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क्या भारत में कोई संपादक-पत्रकार ऐसी मर्दानगी आज दिखा सकता है?: हरिशंकर व्यास

<p style="text-align: justify;">'सेना, इस्लामी उग्रवाद आदि तमाम जकड़नों के बावजूद पाकिस्तान में पत्रकार यदि अधिक जीवंत और हिम्मती है तो वजह मुस्लिम मिजाज, तासीर से पैदा लड़ने-मरने का साहस है। और वैसा हम हिंदूओं में हो ही नहीं सकता। इसलिए भारत के क्रिकेटर भी पाकिस्तानी टीम से खौफ में खेलते रहे हैं तो भारत के प्रधानमंत्री जीत कर भी या तो हारते हैं या

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

'सेना, इस्लामी उग्रवाद आदि तमाम जकड़नों के बावजूद पाकिस्तान में पत्रकार यदि अधिक जीवंत और हिम्मती है तो वजह मुस्लिम मिजाज, तासीर से पैदा लड़ने-मरने का साहस है। और वैसा हम हिंदूओं में हो ही नहीं सकता। इसलिए भारत के क्रिकेटर भी पाकिस्तानी टीम से खौफ में खेलते रहे हैं तो भारत के प्रधानमंत्री जीत कर भी या तो हारते हैं या दुश्मन को पकौड़े की कूटनीति से साधने का मुगालता पालते है!' हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

भारत के मीडिया में ‘डॉन’ कहां!

‘डॉन’ मतलब पाकिस्तान का अंग्रेजी अखबार! इस अखबार की और उसके पीछे पाकिस्तानी पत्रकारों की हिम्मत को दाद दीजिए जो ये पाकिस्तानी सेना और शरीफ सरकार दोनों से इस बात पर भिड़े हैं कि कैसे उस रिपोर्टर की विदेश आवाजाही पर रोक लगाई जिसने हिम्मत के साथ अंदरखाने की यह खबर दी कि सेना और नवाज सरकार में आतंकियों को गुपचुप दूध पिलाने पर मतभेद फूटा।

ध्यान रहे डॉन में जब खबर छपी तो उसकी वैश्विक चर्चा हुई। भारत में भी वह खबर सुर्खियों के साथ छपी। उसी पर भारत में कईयों ने माना कि नवाज सरकार तो शरीफ है मगर सेना बिगड़ैल है। वहां सरकार और सेना में झगड़ा है। सोच सकते हैं सेना और आईएसआई उस पत्रकार और अखबार पर कितने तिलमिलाए होंगे। बाद में नवाज शरीफ और सेना सबने सफाई दी कि ऐसा कोई मतभेद नहीं। नवाज शरीफ से मिलने सेना प्रमुख राहील शरीफ गए। दो बार बात हुई। सरकार की तरफ से दो दफा खंडन हुआ। अखबार ने उसे छापा भी मगर अपनी रपट पर कायम रहा। सो पाकिस्तानी सेना और आतंकी तत्व ऐसी मीडिया चोट की कैसे अनदेखी करते। नतीजतन पत्रकार सिरिल अलमेडा के देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई। आदेश हुआ है कि सेना के बारे में ‘मनगढ़ंत’ कहानी प्रकाशित करने के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो।

तभी अखबार ‘डॉन’ और पाकिस्तान की पत्रकार बिरादरी सरकार के विरोध में उठ खड़ी हुई है! अखबार ने संपादकीय लिख दो टूक शब्दों में कहा है कि जो छपा है उसके लिए स्वयं संपादक जिम्मेवार है। सूचनाओं के गेटकीपर के नाते पुष्टी, क्रास चेक और तथ्यों को चेक करके रिपोर्ट छपी है। हम अपनी खबर पर अटल है और रिपोर्टर के पीछे खड़े है।

क्या भारत में कोई संपादक या पत्रकार ऐसी मर्दानगी आज दिखा सकता है? इस सवाल पर विचार करते हुए ध्यान रखें पाकिस्तान और भारत की स्थिति के फर्क को। पाकिस्तान में सेना सर्वेसर्वा है। यह भी सोचें कि डॉन ने जब शरीफ सरकार के हवाले लिखा कि सेना और एजेंसियां आतंकवादियों को गुपचुप समर्थन देना बंद करें तो इस पर आतंकी संगठनों और जिहादी भी कितने भड़के होंगे। सो ‘डॉन’ और पत्रकार बिरादरी दोनों के खिलाफ सेना, सरकार, आतंकी संगठन सब बदला लेने के मूड में होंगे। बावजूद इसके यदि वहां के पत्रकार मर्दानगी दिखा रहे हैं तो निसंदेह कमाल की बात है।

तभी भारत के आज के मीडिया सीन में यह सवाल गंभीर है कि क्या कोई अखबार, संपादक अपने यहां ऐसी मर्दानगी दिखा सकता है? मैंने भी ‘डॉन’ के मामले में गौर नहीं किया था। पर जब आज कोलकत्ता के टेलिग्राफ के पहले पेज की एक हैडिंग देखी तो सोचने को मजबूर हुआ कि एक तरफ वे और एक तरफ हम। हैडिंग थी- जब उधर सवेरा (डॉन) ज्यादा उजला!

क्या बात है! बहुत सटीक व सबकुछ कह देने वाला शीर्षक! जब अपने पूर्व गृह मंत्री पी चिंदबरम भारत के मीडिया से पूछ रहे हैं कि क्यों तुम लोग ऐसे गिर रहे हो जैसे नाइनपिसं? क्यों तुम लोग ऐसे घुटने टेक रहे हो? तब उस देश से हमें पत्रकारी साहस और धर्म का अनुकरणीय पाठ मिल रहा है जिससे एलर्जी रखते हैं, नफरत करने, उसके कमजोर लौकतंत्र का मखौल उड़ाने का ख्याल दिमाग में पैठा होता है।

हां, टेलिग्राफ में मानिनी चटर्जी ने पाकिस्तान में पत्रकारी निर्भिकता के साथ भारत के मीडिया की इन दिनों की भोपूगिरी पर जो लिखा है उसमें एनडीटीवी और पी चिदंबरम के इंटरव्यू का किस्सा भी है। आप जानते ही होंगे कि मैं विचारों में न मानिनी चटर्जी का कायल हूं और न एनडीटीवी या वाम-सेकुलर बौद्विक विमर्श में साझेदार।

मैं दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी हूं और हिंदू सरोकारों में भी दुबला रहता है। 35 साल से यही अपनी निरंतरता है। उस नाते ताजा मामले में भी सोचने बैठा हूं तो थीसिस यही निकल रही है कि यदि आज पाकिस्तान में दबंग पत्रकारिता देख रहे हैं और मोदी काल के दौरान यदि भोंपू पत्रकारिता में कान फट रहे हैं तो बुनियादी वजह मुस्लिम बनाम हिंदू डीएनए का फर्क है। हम हिंदू इतने भीरू, डरपोक, कायर हैं कि इमरजेंसी लगी तो भारत का मीडिया रेंगने लगा और आज नरेंद्र मोदी भले कुछ न कहें लेकिन उनके खौफ में एनडीटीवी भी थर्ऱाता हुआ है तो एक भी अखबार या टीवी चैनल ऐसा नहीं है जो सम्यक, शांत भाव मगर खबर लेने के अंदाज में खबर देने की जिम्मेवारी निभा सकें। फर्क हिंदू बनाम मुसलमान का है। तभी यह पुरानी हकीकत है कि सेना, आईएसआई जैसी खुफियां एजेंसियों और दस तरह के खूंखार आतंकी संगठनों- आतंकवादियों के बावजूद पाकिस्तान में पत्रकारी तेंवर लिए मर्द पत्रकार, मीडिया संस्थान अधिक मिलेंगे। यदि भारत में वहां की सेना जैसा 20 प्रतिशत भी खौफ होता तो भारत का मीडिया इतना गुलाम होता कि चीन के साम्यवादी या सोवियत संघ या उत्तर कोरिया के किम राज की भोंपूगिरी से वह प्रतिस्पर्धा कर रहा होता!

सेना, इस्लामी उग्रवाद आदि तमाम जकड़नों के बावजूद पाकिस्तान में पत्रकार यदि अधिक जीवंत और हिम्मती है तो वजह मुस्लिम मिजाज, तासीर से पैदा लड़ने-मरने का साहस है। और वैसा हम हिंदूओं में हो ही नहीं सकता। इसलिए भारत के क्रिकेटर भी पाकिस्तानी टीम से खौफ में खेलते रहे हैं तो भारत के प्रधानमंत्री जीत कर भी या तो हारते हैं या दुश्मन को पकौड़े की कूटनीति से साधने का मुगालता पालते है!

सो भारत बनाम पाकिस्तान, अपने बनाम उनके मीडिया, अपने हिंदू रक्षक बनाम उनके जिहादी, अपने फिल्मकार बनाम उनके फिल्मकार आदि में फर्क की बुनियाद हिंदू बनाम मुस्लिम फर्क है। दुर्भाग्य यह है कि भारत में कोई नहीं समझ रहा है कि देश को बनाना है तो सबसे पहले हिंदू को निर्भिक, बेखौफ बनाना होगा। दुर्भाग्य यह भी है कि इसमें मोदी सरकार एकदम विपरित काम कर रही है। तभी सोचें कि यह कितनी बेहूदा बात है जो राहुल गांधी के खून की दलाली वाली फुटैज को बताने की एनडीटीवी में हिम्मत नहीं हुई। पी चिदंबरम का लिया हुआ इंटरव्यू टेलिकास्ट नहीं किया। इसलिए कि उन्हें डर लगा कि नगाड़ों के माहौल में यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सर्जिकल स्ट्राइक के विपरित होगा। नगाड़ों का शौर ही ऐसा है कि सबमें सिर्फ जयकारे की हौड़ है। और यही क्या इतिहासजन्य गुलाम कौम का नैसर्गिक व्यवहार नहीं है?

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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