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क्या मीडिया सच में दलाल, देशद्रोही और प्रॉस्टिट्यूट है?

सज्जन चौधरी ।। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस वाले दिन एक टीवी चैनल पर खबर देख रहा था, जिसमें योग न करने वालों पर एक धर्म

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

सज्जन चौधरी ।।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस वाले दिन एक टीवी चैनल पर खबर देख रहा था, जिसमें योग न करने वालों पर एक धर्म विशेष के प्रति लगाव न रखने का आरोप लगाया जा रहा था। जितना शर्मनाक योग को एक धर्म विशेष से जोड़कर देखना है, उससे ज्यादा शर्मनाक इस खबर को एक टीवी चैनल पर दिखाया जाना है।

बीते दो दशकों में मीडिया कितना पावरफुल हुआ है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि अंबानी जैसे घराने, बिड़ला से लेकर देश के तमाम बड़े कॉरपोरेट घरानों को इस व्यापार में उतरना पड़ा है। कॉरपोरेट घरानों के इस व्यवसाय में आने से मीडिया की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। कॉरपोरेट घराने मुनाफा कमाने के लिए किसी क्षेत्र में पैसा लगाते हैं और यह मुनाफा हमेशा पैसा नहीं होता।

कॉरपोरेट घराने संबंधों को साधने के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन्हीं संबंधों के चक्कर में मीडिया की प्रमाणिकता पर सवाल उठने लगे हैं। हर चैनल और अखबार पर किसी न किसी पार्टी विशेष को सपोर्ट करने का आरोप लग रहा है। मीडिया को दलाल, देशद्रोही, प्रॉस्टिट्यूट और न जाने किस किस नाम से बुलाया जा रहा है। मसलन, भाजपा के फेवर की खबर चले तो मीडिया दलाल और अगर भाजपा के खिलाफ खबर चले तो प्रॉस्टिट्यूट और देशद्रोही। भाजपा-कांग्रेस के इस खेल में एक नई पार्टी और कूद पड़ी है, जिसने मीडिया को लेकर सारी हदें पार कर दी हैं। आम आदमी पार्टी ने बड़े-बड़े पत्रकारों और अखबारों को विज्ञापन का लालच देकर अपनी मुट्ठी में कर लिया है।

बहरहाल, सवाल यह है कि क्या मीडिया सच में दलाल, देशद्रोही और प्रॉस्टिट्यूट है? जवाब में इतना ही कहा जा सकता है कि जब तक राजनैतिक पार्टियां संपादकों और मीडिया मुगलों को राज्यसभा भेजने की परंपरा को जारी रखेंगे, तब तक मीडिया पर दलाल और देशद्रोही होने के आरोप लगते रहेंगे। मतलब, हमें सिक्के के दोनों पहलुओं पर नजर डालनी होगी। कांग्रेस हो या भाजपा सभी ने संपादकों और मीडिया मालिकों को राज्यसभा भेजा है। दक्षिण भारत में मीडिया के बहुत बड़े वर्ग पर सिर्फ राजनेताओं का कब्जा है। पंजाब में भी एक दल विशेष ने मीडिया पर कब्जा जमा रखा है। अब यहां फिर से सवाल खड़ा होता है कि गाली मीडिया को दें या राजनेताओं को, जिन्होंने मीडिया को दलाल बना दिया है। राजनेताओं और कॉरपोरेट घरानों के इस खेल का मोहरा बनते हैं 15,20 और 25 हजार रुपए कमाने वाले नौजवान। जिन्हें कंपनी की पॉलिसी को मानते हुए सिर्फ कार्यकर्ता की तरह काम करना होता है। अपनी खबर के माध्यम से किसी की बजानी है और किसे ऊपर उठाना है, इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे सिर्फ खबर से मतलब होता है, जिसे करने के लिए उसे ऊपर से ऑर्डर मिले होते हैं। अगर खबर के बारे में ज्यादा दिमाग चलाने की सोची तो उससे कम पैसे में काम करने वालों की भीड़ कंपनी के पास पहले ही लगी रहती है। इन परिस्थितियों में जब किसी पर दलाल, देशद्रोही और प्रॉस्टिट्यूट होने का आरोप लगता है तो दुख होता है। क्योंकि मैं भी इसी मीडिया का एक छोटा सा हिस्सा हूं।

जब से मीडिया में नौकरी कर रहा हूं एक बात दिमाग में बैठ चुकी है। किसी भी मुल्क के लिए सबसे खतरनाक अगर कुछ है तो वह मीडिया और जुडीशरी का भ्रष्टाचार है। आम आदमी के लिए इंसाफ की आखिरी उम्मीद इन्हीं दोनों पर टिकी होती है। लेकिन राजनैतिक दलों से जिस तरह से मीडिया और जुडीशरी को अपने हिसाब से तोड़ा-मरोड़ा है, वह बेहद डरावना है।

हाल ही में उत्तराखंड में सरकार गिराने और बचाने को लेकर हुए जोड़-तोड़ में जुडीशरी का अहम रोल सामने आया। उत्तराखंड हाई कोर्ट के जज के फैसलों को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर दुष्प्रचार किया गया और जज पर कांग्रेस समर्थित होने का आरोप लगाया गया। हैरानी की बात देखिए, पूरा प्रकरण निपटने के बाद जज का ट्रांसफर भी हो गया। तो क्या सच में हमारे जुडीशल सिस्टम राजनेताओं के इशारों पर नाच रहा है। ऐसा ही कुछ देखने को मिला था 2जी स्पेक्ट्रम मामले में फैसला सुनाने वाले जज अशोक गांगुली की रिटायरमेंट के वक्त। उन पर कांग्रेस के खिलाफ फैसला सुनाने का आरोप लगा था और रिटायरमेंट से कुछ ही दिन पहले उनकी ही इंटर्न ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगा दिया। राजनैतिक गलियारों और दिल्ली के प्रेस क्लब में यह चर्चा आम थी कि कांग्रेस ने बदला ले लिया है। इन दो घटनाओं के माध्यम से मैं यहां यह दिखाना चाहता हूं कि न सिर्फ मीडिया बल्कि जुडीशरी भी राजनीति के इस खेल से अछूती नही हैं।

बहरहाल, एक मीडिया पर्सन होने के नाते जब कोई मेरी जमात पर दलाल, देशद्रोही और प्रॉस्टिट्यूट जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है तो दुख होता है। सोशल मीडिया पर आम नागरिक जिन्हें मामले की असलियत नहीं पता होती वे भी कोई पोस्ट डालकर हमारी बिरादरी पर सवाल खड़े कर देते हैं। हमें गालियां बकते हैं, हमारा चरित्र हनन किया जाता है और इधर हम हैं जिन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि हम देश का साथ दें या किसी पार्टी विशेष का या अपना परिवार चलाने के लिए अपनी नौकरी बचाए रखें और बॉस के आर्डर को फॉलो करते रहें।

(लेखक एक युवा पत्रकार है।)

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