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पढ़िए, हिंदी साहित्यकार 'नामवर' के नामवर सिंह बनने की पूरी कहानी...

शफीक आलम ।। नामवर के नामवर सिंह बनने की कहानी है भारतीय साहित्य में दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नामवर सिंह के व्यक्तित्व से वाकिफ नहीं हो। नामवर सिंह की शख्सियत एक ऐसे चिराग की है जिसकी र

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

शफीक आलम ।।

नामवर के नामवर सिंह बनने की कहानी है

भारतीय साहित्य में दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो नामवर सिंह के व्यक्तित्व से वाकिफ नहीं हो। नामवर सिंह की शख्सियत एक ऐसे चिराग की है जिसकी रौशनी से हिंदी साहित्य जगत न सिर्फ रौशन है, बल्कि इस चिराग से प्रकाश लेकर हिंदी लेखकों, साहित्यकारों, कवियों, आलोचकों आदि ने ऐसे-ऐसे नायाब फूल खिलाए हैं जिनकी खुशबू ने हिंदी के साथ-साथ समूचे भारतीय साहित्य को मंत्रमुग्ध कर रखा है। केवल बीस वर्ष की आयु में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे प्रख्यात विद्वान की लेखनी पर आलोचना करने की हिम्मत केवल आने वाले युग का नामवर सिंह ही जुटा सकता था। नामवर सिंह आज 90 वर्ष के हो गए हैं। आज से 70 वर्ष पूर्व जो सफर शुरू हुआ था, वह सफर उसी निष्ठा, उसी जोश और उसी जज्बे के साथ जारी है। इस अवधि में साहित्य की दुनिया ने कई करवटें बदलीं, बदलाव की कई आंधियां देखीं। कोई भी संवेदनशील फनकार या चिन्तक ऐसे बदलाव से अनभिज्ञ नहीं रह सकता, नामवर सिंह भी नहीं रहे। उनके साहित्यिक जीवन में भी कई पड़ाव आये लेकिन हर पड़ाव से बकौल शायर-हम जहां पहुंचे कामयाब आए।

यदि नामवर सिंह की साहित्यिक सेवाओं पर एक सरसरी नजर डाली जाए तो यह आसानी से कहा जा सकता है कि वे केवल एक व्यक्ति, एक आलोचक, एक कवि, एक साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक संस्था हैं और एक संस्था की उपलब्धियों को केवल तीन सौ या चार सौ पन्नों में समेट लेने की कोशिश बहुत जोखिम भरा काम है। लेकिन इस सिलसिले में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका बहुवचन ने एक कामयाब कोशिश की है।

[caption id="attachment_25439" align="alignright" width="348"]                                   नामवर सिंह[/caption]

इसमें कोई शक नहीं कि यह काम गागर में सागर भरने जैसा है, लेकिन यह काम क्यों जरूरी है, इसका जवाब बहुवचन के विशेषांक में शामिल चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय के लेख से मिल सकता है। वे लिखते हैं: नामवर सिंह हमारे बीच हैं, यह हिंदी का सबसे बड़ा सौभाग्य है। वे अपनी उम्र का जो हिस्सा जी चुके हैं वह नामवर सिंह बनने का हिस्सा था, लेकिन अब जो जीवन वे जी रहे हैं, वो नामवर सिंह कैसे बने और नामवर सिंह होने का क्या मतलब है यह देश को बताने का हिस्सा है। वे हिंदी साहित्य के लिए एक ऐसी मिसाल हैं, जो अपने आप में पूरे ग्रन्थ में परिवर्तित हो चुके हैं।

बहुवचन का यह अंक कई लिहाज से स्मरणीय और दस्तावेजी हैसियत रखता है। सबसे पहले तो यह कि इसमें नामवर सिंह जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व के जीवन और कार्य के हर पहलुओं को समझने और पाठक को उससे अवगत कराने की कोशिश की गई है। दूसरी यह कि मैनेजर पाण्डेय, राम बहादुर राय, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी आदि जैसे हिंदी साहित्य के प्रथम पंक्ति के लेखकों ने नामवर सिंह के जीवन और लेखनी के अलग-अलग पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। इस अंक को पांच भागों में बांटा गया है। पहला भाग आंखन देखी शीर्षक से है जिसमें 27 लेख शामिल हैं। इन लेखों में नामवर के जीवन के अलग-अलग अनछुए कोनों को खंगालने की कोशिश की गई है। इस भाग में रामदरश मिश्र, निर्मला जैन, मैनेजर पाण्डेय, संतोष भारतीय, प्रियदर्शन आदि के लेख शामिल हैं।

इन लेखों से नामवर के जीवन के कई अनदेखे पहलु उजागर होते हैं, जिनके बारे में आम पाठक को जानकारी नहीं थी। मिसाल के तौर पर रामदरश मिश्र अपने लेख बनारस के नामवर भाई में लिखते हैं कि नामवर भाई अच्छे कवि तो थे ही, चिन्तक भी थे। वे शंभूनाथ सिंह के शिष्य कवियों में से थे, उनके साथ कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में जाते थे, अपने मधुर कंठ से कविताएं पढ़ते थे। ये कविताएं नामवर भाई के गहरे प्रकृति-प्रेम की गवाही देती थीं। मुझे विश्वास है कि नामवर भाई यदि कविताएं करते रहे होते तो समकालीन बड़े कवियों में उनकी गणना होती किन्तु न जाने उन्हें क्या सूझी कि धीरे-धीरे कविता से आलोचना की ओर अग्रसर हो गए।

भाषा के संबंध में नामवर जी के विचार को एक लम्बे समय तक उनके सहयोगी रहे प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय ने यूं बयान किया है: ।।। मैंने पूछा, डॉ। साहब समस्या क्या है? बोले, कई वाक्यों में मौलवी साहब अपनी दाढ़ी फटकार रहे हैं और कई में पंडितजी अपनी चुटिया हिला रहे हैं। मतलब कठिन संस्कृत के भी शब्द हैं और कठिन अरबी-फारसी के शब्द भी हैं। बोले ऐसी भाषा नहीं चलती, दोनों में एक संतुलन हो और अरबी-फारसी के केवल वे शब्द हिंदी में चलें जो प्रचलन में हों और संस्कृत के शब्दकोष से शब्द निकाल कर नहीं लिखने चाहिए, न भाषण देना चाहिए। दरअसल इस तरह के कई रोचक किस्से हैं जो इस अंक में हर जगह पढ़ने को मिलते हैं।

[caption id="attachment_25440" align="alignleft" width="347"]                                     नामवर सिंह[/caption]

बहुवचन के इस विशेषांक का दूसरा भाग मूल्यांकन का है, जिसमें नामवर सिंह की आलोचना की आलोचना की गई है। इस भाग में अशोक वाजपेयी, पीएन सिंह, रवि भूषण, बलराज पाण्डेय के लेख शामिल हैं। तीसरा भाग पुनि पुनि देखिय है, जिसमें राजेश जोशी, दया शंकर, ए अरविंदाक्षन, रघुवीर चौधरी, कमलानंद झा, मनोज कुमार सिंह ने नामवर सिंह से अपने परिचय के हवाले से उनकी लेखनी को समझने की कोशिश की है। हिंदी क्षितिज के पार, गैर हिंदी भाषी क्षितिज पर नामवर सिंह के प्रभाव को अंकित करने और उसे समझने का प्रयास किया गया है। इसलिए इस भाग में एक अंग्रेजी लेख भी शामिल है। पांचवां भाग जीवन क्या जिया में नामवर सिंह का शशिकांत से संवाद शामिल है। अंत में उनकी डायरी के पन्ने, उनके लिखे पत्र और उनकी कुछ तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं।

यह कहने की कदाचित आवश्यकता नहीं है कि नामवर सिंह का जीवन पूर्ण रूप से साहित्य को समर्पित रहा है। वह लम्बे समय तक अध्यापन से जुड़े रहे हैं और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े होने के कारण वे वामपंथी विचारधारा के हामी रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके छात्रों और प्रशंसकों में हर विचारधारा के समर्थक शामिल रहे हैं। अपने प्रिय छात्रों के साथ उन्होंने विचारधारा की बुनियाद पर कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं रखा। लिहाज़ा वर्षों पूर्व रिटायर होने के बावजूद उनके दरवाज़े नए, प्रतिभावान एवं उत्साही लेखकों के लिए हमेशा खुले रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बहुवचन का यह अंक हर साहित्य प्रेमी के पास होना चाहिए।

(साभार: चौथी दुनिया)

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