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दस लाख रुपए देकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों को वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का संदेश...

<p style="text-align: justify;">'अगर आप पत्रकारिता के कोर्स में कोई फैक्ट्री समझ कर आए हैं तो प्लीज एक काम कीजिए। मुझसे कभी न मिलिये। कभी मिल भी जाइये तो मुंह फेर के चले जाइये। तल्खी से इसलिए कह रहा हूं कि आपको बात समझ आए। इतनी नौकरियां नहीं हैं। अगर होती तो तमाम जगहों पर कैंपस सलेक्शन हो रहे होते। दो चार की संख्या में भर्ती निकलती है। अगर नौकरी पा

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

'अगर आप पत्रकारिता के कोर्स में कोई फैक्ट्री समझ कर आए हैं तो प्लीज एक काम कीजिए। मुझसे कभी न मिलिये। कभी मिल भी जाइये तो मुंह फेर के चले जाइये। तल्खी से इसलिए कह रहा हूं कि आपको बात समझ आए। इतनी नौकरियां नहीं हैं। अगर होती तो तमाम जगहों पर कैंपस सलेक्शन हो रहे होते। दो चार की संख्या में भर्ती निकलती है। अगर नौकरी पाने के उद्देश्य से दस लाख देकर इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं तो भइया ये जुल्म मत करो।' हाल ही में अपने ब्लॉग पर एक खुले खत के जरिए पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों से ये कहा वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने। उनका ये खुला खत आप यहां पढ़ सकते हैं:

प्रेरितों के नाम पत्रकारिता के प्रेरक का पत्र

मेरे प्यारे प्रेरितों,

आज कल पत्रकारिता की पढ़ाई की कई दुकानें खुल गईं हैं। इन दुकानों की दुकान चलती रहे इसलिए अब इनकी भी रेटिंग होने लगी है। इनकी रेटिंग के नाम पर पत्रिकाओं की दुकान चलाती रहती है। आप उन्हें पढ़कर अपने सपनों की दुकान खोल लेते हैं। आप में से कइयों से मिल कर लगता है कि आपने चैनलों के एंकरों से प्रभावित होकर पत्रकार बनने का फैसला किया। आप उनसे प्रेरित हो जाते हैं और आपको प्रेरित करवाया भी जाता है। ध्यान रहे प्रेरित होना या फैन होना कृत्रिम प्रक्रिया है। वैसे तो आप लोग कई एंकर पत्रकारों से प्रेरित होंगे लेकिन मेर सामने आते हैं तो आप मेरा ही नाम लेते हैं। इसका डेटा बताता है कि ठगी का शिकार होने वाले कई छात्र मुझसे भी प्रेरित होते हैं। लिहाजा एक प्रेरक के रूप में मेरा फर्ज बनता है कि प्रेरित से साफ साफ कह दूं। पहले भी कस्बा में कह चुका हूं। कस्बा की पहुंच सीमित है सो दुबारा लिख रहा हूं। कृपया इस लेख को प्राइवेट और कई बार सरकारी संस्थानों में पत्रकारिता पढ़ रहे छात्रों तक पहुंचाने में मेरी मदद करें।

आप सभी जब ककड़ी की तरह खिच्चा खिच्चा उम्र में मुझसे टकरा जाते हैं तो मैं थोड़ा अवसाद से भर जाता हूं। ऐसा नहीं कि आप योग्य नहीं हैं या आप आगे जाकर कुछ नहीं करेंगे। आप में से कुछ काबिल भी होते हैं और कई झोल भी। कई बार झोल अच्छा कर जाते हैं और काबिल झोल हो जाते हैं। मैं आम तौर पर कइयों से मिल नहीं पाता और सच बात ये हैं कि मिलना भी नहीं चाहता क्योंकि मेरी फितरत ही ऐसी है।

मुझे ऐसा लग रहा है कि कई प्राइवेट संस्थान पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए तीन साल के कोर्स के लिए सिर्फ फीस के छह से दस लाख रुपए लेते हैं। कुछ दस से अठारह लाख तक ले रहे हैं। आप लोग सहर्ष दे भी रहे हैं। हॉस्टल और रहने खाने के भी खर्चे होते होंगे। अगर ये सही है तो भयावह है। प्रेरितों सुनो, सरकारी संस्थानों से दस बीस हजार की फीस देकर पत्रकारिता पढ़ने में कोई बुराई नहीं है लेकिन दस लाख फीस देकर जर्नलिज्म का कोर्स करेंगे तो आप मूर्ख हैं। आपको दुनिया के बाजार ने मूर्ख बनाया है और आपने अपने मां बाप को मूर्ख बनाया है। आप फंस गए दोस्त।

मुझे कोर्स और शिक्षक की गुणवत्ता का ज्ञान नहीं है इसलिए उस पर टिप्पणी नहीं करुंगा लेकिन मेरा दिल कहता है कि नजदीक से देखने पर वे भी मुझे निराश नहीं करेंगे। थर्ड क्लास ही होंगे। एक बात बताइए, जिस देश के सैंकड़ों टीवी चैनलों की पत्रकारिता का कोई स्तर नहीं हो, उस देश में टीवी पत्रकारिता पढ़ाने वाले कहां से आ गए? अगर वे सभी टॉप क्लास के हैं तो उसकी झलक आप छात्रों में क्यों नहीं दिखती है। अपवाद से नियम नहीं बनता है। चंद अच्छे प्रोफेसर हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इतने योग्य प्रोफेसर हैं कि वे हर जगह भरे होंगे।

मित्रों अगर पत्रकारिता की पढ़ाई आप विद्या यानी अकादमी के रूप में करते हैं तो कोई बात नहीं। फिर तो आप गहन अध्ययन करें, उसे लेकर शोध करें और दुनिया को समझने में मदद करें। संचार एक शानदार और गंभीर विषय है। आपको देखना होगा कि प्राइवेट संस्थान इस पैमाने पर कितने खरे उतरते हैं। सरकारी संस्थानों में कई काबिल लोग पढ़ा रहे हैं लेकिन वहाँ भी संचार के सभी शिक्षक बेहतर हैं, ऐसा भी नहीं है।

अगर आप पत्रकारिता के कोर्स में कोई फैक्ट्री समझ कर आए हैं तो प्लीज एक काम कीजिए। मुझसे कभी न मिलिये। कभी मिल भी जाइये तो मुंह फेर के चले जाइये। तल्खी से इसलिए कह रहा हूं कि आपको बात समझ आए। इतनी नौकरियां नहीं हैं। अगर होती तो तमाम जगहों पर कैंपस सलेक्शन हो रहे होते। दो चार की संख्या में भर्ती निकलती है। अगर नौकरी पाने के उद्देश्य से दस लाख देकर इन संस्थानों में पढ़ रहे हैं तो भइया ये जुल्म मत करो।

पहले पता कीजिए कि हिंदी अखबारों और चैनलों में शुरुआती तनख्वाह कितनी है। कितने वर्षों के बाद दस हजार से बढ़कर पचास हजार होती है। कितने साल में दस लाख की बचत होती है। मैं पुराने जमाने का आदमी हूं तो मेरी जानकारी थोड़ी पुरानी हो सकती है। अब हो सकता है कि लोग तीस हजार पर जॉइन कर रहे हों! कुछ लोगों की सैलरी अच्छी होती है मगर उन कुछ लोगों में शामिल होने में वर्षों निकल जाते हैं। मैं सिर्फ आपकी फीस और नौकरी की संभावना के अनुपात की बात कर रहा हूं।

हिंदी पत्रकारिता में अवसर होंगे मगर ये किस तरह के अवसर हैं, आप उनका भी तो मूल्याकंन कर लीजिए। आप हिंदी के एक लोकप्रिय परंतु रद्दी अखबार लीजिए और एक इंडियन एक्सप्रेस लीजिए। जनसत्ता नहीं। दोनों की खबरों के स्तर, दायरा और पन्नों की तुलना कीजिए। फिर देखिए कि किस चैनल में पत्रकारिता हो रही है, जो आपको प्रेरित करती है। अगर अपनी बुद्धि का विसर्जन करने का फैसला कर ही लिया है तो मैं क्या कर सकता हूं। क्या आप चीखने चिल्लाने के लिए दस लाख फीस देंगे।पांच लाख भी बहुत ज्यादा है। इतना ही शौक है तो फोन से अपना विडियो रिकॉर्ड कर यू-ट्यूब में डाल दीजिए।

अंग्रेजी में कोर्स करने वालों के साथ भी संकट है। कई बार हमें लगता है कि अंग्रेजी पत्रकारिता कोई स्वर्ग है। वहां की सैलरी के बारे में ज्ञान नहीं है लेकिन नौकरियां वहां भी कम है। वहां कई लोग छोड़ कर या अवकाश लेकर विदेशों में जाते रहते हैं तो जगह बनती रहती है। आप यहां पत्रकारिता का कोर्स कर रहे हैं और आपकी जगह कोई बेहतर खानदान और विदेशी कॉलेज वाला आकर ले लेगा। बाहर के कॉलेजों में संचार और मीडिया की गंभीर पढ़ाई तो होती ही है। उनका छात्र जीवन तो कम से कम ठीक ही गुजरता है। हर चैनल ने अपनी दुकान खोल रखी है और पत्रकारिता के नाम पर कैमरे का रिकॉर्ड बटन दबाना सीखाते हैं। स्पीड न्यूज करने के लिए आप दस लाख की फीस देंगे? घर में कोई डांटने वाला नहीं है क्या?

सवाल पैसे की कमी का नहीं है। हो सकता है आपके पास पैसे हों। आदरणीय मां बाप दहेज की रकम समझ कर निवेश कर देते हों। वैसे पत्रकार भी दहेज लेते हैं। बताइए कौन बेवकूफ होगा जो पत्रकार को दहेज देगा। इतना भी नहीं समझता होगा कि जो दहेज लेगा वो खाक पत्रकारिता करेगा। जो अपने जीवन में किसी जहर को पीने से मना नहीं कर सकता वो दूसरों के बारे में क्या लिखेगा बोलेगा। और लड़कियों को ये दहेज लेने वाले बंदर पसंद कैसे आ जाते हैं। एनि वे फ्रैंड्स।

अगर पत्रकारिता के कोर्स को प्रोडक्ट बनाकर बेचा जा रहा है तो बच्चों पता तो कर लो कि गली गली में बिखरे इन देसी हावर्डों से निकल कर कितने को नौकरी मिल रही है? मिलती भी है या नहीं मिलती है? कितने की नौकरी मिलती है? इंटर्नशिप के नाम पर आपको ख्वाब बेचा जाता है। प्यारे दस लाख देकर बेरोजगार रहने वाला कोर्स मत करो। नौकरी मिलने पर भी आप कई साल तक बेरोजगार ही रहते हैं। कई साल तक पंद्रह बीस हजार की नौकरी करनी पड़ती है। स्ट्रिंगर हो गए तो और भी बुरी हालत होती है। उनकी कहानी सुना दूंगा तो अपने वीसी का घेराव कर दोगे। घेराव करने से पहले सोच लेना कि जेएनयू और रोहित वेमुला के समय छात्र आंदेलन के बारे में तुम्हारी क्या राय थी।

जरूर इन्हीं में से बहुत लोग बहुत कुछ हो जाते हैं। जैसे मैं चिट्ठी छांटते छांटते यहां तक आ गया लेकिन ये तो लक बाइ चांस की भी कहानी है। जरूरी नहीं कि आपके लिए भी अवसरों का समुद्र इंतजार कर रहा है। लोग ऊपर आ भी रहे हैं मगर आंख फोड़ कर देखेंगे तो पता चलेगा कि उनकी संख्या दो या चार है। मैं अन्य चैनलों के लोगों से भी नहीं मिल पाता इसलिए सैलरी वगैरह का खास अंदाजा नहीं है लेकिन आम तौर पर प्रतीत होता है कि सामान्य रूप से लोगों को कम सैलरी मिलती है। अवसर के नाम पर वही गूगल आधारित काम है जो मैं भी करता हूं। कभी कभार कुछ चैनल सूखा वगैरह को यात्रा टाइप कर देते हैं उसके बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिकता फैलाते हैं। ये करने के लिए छह लाख फीस और चार लाख दिल्ली का खर्चा क्यों दोगे? सीधे किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर नेता बनने की संभावना तलाशो। जब अभी गलत सही का फर्क नहीं समझोगे तो कब समझोगे मित्र।

हिंदी पत्रकारिता का हाल देख लीजिए। इसका जनाधार है मगर कोई आधार नहीं है। दायरा सीमित है और स्तर विवादित। अपवाद की बात मत कीजिए। दूसरा किसी में हिम्मत नहीं है विश्व स्तरीय पत्रकारिता करने की। संसाधन बहाना है। अचानक कहां से पैसा आ गया प्रधानमंत्री का यात्रा कवर करने के लिए। पहले तो ये इतनी संख्या में रिपोर्टर भी नहीं भेजते थे। हिंदी पत्रकारिता अपने जनाधार को असरदार नहीं बनाती बल्कि किसी राजनीतिक प्रभाव के विस्तार में आसानी से सहायक बन जाती है।यह हाल अंग्रेजी का भी है। जरा संपादकों के लेख को ध्यान से पढ़िये, पता चलेगा।

हिंदी का आम पत्रकार आता तो है जुनून लेकर लेकिन जब संस्थाएं मौका नहीं देती है तो वह भी जल्दी ठंडा पड़ जाता है। साधारण परिवारों से होने के कारण नौकरी मिलने का ही अहसान चुकाने के लिए तमाम तीर्थ यात्राएं करने लगता है। ज्योतिष से मूंगा पुखराज बनवा लेता है और कलाई में रक्षा बंधवा लेता है। हिंदी के नौकरीदेवा संपादकों के फेसबुक कमेंट पढ़कर भावुक या प्रभावित होते रहता है। इस देश का हर आदमी खुद को अवतार मोड में देखता है। कुछ लोग अवतार से आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लग जाते हैं।

मेरा काम सिर्फ लिखना है तो लिख दे रहा हूं। वैसे आपके लिए लिखना भी नहीं चाहिए था। जो जवानियां महंगी फीस और घटिया पढ़ाई के फर्क को राजनीतिक तौर से नहीं देख पाती हैं, वो किसी काम की नहीं होती हैं। इतना तो आपको देखना चाहिए था कि क्यों दस लाख देकर पत्रकारिता की पढ़ाई करें। किस लिए? जिस पेशे में न नौकरी का सिस्टम है, न वेकैंसी का है उसमें आप भेंड की तरह आएंगे तो आप समझिए। जरूर कीजिए पत्रकारिता मगर जिन बंदर एंकरों से प्रेरित होकर लाखों रुपए दे रहे हैं वो मत दीजिए। प्लीज। नौजवान पत्रकार तो आने ही चाहिएं मगर दस लाख देकर नहीं दोस्त। वो पैसा लेकर बार्सीलोना और टोक्यो घूम आइए।

हम लोगों की सूरत से जो आप सपने देख रहे हैं, वो एक हद तक ही ठीक है। हम भी आपकी उम्र में ऐसे सपने देखते थे। हालांकि मैं वो भी नहीं देखता था, मगर इससे बात समझ में आती है तो लिख दे रहा हूं। ऐसा भी मुगालता नहीं है कि आप हम एंकरों को देख कर ही पत्रकारिता में आते हैं। कई लोग पत्रकारिता के लिए आते हैं और करते भी हैं। मगर दोस्तों अपनी जवानी में थोड़ी धार लाओ। बोका बनके मत घूमो। कोई तुम्हारी पूंजी हड़प कर बोका बना रहा है। किसी पत्रकार से पूछना कि उसके खाते में दस लाख की बचत करने में कितने साल लगे।

ओ मेरे प्यारे प्रेरितों अपने इस प्रेरक की बात याद रखना। मैंने प्रेरणा बनने का अहसान चुका दिया। अब तुम प्रेरित होने का फर्ज निभाओ। मैं बदल नहीं सकता मगर लिख सकता हूं। छात्र हो राजनीतिक चेतना का विस्तार करो। समझो सिस्टम और बाजार के खेल को। किसी उत्पाद का उतना ही मूल्य चुकाओ जितनी उसकी उपयोगिता हो। आप लोगों को जब इंटर्नशिप नहीं मिलती है और नौकरियां नहीं मिलती हैं तो दुख होता है। आपके हालात से गुजरे हैं इसी मोह के कारण लिख रहा हूं। मेरे लेख में निगेटिव पॉजिटिव मत खोजना। फिर भी लगता है कि बीस लाख खर्च कर पत्रकारिता पढ़ी जाए तो दो चार लाख मुझे भी किसी एकादशी को दे जाना। माल रखकर आशीर्वाद दे दूंगा। बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

आपका प्रेरक

रवीश कुमार

(साभार: कस्बा ब्लॉग से)

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