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वरिष्ठ पत्रकार एम.जे.अकबर की किताब में पटेल खलनायक लगते हैं..नेहरू नायक...

संजय श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक जागरण छह दिन पहले

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

संजय श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक जागरण छह दिन पहले एमजे अकबर ने कश्मीर पर राज्यसभा में बड़ा शानदार भाषण दिया। यूट्यूब पर मैने भी उसे सुना। वह मौजूदा एनडीए सरकार में मंत्री हैं। तेजतर्रार पत्रकार रहे हैं। खासे संपन्न हैं। अकबर ने करीब ढाई दशक पहले कश्मीर पर एक किताब भी लिखी थी-.''कश्मीर : बिहाइंड द वेल''। तब अकबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का करीबी कहा जाता था। वो नेहरू-गांधी परिवार की तारीफों के पुल बांधते थे। ''कश्मीर : बिहाइंड द वेल'' में एक बात जो प्रतिध्वनित हुई-वो थी कि कश्मीर समस्या आज जो भी है, उसके लिए असल में पटेल की बेरुखी ज्यादा जिम्मेदार हैं। पटेल की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हुए उन्होंने लिखा कि शायद पटेल चाहते ही नहीं थे कि कश्मीर का भारत में विलय हो। उस किताब के कुछ अंशों पर जरा गौर फरमाइए..इसके बाद शायद आपको लगे कि कश्मीर समस्या को लेकर एक बार लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की भूमिका पर भी राष्ट्र चर्चा कर ले- (मैने इसका हिन्दी में ट्रांसलेशन करने की कोशिश की है) 1946-47 के शीतकाल तक नेहरू और पटेल मान चुके थे कि विभाजन अटल है लेकिन दोनों के आंकलन एक नाजुक फर्क था-कश्मीर। सांप्रदायिक आधार पर देश में जो फांक बना था उसे देखते हुए पटेल ने कश्मीर को देश से बाहर मान लिया था, जवाहर लाल ने ऐसा नहीं माना था, कारण थे शेख अब्दुल्ला-वे ही इस गुत्थी की कुंजी थे। कश्मीर का सवाल लेकर नेहरू इतनी बार और इतनी भावुकता से माउंटबेटन से चर्चा कर चुके थे कि माउंटबेटन ने एक बार उन्हें रोगग्रस्त तक लिखा था। यही कारण है कि जब पटेल को राज्यों का महकमा सौंपा गया तो माउंटबेटन ने राहत महसूस की। लेकिन हैरानी की बात है कि जब पटेल और इस मामले में उनके सलाहकार वीपी मेनन भारत की पांच सौ रियासतों के एक से बढक़र एक नमूने राजाओं से निपट रहे थे तो हरिसिंह को भारत में विलय करने के लिए राजी करने की दिशा में वो क्यों आगे नहीं बढ़े? ये बात बिल्कुल तर्कसम्मत लगती है कि पटेल के मन में कहीं इस बात की हिचक रही हो कि सीमा पर एक मुस्लिम बहुत राज्य रखा जाए लेकिन नेहरू और अब्दुल्ला तो थे जो इस प्रकार के विलय को जनसमर्थन दिलाने की गारंटी दिला रहे थे। ऐसे में ये बात असामान्य लगती है कि राज्यों के मामलों के मंत्रालय ने हरिसिंह को भारत में लाने की कोशिश की ही नहीं-विभाजन से पहले तो नहीं ही की, इससे भी अवाक ये तथ्य कर जाता है कि 15 अगस्त के बाद कोई कोशिश नहीं की गई। पटेल बहुत आसानी से हरिसिंह पर दबाव डाल सकते थे कि वो अब्दुल्ला को रिहा करें और तब पाकिस्तान के हमले से पहले समझौते का कोई रास्ता भी निकाला ही जा सकता था। अगर ये हो जाता तो समस्या युद्ध के मैदान तक नहीं पहुंचती। सच तो ये है कि नेहरू ने यदि अपना दबाव बनाए नहीं रखा होता तो शेख अब्दुल्ला की रिहाई अंत तक नहीं होती और फिर बात हाथ से निकल ही जाती। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने पटेल के सलाहकार और राज्य मामलों के मंत्रालय के सचिव वीपी मेनन की पुस्तक पॉलिटिकल इंटीग्रेशन ऑफ इंडिया (ओरिएंट लांगमैन, कलकत्ता 1956) का हवाला देते हुए लिखा ''पाकिस्तान ने यथास्थिति का समझौता कश्मीर से किया था लेकिन हम इसके परिणामों की जांच के लिए समय चाहते थे। हमने उस राज्य को अकेला छोड़ दिया था। हमने महााजा से विलय के लिए भी नहीं कहा, हालांकि उस वक्त तक रैडक्लिफ दस्तावेज के मुताबिक हमें इस राज्य तक जाने वाली सडक़ मिल चुकी थी। जनसंख्या का जैसा विभाजन वहां था, उस कारण भी कश्मीर की समस्या विचित्र ही थी। इन सबसे बढक़र ये कि हमारे हाथ समस्याओं में बुरी तरह उलझे थे और मैं सच कहूं तो सीधी सी बात ये है कि मेरे पास कश्मीर के लिए कोई वक्त था ही नहीं।'' अकबर अपनी किताब में आगे लिखते हैं, ''हैरान कर देने वाली स्वीकारोक्ति है ये। राज्यों के मंत्रालय के सचिव को वक्त ही नहीं था कि कश्मीर के बारे में सोचे। मेनन ने स्वीकार किया है कि कश्मीर के भारत में विलय की परिस्थिति तो रैडक्लिफ के फैसले से बनी। यदि पटेल और मेनन ने उस दबाव का आधा दबाव भी हरि सिंह पर डाला होता, जो उन्होंने जोधपुर पर डाला था तो अब्दुल्ला कब के रिहा हो चुके होते और त्रिपक्षीय वार्ता द्वारा पाकिस्तान हमले से कहीं पहले कश्मीर का भारत में विलय हो चुका होता, इसी की वकालत तो नेहरू करते आ रहे थे। उन्होंने तो अपने मंत्रिमंडल को सावधान भी किया था कि पाकिस्तान कश्मीर पर हमले की तैयारी कर रहा है और ऐसी किसी फौजी कार्रवाई से पहले भारत को कश्मीर का मामला सुलझा लेना चाहिए।'' अपनी इसी पुस्तक में एमजे अकबर ने एचवी हॉडसन की किताब द ग्रेट डिवाइड का हवाला देकर पटेल को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। '' भारत सरकार का राज्य मंत्रालय बला की निष्क्रियता दिखाता रहा। उसने विलय का विचार करने के लिए जब राज्यों के प्रतिनिधियों को बुलाया तो उसमें से जानबूझकर कश्मीर का नाम ही हटा दिया गया। जानबूझकर हटा दिया- यह बात विस्मित करती है। इससे तो यहां तक लगता है कि कश्मीर को बाहर से बाहर रखने के लिए पटेल ने कोई साजिश कर रखी थी।'' बकौल अकबर की किताब ''कश्मीरः बिहाइंड द वेल'' में उन्होंने हॉडसन के जरिए ही फिर पटेल और उनके मंत्रालय पर निशाना साधा: ''स्वतंत्रता के बाद, कश्मीर सरकार के एक प्रतिनिधि ने राज्य मंत्रालय से भारत या पाकिस्तान में विलय की राय मांगी तो उसे सचिव (वीपी मेनन) ने कहा कि इस मामले में भारत सरकार कोई राय नहीं देना चाहती है और यदि कश्मीर से विलय का औपचारिक प्रस्ताव आया तो मंत्रालय उस पर सारी बातों को ध्यान रखकर विचार करेगा।'' संभव हो तो लोटस कलेक्शन रोली बुक्स की इस किताब को मंगाकर पढ़ें...  


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