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नहीं चाहिए कोई नई सड़कें-ट्रेन, न मिले डिजिटल इंडिया, सर हमें पाकिस्तान चाहिए, बोले वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु
निर्मलेंदु कार्यकारी संपादक, राष्ट्रीय उजाला ।। देश की आन, बान और शान पर कुर्बान हो गये ये शहीद। उरी में आर्मी कैंप पर हुए हमले के बाद देशवासी बस एक ही मांग कर रहे हैं कि अब वक्त बातों का नहीं, ऐक्शन लेने का है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्य
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
देश की आन, बान और शान पर कुर्बान हो गये ये शहीद। उरी में आर्मी कैंप पर हुए हमले के बाद देशवासी बस एक ही मांग कर रहे हैं कि अब वक्त बातों का नहीं, ऐक्शन लेने का है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या एसी कमरे में बैठकर हमारे नेता भाषण ही देते रहेंगे, या फिर कोई ठोस कार्रवाई करेंगे। नहीं चाहिए कोई नई सड़कें, नहीं चाहिए नई ट्रेन, न मिले डिजिटल इंडिया, सर हमें पाकिस्तान चाहिए।
हमें उन आतंकियों को सबक सिखाना ही होगा। आश्चर्य की बात तो यह है कि आज जिन सैनिकों की वजह से हम चैन की नींद सोते हैं, जो हमारे देश की रक्षा के लिए परिवार छोड़कर रात दिन एक कर रहे हैं, वे मौत की नींद सो रहे हैं और हमारे नेता सिर्फ कड़ी निंदा और डिबेट कर रहे हैं। चैनल वाले कुछ लोगों को बैठा कर केवल टीआरपी के चक्कर में डिबेट करवाते रहते हैं। कौन दोषी है, किसका दोष है, कौन दोषी नहीं, इस पर बेवजह समय बर्बाद करते रहते हैं और वहीं दूसरी ओर मनोहर पर्रिकर जी, शहीदों को सलाम ही देते रहते हैं। ठोस कदम उठाने के बारे में कभी नहीं सोचते। मेरा बस पर्रिकर जी से यही गुजारिश है कि अब केवल ऐक्शन दिखाने का समय आ गया है, क्योंकि भाषण से अब मन भर गया है! जवानों की शहादत की कीमत वसूलने का समय आ गया है। अब देश की सारी पार्टियों को मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ फैसला लेना होगा। राजनाथ जी से मैं यही कहना चाहता हूं कि आज आरोप-प्रत्यारोप का समय नहीं। ठोस कदम उठाने का समय है। अब बात नहीं, हथियार से जवाब देना होगा। सोशल मीडिया में लोग अपना अपना गुस्सा निकाल रहे हैं- नहीं चाहिए हमें आर्थिक विकास, हमें इंसाफ चाहिए, हमें खून के बदले खून चाहिए। हमें अब पाक साफ चाहिए। ऐसे में प्रधानमंत्री जी से मेरी यही गुजारिश है कि ऐक्शन लें, क्योंकि लगातार सहते रहना भी कायरता ही है। सौ चोट सुनार की हो चुकी, अब लोहार की बारी है।
उरी के शहीदों का बलिदान गाथा बेकार नहीं जाएगा। बेकार नहीं होगी यह कुर्बानी। कुछ जवानों का अस्पताल में इलाज चल रहा है, तो कुछ को मौत की आहट सुनाई दे रही है। उरी के लोगों का मानना यही है कि यह सुरक्षा व्यवस्था की खामी के चलते हुआ है। उन शहीदों को आखिरी सलाम, जो देश की खातिर जान कुर्बान करके हमें नींद में रहने की आदत डलवाता है। क्या अब भी आप इस हमले की सिर्फ कड़े शब्दों में निंदा ही करेंगे या अब घुसकर मारने का कोई प्लॉन है। उन 17 शहीदों के घरवालों को यह यकीन ही नहीं हो रहा है कि उनके जवान बेटे अब इस दुनिया में नहीं हैं। सभी परिवारवालों के घर में मातम छाया हुआ है। मां, बच्चे, पिता, पड़ोसी, भाई, बहन सब रो रहे हैं। जुबां खामोश हैं, यकीन करना मुश्किल हो रहा है। देश के लोग अब यही कह रहे हैं कि देश के लिए मर मिटने वाले उन शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी।
शहीदों की शहादत याद रखेगा देश। शहीदों के लिए शहीदों के परिवार वालों की आंखों में गर्व के आंसू हैं। वे 17 जवान आखिरी वक्त तक दुश्मनों से लड़ते लड़ते शहीद हो गये। जाते जाते वह शायद यही कह गये -- कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। हम तो बस इस लेख के माध्यम से यही गुजारिश कर सकते हैं -- ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी।
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