कर 2,01,891 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया था। रिपोर्ट में SME के साथ टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम, रियल एस्टेट, ऑटोमोटिव और शिक्षा को विज्ञापन बाजार की ग्रोथ बढ़ाने वाली प्रमुख कैटेगरी में शामिल किया गया था।
इसके बाद WPP Media के जून के मिड-ईयर अपडेट में 2026 में भारत के विज्ञापन बाजार का आकार करीब 2 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया। इसमें डिजिटल अपनाने, ई-कॉमर्स, क्विक कॉमर्स और बड़ी SMB बेस को लंबे समय में ग्रोथ को सपोर्ट करने वाले प्रमुख कारण बताया गया। सोशल और अन्य डिजिटल विज्ञापन के 8.3 अरब डॉलर तक पहुंचने और 13.2% की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया गया।
CTV बाजार के लिए इसका सीधा मतलब है कि जैसे-जैसे SME विज्ञापन बाजार का कुल आकार बढ़ेगा, उस खर्च का एक बड़ा हिस्सा ऐसे टीवी प्लेटफॉर्म की ओर जा सकता है, जहां डिजिटल तरीके से विज्ञापन खरीदने और उसके नतीजों को मापने की सुविधा उपलब्ध है।
CTV अब सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं
WPP Media, The Trade Desk और Ormax की नई रिसर्च यह बताती है कि यह अवसर क्यों लगातार बढ़ रहा है।
अब CTV की पहुंच 20.7 करोड़ भारतीयों तक हो गई है। इनमें से 7 करोड़ दर्शक ग्रामीण भारत में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक CTV पर 80% से ज्यादा व्यूइंग परिवार या अन्य लोगों के साथ होती है। एक औसत CTV इम्प्रेशन 2.5 दर्शकों तक पहुंचता है।
CTV पर प्रीमियम और लंबे समय तक देखे जाने वाले कंटेंट की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक CTV पर होने वाली व्यूइंग में वेब सीरीज की हिस्सेदारी 69%, क्रिकेट की 64% और फिल्मों की 63% है। सप्ताह के दिनों में रात 8 से 10 बजे के प्राइम-टाइम स्लॉट में CTV के 78% यूजर्स बड़ी स्क्रीन पर कंटेंट देखते हैं।
रीजनल और MSME विज्ञापनदाताओं के लिए बड़ी स्क्रीन और लोकल टारगेटिंग का यह मेल खास तौर पर आकर्षक है।
पहले किसी रीजनल ब्रैंड के सामने महंगे और बड़े स्तर के टीवी कैंपेन तथा बेहद टारगेटेड डिजिटल कैंपेन में से किसी एक को चुनने की चुनौती होती थी। अब CTV के जरिए वह अपने दर्शकों को खास बाजारों तक सीमित रखते हुए टीवी स्क्रीन का विजुअल असर भी हासिल कर सकता है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छोटे बाजारों में CTV की पहुंच बढ़ रही है। ऐसे में CTV की अतिरिक्त ऑडियंस का बड़ा अवसर अब मेट्रो शहरों से बाहर भी दिखाई दे रहा है।
मापने योग्य नतीजे MSMEs के लिए बदल रहे हैं CTV की तस्वीर
एक और बड़ा बदलाव विज्ञापन के नतीजों को मापने के तरीके में हो रहा है। PrsmX के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट व हेड सौरभ गोलानी, ने कहा कि MSMEs अब ऐसी पहुंच चाहते हैं जिसे मापा जा सके, विज्ञापन की फ्रीक्वेंसी ज्यादा प्रभावी हो, एंगेजमेंट मजबूत हो और मीडिया पर किए गए निवेश और मार्केटिंग के नतीजों के बीच संबंध ज्यादा साफ हो।
सौरभ गोलानी ने कहा, “वे ऐसे ज्यादा इनोवेटिव फॉर्मेट भी तलाश रहे हैं, जिनमें कंटेंट के साथ मौसम, खेल के स्कोर या शेयर बाजार की कीमतों जैसी लाइव अपडेट दिखाई जाएं। इससे ब्रैंड्स को उस समय दर्शकों से जुड़ने के लिए ज्यादा क्रिएटिव तरीके मिलते हैं।” उन्होंने कहा कि CTV की ग्रोथ विज्ञापनदाताओं को इस माध्यम की भूमिका पर दोबारा विचार करने के लिए भी प्रेरित कर रही है।
सौरभ गोलानी ने कहा, “भारत में CTV विज्ञापन खर्च 2024 में करीब 35% बढ़कर लगभग 1,500 करोड़ रुपये हो गया था और इस सेगमेंट के हर साल करीब 40% की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।”
उन्होंने कहा, “हम MSMEs की बढ़ती दिलचस्पी देख रहे हैं, क्योंकि प्रोग्रामेटिक एक्सेस और लचीले कैंपेन मॉडल एंट्री की बाधा को कम कर रहे हैं। आने वाले समय में CTV उन ब्रैंड्स के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण चैनल बन सकता है, जो टारगेटिंग या मापने की क्षमता से समझौता किए बिना अपना कारोबार बढ़ाना चाहते हैं।”
नवीनतम बाजार अनुमानों के मुताबिक CTV विज्ञापन का अवसर इससे भी बड़ा है, हालांकि अलग-अलग रिपोर्ट में इसकी परिभाषा अलग होने के कारण आंकड़ों में अंतर है। PMAR 2026 के मुताबिक 2025 में CTV विज्ञापन बाजार करीब 6,000 करोड़ रुपये का था, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना है। 2026 में इसके करीब 8,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
FICCI-EY ने व्यापक परिभाषा का इस्तेमाल करते हुए CTV विज्ञापन से होने वाली आय 9,900 करोड़ रुपये बताई है, जो 42% की बढ़ोतरी है। इसके साथ ही करीब 4 करोड़ साप्ताहिक एक्टिव CTV घरों का अनुमान है, जबकि एक साल पहले यह संख्या 3 करोड़ थी।
अलग-अलग अनुमान बाजार की परिभाषा में अंतर को दिखाते हैं, लेकिन सभी एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। CTV तेजी से एक उभरते हुए फॉर्मेट से बदलकर विज्ञापन के एक महत्वपूर्ण चैनल में तब्दील हो रहा है।
पहली बार विज्ञापन देने वाले ब्रैंड्स बढ़ा रहे हैं अगला चरण
Frodoh के फाउंडर व सीईओ रुषभ आर. ठक्कर के मुताबिक CTV के लोकतांत्रिक होते जाने का सबसे स्पष्ट संकेत सिर्फ मौजूदा विज्ञापनदाताओं का ज्यादा खर्च करना नहीं है, बल्कि पहली बार इस माध्यम पर विज्ञापन देने वाले ब्रैंड्स की संख्या भी बढ़ रही है। रुषभ ठक्कर ने कहा, “ऑपरेशनल स्तर पर हम देख रहे हैं कि पहली बार CTV पर विज्ञापन देने वाले ब्रैंड्स की संख्या, जिनमें कई रीजनल और MSME ब्रैंड शामिल हैं, कुल CTV विज्ञापन खर्च की बढ़ोतरी से काफी तेजी से बढ़ रही है।”
उन्होंने कहा, “यह लोकतांत्रिक होने की प्रक्रिया को दिखाता है। प्रोग्रामेटिक CTV ने एंट्री की लागत और बाधा को कम कर दिया है। इसका मतलब है कि ज्यादा छोटे ब्रैंड अपना पहला कैंपेन चला रहे हैं, न कि सिर्फ बड़े ब्रैंड अपने बजट में बढ़ोतरी कर रहे हैं।”
रुषभ ठक्कर ने Nielsen की 2025 Annual Marketing Report का हवाला देते हुए कहा कि दुनियाभर में 56% मार्केटर्स ने CTV में अपना निवेश बढ़ाने की योजना बनाई थी। इस बढ़ती दिलचस्पी में मिड-मार्केट और रीजनल विज्ञापनदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है और यह सिर्फ राष्ट्रीय ब्रैंड्स तक सीमित नहीं है।
इसलिए भारत में अवसर सिर्फ इतना नहीं हो सकता कि बड़े विज्ञापनदाता अपने मौजूदा टीवी बजट को CTV की ओर ट्रांसफर कर दें। इससे भी बड़ा अवसर ऐसे नए विज्ञापनदाताओं को टीवी पर लाना हो सकता है, जो अब तक इस माध्यम का इस्तेमाल नहीं करते थे।
टीवी की पहुंच से एड्रेसेबल ग्रोथ तक
CTV में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि यह विज्ञापन के दो अलग-अलग मॉडल को एक साथ लाने का काम कर रहा है। पारंपरिक टेलीविजन में बड़े स्तर पर पहुंच, प्रीमियम कंटेंट और बड़ी स्क्रीन का असर था, लेकिन छोटे विज्ञापनदाताओं के लिए सटीक तरीके से विज्ञापन खरीदना अपेक्षाकृत मुश्किल था। वहीं डिजिटल विज्ञापन में बारीकी से टारगेटिंग, लचीला बजट और नतीजों को मापने की सुविधा थी, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा छोटी पर्सनल स्क्रीन पर दिखाई देता था।
CTV इन दोनों के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को एक साथ ला रहा है। WPP Media, The Trade Desk और Ormax की नई रिपोर्ट के मुताबिक CTV पर विज्ञापन देखने के बाद 83% दर्शक कोई न कोई एक्शन लेते हैं। प्रीमियम दर्शकों में यह आंकड़ा बढ़कर 89% हो जाता है।
दर्शकों का यह एक्शन लेने वाला व्यवहार MSMEs के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके लिए विज्ञापन अक्सर तुरंत मिलने वाले कारोबारी नतीजों से जुड़ा होता है। इनमें पूछताछ, वेबसाइट विजिट, स्टोर पर आने वाले ग्राहक, लीड या बिक्री शामिल हो सकते हैं।
प्रोग्रामेटिक और सेल्फ-सर्व विज्ञापन खरीदने की सुविधा बढ़ने से छोटे विज्ञापनदाताओं के लिए CTV पर विज्ञापन शुरू करने का तरीका भी बदल रहा है। अब उन्हें कई महीने पहले बड़े टीवी कैंपेन के लिए बड़ी रकम लगाने की जरूरत नहीं है। वे सीमित भौगोलिक बाजारों में छोटे स्तर पर कैंपेन शुरू कर सकते हैं, अलग-अलग क्रिएटिव फॉर्मेट आजमा सकते हैं, लोगों की प्रतिक्रिया माप सकते हैं और प्रदर्शन के आधार पर कैंपेन को आगे बढ़ा सकते हैं।
किसी रीजनल रिटेलर, एजुकेशन कंपनी, रियल एस्टेट डेवलपर, हेल्थकेयर ब्रैंड, कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनी या स्थानीय सर्विस प्रोवाइडर के लिए इससे बड़ी स्क्रीन तक पहुंच काफी आसान हो सकती है।
अगली बड़ी लड़ाई छोटे विज्ञापनदाताओं के लिए
दुनिया भर का ट्रेंड बताता है कि CTV ऑडियंस के बढ़ने जितना ही महत्वपूर्ण विज्ञापनदाताओं के आधार का विस्तार भी हो सकता है। उद्योग विशेषज्ञों के हवाले से IAB के 2026 के डिजिटल वीडियो से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि CTV में निवेश करने वाले छोटे विज्ञापनदाताओं की हिस्सेदारी 2024 में 60% से बढ़कर 2026 में 85% हो गई है। भारत भी इसी तरह की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है, हालांकि यहां सेल्फ-सर्व और प्रोग्रामेटिक CTV विज्ञापन खरीदने की सुविधा बाजार में थोड़ी देर से आई है।
भारत के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण है। देश में MSME डिजिटल विज्ञापन बाजार पहले ही हर साल 20% से ज्यादा की दर से बढ़ रहा है। वहीं CTV की पहुंच उन बाजारों तक भी बढ़ रही है, जहां कई रीजनल और उभरते हुए ब्रैंड काम कर रहे हैं।
WPP Media का TYNY फोरकास्ट इस अवसर को और मजबूत करता है। इसमें SME को विज्ञापन बाजार की ग्रोथ में योगदान देने वाली कैटेगरी में शामिल किया गया है। वहीं व्यापक बाजार लगातार ज्यादा संगठित और डिजिटल होता जा रहा है। इसका नतीजा CTV विज्ञापन के पूरे स्वरूप में बड़ा बदलाव हो सकता है।
CTV सिर्फ टेलीविजन का ऐसा प्रीमियम एक्सटेंशन नहीं रहेगा, जिसे मुख्य रूप से बड़े राष्ट्रीय ब्रैंड खरीदते हैं। इसके बजाय यह हजारों छोटे विज्ञापनदाताओं के लिए ग्राहक जोड़ने और कारोबार बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। इनमें किसी जिले के घरों को टारगेट करने वाला स्थानीय सोलर इंस्टॉलर भी हो सकता है और अपने घरेलू बाजार से बाहर पहचान बनाने की कोशिश कर रहा रीजनल कंज्यूमर ब्रैंड भी।
टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए यह विज्ञापन की एक नई कमाई का जरिया है। वहीं MSMEs के लिए इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें घर की सबसे बड़ी स्क्रीन तक पहुंच मिल सकती है, वह भी उसी पुराने तरीके से टीवी विज्ञापन खरीदे बिना।
खाद्य उत्पादों पर किए जाने वाले बड़े-बड़े दावों और विज्ञापनों को लेकर खाद्य नियामक FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने सख्ती बढ़ा दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
खाद्य उत्पादों पर किए जाने वाले बड़े-बड़े दावों और विज्ञापनों को लेकर खाद्य नियामक FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने सख्ती बढ़ा दी है। FSSAI ने हाल के महीनों में खाद्य कारोबार से जुड़ी कंपनियों को 150 से ज्यादा नोटिस जारी किए हैं। इन मामलों में कथित तौर पर भ्रामक विज्ञापन, गलत दावे और लेबलिंग से जुड़े नियमों के उल्लंघन की शिकायतें शामिल हैं।
FSSAI ने शनिवार को अपनी कार्रवाई की जानकारी देते हुए बताया कि जांच के दायरे में कई बड़ी खाद्य, पेय और कंज्यूमर हेल्थ कंपनियां भी शामिल हैं। इनमें Nestlé India, PepsiCo India, Abbott India, Red Bull India, Danone India, Monster Energy India, Hell Energy, Mondelez India, Coca-Cola India, Diageo, Pernod Ricard, Ferrero India और Kenvue जैसे नाम शामिल हैं।
FSSAI के मुताबिक यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा कानूनों और उनसे जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए चलाए जा रहे व्यापक अभियान का हिस्सा है। नियामक ने हाल की कार्रवाई के दौरान कई कंपनियों के उत्पाद भी जब्त किए हैं।
एनर्जी ड्रिंक और अल्कोहल कंपनियों पर भी नजर
FSSAI की कार्रवाई में एनर्जी ड्रिंक और अल्कोहलिक बेवरेज कंपनियों पर खास ध्यान दिया गया है। नियामक यह देख रहा है कि इन कंपनियों के उत्पाद खाद्य सुरक्षा, विज्ञापन और लेबलिंग से जुड़े लागू नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
कार्रवाई का दायरा सिर्फ उत्पाद बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं रहा। FSSAI ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को भी 12 नोटिस जारी किए हैं। इनमें Amazon India और Flipkart जैसे बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
एक अहम कार्रवाई में FSSAI ने बताया कि Amazon के एक वेयरहाउस का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है।
KFC, McDonald’s और Domino’s भी जांच के दायरे में
रेस्तरां और फूड सर्विस कारोबार भी FSSAI की इस कार्रवाई से अछूता नहीं रहा। नियामक ने 30 से ज्यादा नोटिस ऐसे प्रतिष्ठानों को जारी किए हैं, जिनमें KFC India, McDonald’s India, Pizza Hut India, Domino’s India और Costa Coffee शामिल हैं।
FSSAI ने यह भी बताया कि कार्रवाई के तहत Domino’s के पांच लाइसेंस निलंबित किए गए हैं। इससे पहले पिछले साल कई फाइव-स्टार होटलों को भी नोटिस जारी किए गए थे।
पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए गए दावों पर सख्ती
FSSAI की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब खाद्य और पेय उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की जांच पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इससे पहले भी FSSAI ने कंपनियों को ऐसे लेबल बदलने के निर्देश दिए हैं, जिन पर किए गए दावे नियामकीय नियमों के अनुरूप नहीं पाए गए।
नोटिस मिलने के बाद कई कंपनियों ने सुधारात्मक कदम उठाना शुरू कर दिया है। इसमें उत्पाद के लेबल में बदलाव, विज्ञापन में किए गए दावों को बदलना या दूसरी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं में सुधार करना शामिल हो सकता है।
FSSAI की ताजा कार्रवाई से साफ है कि नियामक अब सिर्फ बड़ी खाद्य कंपनियों ही नहीं, बल्कि निर्माताओं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और रेस्तरां समेत पूरे फूड बिजनेस सेक्टर पर नजर रख रहा है।
उपभोक्ताओं के लिए इसका सीधा मतलब है कि अगर किसी खाद्य या पेय उत्पाद की पैकेजिंग या विज्ञापन में कोई बड़ा दावा किया जा रहा है, तो अब नियामक उसकी बारीकी से जांच कर रहा है।
खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले ऐसे दावों पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की सख्ती बढ़ती जा रही है, जो उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले ऐसे दावों पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की सख्ती बढ़ती जा रही है, जो उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं। इसी कड़ी में Amway India, Emami, Bonn Biscuits समेत छह कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स के लेबल, पैकेजिंग और विज्ञापनों से '100%' वाले दावों को हटा दिया है।
PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, FSSAI ने कहा है कि उसने खाद्य कारोबार से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ निगरानी और कार्रवाई तेज कर दी है। खास तौर पर उन मामलों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां '100%' जैसे शब्दों का इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है कि उपभोक्ताओं के मन में उत्पाद को लेकर गलत या बढ़ा-चढ़ाकर धारणा बन सकती है।
रेगुलेटर ने कंपनियों को पैकेजिंग, लेबल, वेबसाइट और प्रमोशनल सामग्री से ऐसे दावों को हटाने के निर्देश दिए हैं।
इन छह कंपनियों ने बदले अपने दावे
FSSAI के मुताबिक, जिन कंपनियों ने नियामकीय कार्रवाई के बाद सुधार किया है, उनमें Amway India Enterprises, Emami, Bonn Biscuits, Apis India, Juza Foods और Masterchow Foods शामिल हैं।
Amway India ने अपने एक प्रोडक्ट पर इस्तेमाल किए जा रहे '100% Pure Coconut Oil' के दावे को हटा दिया है। कंपनी ने FSSAI को बताया कि जिस पुराने स्टॉक पर यह दावा मौजूद था, उसे बिक्री चैनलों से वापस ले लिया गया है।
वहीं, Emami ने अपने Zandu Honey प्रोडक्ट पर किए जाने वाले दावों में बदलाव किया है। Apis India ने भी नियामकीय सलाह मिलने के बाद अपने हनी प्रोडक्ट्स से इसी तरह के दावों को हटा दिया।
Bonn Biscuits ने भी विज्ञापन से हटाया '100%' दावा
Bonn Biscuits ने अपने Jeera Bite Biscuits के विज्ञापन में इस्तेमाल किए जा रहे '100%' वाले दावे को हटा दिया है।
इसके अलावा Juza Foods ने बेबी फूड प्रोडक्ट्स से जुड़े ऐसे दावों को वापस लिया है, जबकि Masterchow Foods ने अपने नूडल्स प्रोडक्ट्स से इसी तरह के दावों को हटाया है।
FSSAI ने तेज की कार्रवाई
कंपनियों पर यह कार्रवाई FSSAI की व्यापक कंप्लायंस ड्राइव का हिस्सा है। रेगुलेटर पिछले कुछ समय से खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग, लेबलिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की जांच तेज कर रहा है।
पिछले सप्ताह भी FSSAI ने बताया था कि Dabur India और Ferns N Petals समेत कई कंपनियों ने नोटिस मिलने के बाद लेबलिंग, विज्ञापन और प्रोडक्ट क्लेम से जुड़ी कमियों को सुधारा था।
इससे पहले भी कई खाद्य कंपनियों को भ्रामक लेबल, ट्रेडमार्क और प्रमोशनल दावों को लेकर सुधारात्मक कदम उठाने पड़े हैं। इससे साफ है कि FSSAI अब खाद्य उत्पादों की मार्केटिंग में किए जाने वाले दावों पर पहले से ज्यादा नजर रख रहा है।
उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले दावों पर नजर
FSSAI खास तौर पर ऐसे दावों पर ध्यान दे रहा है, जो बिना पर्याप्त आधार के उपभोक्ताओं के खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें उत्पाद की शुद्धता (Purity), स्वास्थ्य लाभ (Health Benefits) और सामग्री (Ingredients) से जुड़े दावे शामिल हैं।
रेगुलेटर का फोकस सिर्फ '100%' जैसे शब्दों तक सीमित नहीं है। खाद्य और पेय पदार्थों की मार्केटिंग में किए जाने वाले ऐसे दावों की भी जांच की जा रही है, जिनसे किसी प्रोडक्ट को लेकर उपभोक्ता के मन में उसकी गुणवत्ता या फायदे को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
FSSAI ने हाल के दिनों में एनर्जी ड्रिंक्स और अल्कोहलिक बेवरेज की मार्केटिंग से जुड़े मामलों पर भी नजर बढ़ाई है। ऐसे में आने वाले समय में कंपनियों को अपने पैकेजिंग और विज्ञापन दावों को लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ सकती है।
महाराष्ट्र Food and Drug Administration (FDA) ने विमल इलायची के विज्ञापन में शामिल बॉलीवुड एक्टर्स अजय देवगन, शाहरुख खान और टाइगर श्राॉफ को शो-कॉज नोटिस जारी किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विमल इलायची का विज्ञापन एक बार फिर विवादों में आ गया है। महाराष्ट्र Food and Drug Administration (FDA) ने विमल इलायची के विज्ञापन में शामिल बॉलीवुड एक्टर्स अजय देवगन, शाहरुख खान और टाइगर श्राॉफ को शो-कॉज नोटिस जारी किया है। FDA ने सवाल उठाया है कि कहीं यह विज्ञापन विमल पान मसाला का अप्रत्यक्ष यानी सरोगेट प्रमोशन तो नहीं कर रहा।
FDA ने तीनों एक्टर्स से विज्ञापन में ब्रांड एंडोर्सर के तौर पर उनकी भूमिका को लेकर जवाब मांगा है। साथ ही, उन्हें अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से इस विज्ञापन का प्रमोशनल कंटेंट 15 दिनों के भीतर हटाने का निर्देश दिया गया है।
FDA ने किस बात पर उठाया सवाल?
महाराष्ट्र FDA इस पूरे मामले की जांच Food Safety and Standards Act, 2006 के तहत कर रहा है। खास तौर पर एक्ट की धारा 24 के तहत जांच की जा रही है। यह धारा खाने-पीने से जुड़े भ्रामक या धोखा देने वाले विज्ञापनों से संबंधित है।
रेगुलेटर का कहना है कि विमल इलायची के विज्ञापन में इस्तेमाल की गई प्रस्तुति, डायलॉग, प्रोडक्ट का नाम और बाजार में Vimal ब्रांड की मौजूदगी को देखते हुए उपभोक्ताओं के मन में इसका संबंध Vimal Pan Masala से बन सकता है।
महाराष्ट्र में तंबाकू या निकोटीन वाले पान मसाला पर प्रतिबंध है। ऐसे में FDA यह जांच कर रहा है कि Elaichi के नाम से किया जा रहा विज्ञापन कहीं प्रतिबंधित प्रोडक्ट की अप्रत्यक्ष ब्रांडिंग तो नहीं कर रहा।
10 लाख रुपये तक का जुर्माना
FDA ने अपने नोटिस में Food Safety and Standards Act की धारा 53 का भी जिक्र किया है। इस प्रावधान के तहत भ्रामक खाद्य विज्ञापन प्रकाशित या प्रसारित करने में शामिल व्यक्ति पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
हालांकि, फिलहाल एक्टर्स को शो-कॉज नोटिस जारी कर उनका पक्ष पूछा गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनके खिलाफ जुर्माना तय हो गया है। आगे की कार्रवाई उनके जवाब और FDA की जांच के आधार पर होगी।
महाराष्ट्र में गुटखा-पान मसाला के खिलाफ बड़ा अभियान
FDA की यह कार्रवाई महाराष्ट्र में प्रतिबंधित गुटखा और पान मसाला के खिलाफ चलाए जा रहे बड़े अभियान के बीच हुई है।
विभाग के मुताबिक, 25 मई से 31 जुलाई 2026 के बीच अधिकारियों ने 658 ठिकानों पर छापेमारी की। इस दौरान करीब 15.11 करोड़ रुपये का स्टॉक जब्त किया गया। अधिकारियों ने 519 FIR दर्ज कीं और 701 लोगों को गिरफ्तार किया।
इसके अलावा प्रतिबंधित प्रोडक्ट की कथित सप्लाई में इस्तेमाल हो रहे 78 वाहन भी जब्त किए गए। इन वाहनों में मिले सामान की कीमत करीब 6.6 करोड़ रुपये बताई गई है।
संगठित नेटवर्क पर भी FDA की नजर
महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई अब सिर्फ दुकानों और सप्लाई तक सीमित नहीं है। विभाग प्रतिबंधित गुटखा, तंबाकू और निकोटीन वाले पान मसाला की सप्लाई से जुड़े संभावित संगठित नेटवर्क की भी जांच कर रहा है।
12 जून 2026 को FDA Commissioner Tukaram Mundhe ने अधिकारियों को पुलिस के साथ मिलकर काम करने और योग्य मामलों में Maharashtra Control of Organised Crime Act, 1999 (MCOCA) के इस्तेमाल की संभावना पर भी गौर करने का निर्देश दिया था।
Vimal के विज्ञापन पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
Vimal के विज्ञापन को लेकर यह पहली बार नहीं है जब नियामकीय सवाल उठे हैं। 2018 में Directorate General of Health Services (DGHS) ने Vishnu Pouch Packaging Pvt Ltd को शो-कॉज नोटिस जारी किए थे। आरोप था कि विमल इलायची के विज्ञापन के जरिए तंबाकू उत्पादों का अप्रत्यक्ष प्रचार किया जा रहा है।
कंपनी ने उस समय इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि घरेलू बाजार के लिए वह Vimal ब्रांड के तहत तंबाकू उत्पाद नहीं बनाती।
इसके बाद जनवरी 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों के खिलाफ DGHS की अपील खारिज कर दी थी, जिनके जरिए इन नोटिस पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने कहा था कि कंपनी तंबाकू रहित पान मसाला बेच सकती है, बशर्ते वह लागू कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों का पालन करे। हालांकि, विज्ञापन को surrogate promotion माना जा सकता है या नहीं, इस मुद्दे पर विवाद बना रहा।
इस बार मामला अलग कानून के तहत
महाराष्ट्र FDA की मौजूदा कार्रवाई को पहले की कार्रवाई से अलग माना जा रहा है। ताजा नोटिस Food Safety and Standards Act के तहत जारी किए गए हैं, जबकि पहले की कार्रवाई Cigarettes and Other Tobacco Products Act (COTPA) से जुड़े प्रावधानों के तहत हुई थी।
फिलहाल अजय देवगन, शाहरुख खान और टाइगर श्राॉफ के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि FDA के नोटिस का वे क्या जवाब देते हैं और क्या रेगुलेटर विमल इलायची के इस विज्ञापन को प्रतिबंधित पान मसाला के surrogate promotion के तौर पर देखता है। 15 दिनों में जवाब और सोशल मीडिया से विज्ञापन हटाने के निर्देश के बाद इस मामले में आगे की तस्वीर साफ होगी।
डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग कंपनी Vertoz Limited के बोर्ड ने कंपनी के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमोटर हिरेन कुमार रसिकलाल शाह को फिर से मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग और टेक्नोलॉजी कंपनी Vertoz Limited के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही अच्छी रही है। कंपनी ने 30 जून 2026 को खत्म हुई तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी के कंसोलिडेटेड नतीजों के मुताबिक, तिमाही में कुल आय बढ़कर करीब 82.24 करोड़ रुपये हो गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह करीब 70.90 करोड़ रुपये थी।
कंपनी का कंसोलिडेटेड मुनाफा भी बढ़ा है। जून 2026 तिमाही में कंपनी को करीब 6.47 करोड़ रुपये का प्रॉफिट हुआ, जबकि जून 2025 तिमाही में यह करीब 6.11 करोड़ रुपये था। यानी सालाना आधार पर मुनाफे में करीब 6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 13 अगस्त 2026 को हुई बैठक में वित्तीय नतीजों के अलावा मैनेजमेंट से जुड़े कई अहम फैसले भी लिए गए।
कंसोलिडेटेड आय 82 करोड़ रुपये के पार
Vertoz की कंसोलिडेटेड रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 तिमाही में ऑपरेशंस से कंपनी की आय करीब 81.64 करोड़ रुपये रही। अन्य आय करीब 60 लाख रुपये रही। इस तरह कुल आय करीब 82.24 करोड़ रुपये रही।
जून 2025 में ऑपरेशंस से आय करीब 70.49 करोड़ रुपये और कुल आय करीब 70.90 करोड़ रुपये थी। इस तरह एक साल में कंपनी की कुल आय में करीब 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
तिमाही के दौरान कंपनी के कुल खर्च करीब 74.06 करोड़ रुपये रहे। इनमें डायरेक्ट सर्विस एक्सपेंस करीब 49.10 करोड़ रुपये, कर्मचारी लाभ पर 8.24 करोड़ रुपये, फाइनेंस कॉस्ट करीब 2.14 करोड़ रुपये, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइजेशन करीब 5.37 करोड़ रुपये और अन्य खर्च करीब 9.22 करोड़ रुपये रहे।
स्टैंडअलोन मुनाफे में भी मजबूत बढ़ोतरी
स्टैंडअलोन आधार पर भी कंपनी का प्रदर्शन बेहतर रहा। जून 2026 तिमाही में Vertoz की कुल आय करीब 26.69 करोड़ रुपये रही, जबकि जून 2025 में यह करीब 7.92 करोड़ रुपये थी।
तिमाही में कंपनी का प्रॉफिट करीब 1.50 करोड़ रुपये रहा। वहीं, जून 2025 तिमाही में कंपनी को करीब 75.43 लाख रुपये का मुनाफा हुआ था। इस तरह स्टैंडअलोन आधार पर भी मुनाफे में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली।
कंपनी के मुताबिक, जून 2026 तिमाही में अन्य कम्प्रिहेन्सिव इनकम का टैक्स के बाद कुल प्रभाव करीब 7.22 करोड़ रुपये का रहा। यह इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स और एक्चुरियल गेन/लॉस की फेयर वैल्यू के असर से जुड़ा है।
हिरेन कुमार शाह को फिर MD बनाने की तैयारी
Vertoz के बोर्ड ने कंपनी के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमोटर हिरेन कुमार रसिकलाल शाह को फिर से मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
उन्हें मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद पांच साल के नए कार्यकाल के लिए फिर से मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया जाएगा। उनका मौजूदा कार्यकाल 13 जून 2027 को खत्म होना है। हालांकि, नए कार्यकाल के लिए कंपनी के सदस्यों की आगामी Annual General Meeting में मंजूरी जरूरी होगी।
कंपनी ने बताया कि इस प्रस्ताव को पहले से मंजूरी देने का मकसद मैनेजमेंट में निरंतरता बनाए रखना और कंपनी के कारोबार व कामकाज में किसी तरह का व्यवधान न आने देना है।
हिरेन कुमार शाह के पास बिजनेस मैनेजमेंट का लंबा अनुभव
हिरेन कुमार शाह Vertoz के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमोटर हैं। कंपनी के मुताबिक, उन्हें बिजनेस मैनेजमेंट, स्ट्रैटेजिक प्लानिंग, ऑपरेशंस और कॉरपोरेट मैनेजमेंट का लंबा अनुभव है।
उन्होंने Vertoz से जुड़ने से पहले अलग-अलग स्टार्टअप वेंचर्स के साथ काम किया है। कंपनी के मुताबिक, उन्होंने Vertoz के कारोबार, ग्रोथ से जुड़ी पहलों और कंपनी के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वह कंपनी के नॉन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर आशीष रसिकलाल शाह के भाई हैं। वहीं, Vertoz की CFO और एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डिंपल हिरेन कुमार शाह उनकी पत्नी हैं।
SHM & CO. को इंटर्नल ऑडिटर बनाया
बोर्ड ने M/s SHM & CO. को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कंपनी का इंटर्नल ऑडिटर नियुक्त करने को भी मंजूरी दी है। यह नियुक्ति 13 अगस्त 2026 से प्रभावी है।
SHM & CO. के प्रोपराइटर हितांशु शेठ हैं। कंपनी के मुताबिक, यह फर्म Internal Audit, Internal Controls, Accounting Processes और Compliance Framework को मजबूत करने के क्षेत्र में काम करती है।
इंटर्नल ऑडिटर के तौर पर यह फर्म सीधे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और जरूरत के मुताबिक Audit Committee को रिपोर्ट करेगी।
कंपनी ने कई पॉलिसीज में किया बदलाव
बोर्ड ने SEBI के नियमों और दूसरे लागू कानूनों में हुए बदलावों के हिसाब से कंपनी की कई पॉलिसीज की समीक्षा भी की। इसके बाद संबंधित पॉलिसीज में जरूरी संशोधन और अपडेट को मंजूरी दी गई।
इनमें इनसाइडर ट्रेडिंग से जुड़े आचार संहिता (Code of Conduct) और अनपब्लिश्ड प्राइस सेंसिटिव इंफॉर्मेशन (UPSI) के निष्पक्ष खुलासे की पॉलिसी, महत्वपूर्ण घटनाओं और सूचनाओं की पहचान से जुड़ी पॉलिसी, नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन पॉलिसी, बोर्ड में विविधता से जुड़ी पॉलिसी और बोर्ड सदस्यों व वरिष्ठ प्रबंधन के लिए आचार संहिता शामिल हैं।
इसके अलावा इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स के परिचय एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम, महत्वपूर्ण कानूनी मामलों (Material Litigation) की पहचान, क्रेडिटर्स के बकाया की महत्वपूर्ण देनदारियों की पहचान, महत्वपूर्ण सहायक कंपनी (Material Subsidiary) और महत्वपूर्ण ग्रुप कंपनियों/संस्थाओं की पहचान से जुड़ी पॉलिसी में भी बदलाव किए गए हैं।
कंपनी ने व्हिसलब्लोअर पॉलिसी के साथ-साथ दस्तावेजों के संरक्षण और रिकॉर्ड में रखने (Preservation & Archival) से जुड़ी पॉलिसी को भी अपडेट किया है।
कंपनी ने कहा कि इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य मौजूदा रेगुलेटरी नियमों और कंपनी के गवर्नेंस एवं कम्प्लयांस फ्रेमवर्क के साथ पॉलिसीज को बेहतर तरीके से जोड़ना है।
शेयरधारकों को पहले ही दिया गया था अंतरिम डिविडेंड
कंपनी ने बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बोर्ड ने 29 मई 2026 को 10 रुपये फेस वैल्यू वाले प्रत्येक शेयर पर 0.10 रुपये का अंतरिम डिविडेंड घोषित किया था।
5 जून 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की गई थी और यह अंतरिम डिविडेंड 26 जून 2026 को शेयरधारकों को भुगतान कर दिया गया। खास बात यह रही कि प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के शेयरधारकों ने स्वेच्छा से अपने हिस्से के अंतरिम डिविडेंड का अधिकार छोड़ दिया था।
करीब दो घंटे चली बोर्ड मीटिंग
Vertoz की बोर्ड मीटिंग 13 अगस्त 2026 को शाम 5 बजे शुरू हुई और शाम 6:55 बजे समाप्त हुई। बैठक में वित्तीय नतीजों को मंजूरी देने के साथ मैनेजिंग डायरेक्टर की दोबारा नियुक्ति, इंटर्नल ऑडिटर की नियुक्ति और कई कंपनी पॉलिसीज में संशोधन को मंजूरी दी गई।
कंपनी ने बताया कि वित्तीय नतीजों की समीक्षा ऑडिट कमेटी ने की थी और उसकी सिफारिश के बाद बोर्ड ने इन्हें मंजूरी दी।
देश की प्रमुख डिजिटल ऑउट-ऑफ होम (DOOH) और ट्रांजिट विज्ञापन कंपनी साइनपोस्ट इंडिया (Signpost India Limited) के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों को लेकर हाल में दो बड़े बदलाव हुए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश की प्रमुख डिजिटल ऑउट-ऑफ होम (DOOH) और ट्रांजिट विज्ञापन कंपनी साइनपोस्ट इंडिया (Signpost India Limited) के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों को लेकर हाल में दो बड़े बदलाव हुए हैं। एक तरफ कंपनी के शेयरधारकों ने गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी को स्वतंत्र निदेशकों के तौर पर पांच-पांच साल के दूसरे कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त करने की मंजूरी दी है। वहीं, दूसरी तरफ कंपनी की स्वतंत्र निदेशक सयंतिका मित्रा का दूसरा कार्यकाल पूरा होने के बाद वह बोर्ड से बाहर हो गई हैं।
कंपनी ने 6 अगस्त 2026 को स्टॉक एक्सचेंज को बताया था कि 5 अगस्त 2026 को हुई असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी की पुनर्नियुक्ति से जुड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी। दोनों का नया कार्यकाल 6 अगस्त 2026 से 5 अगस्त 2031 तक रहेगा।
गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी को मिला दूसरा कार्यकाल
शेयरधारकों की मंजूरी के बाद गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी दोनों कंपनी के गैर-कार्यकारी स्वतंत्र निदेशकों के तौर पर अगले पांच साल तक बोर्ड का हिस्सा रहेंगे।
गिरिश कुलकर्णी को एशिया के इंश्योरेंस और फाइनेंशियल सेक्टर में चार दशक से ज्यादा का अनुभव है। कंपनी के मुताबिक, उन्हें बिजनेस को खड़ा करने और बड़े स्तर पर ले जाने के साथ कॉरपोरेट गवर्नेंस और स्ट्रैटजिक प्लानिंग का भी व्यापक अनुभव है।
उन्होंने एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में कई जॉइंट वेंचर्स को शुरू करने और आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है। वह Dai-Ichi Life के Global Strategy Board के शुरुआती सदस्यों में शामिल रहे और Asia Pacific में चेयरमैन (नॉन-एग्जिक्यूटिव) की भूमिका भी निभाई। इसके अलावा उन्होंने करीब एक दशक तक Star Union Dai-Ichi Life Insurance के MD और CEO के तौर पर काम किया।
वहीं, प्रशांत संघवी को Business Development, Credit Appraisal, Structured Finance और IPO Listing के क्षेत्र में 25 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने Private Equity, बैंकों और Financial Institutions के जरिए फंड जुटाने के क्षेत्र में भी काम किया है।
उनके करियर का एक बड़ा हिस्सा HDFC Bank में रहा, जहां उन्होंने मुंबई में करीब 11 साल तक Business Banking Group (Working Capital) का नेतृत्व किया। इसके अलावा उन्होंने Centurion Bank of Punjab और ICICI Bank में भी काम किया है। उनके पास SBI Life, General Motors Finance (GMAC) और Generali Group से जुड़े अनुभव भी हैं।
कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी कंपनी के किसी भी अन्य डायरेक्टर से संबंधित नहीं हैं। साथ ही, दोनों को SEBI या किसी अन्य संबंधित अथॉरिटी के आदेश के तहत डायरेक्टर का पद संभालने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
सयंतिका मित्रा का दूसरा कार्यकाल हुआ पूरा
इसके बाद Signpost India ने 10 अगस्त को एक और महत्वपूर्ण बोर्ड बदलाव की जानकारी दी। कंपनी की स्वतंत्र निदेशक सयंतिका मित्रा का दूसरा कार्यकाल 8 अगस्त 2026 को कारोबारी घंटे खत्म होने के साथ पूरा हो गया।
इसके साथ ही वह कंपनी की स्वतंत्र निदेशकों नहीं रहीं। कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्होंने Nomination & Remuneration Committee की Chairperson और Audit Committee की Member की जिम्मेदारी भी छोड़ दी।
कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंजों को दी जानकारी में बताया कि सयंतिका मित्रा का कार्यकाल पूरा होना ही उनके पद से हटने का कारण है। कंपनी ने उनकी किसी नई नियुक्ति या किसी अन्य पद पर जाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।
इस तरह अगस्त के पहले सप्ताह में Signpost India के बोर्ड में एक तरफ दो स्वतंत्र निदेशकों को अगले पांच साल के लिए बनाए रखने का फैसला हुआ, वहीं एक मौजूदा स्वतंत्र निदेशक का दूसरा कार्यकाल पूरा हो गया। यानी गिरिश कुलकर्णी और प्रशांत संघवी का दूसरा कार्यकाल 6 अगस्त 2026 से शुरू हुआ, जबकि सयंतिका मित्रा 8 अगस्त 2026 को अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद बोर्ड से बाहर हो गईं।
पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर ब्रैंड Bisleri को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कर्नाटक की एक कंपनी को ‘Bislie’ नाम से पैकेज्ड पानी बनाने और बेचने पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर ब्रैंड Bisleri को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कर्नाटक की एक कंपनी को ‘Bislie’ नाम से पैकेज्ड पानी बनाने और बेचने पर फिलहाल रोक लगा दी है। कोर्ट ने पहली नजर में माना कि ‘Bislie’ नाम रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क ‘Bisleri’ से इतना मिलता-जुलता है कि इससे लोगों के भ्रमित होने की संभावना है।
जस्टिस माधव जे. जमादार ने Bisleri International Private Limited की ओर से दायर अंतरिम याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामला कर्नाटक के बेलागुली महालिंगेगौड़ा किरणकुमार की कंपनी Kalabyraveshwara Mineral Water Industry से जुड़ा है, जो ‘Bislie’ ब्रैंड के नाम से पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर बेच रही थी।
नाम के साथ पैकेजिंग पर भी सवाल
Bisleri की ओर से कोर्ट में कहा गया कि ‘Bislie’ सिर्फ नाम में ही उसके ब्रैंड से मिलता-जुलता नहीं है, बल्कि दोनों प्रॉडक्ट्स की लेबल डिजाइन, आर्टवर्क, रंगों, लेआउट, एलिमेंट्स की प्लेसमेंट और पूरी पैकेजिंग में भी काफी समानता है।
कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि ‘Bislie’ के लिए इस्तेमाल की जा रही बोतल का डिजाइन भी Bisleri की बोतल से काफी मिलता-जुलता है।
Bisleri ने कोर्ट से मांग की थी कि संबंधित निर्माता को ‘Bislie’ नाम या उससे मिलते-जुलते किसी भी नाम, लेबल, पैकेजिंग या डिजाइन के तहत पानी बनाने, बेचने, स्टॉक करने और मार्केटिंग करने से रोका जाए।
मई में बाजार में मिले थे ‘Bislie’ के प्रोडक्ट
कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, Bisleri की टीम ने मई 2026 के आखिरी हफ्ते में बाजार की निगरानी के दौरान ‘Bislie’ नाम से बिक रहे प्रॉडक्ट्स की पहचान की थी। इसके बाद कंपनी को पता चला कि इन प्रॉडक्ट्स का निर्माण कर्नाटक के चन्नरायपटना में किया जा रहा था।
Bisleri ने अपने ट्रेडमार्क के अलावा अपने लेबल पर इस्तेमाल होने वाले ओरिजिनल आर्टवर्क के लिए कॉपीराइट रजिस्ट्रेशन भी करा रखा है।
जून में कोर्ट ने दी थी तलाशी और जब्ती की अनुमति
इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहले 11 जून को निर्माता की गैरमौजूदगी में एक अंतरिम आदेश जारी किया था। कोर्ट ने कोर्ट रिसीवर नियुक्त करते हुए उसे ‘Bislie’ नाम वाले प्रॉडक्ट्स, लेबल, पैकेजिंग सामग्री, मशीनरी और इससे जुड़ी अन्य चीजों की तलाशी लेने और उन्हें जब्त करने की अनुमति दी थी।
इसके बाद कोर्ट के आदेश के मुताबिक परिसर में छापेमारी भी की गई।
‘Bislie’ और ‘Bisleri’ में काफी समानता
कोर्ट ने दोनों ब्रैंड के नाम और पैकेजिंग की तुलना की। कोर्ट के मुताबिक, ‘Bislie’ नाम ‘Bisleri’ की नकल जैसा दिखाई देता है, जिसमें कुछ अक्षरों में बदलाव करके नया नाम तैयार किया गया है।
कोर्ट ने नाम के अलावा दोनों ब्रैंड की पैकेजिंग में भी कई समानताएं पाईं। इनमें आर्टवर्क, कलर स्कीम, डिजाइन, लेआउट और पूरी विजुअल पहचान शामिल है।
कंपनी की गैरमौजूदगी में जारी रहा आदेश
7 अगस्त को हुई सुनवाई में संबंधित निर्माता कोर्ट में पेश नहीं हुआ, जबकि उसे मामले की जानकारी और नोटिस दिया जा चुका था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस संबंध में सर्विस का एफिडेविट दाखिल किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि Additional Special Receiver की रिपोर्ट भी Bisleri के दावों को समर्थन देती है। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने न तो कोर्ट में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा और न ही जवाबी एफिडेविट दाखिल किया। ऐसे में इस चरण पर Bisleri की ओर से लगाए गए आरोपों का कोई विरोध नहीं हुआ।
अंतिम फैसला आने तक ‘Bislie’ पर रोक
इन परिस्थितियों को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने Bisleri की अंतरिम याचिका मंजूर कर ली। कोर्ट ने मुकदमे के अंतिम निपटारे तक निर्माता को ‘BISLIE’ या ‘BISLERI’ से मिलते-जुलते किसी भी नाम या लेबल के तहत पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर बनाने, बेचने, सप्लाई करने, स्टॉक करने, पैकेजिंग, मार्केटिंग या ऑफर करने से रोक दिया है।
यह रोक सिर्फ नाम तक सीमित नहीं है। इसमें विवादित आर्टवर्क, ट्रेड ड्रेस और बोतल के डिजाइन/शेप को भी शामिल किया गया है।
यानी फिलहाल कोर्ट के आदेश के बाद संबंधित निर्माता के लिए ‘Bislie’ नाम, उसकी पैकेजिंग और कथित तौर पर मिलते-जुलते बोतल डिजाइन के साथ बाजार में पानी बेचना मुश्किल होगा। वहीं, ट्रेडमार्क विवाद पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
मीडिया मेजरमेंट और ऑडियंस एनालिटिक्स कंपनी Nielsen Holdings ने डिजिटल विज्ञापन वेरिफिकेशन प्लेटफॉर्म DoubleVerify का अधिग्रहण करने का ऐलान किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मीडिया मेजरमेंट और ऑडियंस एनालिटिक्स कंपनी Nielsen Holdings ने डिजिटल विज्ञापन वेरिफिकेशन प्लेटफॉर्म DoubleVerify का अधिग्रहण करने का ऐलान किया है। यह पूरी तरह नकद (All-Cash) सौदा है, जिसकी कुल कीमत करीब 2.15 अरब डॉलर है।
इस समझौते के तहत DoubleVerify के शेयरधारकों को प्रति शेयर 13.60 डॉलर नकद मिलेंगे। यह कीमत 5 अगस्त 2026 तक के पिछले 60 कारोबारी दिनों के औसत शेयर मूल्य से लगभग 30 फीसदी अधिक है।
दोनों कंपनियों के बोर्ड ने इस सौदे को मंजूरी दे दी है। हालांकि, इसे पूरा होने के लिए DoubleVerify के शेयरधारकों की मंजूरी और नियामकीय स्वीकृतियां मिलना बाकी हैं। उम्मीद है कि यह सौदा 2027 की पहली तिमाही तक पूरा हो जाएगा।
इस अधिग्रहण के बाद Nielsen की ऑडियंस मेजरमेंट और मीडिया इंटेलिजेंस सेवाएं, DoubleVerify की डिजिटल विज्ञापन वेरिफिकेशन, मीडिया क्वालिटी और कैंपेन मेजरमेंट तकनीक के साथ जुड़ जाएंगी। इससे विज्ञापनदाताओं को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि उनके विज्ञापन असली लोगों तक पहुंच रहे हैं, सही माहौल में दिख रहे हैं और फर्जी ट्रैफिक से सुरक्षित हैं।
कंपनियों का दावा है कि विलय के बाद बनने वाली संयुक्त कंपनी का सालाना कारोबार 4 अरब डॉलर से अधिक होगा और यह 300 अरब डॉलर से ज्यादा के वैश्विक विज्ञापन खर्च वाले ग्राहकों को सेवाएं देने की स्थिति में होगी।
Nielsen के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) कार्तिक राव ने कहा कि इस सौदे से कंपनी की डिजिटल विज्ञापन क्षेत्र में मौजूदगी और मजबूत होगी। वहीं, DoubleVerify के CEO मार्क ज़ागोर्स्की ने कहा कि Nielsen के साथ जुड़ने से कंपनी को अधिक संसाधन मिलेंगे और दोनों की तकनीक मिलकर विज्ञापन उद्योग में नए मानक स्थापित करेगी।
सौदा पूरा होने के बाद DoubleVerify, Nielsen के भीतर एक निजी (Private) कंपनी के रूप में काम करेगी। हालांकि, वह अपने मौजूदा DoubleVerify ब्रांड और नाम के साथ ही परिचालन जारी रखेगी। यह जानकारी BestMediaInfo में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर सामने आई है।
इंडियन ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने हमेशा इस इंडस्ट्री की विरासत को सहेजने का काम किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
इंडियन ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने हमेशा इस इंडस्ट्री की विरासत को सहेजने का काम किया है। उसके लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड उन प्रोफेशनल्स को सम्मानित करते रहे हैं, जिन्होंने दशकों तक एजेंसीज खड़ी कीं, यादगार ऐड कैंपेन बनाए और इंडियन ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हर पेशे में ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए, जिन्होंने उस क्षेत्र की नींव मजबूत की हो और उसकी दिशा तय की हो। AAAI लगातार यह जिम्मेदारी निभाता आया है।
लेकिन हर संस्था के जीवन में एक ऐसा समय भी आता है, जब उसे अपनी पुरानी उपलब्धियों से आगे बढ़कर खुद से एक अहम सवाल पूछना पड़ता है- आने वाले समय को आकार देने में उसकी क्या भूमिका होगी?
पिछले एक दशक में शायद ही कोई ऐसी इंडस्ट्री रही हो, जिसमें ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री जितना बड़ा बदलाव आया हो। डिजिटल मीडिया, डेटा, कंटेंट क्रिएटर्स, ई-कॉमर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने इस क्षेत्र के कई पुराने नियम बदल दिए हैं। आज क्लाइंट्स तेजी से नए आइडिया, मापे जा सकने वाले नतीजे और एकीकृत समाधान चाहते हैं। वहीं, आज इस पेशे में आने वाली नई पीढ़ी ऐसे कारोबारी माहौल में काम शुरू कर रही है, जो उनके वरिष्ठों के दौर से बिल्कुल अलग है।
यही वजह है कि अब AAAI के भीतर चर्चा सिर्फ आजीवन योगदान देने वाले दिग्गजों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इस बात पर भी होनी चाहिए कि अगले बीस वर्षों के लिए ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को कैसे तैयार किया जाए।
इंडस्ट्री के भीतर एक भावना लगातार मजबूत हो रही है कि AAAI का नेतृत्व अभी भी मुख्य रूप से पारंपरिक ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज से जुड़े वरिष्ठ लोगों के हाथों में है। उनके योगदान पर कोई सवाल नहीं है और वे हर सम्मान के हकदार हैं। लेकिन जिस इंडस्ट्री को उन्होंने बनाया, वह अब काफी बदल चुका है। ऐसे में डिजिटल कारोबार, टेक्नोलॉजी, कंटेंट, डेटा एनालिटिक्स और बदलते उपभोक्ता व्यवहार को समझने वाले युवा प्रोफेशनल्स की नई सोच इस संस्था को और मजबूत बना सकती है।
यह बात अनुभव की जगह युवाओं को लाने की नहीं है, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलने की है। हर सफल संस्था तब बेहतर काम करती है, जब अनुभवी नेतृत्व के साथ युवा पेशेवर भी जुड़ते हैं, जो नए विचार, नई क्षमताएं और बाजार की नई समझ लेकर आते हैं।
AAAI को उन लोगों का दायरा भी बढ़ाना चाहिए, जिनसे वह सलाह लेता है। आज ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री अकेले काम नहीं करता। किसी भी अभियान को सफल बनाने में ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज के साथ-साथ मार्केटर्स, कंसल्टेंट्स, टेक्नोलॉजी कंपनियां, उपभोक्ता शोधकर्ता और बिजनेस स्ट्रैटेजिस्ट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर AAAI इन क्षेत्रों के सम्मानित प्रोफेशनल्स को सलाहकार परिषदों या विशेष समितियों में शामिल करे, तो संस्था को नई सोच और व्यापक दृष्टिकोण मिलेगा। कई बार सबसे अच्छे विचार उन लोगों से आते हैं, जो किसी इंडस्ट्री को बाहर से देखते हैं।
आज अधिकांश लोग AAAI के बारे में तब सुनते हैं, जब वह गोआफेस्ट का आयोजन द ऐडवर्टाइजिंग क्लब के साथ करता है या फिर जब लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड की घोषणा होती है। दुर्भाग्य से इस वर्ष इस पुरस्कार को लेकर हुआ विवाद, सम्मान समारोह से कहीं अधिक चर्चा का विषय बन गया। इन सालाना आयोजनों के अलावा भी AAAI के पास पूरे वर्ष अधिक सक्रिय, प्रभावशाली और प्रासंगिक बनने का बड़ा अवसर है।
संस्था नियमित रूप से इंडस्ट्री से जुड़े मंचों का आयोजन कर सकती है, जहां उभरते रुझानों पर चर्चा हो। वह रिसर्च रिपोर्ट प्रकाशित कर सकती है, युवा प्रोफेशनल्स के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम शुरू कर सकती है और एजेंसीज, क्लाइंट्स, मीडिया कंपनियों तथा टेक्नोलॉजी पार्टनर्स के बीच संवाद को बढ़ावा दे सकती है। केवल आयोजनों के लिए पहचाने जाने के बजाय AAAI खुद को विचारों और सहयोग का सबसे सम्मानित मंच बना सकता है।
एक और महत्वपूर्ण पहल नेक्स्ट जेनरेशन काउंसिल का गठन हो सकती है, जिसमें एजेंसीज, डिजिटल कंपनियों, मीडिया संस्थानों और स्वतंत्र कंसल्टेंसी से जुड़े युवा पेशेवर शामिल हों। यह समूह प्रतिभा विकास, क्लाइंट्स की बदलती अपेक्षाओं और नए बिजनेस मॉडल जैसे विषयों पर अपने विचार साझा कर सकता है और वरिष्ठ इंडस्ट्री नेताओं के साथ मिलकर काम कर सकता है। इससे भविष्य का नेतृत्व भी व्यवस्थित तरीके से तैयार होगा, न कि केवल संयोग पर छोड़ दिया जाएगा।
इसके अलावा ऐसे पुरस्कार भी शुरू किए जा सकते हैं, जो उभरते हुए एजेंसी लीडर्स, नवाचारी उद्यमियों और डिजिटल दौर में ऐडवर्टाइजिंग की नई परिभाषा गढ़ने वाले प्रोफेशनल्स को सम्मानित करें। करियर के अलग-अलग चरणों में उत्कृष्टता को पहचानना यह संदेश देता है कि इंडस्ट्री अनुभव के साथ-साथ नए विचारों को भी समान महत्व देता है।
AAAI इससे भी बड़ा सपना देख सकता है। आज भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते और सबसे गतिशील ऐडवर्टाइजिंग बाजारों में शामिल है। यहां बनने वाले कई ऐडवर्टाइजिंग कैंपेंस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाता है। ऐसे में क्यों न AAAI हर चार वर्ष में वर्ल्ड ऐडवर्टाइजिंग कांग्रेस आयोजित करने की पहल करे? ऐसा मंच दुनिया भर के एजेंसी प्रमुखों, मार्केटर्स, मीडिया कंपनियों, टेक्नोलॉजी संगठनों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं को एक साथ ला सकता है। इससे न केवल इंडियन ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि AAAI की छवि भी एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की इंडस्ट्री संस्था के रूप में मजबूत होगी।
विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों के साथ मजबूत जुड़ाव भी AAAI की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। छात्रों के लिए आउटरीच प्रोग्राम, मेंटरशिप, इनोवेशन चैलेंज और अतिथि व्याख्यान जैसे प्रयास कक्षा और कार्यस्थल के बीच की दूरी कम कर सकते हैं। युवा प्रोफेशनल्स को यह महसूस होना चाहिए कि AAAI ऐसी संस्था है, जो उनके विकास और करियर को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाती है।
ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री कभी स्थिर नहीं रहा और उसकी सबसे पुरानी संस्था को भी स्थिर नहीं रहना चाहिए। इंडस्ट्री की विरासत को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे भविष्य के लिए तैयार करना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।
कोई यह नहीं कह रहा कि AAAI उन दिग्गजों का सम्मान करना बंद कर दे, जिन्होंने इंडियन ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री की मजबूत नींव रखी। उनका योगदान हमेशा अमूल्य रहेगा। लेकिन यदि यह संस्था युवा प्रोफेशनल्स के लिए भी जगह बनाए, एजेंसी जगत के बाहर से आने वाले नए विचारों का स्वागत करे और व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करे, तो इससे उसकी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता दोनों और मजबूत होंगी।
आखिरकार, बीते दौर के महान लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उन्हें सम्मानित करना नहीं है, बल्कि ऐसी संस्था छोड़कर जाना भी है, जो आने वाले कल की चुनौतियों और अवसरों के लिए पूरी तरह तैयार हो।