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किसी दिन गंभीर झमेले में फंस जाएंगे मिस्टर मीडिया!

फरवरी के पहले सप्ताह में अंतरिम बजट और बंगाल-केंद्र सरकार के बीच रस्साकशी...

राजेश बादल 7 years ago

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

फरवरी के पहले सप्ताह में दो बड़े कवरेज़ थे। एक अंतरिम बजट और दूसरा बंगाल और केंद्र सरकार के बीच रस्साकशी। रस्सा बनी सीबीआई और निर्णायक रहा सर्वोच्च न्यायालय। इस प्रसंग ने दो दिन तक देश की देह में हरारत पैदा कर दी। दोनों घटनाक्रम ही बड़े महत्वपूर्ण। लोकसभा चुनाव पर असर डालने वाले। अख़बारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया ने इन पर जमकर 'खेला' (आजकल मीडिया में यही शब्द चलता है)। इस कवरेज के बाद निचोड़ निकाला तो दिल बैठ गया। कवरेज़ की गुणवत्ता ने निराश किया। विनम्रता से कह रहा हूं कि मैं निराशावादी नहीं हूं। कुछ अपवाद भी थे। इसलिए अगर आपने अच्छा किया तो कर्तव्य निभाया। उसे शाबाशी के लिए किसी मंच या माध्यम की दरकार नहीं है।

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पहले बजट की बात। हमने उसे वैसी ही जगह दी, जैसे पूर्ण बजट को देते हैं। संसद के मान्य सिद्धांत और परंपरा पांचवें साल में ठीक चुनाव के पहले बजट को बजट नहीं मानते। इसका पालन भी होता रहा है। असल में केंद्र सरकार को अपने लिए जिस धन की ज़रूरत होती है, वह पिछले साल ही उसे बजट पारित होने के बाद मिल जाता है। इसकी मियाद 31 मार्च 2019 को समाप्त हो जाती है। इसके बाद एक अप्रैल से नया वित्त वर्ष लग जाएगा। चुनाव के बाद नई सरकार का गठन होगा और वह जुलाई में पूर्ण बजट पेश करेगी। तब तक यह सरकार कामचलाऊ सरकार मानी जाएगी। एक अप्रैल से जुलाई तक उसे उतना ही पैसा मिलेगा। जितने में उसके काम न रुकें। यानी वह अपने गुजारे लायक पैसा लेगी और साल भर के आय-व्यय का लेखा जोखा पेश करेगी। लेकिन इस बार के बजट में पूर्ण बजट की तरह ऐलान किए गए। कारण था चुनाव। कवरेज में उसे उतना ही संक्षिप्त स्थान मिलना चाहिए था। यह अनुपात बिगड़ गया। जब हम मीडिया वाले इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं तो आम दर्शक या पाठक इसका शिकार हो जाता है। गांव-गांव में इस पर चर्चा शुरू हो जाती है। स्पष्ट कर दूं कि नई सरकार (भले ही वह बीजेपी की हो) अपने इन ऐलानों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। यानी हमने मानसिक तौर पर अपने उपभोक्ता को ठगा। कुछ चैनलों ने इसे समझाया, अखबारों ने स्पष्ट किया, लेकिन उनकी आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की तरह दब गई।

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इसी तरह बंगाल सरकार और केंद्र सरकार सीबीआई को मोहरा बनाकर आमने सामने आईं तो इस मामले में भी मीडिया के तमाम रूपों ने गहराई से विश्लेषण नहीं किया। इस मामले का विश्लेषण प्याज के छिलकों की तरह होना चाहिए। यानी हर परत की अलग-अलग व्याख्या। मगर पत्रकार या तो इधर खड़े नज़र आए या उधर। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। हमें सिर्फ़ तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करनी चाहिए थी। इसी तरह के मीडिया ट्रायल की आलोचना अदालत भी करती है और समाज भी आप पर सवाल खड़े करता है। सीबीआई के क़ानूनी पहलू पर भी सब अपने अपने ढंग से तीर-तुक्के लगाते रहे। हमारे मीडिया संस्थानों में बीट सिस्टम के ध्वस्त होने और जानकार एक्सपर्ट पर्याप्त संख्या में नहीं होने के कारण राजनीतिक/क्राइम/आम सिटी रिपोर्टर ही इस बेहद नाज़ुक और संवेदनशील मसले की पड़ताल करते रहे। क्या इसे कोई भी उचित ठहराएगा?

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ज़ाहिर है स्थिति एक या दो दिन में बदलने वाली नहीं है। ऐसे में समाधान यही है कि सिर्फ इंटरनेट पर तात्कालिक ज्ञान लेकर अपनी रिपोर्ट फ़ाइल न करें और न एंकर उस जानकारी को प्रसारित करें। कुछ क़ानूनी, संसदीय सन्दर्भ की किताबें अपने घर की लायब्रेरी में (यदि अब तक बची हैं तो) ज़रूर रखें। अगर कई दिन चलने वाला मसला है तो घर पर थोड़ा अध्ययन तो हो ही सकता है। इसके बाद इस जानकारी और राजनीतिक समीकरणों पर एक बार सोच लीजिए। फिर देखिए गुणवत्ता में कितना अंतर आता है। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन गंभीर झमेले में फंस जाएंगे मिस्टर मीडिया!


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