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कट्टरपंथी इस्लाम पूरी मानवता के लिए ख़तरा बन गया है, बोले वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह
एन.के.सिंह वरिष्ठ पत्रकार ।। कट्टरपंथी इस्लाम
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
एन.के.सिंह
वरिष्ठ पत्रकार ।।
कट्टरपंथी इस्लाम पूरी मानवता के लिए ख़तरा बन गया है। इसे ख़त्म करने के दो हीं तरीके हैं- पहला, इस्लाम के 170 करोड़ अनुयायी स्वयं तन कर खड़े हों और प्रतिकार करें’
दूसरा- पूरी दुनिया में सभी मानव-स्वतन्त्रता को कुछ दिन रोक कर इनका समूल नाश (लेकिन इसमें ख़तरा है निर्दोषों के शिकार होने का)।
पहला तरीका व्यावहारिक भी है और सम-सामयिक मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप भी। सभ्यता के इस वर्तमान मंजिल पर पहुंचने की बाद इस दुनिया को कुछ आपराधिक मानसिकता वाले आतंकियों के हाथ सौप देना सोचा भी नहीं जा सकता लेकिन दूसरा विकल्प तब हीं इस्तेमाल किया जा सकता है जब पहला फलीभूत न हो अर्थात जब धर्म के अनुयायी स्वयं आतंकवाद को नियंत्रित न करें। इस दूसरे तरीके की हिमायत क्रोधातिरेक या भावातिरेक में ड्राइंग रूम आउटरेज (सोफे पर बैठे गुस्सा) के रूप में या टीवी स्टूडियो में हम अक्सर करते हैं ‘दो के बदले दस सर या पाकिस्तान को ख़त्म करो हमेशा के लिए झंझट ख़त्म’ के भाव में या फिर ‘भारत माता की जय न बोलने वालों को पाकिस्तान भेजने की सलाह दे कर’। समस्या का समाधान गुस्से के इजहार से नहीं गंभीर चिंतन से हीं हो सकता है।
इस दूसरे तरीके के कुछ ताज़ा वैश्विक भौंडे उदाहरण देखें और उनके खतरनाक परिणाम का अंदाज़ा लगायें। पिछली 26 जुलाई को एक पाकिस्तानी–अमरीकी दंपत्ति को डेल्टा एयरलाइन्स के स्टाफ ने पेरिस से सिनसिनाटी (ओहायो) वाले फ्लाइट से इसलिए उतार दिया क्योंकि महिला यात्री ने गर्मी अधिक होने की वजह से ‘अल्लाह’ कहा। स्टाफ का कहना है उसने ‘अपने कान’ से सुना कि महिला कुछ ‘अल्लाह’ जैसा शब्द कह रही है जिससे स्टाफ को सहज नहीं लगा। इसी साल अप्रैल में लॉस एंजेलेस में एक मुसलमान छात्र को इसलिए जहाज से उतार दिया गया क्योंकि उसके बगल वाला अमरीकी यात्री इस बात से असहज महसूस कर रहा था कि वह छात्र किसी से फ़ोन पर अरबी में बात कर रहा था और कई बार ‘इंशाअल्लाह’ का उच्चारण कर रहा था। इस अभिव्यक्ति का मतलब ‘हरी इच्छा’ या ‘ भगवान ने चाहा’ होता है। अंग्रेजी में ‘गॉड विलिंग’ कहते हैं। अब गौर करें कि जब पूरी दुनिया के युवा मुसलमानों को यह खबर मिलेगी कि गैर-मुस्लिम लोग अल्लाह का नाम सुनकर ‘असहज’ हो जाते हैं और जहाज से उतार देते है या इंशाअल्लाह कहने पर अमरीकी एफ़बीआई ‘पूछताछ’ के लिए जहाज से उतार कर ले जाती है तो उनका भाव क्या होगा।
पिछले दिसंबर में चार एशियाई लोगों को (जिनमें तीन मुसलमान थे और एक सिख) टोरंटो से न्यूयॉर्क जाने वाले जहाज से इसलिए उतार दिया गया कि पायलट उनके चेहरे से अपने को असहज महसूस करने लगा। क्या इस्लामी कट्टरपंथ से हम इस तरह लड़ सकेंगे? क्या हम जाने-अनजाने में इस कट्टरपंथ को अपनी अदूरदर्शिता और संकीर्णता से और हवा नहीं दे रहे हैं? क्या हम उन कट्टरपंथी मुल्लाओं और जाकिर नाईक जैसे लोगों को को यह मौका नहीं दे रहे हैं कि वे दस साल के बच्चे को यह किस्सा बता कर उसे बरगलाएं और ‘अल्लाह के काम के लिये कुर्बान’ होने के लिए प्रेरित करें? इसके बाद केवल आत्मघाती बेल्ट हीं तो पहनना है इस विश्वास के साथ कि ‘अल्लाह के काम के लिए अगर कुर्बान हुए तो जन्नत में अल्लाह हमारा इस्तेकबाल करेंगे और वहां 74 हूरें हमारे हुजूर में खडी रहेंगी’। यही ज्ञान तो मुल्लाओं व ज़ाकिर नाईक ने क़ुरान के सूरा 9, आयत 5 उद्धृत करते हुए युवा मुसलमानों को बताया। यह अलग बात है कि इस आयत की सन्दर्भिता नहीं बतायी। तीन तलाक़ या तीन बीवियां रखने की इजाज़त का भी कारण नहीं बताया गया।
फिर अगर दुनिया के 23 प्रतिशत (170 करोड़) लोग इस्लाम में आस्था रखते हैं तो आप महज ‘असहज’ हो कर उन्हें ख़त्म तो नहीं कर सकते? हम क्यों नहीं समझते कि अगर पैगम्बर मुहम्मद साहेब को इतने झंझावात झेलने के बाद सफलता मिली जो आज संख्या के आधार पर दुनिया का दूसरे नंबर का धर्म है तो कुछ विशेषता जरूर होगी। समस्या कुरआन शरीफ की व्याख्या को लेकर है जिसे मुल्लाओं ने गलत तरीके से पेश कर कट्टरवाद और आतंक को पनपाया। जब-जब इस्लाम में सुधारवादी और समय-सापेक्ष परिवर्तन के प्रयास हुए इन मुल्लाओं ने उसे ख़ारिज कर दिया। यहां सवाल यह है कि अगर कठमुल्ले इस्लाम की गलत व्याख्या करके इतना कन्विंस कर सकते हैं या जाकिर नाईक खड़ा कर सकते हैं तो सही सोच और सही व्याख्या मानने वाले इस्लाम के अनुयायी क्यों नहीं।
गैर –इस्लामी समाज भी इसे तत्व खड़ा करने में मदद क्यों नहीं कर सकता है। अगर ‘अल्लाह’ कहने पर जहाज से उतारा जा सकता है तो सही सोच वाले को बौद्धिकता के जहाज पर चढ़ाया भी जा सकता है। इस्लाम अध्ययन, समीक्षा और एकेडेमिक विश्लेषण का विषय बन हीं नहीं पाया। अगर कुछ तथाकथित एकेडेमीशियन पैदा भी हुए तो उन्हें इन मुल्लाओं ने ख़ारिज कर दिया। गैर–मुसलमान या आधुनिक सोच वाले थोड़े बहुत मुसलमान महज यह कह कर कुरआन की बातों को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि इसमें गत्यात्मकता (डायनेमिज्म) के लिए जगह नहीं है। फिर इनके अनुयायिओं की संख्या बढ़ क्यों रही है? क्या वे आप से कमअक्ल हैं? नहीं। लेकिन हाँ , उनमें से हीं एक बड़ा वर्ग आज बाहर आ रहा है इस्लाम की सही व्याख्या और आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कुरआन की व्याख्या को लेकर।
भारत में अगर मुसलमान महिलाएं ‘तीन तलाक’ की मानवीय और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ खडी हो रही हैं तो यह शुभ सूचक है। पूरी दुनिया में मुसलमानों के एक छोटे से वर्ग ने अपने को ‘गैर-मुसलमान’ ऐलान करना शुरू किया है (सिर्फ यह सन्देश देने के लिए कि वे मुल्लाओं की इस्लाम की गलत और शोषणकारी व्याख्या के खिलाफ हैं)। पाकिस्तान के ‘फाटा’ (संघ-प्रशासित कबायली प्राधिकरण) क्षेत्र में तहरीक-ए-तालिबान ने चार साल पहले ऐलान किया कि लड़कियां केवल घर में पढ़ेंगी और वह भी मात्र कुरआन की आयतें और दूसरा ऐलान था पुरुष डॉक्टर महिलाओं का शरीर नहीं छूएंगे। नतीजा यह कि इस अफ़ग़ानिस्तान से सटे बड़े इलाके में पिछले सात साल से औरतें बगैर ऑपरेशन के मर रहीं हैं। क्या पाकिस्तान में इस्लाम के अनुयायी इसके खिलाफ तन कर खड़े नहीं हो सकते? क्या वे किसी हाफिज सईद के खिलाफ एक विरोधी आन्दोलन नहीं शुरू कर सकते यह कहते हुए कि कश्मीर के बुरहान वाणी की मौत से ज्यादा जरूरी है फाटा क्षेत्र की औरतों की दुर्दशा।
भारत या पूरे विश्व की भूमिका इस समय इस्लाम में पुनर्जागरण को लेकर उन तत्वों के मददगार के रूप में होनी चाहिए जो मुल्लाओं के खिलाफ खड़े होना चाहते हैं। मैंने स्वयं इन तत्वों को पाकिस्तान में बेख़ौफ़ मुल्लाओं के खिलाफ जन-मंचों से बोलते सुना है जब मैं कराची में एक तक़रीर में शिरकत कर रहा था। मुसलमान औरतें खडी हो रही हैं। हमें इन लोगों को मदद करनी होगी, सुरक्षा देनी होगी, आर्थिक और सामरिक रूप से इन्हें मज़बूत करना होगा। विचारधारा की लड़ाई गोलियों से नहीं लड़ी जा सकती और इसमें राज्य के अभिकरणों की भूमिका मात्र ‘हेल्पर’ की हीं हो सकती है बाकि लड़ाई इस्लाम के वैज्ञानिक सोच वाले तत्व हीं लड़ सकते हैं।
सरकार हीं नहीं गैर-राज्य संस्थाओं के स्तर पर भी परोक्ष रूप से इन आधुनिक सोच वाले तत्वों को कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ खड़ा करना हीं इस वैश्विक समस्या का निदान है।
(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)
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