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वाकई हिंदी की कैसी बेकद्री हो रही है इस देश में, आलोक मेहता का ये लेख पढ़कर समझ जाइए

आलोक मेहता प्रधान संपादक, आउटलुक (हिंदी) ।। डिजिटिल इंडिया में हिंदी समाज

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

आलोक मेहता

प्रधान संपादक, आउटलुक (हिंदी) ।।

डिजिटिल इंडिया में हिंदी समाज

हिंदी उत्सव- हिंदी दिवस- पखवाड़ा। राष्ट्रभाषा की गौरव गाथा और जयकार। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की मान्यता के लिए प्रधानमंत्रियों द्वारा सौ-सौ करोड़ तक खर्च की घोषणाएं। दुनिया के 130 विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा की पढ़ाई की व्यवस्था। बॉलिवुड से दक्षिण भारत ही नहीं यूरोप, अमेरिका, एशिया ही नहीं अफ्रीका में भी हिंदी फिल्मों और गानों की गूंज। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पहले जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा राष्ट्रभाषा हिंदी को सही गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के संकल्प, संघर्ष, वायदे और एक हद तक उपलब्धियां भी। लेकिन असलियत में भारत की तरक्की के साथ हिंदी को समुचित महत्व कहां मिल पाया है? डिजिटल इंडिया की धूम है, लेकिन इंटरनेट के जरिए सामान्य दूसरी श्रेणी का टिकट तक हिंदी में मिल पाने की व्यवस्था नहीं हो पाई है?

सरकारी दस्तावेज अवश्य अंग्रेजी-हिंदी में निकालने की बाध्यता है, लेकिन सारी सुविधाओं के बावजूद भारत के राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के भाषण उसी दिन उनकी सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हो सकते हैं। देर सबेर अनुदित सामग्री मिल सकती है। श्रीमती सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्रालय में भी हिंदी का प्रयोग बढ़ाने के हरसंभव प्रयास किए हैं, लेकिन वहां भी विदेश मंत्रालय की घोषणाएं, भाषण इत्यादि उसी दिन मंत्रालय की वेबसाइट पर हिंदी में उपलब्ध नहीं हो पाते।

प्रवासी भारतीय दिवस के साथ जनवरी में मनन वार्ता। विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर इस वर्ष बहुत अच्छा कार्यक्रम हुआ और कई देशों से भारत में हिंदी भाषा की शिक्षा पाने आए छात्रों के कार्यक्रम और भाषण तक का विवरण अगली सुबह मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हुआ। संसद में प्रस्तुत होने वाले विधेयकों, प्रस्तावों अथवा सरकारी घोषणाओं का हिंदी अनुवाद इतना जटिल और अटपटा होता है कि अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों को पढ़े बिना कोई भला मानस सही जानकारी नहीं पा सकता है।

सत्तर साल बाद भी आकाशवाणी- दूरदर्शन के अंतरराष्ट्रीय प्रसारण का नेटवर्क तैयार नहीं हो सका। परमाणु शक्ति संपन्न देशों के समूह अथवा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए दो दशकों में करोड़ों रुपए खर्च हो गए और अनेक देशों के समर्थन के बावजूद अन्य देशों से प्रतियोगिता के कारण रुकावटें हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को मान्यता दिलाने के मुद्दे पर तो चीन या पाकिस्तान तक विरोध नहीं कर सकता है। लेकिन भारतीय विदेश सेवा के नौकरशाह अपने पूर्वाग्रहों के कारण स्वयं गंभीर कोशिश नहीं करते।

न्यूयार्क की बात दूर रही, भारत के कितने पब्लिक स्कूलों में हिंदी भाषा की अनिवार्य शिक्षा पर जोर दिया जाता है? शिक्षा नीति सरकारी स्कूलों पर लागू हो जाती है। निजी संस्थानों को सस्ती जमीन और अनुदान देने वाली सरकारें कभी पब्लिक स्कूलों में हिंदी की शिक्षा दिए जाने पर कहां जोर देती है। इसलिए हर साल 'हिंदी दिवस’ पर कभी खुश, कभी गम जैसे गाने गा लिए जाते हैं, हिंदी समाज को भाषा का असली गौरव मिलना अभी बाकी है।

(साभार: आउटलुक)

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