OpenAI प्रमुख सैम ऑल्टमैन ने स्वीकार किया कि उन्होंने AI के प्रभाव और कंपनियों में इसके इस्तेमाल की रफ्तार को लेकर पहले जरूरत से ज्यादा तेज अनुमान लगाया था।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच OpenAI (OpenAI) के प्रमुख सैम ऑल्टमैन (Sam Altman) ने AI को अपनाने की रफ्तार को लेकर अपनी पुरानी सोच पर खुलकर बात की है। उन्होंने स्वीकार किया कि तकनीक के विस्तार और इसके आर्थिक असर को लेकर उनके शुरुआती अनुमान वास्तविकता से ज्यादा महत्वाकांक्षी थे।
हाल ही में पॉडकास्टर डेविड सेनरा (David Senra) के साथ बातचीत में ऑल्टमैन ने बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि 2023 में GPT-4 (GPT-4) के आने के बाद कंपनियों के काम करने का तरीका काफी तेजी से बदल जाएगा। उनका अनुमान था कि AI के कारण बिजनेस की प्रक्रियाओं और कामकाज में जल्द ही बड़े स्तर पर बदलाव दिखाई देने लगेंगे। हालांकि, ऐसा बदलाव उनकी उम्मीद के मुताबिक तेजी से नहीं हुआ।
ऑल्टमैन के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि तकनीक बदलने के बावजूद लोगों और संस्थानों की कार्यशैली तुरंत नहीं बदलती। कंपनियां लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे सिस्टम, टूल्स और प्रक्रियाओं पर निर्भर रहती हैं। ग्राहक भी उन्हीं सेवाओं और कंपनियों के साथ जुड़े रहते हैं, जिनका इस्तेमाल वे पहले से करते आए हैं।
कर्मचारियों के स्तर पर भी बदलाव आसान नहीं होता। हर व्यक्ति के काम करने का एक स्थापित तरीका होता है और नई तकनीक को अपनाने के लिए केवल AI उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए काम करने की पूरी प्रक्रिया में बदलाव करना पड़ सकता है। यही वजह है कि AI की क्षमता बढ़ने के बावजूद उसका प्रभाव कंपनियों के रोजमर्रा के काम में धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है।
ऑल्टमैन ने इस धीमी गति को पूरी तरह नकारात्मक नहीं माना। उनके मुताबिक, धीरे-धीरे होने वाला परिवर्तन कंपनियों और समाज को नई तकनीक को समझने तथा उसके सही इस्तेमाल के तरीके खोजने का समय देता है। इससे संगठन यह तय कर सकते हैं कि AI को अपने मौजूदा कामकाज में किस स्तर पर शामिल किया जाए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से नौकरियों और काम करने के तरीकों को बदल रहा है। ऐसे में AI के असर को समझने वाली रिसर्च का तरीका भी लगातार बदल रहा है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से नौकरियों और काम करने के तरीकों को बदल रहा है। ऐसे में AI के असर को समझने वाली रिसर्च का तरीका भी लगातार बदल रहा है। इसी को देखते हुए OpenAI अपनी इकोनॉमिक रिसर्च टीम का विस्तार करने की तैयारी कर रही है। कंपनी ऐसे लोगों की तलाश में है, जिनके पास अच्छी एनालिटिकल क्षमता के साथ-साथ बदलते हालात के हिसाब से खुद को ढालने, टीम के साथ काम करने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता हो।
OpenAI की इकोनॉमिक रिसर्च टीम की अगुआई कंपनी के चीफ इकोनॉमिस्ट रोनी चटर्जी (Ronnie Chatterji) कर रहे हैं। उन्होंने Business Insider से बातचीत में बताया कि AI जिस तेजी से विकसित हो रहा है, उसके कारण रिसर्च से जुड़े सवाल भी तेजी से बदल रहे हैं। इसलिए इस टीम में काम करने वाले शोधकर्ताओं को ऐसे सवालों पर काम करने के लिए तैयार रहना होगा, जिनका जवाब पहले से तय नहीं है।
चटर्जी के मुताबिक, AI के क्षेत्र में बदलाव की रफ्तार इतनी तेज है कि रिसर्च टीम का काम भी लगातार बदल रहा है। उन्होंने कहा कि टीम यह समझने पर काम करती है कि AI का असर कर्मचारियों, कंपनियों, संस्थानों और पूरी अर्थव्यवस्था पर किस तरह पड़ रहा है।
तीन बड़े क्षेत्रों पर हो रहा है काम
चटर्जी ने बताया कि OpenAI की इकोनॉमिक रिसर्च टीम का काम मोटे तौर पर तीन बड़े हिस्सों में बंटा हुआ है।
पहला क्षेत्र यह समझना है कि AI पहले से नौकरियों और कर्मचारियों को किस तरह प्रभावित कर रहा है। इसमें यह देखना भी शामिल है कि कंपनियां AI को अपनाने के बाद किस तरह अपने काम करने के तरीके बदल रही हैं और इसका रोजगार पर क्या असर पड़ रहा है।
दूसरा क्षेत्र कंपनियों में AI को अपनाने और संगठनात्मक बदलाव से जुड़ा है। जैसे-जैसे कंपनियां ज्यादा सक्षम AI टूल्स का इस्तेमाल कर रही हैं, रिसर्च टीम यह समझने की कोशिश करती है कि AI सिर्फ काम को आसान बना रहा है या कंपनियों के काम करने और संगठन चलाने के तरीके में भी बड़ा बदलाव ला रहा है।
तीसरा क्षेत्र भविष्य में AI के संभावित आर्थिक प्रभावों को समझने पर केंद्रित है। इसमें ऐसे विषय भी शामिल हो सकते हैं, जो अभी पारंपरिक आर्थिक रिसर्च का हिस्सा नहीं रहे हैं।
चटर्जी ने उदाहरण के तौर पर Recursive Self-Improvement का जिक्र किया। इसका मतलब ऐसी संभावित स्थिति से है, जिसमें AI सिस्टम खुद को बेहतर बनाने में सक्षम हो सकें। उनके मुताबिक, AI के विकास के साथ इस तरह के विषय आने वाले समय में आर्थिक रिसर्च के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सिर्फ तकनीकी जानकारी काफी नहीं
OpenAI की इस टीम में काम करने के लिए सिर्फ तकनीकी विशेषज्ञता को ही पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। चटर्जी के मुताबिक, उम्मीदवारों में ऐसे सवालों पर काम करने की क्षमता होनी चाहिए, जिनके जवाब आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं को ऐसी परिस्थितियों में काम करने में सहज होना चाहिए, जहां चीजें स्पष्ट न हों। AI के तेजी से बदलते क्षेत्र में यह क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज कोई विषय छोटा या सीमित लग सकता है, लेकिन AI की नई क्षमताओं के सामने आने के बाद वही विषय महत्वपूर्ण बन सकता है।
टीम ऐसे लोगों को भी महत्व देती है जो बदलती प्राथमिकताओं के अनुसार खुद को ढाल सकें। यानी शोधकर्ताओं को केवल तय किए गए सवालों के जवाब तलाशने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उन्हें यह भी समझना होगा कि कौन से सवाल महत्वपूर्ण हैं और किन मुद्दों पर रिसर्च की जरूरत है।
सरकारों और यूनिवर्सिटी के साथ भी काम
OpenAI की इकोनॉमिक रिसर्च टीम का काम सिर्फ कंपनी के भीतर तक सीमित नहीं है। टीम OpenAI के कर्मचारियों के साथ-साथ सरकारों और विश्वविद्यालयों के साथ भी काम करती है। इसकी वजह यह है कि AI से जुड़े आर्थिक और नीतिगत सवाल काफी व्यापक हैं और उनका असर अलग-अलग क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
चटर्जी के मुताबिक, रिसर्च टीम के सदस्यों से यह उम्मीद भी की जाती है कि वे खुद महत्वपूर्ण सवालों की पहचान करें और यह तय करें कि उन सवालों के जवाब से किन लोगों या संस्थानों को फायदा हो सकता है।
अलग-अलग क्षेत्रों से लोगों को जोड़ रही टीम
रोनी चटर्जी 2024 में OpenAI से जुड़े थे। इससे पहले वह अमेरिकी सरकार और शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं में काम कर चुके हैं। वह अमेरिकी प्रशासन के $52 बिलियन CHIPS कार्यक्रम से भी जुड़े रहे हैं।
वह अमेरिका की नेशनल इकनॉमिक काउंसिल में एक्टिंग डिप्टी डायरेक्टर (Acting Deputy Director) और US कॉमर्स डिपार्टमेंट में चीफ इकनॉमिस्ट (Chief Economist) की भूमिका भी निभा चुके हैं। इसके अलावा वह Duke University में Business and Public Policy के प्रोफेसर हैं।
OpenAI में चटर्जी करीब एक दर्जन लोगों की इकोनॉमिक रिसर्च टीम का नेतृत्व कर रहे हैं और अब इसमें और लोगों को शामिल करने की तैयारी है।
इस टीम में इकोनॉमिस्ट और डेटा साइंटिस्ट के अलावा बिजनेस प्रोफेशनल्स, पूर्व शिक्षक और सरकार में काम कर चुके लोग भी शामिल हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले लोगों की यह विविधता इस बात को दिखाती है कि AI के आर्थिक असर को समझने के लिए केवल एक ही विषय की विशेषज्ञता काफी नहीं है।
AI जिस तेजी से लोगों के काम करने के तरीके और कंपनियों के संगठनात्मक ढांचे को बदल रहा है, उससे OpenAI की रिसर्च टीम के सामने लगातार नए सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में इस टीम में काम करने वालों के लिए सिर्फ सही जवाब जानना ही जरूरी नहीं होगा, बल्कि सही सवाल पहचानने और बदलती परिस्थितियों के साथ उस पर काम करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
नासा ने निचली कक्षा में बेहद कम हवा के घनत्व और खिंचाव को मापने वाली सस्ती तकनीक विकसित करने के लिए ऑर्बिटल क्लैरिटी चैलेंज शुरू किया है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट्स की कक्षा पर पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का असर लगातार बना रहता है। इसी प्रभाव को बेहतर तरीके से समझने के लिए नासा (NASA) ने 19 अगस्त 2026 को ऑर्बिटल क्लैरिटी चैलेंज (Orbital Clarity Challenge) नाम से एक नई प्रतियोगिता शुरू की है। इसका उद्देश्य ऐसी कम लागत वाली तकनीक तैयार करना है, जो निचली पृथ्वी कक्षा में मौजूद बेहद विरल हवा को सटीकता से माप सके।
यह प्रतियोगिता नासा के टेकलीप प्राइज प्रोग्राम (TechLeap Prize Program) के तहत आयोजित की जा रही है। इसमें भाग लेने वाली टीमों को ऐसे छोटे और व्यावहारिक उपकरण विकसित करने होंगे, जो अंतरिक्ष में हवा के घनत्व, दबाव या उससे पैदा होने वाले ड्रैग यानी खिंचाव का पता लगा सकें।
पृथ्वी से काफी ऊंचाई पर स्थित थर्मोस्फीयर (Thermosphere) में वायुमंडल बेहद विरल होता है। इसके बावजूद यह सैटेलाइट्स की गति और उनकी कक्षा को प्रभावित करता है। खासतौर पर जब सूर्य की गतिविधियां बढ़ती हैं, तब ऊपरी वायुमंडल गर्म होकर फैलता है। इसके परिणामस्वरूप सैटेलाइट्स पर वायुमंडलीय खिंचाव बढ़ सकता है और उनकी कक्षा में बदलाव आने की संभावना रहती है।
नासा के मुताबिक, इस चुनौती में ऐसे सेंसर विकसित करने पर जोर है जिन्हें मौजूदा महंगे वैज्ञानिक उपकरणों के मुकाबले कम लागत में तैयार किया जा सके। इन्हें बड़ी संख्या में बनाया जा सके और सामान्य व्यावसायिक अंतरिक्ष यानों पर आसानी से लगाया जा सके, यह भी प्रतियोगिता का अहम हिस्सा है।
यदि बड़ी संख्या में सैटेलाइट्स पर ऐसे सेंसर लगाए जाते हैं, तो वैज्ञानिकों को ऊपरी वायुमंडल की स्थिति से जुड़े ज्यादा व्यापक और लगातार आंकड़े मिल सकेंगे। इससे सैटेलाइट संचालकों को कक्षा में होने वाले बदलावों को समझने और जरूरत पड़ने पर उनकी स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है।
ऑर्बिटल क्लैरिटी चैलेंज को तीन चरणों में आयोजित किया जाएगा। इस पूरी प्रतियोगिता के लिए करीब 12 महीने की समयसीमा तय की गई है और अधिकतम चार टीमों को विजेता चुना जाएगा। विजेता टीमों के बीच कुल 5 लाख डॉलर यानी लगभग 5 करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि बांटी जाएगी।
सिर्फ नकद पुरस्कार ही नहीं, बल्कि विजेता टीमों को अपनी विकसित तकनीक को वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में परखने का अवसर भी मिलेगा। नासा उन्हें मुफ्त टेस्ट फ्लाइट उपलब्ध कराएगा, जिससे सेंसर की क्षमता का सीधे अंतरिक्ष में परीक्षण किया जा सकेगा।
ओपनएआई (OpenAI) ने ब्रायन हर्मन (Brianne Herman) को कॉन्ट्रैक्ट आधार पर B2B इंटीग्रेटेड मार्केटिंग लीड नियुक्त किया है। इससे पहले वह वेरिजॉन में थीं।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ओपनएआई (OpenAI) ने ब्रायन हर्मन (Brianne Herman) को B2B इंटीग्रेटेड मार्केटिंग लीड (B2B Integrated Marketing Lead) नियुक्त किया है। वह इससे पहले कंपनी में कॉन्ट्रैक्ट आधार पर इंटीग्रेटेड मार्केटिंग मैनेजर के रूप में काम कर रही थीं।
ओपनएआई से जुड़ने से पहले हर्मन ने वेरिजॉन (Verizon) में करीब नौ साल तक काम किया। वहां उनकी आखिरी भूमिका सीनियर मार्केटिंग मैनेजर की थी। इस दौरान उन्होंने मार्केटिंग से जुड़े विभिन्न कार्यों में अनुभव हासिल किया।
हर्मन के करियर में विज्ञापन क्षेत्र का अनुभव भी शामिल है। उन्होंने साची एंड साची (Saatchi & Saatchi) और ओगिल्वी एंड माथर (Ogilvy & Mather) जैसी प्रमुख विज्ञापन एजेंसियों के साथ काम किया है।
ओपनएआई में अपनी नई भूमिका में हर्मन कंपनी की B2B इंटीग्रेटेड मार्केटिंग गतिविधियों पर काम करेंगी। उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब कंपनी अपने AI उत्पादों और सेवाओं के बिजनेस उपयोग को लेकर मार्केटिंग और कम्युनिकेशन गतिविधियों का विस्तार कर रही है।
जोमैटो (Zomato) के संस्थापक दीपिंदर गोयल ने अपने नए पहनने वाले डिवाइस Temple का छोटा वर्जन पेश किया है। कंपनी जल्द इसके सीमित लॉन्च एडिशन की प्री-ऑर्डर बुकिंग शुरू कर सकती है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जोमैटो (Zomato) के संस्थापक दीपिंदर गोयल ने अपने नए वियरेबल डिवाइस Temple को लेकर नई जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि डिवाइस का नया वर्जन पहले दिखाए गए मॉडल की तुलना में आधे से भी छोटा हो गया है। हालांकि, आकार कम होने के बावजूद इसकी क्षमता को बरकरार रखने का दावा किया गया है।
गोयल के मुताबिक, वॉल्यूम के आधार पर Temple बाजार में मौजूद सबसे छोटे वियरेबल डिवाइसों में शामिल हो सकता है। इसे रोजमर्रा के इस्तेमाल के साथ-साथ ट्रेनिंग के दौरान पहनने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है।
जल्द शुरू होगी प्री-ऑर्डर बुकिंग
Temple के सीमित लॉन्च एडिशन की प्री-ऑर्डर प्रक्रिया जल्द शुरू होने की उम्मीद है। कंपनी का लक्ष्य 2026 के अंत से पहले इसकी डिलीवरी शुरू करना है। इच्छुक ग्राहक Temple की वेबसाइट की मेलिंग लिस्ट से जुड़कर लॉन्च से संबंधित अपडेट हासिल कर सकेंगे।
हालांकि, अभी डिवाइस की कीमत, प्री-ऑर्डर की सटीक तारीख और शुरुआती उपलब्धता से जुड़ी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। शुरुआती लॉन्च को सीमित रखने की तैयारी है, जिसके तहत पहले चरण में चुनिंदा ग्राहकों को डिवाइस उपलब्ध कराया जा सकता है।
रोजमर्रा और ट्रेनिंग के लिए तैयार हो रहा Temple
छोटे आकार के Temple को दैनिक जीवन और ट्रेनिंग के दौरान इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। कंपनी का दावा है कि इसका कॉम्पैक्ट डिजाइन इसे पहनने और साथ रखने को आसान बनाएगा।
फिलहाल डिवाइस में इस्तेमाल होने वाले सेंसर, तकनीक और अन्य फीचर्स की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में इसकी वास्तविक क्षमताओं और प्रदर्शन का आकलन लॉन्च के बाद ही किया जा सकेगा।
Temple is now less than half the size of what you've seen so far.
— Deepinder Goyal (@deepigoyal) August 21, 2026
Volumetrically, Temple is now the smallest wearable on the market, and the most^10 powerful. Living and training with Temple is going to change your life.
We will start taking pre-orders for our limited launch… pic.twitter.com/L7tCEW588p
दूरसंचार विभाग ने टेलीकॉम कंपनियों को इस नई व्यवस्था को अपने सिस्टम से जोड़ने और जरूरी तकनीकी बदलाव पूरे करने के लिए 30 नवंबर तक का समय दिया है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मोबाइल कनेक्शन की तय सीमा को लेकर भारत सरकार अब नियमों का पालन और सख्ती से कराने जा रही है। दूरसंचार विभाग (Department of Telecommunications) ने टेलीकॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि जिन ग्राहकों के नाम पर पहले से निर्धारित संख्या में मोबाइल कनेक्शन हैं, उन्हें नया SIM जारी न किया जाए। यह व्यवस्था 24 अगस्त से लागू होगी।
मौजूदा नियमों के अनुसार, सामान्य तौर पर एक व्यक्ति अपने नाम पर अधिकतम 9 मोबाइल कनेक्शन रख सकता है। वहीं जम्मू-कश्मीर, असम और पूर्वोत्तर राज्यों में यह सीमा 6 मोबाइल कनेक्शन की है।
नया SIM लेने से पहले होगी कनेक्शनों की जांच
नया मोबाइल कनेक्शन लेते समय ग्राहक को अपने नाम पर पहले से सक्रिय सभी मोबाइल नंबरों की जानकारी देनी होगी। इसमें अलग-अलग टेलीकॉम कंपनियों या दूसरे दूरसंचार क्षेत्रों से लिए गए कनेक्शन भी शामिल होंगे।
नया SIM जारी करने से पहले टेलीकॉम कंपनियां ग्राहक के मौजूदा मोबाइल कनेक्शनों की जांच करेंगी। इसके लिए सरकार के डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया जाएगा। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर पहले ही तय सीमा तक कनेक्शन मौजूद हैं, तो कंपनी उसे नया मोबाइल कनेक्शन जारी नहीं कर सकेगी।
सरकारी डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग टेलीकॉम कंपनियों से प्राप्त ग्राहक रिकॉर्ड मौजूद हैं। इनके जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के नाम पर कुल कितने मोबाइल कनेक्शन सक्रिय हैं। 23 अगस्त से प्लेटफॉर्म पर तय सीमा पूरी कर चुके ग्राहकों की पहचान के लिए तस्वीर आधारित सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी।
कंपनियों को 30 नवंबर तक सिस्टम अपडेट करने का समय
दूरसंचार विभाग ने टेलीकॉम कंपनियों को इस नई व्यवस्था को अपने सिस्टम से जोड़ने और जरूरी तकनीकी बदलाव पूरे करने के लिए 30 नवंबर तक का समय दिया है।
अगर तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी ग्राहक को निर्धारित सीमा से अधिक मोबाइल कनेक्शन जारी हो जाता है, तो सरकार ने इसके लिए अंतरिम व्यवस्था भी रखी है। ऐसे अतिरिक्त कनेक्शन को समस्या का समाधान होने तक एक दिन के लिए तत्काल निलंबित किया जा सकता है। यह कार्रवाई ग्राहक आवेदन फॉर्म में दी गई शर्तों के आधार पर की जाएगी।
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य लोगों के नाम पर मोबाइल कनेक्शनों की संख्या को निर्धारित सीमा के भीतर रखना और नियमों का प्रभावी तरीके से पालन सुनिश्चित करना है।
भारत में स्टारलिंक की सेवा शुरू होने से पहले कंपनी को कई नियामकीय मंजूरियों की जरूरत है। सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के कारण स्टारलिंक की मंजूरी प्रक्रिया में पहले भी अड़चनें आई हैं।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की तैयारी कर रहे एलन मस्क (Elon Musk) ने ग्रामीण इलाकों को लेकर स्टारलिंक (Starlink) की योजना के संकेत दिए हैं। मस्क के मुताबिक, स्टारलिंक भारत के उन क्षेत्रों तक इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाने में मदद कर सकता है, जहां अभी तेज और भरोसेमंद इंटरनेट उपलब्ध नहीं है। खास तौर पर ग्रामीण इलाकों को इस योजना में प्राथमिकता मिलने की उम्मीद है।
मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए स्टारलिंक की ग्रामीण कनेक्टिविटी योजना का जिक्र किया। जिस पोस्ट को उन्होंने साझा किया, उसमें भारत के कई गांवों में बेहतर 4G कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं होने का दावा किया गया था। साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इंटरनेट सब्सक्रिप्शन और कनेक्टिविटी की पहुंच में अंतर का भी उल्लेख किया गया।
भारत में स्टारलिंक की सेवा शुरू होने से पहले कंपनी को कई नियामकीय मंजूरियों की जरूरत है। सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के कारण स्टारलिंक की मंजूरी प्रक्रिया में पहले भी अड़चनें आई हैं। ऐसे में मस्क का ताजा बयान भारत में कंपनी की आगे की रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्टारलिंक ने अपने जेनरेशन-2 सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन को मंजूरी दिलाने के लिए भारतीय अंतरिक्ष नियामक इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के समक्ष दोबारा आवेदन किया है। नई पीढ़ी के सैटेलाइट सिस्टम में डायरेक्ट-टू-डिवाइस कनेक्टिविटी जैसी तकनीक भी शामिल है।
स्टारलिंक की सबसे बड़ी खासियत इसका सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सिस्टम है। पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क की तरह इसके लिए हर इलाके में नेटवर्क टावर लगाने की जरूरत नहीं होती। इसके बजाय सैटेलाइट से इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध कराया जाता है।
पैरेंटल कंट्रोल के जरिए माता-पिता क्वाइट आवर्स (Quiet Hours) भी निर्धारित कर सकेंगे। जोखिम वाली परिस्थितियों में उन्हें सुरक्षा संबंधी नोटिफिकेशन भी मिल सकेंगे।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
ओपनएआई (OpenAI) ने किशोरों के लिए खास तौर पर तैयार किया गया ChatGPT पेश किया है। कंपनी ने इसमें सीखने के साथ-साथ सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई अतिरिक्त फीचर्स शामिल किए हैं। यह लॉन्च ऐसे समय में हुआ है, जब किशोरों के बीच एआई चैटबॉट के इस्तेमाल और इसके मानसिक स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
ओपनएआई ने सितंबर 2025 में किशोरों के लिए उम्र के अनुरूप नीतियों और सुरक्षा उपायों वाला विशेष ChatGPT अनुभव विकसित करने की घोषणा की थी। अब ChatGPT for Teens के जरिए स्टडी और सेफ्टी से जुड़े मौजूदा और नए फीचर्स को एक जगह लाया गया है। यह अनुभव 13 से 17 साल के यूजर्स के लिए अपने आप लागू होगा। इसमें पिछले साल जुलाई में पेश किया गया स्टडी मोड (Study Mode) भी शामिल है।
यह मोड सीधे जवाब देने के बजाय मार्गदर्शक सवालों और चरणबद्ध तरीके से किसी विषय को समझने में मदद करता है। असाइनमेंट को शॉर्टकट से पूरा करने की कोशिश करने वाले किशोरों को होमवर्क से जुड़े रिमाइंडर के जरिए दोबारा स्टडी मोड की ओर ले जाया जाएगा। माता-पिता स्टडी आवर्स (Study Hours) तय कर सकेंगे। इसके अलावा चैटबॉट क्विज और सीखने में मदद करने वाले विजुअलाइजेशन भी उपलब्ध कराएगा।
सुरक्षा के लिहाज से किशोरों के लिए बनाए गए ChatGPT में खुद को नुकसान पहुंचाने, हिंसा, ईटिंग डिसऑर्डर, खतरनाक गतिविधियों और सेक्स से जुड़े स्पष्ट या ग्राफिक कंटेंट जैसे संवेदनशील मामलों के लिए मजबूत सुरक्षा उपाय होंगे। लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर किशोरों को ब्रेक लेने के लिए भी रिमाइंडर दिए जाएंगे।
क्रिएटर्स के लिए नेटफ्लिक्स अतिरिक्त कमाई और 325 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स तक पहुंच का अवसर देता है। हालांकि, कुछ क्रिएटर्स ने इन व्यवस्थाओं से दूरी भी बनाई है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
यूट्यूब (YouTube) लोकप्रिय क्रिएटर्स को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़े रखने के लिए बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है। ब्लूमबर्ग (Bloomberg) की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी चुनिंदा क्रिएटर्स के साथ मल्टी-मिलियन डॉलर के इंसेंटिव पर चर्चा कर रही है, ताकि वे तय अवधि तक अपने वीडियो को एक्सक्लूसिव तौर पर यूट्यूब पर उपलब्ध रखें।
प्रस्तावित डील अलग-अलग स्वरूप में हो सकती हैं। यूट्यूब कुछ क्रिएटर प्रोग्राम्स को सीधे फंड करने और क्रिएटर्स को बड़े ब्रांड पार्टनरशिप अवसरों में हिस्सेदारी देने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रहा है। हालांकि, अभी किसी डील को अंतिम रूप नहीं दिया गया है और कुछ क्रिएटर्स के साथ बातचीत एडवांस स्टेज में बताई जा रही है।
बिजनेस इनसाइडर (Business Insider) की रिपोर्ट के अनुसार, यूट्यूब कुछ चुनिंदा क्रिएटर्स के साथ बातचीत कर रहा है। कम से कम एक मामले में प्लेटफॉर्म ने एक्सक्लूसिव अवधि के लिए एक क्रिएटर को लाखों डॉलर देने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी मौखिक स्तर पर था और इसकी शर्तें अंतिम नहीं हुई थीं।
यूट्यूब यह संकेत भी दे रहा है कि जो क्रिएटर्स अपने वीडियो को उसी समय नेटफ्लिक्स पर भी रिलीज करेंगे, उन्हें प्लेटफॉर्म के कुछ फायदे नहीं मिल सकते। इनमें प्रमोशनल सपोर्ट, यूट्यूब इवेंट्स में भागीदारी और बड़े ब्रांड कैंपेन से जुड़े अवसर शामिल हो सकते हैं।
यह कदम ऐसे समय आया है जब नेटफ्लिक्स (Netflix) क्रिएटर-आधारित प्रोग्रामिंग पर अपना फोकस बढ़ा रहा है। स्ट्रीमिंग कंपनी एलन चिकिन चाउ (Alan Chikin Chow) और निक डिगियोवानी (Nick DiGiovanni) जैसे क्रिएटर्स को यूट्यूब के साथ-साथ नेटफ्लिक्स पर वीडियो उपलब्ध कराने के लिए भुगतान कर चुकी है।
क्रिएटर्स के लिए नेटफ्लिक्स अतिरिक्त कमाई और 325 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स तक पहुंच का अवसर देता है। हालांकि, कुछ क्रिएटर्स ने इन व्यवस्थाओं से दूरी भी बनाई है। नेटफ्लिक्स ने कुछ मामलों में वीडियो रिलीज से कई दिन पहले जमा करने और मौजूदा ब्रांड स्पॉन्सरशिप हटाने की मांग की है।
गूगल लेंस के जरिए छात्र पढ़ाई की सामग्री की तस्वीर लेकर उससे जुड़े कॉन्सेप्ट को समझ सकेंगे। AI Overview संभावित गलतियों की पहचान करने और आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन देने में मदद करेगा।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गूगल (Google) ने छात्रों के लिए अपने सर्च (Search) और जेमिनी (Gemini) प्लेटफॉर्म पर नए AI-पावर्ड लर्निंग फीचर्स पेश किए हैं। इनका उद्देश्य कठिन विषयों को समझने, परीक्षा की तैयारी करने, स्टडी मैटेरियल व्यवस्थित करने और सवालों को हल करने में छात्रों की मदद करना है।
गूगल सर्च अब जटिल विषयों के लिए इंटरैक्टिव विजुअल एक्सपीरियंस तैयार कर सकेगा। उदाहरण के तौर पर pH स्केल जैसे विषयों की विजुअल व्याख्या AI Overview में दिखाई जा सकती है। वहीं AI Mode यूजर के सवालों के आधार पर ज्यादा कस्टमाइज्ड अनुभव तैयार करेगा। यह सुविधा AI Mode में अंग्रेजी भाषा में दुनियाभर में उपलब्ध कराई गई है और AI Overviews में भी इसका रोलआउट शुरू हो गया है।
छात्र अब सर्च के जरिए अलग-अलग विषयों और परीक्षाओं के लिए प्रैक्टिस क्विज भी तैयार कर सकेंगे। इनमें साइंस, मैथ्स, ह्यूमैनिटीज और विदेशी भाषाओं के अलावा ACT, AP, ENEM, GRE, JEE, LSAT, MCAT, NEET और SAT जैसी परीक्षाएं शामिल हैं। क्विज में जवाबों की व्याख्या और आगे सीखने के लिए लिंक भी दिए जाएंगे।
गूगल लेंस (Google Lens) के जरिए छात्र पढ़ाई की सामग्री की तस्वीर लेकर उससे जुड़े कॉन्सेप्ट को समझ सकेंगे। AI Overview संभावित गलतियों की पहचान करने और आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन देने में मदद करेगा।
इसके अलावा AI Mode में स्टडी नोटबुक की सुविधा दी जा रही है। छात्र लेक्चर स्लाइड्स, सिलेबस और वेब आर्टिकल जैसी सामग्री जोड़कर उसी आधार पर सवाल पूछ सकेंगे। यह सुविधा 180 से ज्यादा देशों में अंग्रेजी भाषा में रोलआउट हो रही है।
गूगल अपलोड किए गए नोट्स और अन्य स्टडी मैटेरियल से कस्टम डॉक्यूमेंट भी तैयार कर सकेगा। वहीं Gemini में मल्टी-स्टेप रिसर्च, इंटरैक्टिव 3D सिमुलेशन और स्टडी हब जैसे फीचर्स भी जोड़े जा रहे हैं। 3D मॉडल के जरिए छात्र DNA जैसे जटिल विषयों को घुमाकर और जूम करके समझ सकेंगे।
टेलीग्राम (Telegram) ने .gram इंटरनेट डोमेन के लिए आवेदन किया है। मंजूरी मिलने पर यूजर्स को username.gram जैसे वेब एड्रेस और आसान तरीके से वेबसाइट बनाने की सुविधा मिल सकती है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
टेलीग्राम (Telegram) के संस्थापक और सीईओ पावेल डुरोव (Pavel Durov) ने बताया है कि कंपनी ने .gram इंटरनेट डोमेन के लिए आवेदन किया है। अगर इस आवेदन को मंजूरी मिलती है, तो टेलीग्राम के 1 अरब से ज्यादा यूजर्स को अपने यूजरनेम के आधार पर yourname.gram जैसा वेब एड्रेस मिल सकता है।
इस व्यवस्था के तहत टेलीग्राम यूजरनेम को इंटरनेट एड्रेस के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। उदाहरण के तौर पर किसी यूजर को durov.gram जैसा वेब एड्रेस मिल सकता है। हालांकि, कंपनी के आवेदन की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है और अंतिम फैसला इंटरनेट डोमेन व्यवस्था संभालने वाली संस्था आईकैन (ICANN) को करना होगा।
टेलीग्राम का प्लान सिर्फ डोमेन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। कंपनी यूजर्स को आसान तरीके से वेबसाइट बनाने और कंटेंट प्रकाशित करने की सुविधा भी दे सकती है। इसके लिए यूजर्स को जटिल तकनीकी जानकारी सीखने के बजाय सामान्य भाषा में निर्देश देने की सुविधा मिल सकती है।
.gram डोमेन को सामान्य इंटरनेट डोमेन की तरह नहीं देखा जाएगा। इसका नियंत्रण टेलीग्राम के पास रहेगा और इससे जुड़े वेब एड्रेस कंपनी के सिस्टम से जुड़े होंगे। यानी username.gram जैसे पते किसी दूसरे प्रदाता के पास सामान्य डोमेन की तरह आसानी से ट्रांसफर नहीं किए जा सकेंगे।
इस व्यवस्था से टेलीग्राम को अपनी इंटरनेट आधारित सेवाओं और डोमेन सिस्टम पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है। कंपनी पहले अपने t.me लिंक सिस्टम से जुड़ी बड़ी रुकावट का सामना कर चुकी है।
आईकैन ने 2026 में नए इंटरनेट डोमेन के आवेदन की प्रक्रिया 12 अगस्त को बंद की है। इसके बाद आवेदनों की जांच, आपत्तियों और अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। संस्था के मुताबिक आवेदन सामने आने के बाद तकनीकी और वित्तीय पहलुओं की भी समीक्षा की जाएगी।
इसलिए टेलीग्राम का .gram आवेदन वास्तव में स्वीकार किया गया है या नहीं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि आगे आवेदन सूची सामने आने के बाद ही हो सकेगी। अगर आवेदन मंजूर भी हो जाता है, तो डोमेन सेवा शुरू होने में कुछ समय लग सकता है।