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अरनब को इंटरव्यू देने के पीछे मोदी का क्या उद्देश्य हो सकता है, बोले वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह

<p style="text-align: justify;">‘प्रधानमंत्री ने बेहद खूबसूरती से इस साक्षात्कार के सवालों के जरिए यह स्पष्ट किया कि वह स्वयं को इस 'ब्रांड की राजनीति’ से अलग ही नहीं रखते, बल्कि उन्होंने एक चेतावनी भी दी कि एक सीमा के आगे इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ हिंदी दैनिक अखबार <strong>‘नईदुनिया’</strong> में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है<strong> वरिष्

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘प्रधानमंत्री ने बेहद खूबसूरती से इस साक्षात्कार के सवालों के जरिए यह स्पष्ट किया कि वह स्वयं को इस 'ब्रांड की राजनीति’ से अलग ही नहीं रखते, बल्कि उन्होंने एक चेतावनी भी दी कि एक सीमा के आगे इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ हिंदी दैनिक अखबार ‘नईदुनिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

साक्षात्कार में छुपे हैं कई संदेश  

कोई भी बड़ा नेता यूं ही कोई साक्षात्कार नहीं देता, खासकर तब जबकि वह देश का प्रधानमंत्री हो और वह भी नरेंद्र मोदी जैसा। इसके पीछे कोई उद्देश्य होता है जो काल, स्थिति और मैसेज को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। फिर इसी के अनुरूप माध्यम, संस्था और भाषा का चुनाव होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर चाहते तो राष्ट्र को संबोधित भी कर सकते थे। वे प्रेस कांफ्रेंस भी कर सकते थे या किसी ज्यादा प्रसार वाले अखबार या ज्यादा टीआरपी वाले हिंदी चैनल को भी इंटरव्यू दे सकते थे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। आखिर उन्होंने साक्षात्कार के लिए एक अंग्रेजी टीवी चैनल को ही क्यों चुना और फिर खुद हिंदी में ही क्यों बोले, यह जानना जरूरी है।

दरअसल, राष्ट्र को संबोधित करना एकल संवाद होता है जैसे कि 'मन की बात’। इसमें आप अपनी बात जनता तक पहुंचा रहे होते हैं। इससे यह आभास नहीं मिलता कि जनता को उसके सवालों का जवाब मिल रहा है। दूसरी ओर, प्रेस कांफ्रेंस बेलगाम होती है और कई बार प्रश्नों की बाढ़ में मूल संदेश खो जाता है। जहां तक भाषा का सवाल है तो भारतीय जनमानस में औपनिवेशिक मानसिकता की वजह से आज भी अंग्रेजी को बौद्धिकता का पर्याय माना जाता है, साथ ही कुछ हद तक बौद्धिक ईमानदारी का भी।...तो फिर प्रधानमंत्री ने अंग्रेजी में पूछे गए सवालों के जवाब हिंदी में क्यों दिए? इसके पीछे स्पष्ट है कि उनकी मंशा 80 करोड़ से ज्यादा हिंदी बोलने और समझने वालों तक अपनी बात पहुंचाने की रही होगी। दो साल से ज्यादा के शासनकाल के बाद निरपेक्ष विश्लेषकों के मन में ही नहीं, देश की जनता के मन में भी कुछ शंकाएं जन्म लेती हैं और उन शंकाओं का समाधान मात्र इसी तरीके से किया जा सकता था।

तकरीबन डेढ़ घंटे (88 मिनट) के इस साक्षात्कार में प्रश्नों के उत्तर के रूप में चार प्रमुख संदेश निकले। एक तो यह कि अगर देश का विकास सर्वोपरि है तो हर दूसरे-तीसरे दिन कोई सत्तापक्ष का नेता, मंत्री या भगवाधारी भावनात्मक मुद्दे क्यों उठा रहा है? आखिर क्यों कोई मंत्री 'भारत माता की जय’ न कहने वालों को पाकिस्तान जाने की सलाह दे देता है और क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी अनुषांगिक संगठन का पदाधिकारी मुसलमान मुक्त भारत की बात कह देता है? ऐसे में शंका यह होती है कि नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता के शीर्ष पर रहते हुए यह विरोधाभास क्यों? क्या इन गैर-विकास के मुद्दों से माहौल खराब करने वालों को कोई मौन सहमति तो नहीं है?

प्रधानमंत्री ने बेहद खूबसूरती से इस साक्षात्कार के सवालों के जरिए यह स्पष्ट किया कि वह स्वयं को इस 'ब्रांड की राजनीति’ से अलग ही नहीं रखते, बल्कि उन्होंने एक चेतावनी भी दी कि एक सीमा के आगे इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साक्षात्कार के दौरान सवाल आया कि 'पार्टी के ही लोग इस तरह के मुद्दे उठाते हैं’, इस पर मोदी का जवाब था-'पार्टी ही नहीं, किसी के द्वारा भी अगर इस तरह की बात होती है तो वह गलत है और यह वे लोग करते हैं जो मीडिया में अपने प्रचार को आतुर रहते हैं।’

इसका संदर्भ ध्यान देने लायक है। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्यसभा में भेजे गए सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा पिछले दिनों रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर अनर्गल आरोप लगाना और इस प्रक्रिया में मोदी सरकार के दूसरे कद्दावर नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर परोक्ष रूप से हमला करना। इससे संदेश यह जा रहा था कि स्वामी का यह हमला इतना सामान्य नहीं है, जितना दिखाई देता है और यह भी कि स्वामी पर संघ का वरदहस्त है। जेटली का चीन यात्रा बीच में ही रोककर भारत वापस लौटना अनायास ही नहीं घटित हुआ।

प्रधानमंत्री का संदेश बिलकुल स्पष्ट था कि भविष्य में ऐसी स्थितियां पैदा करने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शायद इस संदेश का विस्तार करते हुए मोदी ने यह भी कहा कि टीवी चैनलों के डिबेट में वे देखते हैं कोई प्रवक्ता कुछ कह रहा है। वह इनमें से कइयों को पहचानते भी नहीं हैं, लेकिन मीडिया इन्हें इस तरह से प्रोजेक्ट करता है, जिससे वह अपने वास्तविक कद से कहीं बड़े हो जाते हैं। उनके कहने का आशय यह था कि ये प्रवक्ता पार्टी या सरकार की नीतियों के बारे में जो कहते हैं, सिर्फ इससे ही सरकार के कामकाज का विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए। मोदी का यह संदेश इसलिए भी सामयिक था, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से यह सोच उभरी है कि ये प्रवक्ता अहंकारी और असहिष्णु होते जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं को लेकर भी काफी कुछ कहा जाता है। इस संदर्भ में मोदी ने स्थिति साफ करते हुए यह बताना चाहा कि वे इसलिए व्यक्तिगत रूप से विश्व के तमाम नेताओं से मिल रहे हैं, क्योंकि जमीनी पृष्ठभूमि से होने की वजह से उनके बारे में अन्य देशों में अपरिपक्व और भ्रामक जानकारी है। एक प्रधानमंत्री होने के कारण इससे कई बार देश का नुकसान हो सकता है। शायद उनका आशय गुजरात दंगों के बाद कुछ देशों द्वारा बनाई गई उनकी छवि के संदर्भ में था। उन्होंने अपने जवाब में यह भी याद दिलाया कि उनकी हाल की यात्रा के दौरान अमेरिकी अखबारों में क्या प्रकाशित हुआ। उनके मुताबिक वहां अखबारों ने बताया कि बराक ओबामा की भारत के साथ मैत्री का वर्तमान मुकाम कूटनीतिक सफलता का द्योतक है। मोदी इसके जरिए अपनी कूटनीतिक सफलता के बारे में भी बताते दिखे।

उन्होंने महंगाई को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। महंगाई पर यह कहकर कि दो सालों में जिस तरह का सूखा रहा और जिस तरह किसानों ने घबराकर दलहन की जगह गन्न्ा की फसल बोना शुरू की, उससे दाल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई। उन्होंने जनता को इस बारे में आश्वस्त करने की कोशिश की कि स्थिति नियंत्रण में लाई जा सकती है और लाई जाएगी। हालांकि दलहन की पैदावार लगातार पिछले कई वर्षों से कम हुई है और इसकी खाई पाटने के लिए पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने भी न्यूनतम समर्थन मूल्य तो बेतहाशा बढ़ाया था।

साक्षात्कार में एक राजनीतिक संदेश भी था, जिसमें यह प्रयास था कि विपक्ष और कांग्रेस को अलग-अलग देखा जाए। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि संसद में गतिरोध का आरोप विपक्ष पर लगाना गलत है और बगैर नाम लिए कांग्रेस को इसका दोषी बताया। गरीब राज्यों के लोगों के कल्याण से जीएसटी बिल को जोड़ते हुए उन्होंने यह कोशिश की कि जनता कांग्रेस के रवैये के प्रति नाराज हो और गैर-कांग्रेस विपक्षी दल बिल के साथ हों।

महंगाई को छोड़कर बाकी संदेश अपेक्षाकृत तार्किक और स्वीकारने योग्य कहे जा सकते हैं। पर आगे जनता यह भी देखेगी कि क्या कोई मंत्री गिरिराज, कोई महंत या कोई सुब्रह्मण्यम स्वामी फिर तो पुराना राग नहीं अलापने लगा? अगर ऐसा होता है तो जनता की शंका बनी रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

 


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