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ये दो उदाहरण पेश कर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने बताया, सच्चा मजहब इंसानियत में ही है...
हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने दो ऐसे उदाहरण पेश किए, जिन्होंने इंसानियत की एक मिशाल पेश की और दुनिया को बता दिया कि सच्चा मजहब इंसानियत में ही है। इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं। डॉ. वैदिक का पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने दो ऐसे उदाहरण पेश किए, जिन्होंने इंसानियत की एक मिशाल पेश की और दुनिया को बता दिया कि सच्चा मजहब इंसानियत में ही है। इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं। डॉ. वैदिक का पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
फराज़ और तारिक का मजहब?
इसी प्रकार मथुरा के तारिक हुसैन ने अपनी हिंदू मां की अंत्येष्टि दाह-संस्कार करके की। स्व. कृपा यादव उसकी सगी मां नहीं थी। वह उसके पिता लियाकत अली की दूसरी पत्नी थी। पहली मुसलमान पत्नी के बेटे तारिक ने अपनी सौतेली मां को हमेशा सगी मां का दर्जा ही दिया। 36 साल तक कृपा और लियाकत पति-पत्नी की तरह रहे और दोनों अपने-अपने धर्म का पालन करते रहे। उनके बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। कृपा के दाह-संस्कार में मथुरा के सैकड़ों हिंदू और मुसलमान शामिल हुए। तारिक हुसैन ने अपनी मां को मंत्र-पाठ करते हुए मुखाग्नि दी।
उक्त दोनों घटनाएं मर्मस्पर्शी हैं। ये जाहिर करती हैं कि सच्चा मजहब इंसानियत में ही है। इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं है। फराज और तारिक किन्हीं भी बड़े से बड़े मुल्ला-मौलवी और संत-स्वामी से बड़े हैं।
(साभार: नया इंडिया)
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