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पढ़िए, भारतीय मीडिया के क्षेत्र में निवेश के क्यों पड़ रहे हैं लाले...
‘भारत जैसे देश में जहां 30 करोड़ से भी अधिक लोग समाचारपत्र पढ़ते हों, 90 करोड़ से अधिक लोग टेलिविजन देखते हों और 34 करोड़ से भी अधिक लोग ऑनलाइन मीडिया का इस्तेमाल करते हों, वहां निवेश के लिए विदेशी कंपनियों में होड़ लग जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है’ हिंदी बिजनेस पोर्टल बिजनेस स्टैंडर्ड पर छपे अपने आलेख के जरि
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘भारत जैसे देश में जहां 30 करोड़ से भी अधिक लोग समाचारपत्र पढ़ते हों, 90 करोड़ से अधिक लोग टेलिविजन देखते हों और 34 करोड़ से भी अधिक लोग ऑनलाइन मीडिया का इस्तेमाल करते हों, वहां निवेश के लिए विदेशी कंपनियों में होड़ लग जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है’ हिंदी बिजनेस पोर्टल बिजनेस स्टैंडर्ड पर छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है कॉलमनिस्ट वनिता कोहली-खांडेकर का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
भारतीय मीडिया क्षेत्र में निवेश के पड़े लाले
इस अधिग्रहण ने हालांकि लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र को अधिग्रहण और विलय के मोर्चे पर निवेश जुटाने में इतनी कड़ी मशक्कत क्यों करनी पड़ती है? न्यूज कॉर्पोरेशन के स्वामित्व वाले वीसीसीएज का कहना है कि इस साल 20 जून तक केवल 7.88 करोड़ डॉलर (करीब 530 करोड़ रुपए) का ही भारतीय मीडिया जगत में निवेश हो सका है। अब आप जरा पिछले साल के एक अरब डॉलर और वर्ष 2014 के 40 करोड़ डॉलर के निवेश से इसकी तुलना कीजिए। वैसे हो सकता है कि वर्ष 2016 का अंत होते-होते निवेश के मामले में तस्वीर सकारात्मक हो जाए लेकिन फिलहाल इसकी संभावना बेहद कम नजर आ रही है।
भारतीय उद्योग परिसंघ के मुताबिक अप्रैल 2000 से लेकर सितंबर 2015 तक भारत में हुए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में से मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का हिस्सा केवल 1.61 फीसदी है। विदेशी निवेश के लिहाज से अच्छे साल भी मीडिया और मनोरंजन जगत के लिए कुछ खास नहीं साबित हुए हैं। यहां तक कि मीडिया में एफडीआई आकर्षित करने के लिए पिछले साल दीवाली के मौके पर सरकार की तरफ से दी गई ढील और इस साल जून में नियमों को और उदार बनाने से भी कोई खास मदद नहीं मिली है। तमाम कोशिशों के बावजूद भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन जगत में निवेश के लिए विदेशी कंपनियां अधिक उत्साही नजर नहीं आ रही हैं।
भारत जैसे देश में जहां 30 करोड़ से भी अधिक लोग समाचारपत्र पढ़ते हों, 90 करोड़ से अधिक लोग टेलिविजन देखते हों और 34 करोड़ से भी अधिक लोग ऑनलाइन मीडिया का इस्तेमाल करते हों, वहां निवेश के लिए विदेशी कंपनियों में होड़ लग जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है क्योंकि कुछ सूचीबद्ध समाचारपत्रों को छोड़कर कोई भी मीडिया समूह अच्छा रिटर्न देने में नाकाम रहा है। भारत में टेलिविजन कंपनियां ब्राजील की तुलना में आधा मार्जिन ही हासिल कर पा रही हैं जबकि फिल्मों की दुनिया में शायद ही कोई प्रोडक्शन हाउस मुनाफा कमाने की हालत में है। डिज्नी इंडिया के भारतीय फिल्म कारोबार से हाथ समेटने की चर्चाएं जोरों पर हैं जिसके लिए इसके कमाई न कर पाने को जिम्मेदार बताया जा रहा है। इसके बावजूद पैसा तो कमाना ही है।
यही वजह है कि कॉमकास्ट और लिबर्टी ग्लोबल को छोड़कर दुनिया का हरेक बड़ा मीडिया समूह भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। ट्वïेंटीफस्र्ट सेंचुरी फॉक्स का तो स्टार इंडिया के रूप में लाभदायक स्थानीय कारोबार है। लेकिन यह भी सच है कि स्टार, टाइम्स समूह और ज़ी समूह भारतीय मीडिया और मनोरंजन जगत के लिए सामान्य नियम न होकर अपवाद जैसे हैं।
आखिर इसकी वजह क्या है? कमजोर नीति-निर्माण के अलावा यह उद्योग बनावटी धड़ों में बंटा हुआ है जहां पर गिनी-चुनी फर्मों के लिए लामबंदी की जाती है, न कि समूचे उद्योग की समस्याएं उठाई जाती हैं। नियामकीय संस्थानों की तिरछी नजर भी कई बार सवालों के घेरे में आती है। इसके साथ ही कॉर्पोरेट गवर्नेंस के कई गंभीर मसले भी हैं। सुनने में तो यह आसानी से समझ में आने वाली बात लगती है लेकिन मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में सक्रिय कंपनियों पर एक नजर डालने से ही पता चल जाएगा कि उन्हें किन हालात का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, भारत में फिल्मों के प्रदर्शन के लिए स्क्रीन की भारी कमी है। अगर फिल्मी स्क्रीन की संख्या को दोगुना कर 20 हजार तक पहुंचाया जा सके तो राजस्व भी बढ़कर 24 हजार करोड़ रुपए के पार पहुंच जाएगा। ऐसा होने से फिल्म उद्योग न केवल ज्यादा मुनाफा कमाने वाला हो जाएगा बल्कि ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा और सरकार को भी टैक्स के रूप में अधिक राजस्व मिलेगा। इतना ही नहीं, भारत फिल्म कारोबार के मामले में अमेरिका और चीन के साथ कदमताल करता हुआ दिखाई देगा।
लेकिन कई तरह की मंजूरियों को हासिल करने की बाध्यता और उसमें सरकारी लेटलतीफी के चलते फिल्मी स्क्रीन बनाने के काम में अनावश्यक विलंब होता है। पीवीआर ने चेन्नई के एक मॉल में 5 स्क्रीन वाले मल्टीप्लेक्स का काम अप्रैल 2013 में ही पूरा कर लिया था लेकिन इसे दिसंबर 2015 में जाकर शुरू किया जा सका, वह भी अदालती आदेश के बाद। इतने लंबे समय तक कारोबारी गतिविधि ठप रहने से निवेशक को तो पहले ही काफी घाटा उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पीवीआर पिक्चर्स के मुख्य कार्याधिकारी कमल ज्ञानचंदानी का कहना है कि फिल्म प्रदर्शन कारोबार की राह में अड़चन पूंजी नहीं, बल्कि कारोबारी माहौल है।
मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र के दो बड़े माध्यम टेलिविजन और फिल्म अगर आधारभूत ढांचे के अभाव में पैसा जुटाने की अपनी क्षमता का दोहन नहीं कर पा रहे हैं तो डिजिटल और अन्य नए माध्यमों की क्या हालत होगी? भारत में एक मुनाफा कमाने वाला मीडिया कारोबार चलाने की राह में कोई बड़ी नियामकीय अड़चन नहीं है। इसके बावजूद मीडिया डॉट नेट और प्राइम फोकस जैसी अधिकांश सफल मीडिया फर्म बाहर से ही काम करना पसंद करती हैं। सिंगापुर या दुबई से संचालित होकर भारतीय प्रतिभाओं के दम पर बड़ा कारोबार खड़ा करना अपने आप में काफी समझदार कदम लगता है। कितना अच्छा हो अगर हम भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के बारे में भी ऐसा ही कह सकें।
(साभार: बिजनेस स्टैंडर्ड)
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