Share this Post:
Font Size   16

मिस्टर मीडिया: ख़ामोश! पेड न्यूज़ का सिलसिला जारी है

Published At: Saturday, 02 February, 2019 Last Modified: Sunday, 03 February, 2019

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

मैंने पिछले कॉलम में देश के स्ट्रिंगर्स की दयनीय स्थिति और कुछ टीवी चैनलों के लोगो किराए पर देने या उसकी बोली लगाने की कुप्रथा पर लिखा था। इसके बाद मेरे पास सैकड़ों फोन और सन्देश आए।

जिला और तहसील स्तर के पत्रकारों तक ने संपर्क किया। दबाव की एक नई क़िस्म की पत्रकारिता का पता चला। उन्होंने कहा, ‘गणतंत्र दिवस पर पत्रकारों को टारगेट दिए गए थे। अख़बारों ने अपने रिपोर्टरों को पच्चीस हज़ार से लेकर एक लाख रुपए के विज्ञापन जुटाने का फ़रमान दिया था। एक ऐसे ही सन्देश की कॉपी यहां आप देख सकते हैं। पत्रकार और संबंधित अख़बार का नाम नहीं दे रहा हूं, क्या पता उस बेचारे पर ग़ाज़ गिर जाए।

यह भी पढ़ें: मिस्टर मीडियाः धंधा तो है पर क्या वाकई गन्दा है?

कुछ पत्रकार तो यहां तक दुखी थे कि बोले,' एक लाख तो नहीं जुटाएंगे। चाहे नौकरी से निकाल दें। विज्ञापनों की भीख मांगने से छोटी सी दुकान कर लेना बेहतर है। एक लाख रुपए समाचार पत्र के लिए लूंगा तो इससे अच्छा है दो-चार शुभचिंतकों के सामने झोली फैलाकर दो लाख रुपए उधार ले लूंगा। किराना या स्टेशनरी की दुकान खोलूंगा। धीरे-धीरे चुकाता रहूंगा, मगर भविष्य में पत्रकारिता नहीं करूंगा। तकनीकी तौर पर शायद यह पेड न्यूज़ की श्रेणी में नहीं आए, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर वसूली का धंधा तो है ही। आजकल घर-परिवार के लोग ही पैसे की मदद करने से कतराते हैं फिर अन्य लोग क्यों कर विज्ञापन देने लगे? 

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडियाः परदा बदलने से भौंडी नक़ल जायज़ नहीं हो जाती

विज्ञापनदाता के पास संवाददाता जाता है तो भले ही स्थानीय सामाजिकता के चलते वह ज़िक्र न करे, मगर विज्ञापनदाता के अंदर यह भाव तो आ ही जाता है कि अगर विज्ञापन नहीं दिया तो समाचारपत्र में उसके संस्थान या कारोबार के ख़िलाफ़ ख़बर छप जाएगी। यह एक क़िस्म की धौंस ही तो है। कभी कभी विज्ञापनदाता इनकार कर देता है तो संबंधित पत्रकारों को वहां के पुलिस अफसर या विधायक की मदद लेनी पड़ती है। पुलिस ऑफिसर या विधायक सीधे-सीधे कहते हैं कि ये अपने आदमी हैं। इनकी मदद करनी है। बेचारा विज्ञापनदाता क्या करे? पुलिस और नेता से कौन नहीं डरता? वह चुपचाप जेब ढीली कर देता है।

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडियाः न्यूज अगर प्रोडक्ट है तो उसे वैसा बनाकर दिखाइए

पुलिस अफसर भी क्या करे? आजकल अपराध कम तो होते नहीं, हर साल आंकड़ा बढ़ता ही जाता है। अखबार में अपराध उछलते हैं तो उसकी दुकान ठंडी हो जाती है। तबादला भी हो जाता है। इसी तरह विधायक जी ने सहायता नहीं की तो अखबार उनका बायकॉट शुरू कर देता है। यही वह पेंच है। यहीं से गाड़ी पटरी से उतर जाती है।

यह भी पढ़ेंः मिस्टर मीडिया: बालिग़ तो हुए, ज़िम्मेदार कब बनेंगे?

अफ़सोस! इस संक्रामक महामारी को रोकने या उससे निपटने का कोई कारगर उपाय मुझे भी नहीं सूझ रहा है। पत्रकारिता की देह इस मर्ज़ से मुक्त हो जाए, ऐसा कोई समाधान नहीं दिखता। संस्थान ही जब नई नस्लों को बिगाड़ने का काम कर रहे हों तो कोई क्या करे? बागड़ जब खेत को खाने लगती है तो उसके ख़तरनाक़ परिणाम भी होते हैं। यह तथ्य मीडिया-मुगलों, कार्यपालिका और विधायिका के पैरोकारों को समझना पड़ेगा। अगर वे नहीं चेते तो यह एक ऐसा तीर है जो उलटकर उन पर भी लग सकता है।

यह भी पढ़ें: मिस्टर मीडिया: विश्लेषण के दरम्यान कितने निष्पक्ष होते हैं पत्रकार?

बड़े पत्रकारों और संपादकों को सावधान होने की ज़रूरत इसलिए भी है कि कहीं वे मैनेजमेंट के दबाव में अपनी पदोन्नति और पैकेज बचाने के लिए इन संवाददाताओं को शोषण और दमन चक्र के नए जाल में तो नहीं फंसा रहे। यह बात ध्यान देने की है मिस्टर मीडिया!



पोल

सोशल मीडिया पर पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है, क्या है आपका मानना?

पत्रकार भी दूध के धुले नहीं हैं, उनकी भी जवाबदेही होनी चाहिए

ये पेड आईटी सेल द्वारा पत्रकारिता को बदनाम करने की साजिश है

Copyright © 2019 samachar4media.com