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वरिष्ठ पत्रकार विजय विद्रोही ने उठाया सवाल, गंगा किनारे 118 शहर-144 नाले, तो कैसे साफ हो गंगा?

 ‘हरिद्वार की बात करें तो यहां रोज शाम को गंगा आरती होती है। हर आदमी गंगा की कसम खाता है कि वह गंगा को साफ रखेगा, गंगा में साबुन का इस्तेमाल नहीं करेगा, कपड़े धोएगा नहीं। लेकिन, सुबह होते ही लोग कसम भूल जाते हैं।’ हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘चौथी दुनिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए कहा 

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

 ‘हरिद्वार की बात करें तो यहां रोज शाम को गंगा आरती होती है। हर आदमी गंगा की कसम खाता है कि वह गंगा को साफ रखेगा, गंगा में साबुन का इस्तेमाल नहीं करेगा, कपड़े धोएगा नहीं। लेकिन, सुबह होते ही लोग कसम भूल जाते हैं।’ हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘चौथी दुनिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए कहा एबीपी न्यूज’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर विजय विद्रोही ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

118 शहर, 144 नाले कैसे साफ हो गंगा 

हाल में मेरा गोमुख से लेकर गंगोत्री, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद और बनारस जाना हुआ था। गोमुख का अनुभव ये रहा कि वहां 500 मीटर के भीतर जाने की मनाही है, लेकिन लोग वहां जाते हैं, नहाते हैं। नए कपड़े पहनते हैं और पुराने कपड़े वहीं छोड़कर चले जाते हैं। सर्दी ज्यादा पड़ती है तो लोग थर्मस में चाय भरकर ले जाते हैं, चाय पीने के बाद कप वहीं फेंक कर चले जाते हैं। पान मसाला और अन्य खाने वाली चीजों के रैपर आदि वहीं फेंक देते हैं। गोमुख में इस तरह का कृत्य लोगों की मानसिकता को दर्शाता है।

तीन साल पहले मुझे यहां एक अमेरिकी नौजवान मिला था। मुझसे कहने लगा कि हमलोग आपकी तरह नदियों की पूजा नहीं करते, लेकिन हम नदियों को साफ जरूर रखते हैं। जहां तक गंगोत्री की बात है, गंगोत्री में सुरेश रैंगवाल है जो गंगोत्री समिति मंदिर से ज़ुडे हैं, उनका कहना था कि एक-डेढ़ महीने पहले उमा भारती यहां आई थीं। उन्होंने उमा भारती से कहा कि सफाई को लेकर कुछ होना चाहिए। उमा भारती ने कहा कि मैं कसम खाती हूं कि मैं गंगा को साफ करूंगी। लेकिन वहां पर भी जो धर्मशालाएं हैं, होटल बने हुए हैं, उसकी गंदगी गंगा में जा रही है। लोगों ने स्थानीय स्तर पर मिलकर गड्ढे खोदे हैं ताकि गंदगी को नदी में जाने से रोका जा सके। तीन साल का मेरा अनुभव ये रहा कि कचरा पात्र पहले भी थे, अब भी हैं। पहले कचरा, कचरा पात्रों के अंदर कम, बाहर ज्यादा होता था। लेकिन इस बार गंगोत्री और खासकर हरिद्वार में मैंने देखा कि लोग अब कचरा, कचरा पात्र में डाल रहे हैं।

हरिद्वार की बात करें तो यहां रोज शाम को गंगा आरती होती है। हर आदमी गंगा की कसम खाता है कि वह गंगा को साफ रखेगा, गंगा में साबुन का इस्तेमाल नहीं करेगा, कपड़े धोएगा नहीं। लेकिन, सुबह होते ही लोग कसम भूल जाते हैं। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय का अध्ययन बताता है कि एक आदमी जो पूजा सामग्री लेकर आता है, उसमें से करीब 600 ग्राम कचरा वहीं छोड़कर चला जाता है। प्लास्टिक, फूल-मालाएं, अगरबत्तियां आदि। हरिद्वार में ही जगजीतपुर में 40 एमएलडी के एसटीपी की नींव उमा भारती ने रखी थी। एक साल बाद भी वह नींव वहीं की वहीं है। उस पर कोई भी काम नहीं हुआ है। अगर, हम इलाहाबाद की बात करें तो यहां 8 एसटीपी (सीवर ट्रीटमेंट प्लांट) लगे हुए हैं, जिसमें से 4 बंद हैं। एक प्लांट 200 करोड़ रुपए का है। जो 4 प्लांट काम कर रहे हैं वह भी आधी क्षमता का ही काम कर रहे हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक शोध किया था, जिसके मुताबिक गंगा किनारे 55 एसटीपी हैं। जांच में बोर्ड ने पाया कि 55 में से 15 तो बंद पड़े थे, बाकि के भी अपनी क्षमता से कम पर काम कर रहे थे। यही हालत हमें कानपुर में देखने को मिली। यहां टैनरी से 90 लाख लीटर रासायनिक कचरा निकलता है। लेकिन, वहां के जानकारों के मुताबिक यह मात्रा 150 लाख लीटर के करीब है। हालांकि, टैनरी उद्योग का कहना है कि हम अपना कचरा तो एसटीपी में डालते हैं और एसटीपी के रख-रखाव के लिए हर साल पैसा भी देते हैं। अब, एसटीपी ही ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो इसमें क्या किया जा सकता है।

ऐसे ही कानपुर में सीसामाऊ का नाला है, जहां से 15 करोड़ लीटर गंदा पानी रोज निकलता है और गंगा में जाता है। वहां एक स्थानीय निवासी वकार भाई से मेरी बात हुई। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं 40 साल से यहां रह रहा हूं। मैने सीसामाऊ नाले को ऐसे ही बहते हुए देखा है। गंगा एक्शन प्लान वन आया, गंगा एक्शन प्लान टू आया। उसके बाद और योजनाएं आईं। जवाहर लाल नेहरु अर्बन रिन्यूअल मिशन के तहत कानपुर को 360 करोड़ रुपए मिला, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

बनारस की बात करें तो बनारस के घाट को चमका दिया गया है। अस्सी घाट चमक रहा है, लेकिन इससे मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर नांगल का नाला है। ये नाला पिछले कई सालों से वैसा का वैसा ही पड़ा है। सीवर लाइन बिछाने का काम जरूर तेजी से चल रहा है। अखिलेश यादव ने भी थोड़ी प्रेरणा ली है। वरुणा नदी पर 319 करोड़ रुपए की लागत पक्के घाट बनाने का काम चल रहा है। दूसरी तरफ गंगा के किनारे मणिकर्णिका घाट है, वहां बने विद्युत शवदाह गृह में बहुत कम लोग आते हैं। 2018 तक गंगा को साफ करने की बात असंभव है। सबसे बड़ी बात है कि गंगा के किनारे 118 शहर हैं, 144 नाले हैं, जिनका गंदा पानी सीधे गंगा में गिरता है। इन 118 शहरों में एसटीपी लगाना है। अभी तो जुलाई के अंत तक इसके लिए टेंडर ही निकलना है। एक एसटीपी के शुरू होने में ढाई से तीन साल लगते हैं। इस हिसाब से तो 2018 तक कुछ हो ही नहीं पाएगा।

(साभार: चौथी दुनिया)

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