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जन्मदिन विशेष: एक दोस्त संपादक थे उदयन शर्मा

सुमिता वर्मा ।। जब उदयन शर्मा नहीं र

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

सुमिता वर्मा ।।

जब उदयन शर्मा नहीं रहे, उस दिन 23 अप्रैल, 2001 को पहली बार पता चला कि 11 जुलाई का दिन उनके जन्म का दिन था। और उसके बाद से 11 जुलाई उनके न होने की ही याद ज्यादा दिलाती रही है। हिंदी पत्रकारिता ने 70 और 80 के दशक में जो नए आयाम स्थापित किए, उसमें उदयन शर्मा की अपनी भूमिका रही है। एक प्रखर और बेहद मानवीय पत्रकार, जिसने उत्तर भारत की आर्थिक-सामाजिक स्थिति से लेकर सांप्रदायिक दंगों तक के सच अपनी पूरे संदर्भों के साथ लोगों के सामने रखे। ‘धर्मयुग’, ‘रविवार’ और ‘संडे ऑब्जर्वर’ के लिए की गई उन की रिपोर्ट्स पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले युवा पत्रकार अनदेखा नहीं कर सकते। प्रभावी संपादक वे बाद में थे, पहले वे पत्रकार थे। किसी सच तक पहुंचने और उसे सबके सामने लाने का जोखिम वे बार-बार उठाते रहे।

संपादक उदयन शर्मा के साथ काम कर चुके लोग जानते हैं कि वे दरअसल दोस्त संपादक थे। अपनी टीम को साथ लेकर चलना जानते थे। वे उन्हें सपने भी देते थे और उन सपनों पर काम करने का मौका भी। दिलेर और महत्वाकांक्षी पत्रकार-संपादक के साथ-साथ वे अलग किस्म के इंसान भी थे। आजाद सोच और खुली अभिव्यक्ति उनके समाजवादी मानवीय सराकारों के आस-पास घूमती थी, जिसे उनका अपना विशिष्ट और एक अलग पहचान देता था। उनके आस-पास होने का अर्थ था, वहां कुछ न कुछ घट रहा है। वे हर बार मिलने पर हैरान करते थे। उनका होना अदेखा नहीं किया जा सकता था। इसलिए नहीं कि वे बॉस या संपादक थे, इसलिए कि उनके भीतर का उत्साह सहजता से किसी को भी आकर्षित कर लेता था। वे एक हंसता हुआ चेहरा थे, जो आश्वस्त करता था। और एक गहरी नजर थी, जो सब समझ लेती है।

तमाम लोग जो उनके संपर्क में आए, उनके अपने अनुभव रहे हैं, मगर 1990-91 के वे हिंदी संडे ऑब्जर्वर के दिन शायद उस समय की टीम के सभी लोगों को  याद होंगे, जहां कुछ साझे यकीन थे, तो बहुत सी साझी आशंकाएं थीं। मगर उदयन जी के उत्साह से कोई अछूता नहीं रहा था और कब वे सभी दिन बीत गए,  जिनकी तलाश में लोग अब भी बार-बार 11 जुलाई को एक साथ नजर आ जाते हैं। शायद उनके बहाने सब अपने उस समय की फिर से याद कर लेना चाहते हैं, समय कुछ देर के लिए वापस वहीं जाकर ठहर जाता है, जहां सब एक साथ कुछ समय रहे और फिर नई राहें निकलती रहीं। उदयन शर्मा भी बाद के दिनों में पत्रकारिता और राजनीति के बीच अपने रास्ते तलाशते रहे। मगर उन्हें पता नहीं था कि उन्हें समय कम मिला है।

पत्रकारिता की यह लंबी यात्रा लगता है एक छोटी सी जिंदगी के साथ बहुत जल्दी खत्म हो गई। उस समय उदयन जी बीमार नहीं थे। मृत्यु से लगभग साल भर पहले एक दिन उन्होंने कहा था ‘50 के बाद अब लगता है, समय कम रह गया है, जल्दी-जल्दी जी लेने का मन करता है’। पता नहीं वे आखिरी दिनों में मन मुताबिक जी पाए या नहीं, पर जब-जब मिले, चेहरे पर हंसी वही दिखती थी। और फिर बीमारी और वे नहीं रहे। 52 वर्ष की उम्र इस दुनिया से जाने के लिए बहुत कम लगती है।

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