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मिस्टर मीडिया: बालिग़ तो हुए, ज़िम्मेदार कब बनेंगे?

Published At: Wednesday, 02 January, 2019 Last Modified: Thursday, 03 January, 2019

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

अच्छा लगता है। सुनने-कहने में अच्छा लगता है। हिन्दुस्तान का चैनल उद्योग वयस्क हो गया। अठारह बरस पहले अपनी ज़मीन से प्रक्षेपित हिन्दुस्तान का पहला चैनल आया था। दो हज़ार पांच आते आते चैनल उद्योग खड़ा हो गया।

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साल दर साल आकार और विकराल-विराट। इसके बाद एक के बाद एक चैनल आते गए। आकार बढ़ता गया। इतना बड़ा कि पैजामे से बड़े पैर हो गए। आज बढ़ते पांव ही बड़ी चुनौती बन गए हैं। न पाजामा बड़ा हो सकता है और न पैर छोटे। चैनल इंडस्ट्री को एडल्ट तो मानने में कोई एतराज़ नहीं है। सवाल है कि क्या वह इतना ज़िम्मेदार है कि अपने अच्छे-बुरे का चुनाव कर उसे वोट कर सके। शायद नहीं। हमें अभी इंतज़ार करना होगा। दो हज़ार उन्नीस की नई और ताज़ी सर्द किरणों के बीच गरमागरम माथापच्ची आज उपयोगी है।

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दरअसल, बचपन नटखट, शरारती, चंचल और बेपरवाह होता है। पीछे मुड़कर इस चैनल इंडस्ट्री का बचपन देखिए तो लगता है कि यह इसके उलट था। हम परदे पर इतने ज़िम्मेदार थे कि बच्चों को कहते थे कि टेलिविजन देखना हो तो ख़बरिया चैनल देखो। आज कहते हैं कि समाचार चैनल छोड़कर सब कुछ देखो। ऐसा क्या हुआ कि हमारे न्यूज़ चैनलों की साख़ को बट्टा लग गया। एक प्रिंस नाम का बच्चा खुले बोरवेल में गिरा। समाचार चैनलों ने उसे बचाने का बीड़ा उठाया। बच्चा बच गया। दस बारह साल बाद भी दर्शकों को याद है। पर किसे याद है कि कौन से चैनल ने स्वर्ग की सीढ़ी कब दिखाई थी? गुजरात में विनाशकारी भूकंप का कवरेज आज भी भारतीय चैनल इंडस्ट्री के सामाजिक सरोकारों की याद दिलाता है, लेकिन बैतूल के पंडित कुंजीलाल की अपनी मौत की भविष्यवाणी पर हुए तमाशा कवरेज को कौन अपनी यादों में जगह देना चाहेगा?

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प्रिंस को बचाना लता मंगेशकर का गीत है और कुंजीलाल आइटम सांग। हमारा चैनल उद्योग टीआरपी के लिए आइटम सांग मांगता है। विडंबना है कि जो चैनल इंडस्ट्री प्रिंस के नाम पर हिन्दुस्तान के दर्शकों की सहानुभूति बटोरती थी, उसे बालिग़ होने पर मेघालय में ज़मीन के नीचे फंसे पंद्रह मजदूरों की फ़िक़्र नहीं हुई। नए साल के स्वागत में छोटे परदों पर जश्न चलते रहे। देखने वाले झूमते रहे। मेघालय के मजदूरों की कराह किसी ने न सुनी। नए साल का जश्न कवर करने के लिए सात समंदर पार टीमें भेजने वाले कितने चैनलों ने अपनी टीमें मेघालय भेजीं?

कई साल से हम मुल्क़ में बीबीसी, डिस्कवरी, हिस्ट्री, एनिमल प्लेनेट या ट्रैवल चैनल देख रहे हैं। ये सारे परदेसी चैनल हैं। इन्हें कोई भारतीय बुरा नहीं कहता। तो हमें अपने डिस्कवरी अथवा बीबीसी शुरू करने से रोका किसने है? हम भारतीय तो वैसे भी दुनिया में नक़ल करने के लिए जाने जाते हैं। कितनी ही भौंडी नक़ल करें-अपने डिस्कवरी, एनिमल प्लेनेट, हिस्ट्री चैनल को शायद ही बुरा कहा जाएगा। बशर्ते हम उसमें सास, बहू और साज़िश न दिखाएं। यही नहीं, ढंग के आध्यात्मिक, सेहत, विज्ञान, संस्कृति और पर्यावरण केंद्रित चैनल प्रारंभ करने से किसने रोका था? भारत की धरती अपनी पूंजी-वीरों से ख़ाली नहीं हुई है। मैं तो कम से कम यही मानता हूं।

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संवेदनाओं के धरातल पर भी अब दो फ़ीसदी इंडिया से अट्ठानवे फ़ीसदी हिन्दुस्तान हारने लगा है। इंडिया अपमार्केट है और हिन्दुस्तान डाउन मार्केट। मीडिया की मंडी में डाउन मार्केट नक़्क़ारख़ाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गया है। विद्रूपता तो यह है कि चैनल चलाने वाले नब्बे फ़ीसदी प्रोफेशनल्स डाउन मार्केट हिन्दुस्तान के गांवों-क़स्बों से आए हैं। उनकी विवशता और तक़लीफ़ को समझ सकते हैं। क्या यह गोरी हुक़ूमत की याद नहीं दिलाती, जब दो फ़ीसदी गोरे शेष भारत पर राज करते थे। पूंजी के हाथ में पेशेवरों का रिमोट है। यह हालत बदलनी होगी। हालत बदलने का काम पाकिस्तान से आकर कोई नहीं करने वाला है। यह बात समझनी होगी मिस्टर मीडिया!



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