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इन देशों में खूब मुस्कुराती है ‘हिंदी’

आज सुबह जब मैं सोकर उठा तब मेरी नजर अखबारों की खबरों पर गई। सभी...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

शंभूनाथ गौतम

वरिष्ठ पत्रकार ।।

क्षमा करना (हिंदी) तुझे सिर्फ एक सप्ताह ही याद कर पाएंगे

आज सुबह जब मैं सोकर उठा तब मेरी नजर अखबारों की खबरों पर गई। सभी अखबारों में हिंदी को लेकर बहुत कुछ छापा गया। पहले तो मैं समझ नहीं पाया माजरा क्या है। जब दिमाग लगाया तो आज तारीख 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस है। आज और आने वाले कुछ दिनों तक हिंदी के प्रचार-प्रसार और विस्तार को लेकर खूब शोर मचेगा। आज से हमारे देश में सरकारी अर्ध सरकारी संस्थानों में हिंदी-हिंदी होने लगता है। कहीं हिंदी दिवस तो कहीं हिंदी पखवाड़े का आयोजन भी होता है।

हिंदी और हिंदी दिवस को लेकर देशभर में इतने अधिक आयोजन होते हैं कि वहां पर आने वाले हिंदी के तथाकथित प्रेमी कई संस्थानों के अधिकारी गण हिंदी भाषा को लेकर लंबे चौड़े भाषण देते हैं। जबकि इनका हिंदी के प्रति वास्तविक प्रेम भाषणों तक ही सीमित रहता है अमल में लाया नहीं जाता है। अपना देश शायद दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहां भाषा के नाम पर भी दिवस मनाए जाते हैं। 69 सालों से हमारे देश में हिंदी दिवस को लेकर प्रचार-प्रसार तो खूब किया जाता है लेकिन वास्तविक और जिम्मेदार ही इसको अमल में लाने से कतराते हैं। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी दिवस और हिंदी को लेकर बड़ी बड़ी बातें तो की जाएंगी लेकिन उसके विस्तार को लेकर कोई योजना नहीं बन पाएगी।

हिंदी स्वयं ही अपनी ताकत से ही बढ़ रही है पूरे विश्व में-

आज पूरा विश्व एक ग्लोबल बाजार के रूप में उभर चुका है, जिसमें हिंदी स्वयं ही तीसरी भाषा के रूप में उभर गई है। हमारे देश में हिंदी का विस्तार भले ही अधिक न हो पाया हो लेकिन पूरे विश्व में आज कई बड़ी बड़ी कंपनियों में हिंदी खूब फल-फूल रही है। गूगल, फेसबुक, वॉट्सऐप और याहू समेत तमाम कंपनियों ने हिंदी भाषा का बहुत बड़ा बाजार बना दिया है और हिंदी के नाम पर ही अरबों खरबों रुपए की कमाई कर रहे हैं।

हमारे देश समेत विश्व के कई देशों में हिंदी सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं। इन सम्मेलनों में भी हजारों लोगों की आमदनी का जरिया हिंदी बनी हुई है।

हिंदी के नाम पर कई संस्थान और विश्वविद्यालय पर सरकार अरबों खर्च करती है-

केंद्रीय हिंदी संस्थान हो चाहे वर्धा महाराष्ट्र का हिंदी विश्वविद्यालय या कई राज्यों में हिंदी के संस्थान संस्थानों पर केंद्र व राज्य सरकार हर वर्ष अरबों का बजट स्वीकृत करती है। इन संस्थानों में भी हजारों लोगों को रोजगार दे रखा है।

दक्षिण के राज्य और वोट बैंक की मजबूरी भी कम जिम्मेदार नहीं-

14 सितंबर 1949 को जब हमारे देश में हिंदी राजभाषा का आधिकारिक दर्जा मिला था तब दक्षिण के राज्य तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों ने इसका खुल कर विरोध किया था। तमिलनाडु के कई लोगों ने तो हिंदी राजभाषा को लागू किए जाने के विरोध में आत्महत्या तक कर डाली थी। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कभी भी हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया है बल्कि उल्टा हिंदी का विरोध करते ही रहे हैं। वहां के राजनीतिक दल और नेताओं को यह पता है कि अगर हिंदी को हम बढ़ावा देंगे यह बात करेंगे तो हमारा वोट बैंक पर असर पड़ेगा।

इन देशों में हिंदी खूब मुस्कुराती है-

गुयाना, सूरीनाम, त्रिनाद एंड टोबैगो फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका और सिंगापुर में बोलचाल की भाषा हिंदी भी है। हालांकि यह सभी देश में भारतीय बहुसंख्या में रहते हैं। भारत की अपेक्षा इन देशों में हिंदी खूब फल-फूल और अच्छी सेहत में है।

आइए अब कुछ दिनों तक हिंदी को बढ़ावा देने के लिए तथाकथित हिंदी प्रेमियों की बातें सुने-

आज से हमारे देश में कुछ दिनों तक हिंदी भाषा के विस्तार और प्रचार प्रसार के लिए खूब शोर मचेगा और बड़ी-बड़ी बातें होंगी। मंत्री, नेता और तथाकथित हिंदी प्रेमी खूब सज-धजकर पहुंचेंगे और हिंदी भाषा के विस्तार और प्रचार प्रसार के लिए बड़े-बड़े भाषण देंगे और चलते बनेंगे। आइए हिंदी सम्मेलन में इस बार भी इन नेताओं और तथाकथित लोगों की हिंदी को लेकर क्या कहा जा रहा है। सुनिएगा जरूर। हो सकता है यह लोग वही कहे जो पिछली बार हिंदी दिवस पर कहकर कर गए थे। लेकिन हिंदी तुझे कसम है तू हिम्मत न हारना तू अपना मुकाम स्वयं ही पूरे विश्व में तेजी से बनाती जा रही है...

 


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