होम /
विचार मंच /
रजनीकांत कैसे बने तलयवर, बताया वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने
रजनीकांत कैसे बने तलयवर, बताया वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने
<h1><em><span style="font-size: 15px;"><span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; color: black; letter-spacing: -0.4pt;">रजनीकात की फिल्म 'कबाली; धमाल मचा रही है। नए रिकॉर्ड बना रही है, सुर्खियों का हिस्सा बन चुकी इस फिल्म पर दैनिक हिन्दुस्तान की सीनियर फीचर एडिटर और बॉलीवुड को करीब से जानने वाली पत्रकार जयंती रंगनाथन ने अपने एक लेख के जरीए
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
रजनीकात की फिल्म 'कबाली; धमाल मचा रही है। नए रिकॉर्ड बना रही है, सुर्खियों का हिस्सा बन चुकी इस फिल्म पर दैनिक हिन्दुस्तान की सीनियर फीचर एडिटर और बॉलीवुड को करीब से जानने वाली पत्रकार जयंती रंगनाथन ने अपने एक लेख के जरीए रजनीकांत के बारे में कई अनजानी बातें बताई हैं, जिसे हम आपके साथ शेयर कर रहे हैं...
तलयवर है आम आदमी का नायक
जयंती रंगनाथन, सीनियर फीचर एडीटर, हिन्दुस्तान
तलयवर की नई फिल्म ‘कबाली’ रिलीज हो गई है। उन्होंने अपने करोड़ों प्रशंसकों से अपील की है कि उनके आदमकद पोस्टर
को लाखों लीटर दूध से न नहलाया जाए, इसकी बजाय दूध किसी गरीब को दान कर दें। तलयवर ने कहा है, न मानने का सवाल कहां उठता है? प्रशंसक बौरा रहे हैं, सारे सिनेमा हॉल हफ्ते भर के लिए बुक हो चुके हैं।
पहला दिन, पहला शो नहीं देखा, तो तलयवर के प्रशंसक किस मुंह से हुए? लेकिन तलयवर रजनीकांत हैं कहां? फिल्म के प्रचार में तो खैर वह कभी हिस्सा नहीं लेते, कभी अपनी फिल्म को लेकर मीडिया के पास नहीं जाते और न ही किसी किस्म का प्रमोशन करते हैं। इस बार अपनी फिल्म ‘कबाली’ पूरी करने के बाद वह हमेशा की तरह हिमालय नहीं गए, बल्कि कैलिफोर्निया चले गए हैं, स्वास्थ्य लाभ के लिए।
तलयवर यानी पालनहार, बॉस, हालांकि 65 साल के रजनीकांत अपने लिए इस संबोधन से घबराते हैं। समूचे तमिलनाडु में वह सिर्फ अपने प्रशंसकों के तलयवर ही नहीं, अर्द्धदेव (डेमीगॉड) हैं। उनके नाम के कई मंदिर हैं। हर फिल्म के प्रदर्शन से पहले शहरों और कस्बों में कई मीटर ऊंची पोस्टर और मूर्तियां लगाई जाती हैं, जिसे श्रद्धालु दूध से नहलाते हैं। रजनीकांत से पहले भी दक्षिण भारत में ऐसे कई सितारे हुए हैं, जिनके लिए प्रशंसकों ने दीवानगी की सारी हदें पार की हैं। तमिलनाडु में फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं देखी जातीं, वे जनमानस की जिंदगी का हिस्सा हैं। अपने प्रिय सितारे की फिल्म को आत्मसात करने के लिए ये प्रशंसक दीवानगी की हद तक पहुंच जाते हैं। तलयवर की बीमारी की खबर पाकर उनके 1008 प्रशंसक मुरुगन के मंदिर में जाकर सिर मुंडा लेते हैं, हजारों लोग उपवास रखते हैं, तो कई उनकी तस्वीर जड़ी लॉकेट पहनकर उनकी जिंदगी के लिए दुआएं मांगते हैं।
तमिल फिल्मों में हिंदी फिल्मों की अपेक्षा नाटकीयता का पुट हमेशा से ही अधिक रहा है। डायलॉग, अभिनय, मार-पीट, नाच-गाना, सब अतिरंजित होता है। यह अतिरंजना यहां के प्रशंसकों में भी नजर आती है, जो हर काम को बढ़-चढ़कर करने में विश्वास रखती है।
पिछली सदी के पांचवें और छठे दशक में अभिनेता और बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने एमजी रामचंद्रन जब परदे पर आम आदमी की आवाज बनकर दहाड़ते थे, तो उनके चाहने वाले थियेटर से बाहर ही नहीं निकलना चाहते थे। एमजीआर के बाद रजनीकांत ऐसे सितारे बने, जिनके प्रशंसक लगभग चार दशकों से उनके दीवाने बने हुए हैं। उनके लिए तलयवर ऐसे शख्स हैं, जिनके शब्दकोश में असंभव शब्द है ही नहीं। रजनीकांत पर बने अनगिनत चुटकुलों का मर्म भी यही होता है।
रजनीकांत के तलयवर बनने के पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। मूलत: मराठी भाषी रजनीकांत के माता-पिता बैंगलोर (अब बेंगलुरु) में बस गए थे। मां ने अपने सबसे छोटे बेटे को नाम दिया था शिवाजी राव गायकवाड। पर मां का साथ उन्हें बहुत कम मिल पाया। बड़े भाई-बहन और पिताजी ने उनकी परवरिश की। स्कूली दिनों में वह नाटकों में काम करने लगे। पौराणिक नाटकों में काम करने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी थी। वह बनते थे दुर्योधन। उसी दुनिया में उन्हें नया नाम मिला रजनीकांत। वे दिन थे, जब उनका परिवार बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था। रजनीकांत ने उस दौर में कुली, बढ़ई और अंतत: बैंगलोर रोडवेज में कंडक्टर की नौकरी कर ली। उनके मित्र राज बहादुर उनके अभिनय के कायल थे, उन्होंने ही रजनीकांत को एक तरह से ठेलकर मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट में अभिनय का प्रशिक्षण लेने भेजा। प्रशिक्षण के दौरान ही तमिल फिल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक बालचंदर की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने अपनी फिल्म अपूर्व रागंगल में उन्हें बतौर खलनायक ले लिया। इस फिल्म के नायक दक्षिण की फिल्मों के एक और महान कलाकार कमल हासन थे। इसके बाद रजनीकांत एक के बाद एक सीढि़यां चढ़ते चले गए।
वह क्या बात थी, जिसने एक सामान्य कदकाठी और गहरे रंग वाले इस कलाकार को सुपर स्टार बना दिया? इतना कि वह देश के सबसे अधिक कमाने वाले (एक फिल्म के लिए 50 करोड़ रुपये से अधिक) सितारे बन गए? रजनीकांत के पास दो काबिलीयत थीं- गजब का स्टाइल और अभिनय प्रतिभा। अस्सी के दशक में लगातार सफल फिल्में देने के बाद रजनीकांत सही मायने में तलयवर बने 1985 में बनी फिल्म श्री राघवेंद्र से। इसमें उन्होंने संत की भूमिका निभाई थी।
उनकी आटोबॉयोग्राफी लिखने वाले नमन रामचंद्रन कहते हैं, 'रजनीकांत को स्टाइल किंग माना जाता है। उनकी लोकप्रियता के पीछे उनके आम आदमी वाले रूप ने काफी काम किया है। परदे पर उन्हें देखने वालों को वह रूप अपने बीच का कोई अपना लगता था। जब से परदे पर उन्होंने नायक का किरदार निभाना शुरू किया, वह एक आम आदमी की तरह जिंदगी के संघर्ष का मुकाबला करते नजर आए। मैनरिज्म में रजनीकांत का कोई तोड़ नहीं है। बहुत कम लोगों को पता है कि वह अपनी कमाई का आधा हिस्सा दान कर देते हैं, गरीब बच्चों की पढ़ाई और इलाज वगैरह में। मैंने जब अपनी किताब में उनका यह पक्ष लिखा, तो उन्होंने इसे यह कहकर निकलवा दिया कि मैं नहीं चाहता कि कोई इसके बारे में जाने। उनकी सादगी उनका सबसे बड़ा अस्त्र है।'
रजनीकांत ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था- मुझे सिनेमा ने जो दिया है, वह मेरी कल्पना से बहुत परे है। मैं तो इस बात से भी बहुत खुश था कि बैंगलोर रोडवेज में कंडक्टरी के अलावा छुट्टियों के दिन मुझे नाटकों में काम करने का मौका मिल जाता है। फिल्मों में आना और सफल होना मेरी मंजिल कभी नहीं रहा। यह रास्ता जरूर था और आज भी है, जिसे मैं पूरी तरह जीता हूं।
बॉलीवुड के सितारे अपनी फिल्म रिलीज करने के लिए जहां छुट्टी का दिन तलाशते हैं, वहीं तलयवर की फिल्म जिस दिन रिलीज होती है, उस दिन कई कंपनियां अपने यहां अवकाश घोषित कर देती हैं। लगभग सौ करोड़ रुपये में बनी यह फिल्म सिर्फ तीन दिनों में ही दौ सौ करोड़ रुपये से अधिक कमा चुकी है। उम्मीद है कि यह सफलता के कुछ बड़े रेकॉर्ड भी बनाएगी। आलम यह है कि चेन्नई में फिल्म का टिकट न मिलने पर रजनीकांत के प्रशंसक मुंबई और दिल्ली तक यह फिल्म देखने आ रहे हैं। पर तलयवर हमेशा की तरह इस पूरे दृश्य से दूर हैं। जल्द ही यह बुखार फिर चढ़ेगा, जब वह अपनी अगली फिल्म रोबोट-2 के साथ परदे पर लौटेंगे।
साभार: दैनिक हिन्दुस्तान
टैग्स