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ट्विटर बिकने के पीछे इन तीन कारणों का जिक्र किया वरिष्ठ पत्रकार प्रतीश नंदी ने...

माइक्रोब्लॉगिंग दिग्गज वेबसाइट ट्विटर बिकने की खबरें कुछ महीनों से चल रही हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार प्रतीश नंदी का एक आलेख हिंदी दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं: हमारे पतन को दर्शाता ट्विटर का पतन

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

माइक्रोब्लॉगिंग दिग्गज वेबसाइट ट्विटर बिकने की खबरें कुछ महीनों से चल रही हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार प्रतीश नंदी का एक आलेख हिंदी दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं:

हमारे पतन को दर्शाता ट्विटर का पतन

मैंने हाल ही में ट्विटर के आसन्न अवसान के बारे में बहुत से लेख पढ़े हैं। इसकी शुरुआत इससे हुई कि कैसे ट्विटर अपने बिज़नेस को उस तरह से आर्थिक रूप नहीं दे पाई जैसी उसके निवेशकों को अपेक्षा थी। फिर लेख आए कि किस तरह गूगल, सेल्सफोर्स और वाल्ट डिज्नी सारे ट्विटर को खरीदने और इसे मौजूदा कोमा में से निकालने के लिए बेचैन हैं। जब ये खरीदार पीछे हट गए खासतौर पर अल्फाबेट (जो गूगल की मालिक है) ने अपने बैंकरों से सलाह-मशविरा करके ऑफर देने से इनकार कर दिया तो ट्विटर के अवसान की अफवाहें कई गुना बढ़ गईं। सोमवार को ट्विटर के शेयर 15 फीसदी गिर गए।

एक-दूसरे को निगलने वाली आज की दुनिया में इसके तीन कारण हो सकते हैं। या तो कोई ट्विटर की कीमत गिराने की कोशिश कर रहा है ताकि वह इसे सस्ते में खरीद सके या इसका अधिग्रहण कर इसकी नैया पार लगा दे। और भी मजेदार बात यह हो सकती है कि ट्विटर खुद ऐसी हरकत कर रही हो, अनचाहे आक्रामक दावेदारों को दूर रखने की यह पुरानी रणनीति है। इसकी संभावना नहीं है, क्योंकि ट्विटर का बोर्ड विभाजित है। सीईओ जैक डोर्से ट्विटर को बेचने के खिलाफ हैं, जबकि सह-संस्थापक इवान विलियम्स ऐसा चाहते हैं। बोर्ड ने पिछले सितंबर में गोल्डमैन सैक और एलन एंड कंपनी की सेवाएं ली थीं ताकि ट्विटर को बेचने की संभावनाओं का पता लगाया जा सके। किंतु जब संस्थापक इस विषय पर एक-दूसरे से एकदम असहमत हैं तो संभव है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के विरोध में काम कर रहे हों।

दूसरा कारण तुलनात्मक रूप से सरल, काफी सरल लगता है, क्योंकि ऐसे मामलों में आमतौर पर ऐसा ही होता है। ट्विटर काफी वक्त से हमारी जिंदगी में है और यह अब भी काफी लोकप्रिय सोशल साइट है, लेकिन निश्चित ही यह नए प्रतिद्वंद्वियों या समकालीनों की रफ्तार से नहीं बढ़ रही है। फेसबुक सोशल साइट अपने 1.50 अरब यूज़र के साथ आबादी में चीन को पीछे छोड़ चुकी है। ट्विटर 30 करोड़ यूज़र के साथ लड़खड़ाती चल रही है। यहां तक कि इंस्टाग्राम ने इसे पीछे छोड़ दिया है। नई साइटें भी ट्विटर से ज्यादा यूज़र झपटती जा रही हैं, जो कमोबेश लगभग वही हैं, जहां यह थी। मुझे लगता है कि लोग अब ट्विटर से ऊब चुके हैं और अब वे अधिक साहसिक नई जगहों पर जा रहे हैं। स्नैपचेट है। इंस्टाग्राम है और बेशक अपनी प्यारी, पुरानी साइट फेसबुक तो है ही- अविश्वसनीय आमदनी देने वाली कंपनी जो 44 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है।

यूज़रों का इस तरह पाला बदलना नया नहीं है। याद है इंटरनेट की पसंदीदा ऑर्कुट को कैसे एक सुबह पता चला कि एक दशक में उसके तो सारे यूज़र चले गए हैं? ऐसी बात भी नहीं कि इसके सामने पैसे की कोई कमी थी। इसके पीछे गूगल ऑलमाइटी थी, जिसने आखिरकार 2014 में इसे बंद कर दिया। (अफवाहें हैं कि ऑर्कुट के तुर्की संस्थापक ऑर्कुट बुयुक्कॉकटेन जो अब 41 वर्ष के हैं, भारत से हेलो नाम की नई सेवा शुरू करने वाले हैं।) एक दूसरा कारण, जो मुझे लगता है कि सच के बहुत करीब है, यह है कि लोगों को ट्विटर की आज की दुनिया उससे बिल्कुल अलग लगती है, जिसके लिए उन्होंने शुरुआत में साइन-इन किया था कि जिसके कारण वे अब इससे बाहर जा रहे हैं। गरियाते ट्रॉल। अति-राष्ट्रवादी चीख-पुकार। भुगतान पर चलाए गए ट्रेंड, जिनमें से कुछ तो पूरी तरह मूर्खतापूर्ण होते हैं। जैसे एमएसजी, हर बार उनकी मूवी सामने जाती है। मैं कह सकता हूं कि बहस के स्तर में तीव्र गिरावट ट्विटर के शुरुआती प्रेमियों के लिए रोष पैदा करने वाली बात है।

वे तो बोर्ड पर नए विचारों से उफन रही ताज़गी देने वाली दुनिया खोजने आए थे। अद्‌भुत लोगों से रोमांचक संपर्क के लिए आए थे, जिन तक तब पहुंचना मुमकिन नहीं था। मैं ऐसा ही व्यक्ति था। मैं ट्विटर पर काफी वक्त बिताता था, अनजाने लोगों से बतियाता, विचारों, आइडिया, आस्थाओं का आदान-प्रदान करता और, जैसा मैं आज भी करता हूं, मेरे लेखन पर चर्चा करता। जिन लोगों से यह सब होता उनमें से ज्यादातर बहुत खुशनुमा लोग थे। मजेदार, आकर्षक, चतुर और सूचना-संपन्न। प्राय: मुझसे ज्यादा जानकारी रखने वाले। मैं उनसे बतियाता और सोचता कि जिस असली दुनिया में हम रहते हैं, उसकी बजाय इस आभासी दुनिया में दोस्त बनाना आश्चर्यजनक रूप से कितना आसान है।

अब ट्विटर वह नहीं रहा। सफलता की सारी महान कहानियों की तरह, इस पर भी कब्जा हो गया है। राजनेताओं ने कब्जा कर इसे अपना मैदान बनाने की कोशिश की है। सरकार तो एक कदम और आगे बढ़ गई और बड़ी चतुराई से इसने इसे सूचना-प्रसारण मंत्रालय में बदलने की कोशिश की है। आज ट्विटर प्रेस विज्ञप्ति को दूरदर्शन की तुलना में अधिक तेजी से प्रसारित करती है। सच कहूं तो सारी वैश्विक चीजों की तरह यह कहीं अधिक विश्वसनीय है। अकेले नागरिक की राजनीतिक आवाज धीरे-धीरे सरकार के लाउड स्पीकरों के आगे गुम होती जा रही है। ईश्वर करे आप कुछ ऐसा कह दें जिसका सरकार विरोधी अर्थ निकाल लिया जाए। यह बहुत आसान है, क्योंकि ट्विटर पर सरकार की ओर से जो ट्रॉलिंग करते हैं, वे प्रखर चिंतक तो होते नहीं। इसलिए आपको सार्वजनिक रूप से अपमानित करने लगते हैं। किंतु इससे भी खराब बात तो यह है कि नेताओं ने ट्विटर की वह हालत कर दी है, जो बिज़नेस ने की है। प्रायोजित ट्रेंड और भुगतान पर किए ट्वीट आज ट्विटर से ऊब पैदा करने वाले सबसे बड़े कारण हैं। जो दुनिया का सबसे आकर्षक बाजार था, उसे आज बड़े बिज़नेस ने हथिया लिया है। ट्रम्प ऊंची आवाज में अपने विचार 1.20 करोड़ फालोअर्स को सुना रहे हैं तो आप दलाई लामा की आवाज कैसे सुन सकते हैं, जो वैसे भी फुसफुसाहट के धीमे स्वर में बोलते हैं?

इससे मैं अंतिम प्रश्न पर आता हूं : क्या हम नए यूटोपिया (आदर्श लोक) बनाने और उन्हें टिकाए रखने की क्षमता खो चुके हैं? आभासी दुनिया में हम जो निर्मित करते हैं, वे हमारी वास्तविक मनहूस जिंदगी की ठीक नकल बन जाते हैं। ट्विटर के पतन में हमें इसी त्रासदी का अहसास होता है। ऐसे में अंतरिक्ष यात्राओं और बाहरी अंतरिक्ष में नई दुनिया खोजने का उपयोग क्या है (जैसा एलन मस्क और दूसरे लोग कर रहे हैं।) यदि इस सबके अंत में हम हमारी ही दुनिया की प्रतिकृतियां बनाते रहें। हमें तो वैकल्पिक वास्तविकताओं की जरूरत है, अधिक मानवीय समाजों की। अब वही पुरानी दुनिया और नहीं चाहिए।

(येलेखक के अपने विचार हैं)

(साभार: दैनिक भास्कर)

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