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'रेडियो के बारे में उस दिन टूट गया मेरा ये भ्रम'

रेडियो का नाम सुनते ही आवाज की दुनिया कानों में रस घोलने लगती...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अमिता कमल

रेडियो का नाम सुनते ही आवाज की दुनिया कानों में रस घोलने लगती है। ये आवाज का माध्यम है और सबसे जुदा भी। आजकल का युग इंटरनेट का युग है। लोग कई बार हमसे पूछते हैं कि इंटरनेट के इस दौर में कोई रेडियो सुनता भी होगा? तो मैं कहूंगी कि रेडियो की प्रासंगिकता अभी भी बनी हुई है। रेडियो की मोबिलिटी का कोई सानी नहीं है। मोबाइल के आ जाने से रेडियो और भी करीब हो गया है।

आज रेडियो दिवस है तो मैंने सोचा कि आज कुछ लिखा जाए, अपने ‘जन्मदाता’ के विषय में। तो बात करते हैं रेडियो के इतिहास की। 13 फरवरी 1894 में पहला पूर्ण टेलीग्राफी सिस्टम बना, जिसे ‘रेडियो’ कहा गया। सबसे पहले रेडियो को सेना एवं नौसेना में सफलतापूर्वक प्रयोग में लाया गया। वर्ष 1920 में अमरीका के पिट्सबर्ग में पहला रेडियो स्टेशन खोला गया, जिसे वहां हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव के नतीजे प्रसारित करने के लिए इस्तेमाल में लाया गया। वर्ष 1923 में रेडियो में विज्ञापन की शुरुआत हुई। इसके बाद ब्रिटेन में बीबीसी और अमरीका में सीबीएस और एनबीसी जैसे सरकारी केंद्रों की शुरुआत हुई। भारत में रेडियो की शुरुआत 1923 से हुई, जब ‘रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे’ से प्रसारण हुआ। ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी के जरिये रेडियो ने देश में जगह बनाई। सबसे पहले ‘ऑल इंडिया रेडियो’ का नाम वर्ष 1936 में ‘इंपीरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ था, जो आजादी के बाद ‘ऑल इंडिया रेडियो’ या ‘आकाशवाणी’ बन गया।

खैर, ये तो बात हुई ‘रेडियो’ के इतिहास की। जब बात रेडियो की हो और उन सितारों की बात न की जाए जो ‘रेडियो की आन-बान-शान’ रहे हैं, तो यह बात अधूरी है। मुझे अभी तक अपनी दादी की बात याद है, वो कहती थीं कि जब देवकीनंदन पांडे समाचार पढ़ते थे तो सब ध्यान से सुनने लग जाते थे। मेरी मम्मी तो अमीन सयानी जी की बहुत बड़ी प्रशंसक रहीं। वो उस दौर में उनका कार्यक्रम सुना करती थीं। यदि मैं अपने बचपन की बात करूं तो मैंने सबसे ज्यादा ओपी राठौर को सुना है। कभा सोचा भी नहीं था कि रेडियो में जाऊंगी।

मुझे अपने ट्रेनिंग पीरियड का वो क्षण आज भी याद है, जब लक्ष्मीशंकर वाजपेयी सर ने हमसे कहा था कि तुम इतने बडे नेटवर्क से जुड़ रहे हो, जिसका अंदाजा तुम्हें बाद में होगा। आपने सही कहा था सर।

इसी बात पर मैं खुद अपनी एक अच्छी याद शेयर करना चाहूंगी। मैंने दिसंबर 2011 में रेडियो में बतौर एनाउंसर (उद्घोषक) काम करना शुरू किया था। सेक्शन था ऑल इंडिया रेडियो का ESD यानी विदेश प्रभाग। कई सालों तक मैं उद्घोषणा का कार्य करती रही। फिर वहां काम करने वाले सीनियर मुनीश शर्मा जी ने मुझे प्रश्नोत्तर के कार्यक्रम ‘आपने लिखा है’ में शामिल किया, जिसे मैं और वे होस्ट किया करते थे। ये प्रोग्राम करने से पहले यह सोचकर मैं बस यूं ही उद्घोषणा कर दिया करती थी कि इंटरनेट के इस दौर में कौन रेडियो सुन रहा होगा। लेकिन, मैं गलत थी और मेरा ये भ्रम तब टूटा जब मैंने ये प्रोग्राम किया। प्रोग्राम होस्ट करते-करते 10-12 दिन ही बीते होंगे कि विदेश (यूएई) से हमारे एक श्रोता का फोन आया, जिन्होंने मेरी तारीफ की। इसके बाद प्रोग्राम की मेल आईडी पर मेरी तारीफ में मेल आनी लगीं। इनमें कुछ श्रोता जर्मनी के होते तो कुछ यूएई और कुछ भारत के कई शहरो से। इसके बाद मुझे रेडियो की पहुंच का अंदाजा हुआ।

रेडियो की ताकत को माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी माना और अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए ही रेडियो को ही अपना माध्यम बनाया। अंत में यही कहूंगी कि रेडियो न रुका था और न रुकेगा। ये आकाशवाणी है!


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