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बीते एक दशक में लोकसभा चैनल कई मायनों में अलग रहा, बोले टीवी एंकर अनुराग दीक्षित

अनुराग दीक्षित,  एंकर, लोकसभा टीवी ।।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अनुराग दीक्षित, 

एंकर, लोकसभा टीवी ।।

लोकसभा टीवी आज 10 बरस का हो गया है। कल की ही बात लगती है जब 24 जुलाई 2006 को लोकसभा टीवी के 247 प्रसारण की शुरुआत हुई थी। सवाल था कि सालभर में बामुश्किल 70 से 80 दिन चलने वाली लोकसभा के चैनल पर बाकी दिनों में किस तरह के कार्यक्रम प्रसारित किए जाएंगें? दरअसल इसका जबाव ही लोकसभा टीवी को बाकी चैनलों से अलग करने वाला था। हालांकि शुरुआती दिनों में काफी मुश्किल हुई, लेकिन धीरे-धीरे हालात सुधरे। शायद उतने नहीं, जितनी अपेक्षाएं रहीं होंगी। वजह कई थीं और डर भी। डर इस अनूठे प्रयोग की सफलता और असफलता से जुड़ा था। बहरहाल अब इस पड़ाव पर आकर लगता है कि मानों जनता के पैसे से चलने की जबावदेही और सीमित संसाधनों के बीच सोमनाथ चटर्जी का ये प्रयोग शानदार रहा। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के सरंक्षण में बीते दो साल में चैनल ने अपेक्षाकृत बेहतर किया है।

वैसे बीते एक दशक में यह चैनल कई मायनों में अलग रहा है। अब लोकसभा की कार्यवाही देखने के लिए किसी सांसद से दर्शक दीर्घा का पास बनवाने की जरूरत नहीं! लोकसभा टीवी दर्शकों को घर बैठे अपने नेताओं की जबावदेही तय करने का मौका दे रहा है। सदन की चर्चाएं सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। सदन में ना बोलने और हंगामा करने वालों को आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं। ऐसे में सांसदों पर सदन में बोलने और बेहतर आचरण दिखाने का दबाव है। कहना गलत नहीं होगा कि लोकसभा टीवी के शुरू होने के बाद ही बीते एक दशक में बाकी चैनलों पर भी डिबेट शो का चलन बढ़ा है। हो सकता है कई मायनों में उनकी आलोचना होती हो, लेकिन इससे शायद ही कोई असहमत हो कि लोकसभा टीवी ने बहस आधारित कार्यक्रमों में अपनी अलग पहचान बनाई है। तूतू-मैंमैं, चिल्लम चिल्ला नहीं बल्कि गंभीर मुद्दों पर तर्कपूर्ण चर्चा देखने के लिए लोकसभा टीवी आज भारतीय मीडिया के चुनिंदा विकल्पों में से एक है।

मैं चैनल के साथ 2006 से ही जुड़ा हूं। तब से अब तक वर्तिका नंदा, राजीव मिश्र और सीमा गुप्ता जैसे काबिल सीनियर मिले तो रमेश भट्ट, शालिनी,आर्येन्द्र, नताशा, अमान्द्रा, ओमप्रकाश, मुनमुन और नेहा जैसे कई युवा साथी पत्रकार भी। हरेक में खुद को साबित करने की ललक थी, साबित किया भी। हाल ही में अनुराग पुनेठा जैसे अनुभवी और पराक्रम शेखावत जैसे युवा भी साथ जुड़े हैं। इन सबसे  काफी कुछ सीखने को मिला है। इसमें शक नहीं कि लोकसभा टीवी ने बीते दस सालों में मुद्दों को समझने का भरपूर वक्त दिया। देश को समझने का मौका दिया। निजी चैनल में होता तो शायद ऐसा ना कर पाता।

वैसे अपना पहला लाइव शो आज भी याद है। मेहमान ही बोलते रहे और मैं मानों सहमा सा टाई लगाए कोने में बैठा रहा। हालांकि मेहमानों पर हावी तो आज भी नहीं होता। कोशिश रहती है कि जिनको एक्सपर्ट के तौर पर बुलाया है, उन्हें ही सुना जाए, दिखाया जाए। अभी तक महाज्ञानी बनने और चीखने-चिल्लाने से बचा हुआ हूं। पता नहीं एक दशक का यह प्रयोग कितना सफल हो सका है? लेकिन जब विभिन्न मीडिया समूहों के वरिष्ठ संपादक, नीति निर्माता, सिविल परीक्षा की तैयारी करने वाले विधार्थी, सफल हुए युवा अफसर और अन्य दर्शक भी तर्कपूर्ण चर्चा की प्रशंसा करते हैं तो लगता है मानों दस साल का ये सफर सफल रहा। हालांकिं सुधार की गुंजाइश तो हर रोज है।

शुक्रिया लोक सभा टीवी। मेरी शुभकामनाएं....


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