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क्यों बलूची पीएम मोदी का माने एहसान, बताया वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिराज कुरैशी ने...

डॉ. सिराज कुरैशी वरिष्ठ पत्रकार ।। देश के स्वतंत्रता दिवस पर किसी प्रधानमंत्री ने किसी भी देश का नाम लेकर इस तरह का गुणगान शायद कभी नहीं किया होगा। जैसा इस बार 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलूचिस्त

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

डॉ. सिराज कुरैशी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश के स्वतंत्रता दिवस पर किसी प्रधानमंत्री ने किसी भी देश का नाम लेकर इस तरह का गुणगान शायद कभी नहीं किया होगा। जैसा इस बार 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलूचिस्तान का नाम लेकर गुणगान किया। इसके लिये वहां की अवाम को मोदी का एहसानमंद होना चाहिये।

हालांकि वहां की अवाम ने अपने ही देश में मोदी-मोदी-मोदी कहकर जिस तरह के नारे लगाये। उससे पाकिस्तान को शायद अच्छा नहीं लगा। इसी वजह से केवल पाकिस्तान ने ही नहीं बल्कि देश की भाजपा विरोधी पार्टियों ने भी कहा कि जिस तरह लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने बलूचिस्तान का गुणगान किया है। उस तरह नहीं करना चाहिये था।

लेकिन यह सच्चाई सबके सामने आ गई कि 15 अगस्त के मोदी जी के भाषण से एवं PoK और बलूचिस्तान के जिक्र से पाकिस्तान हुकूमत परेशान और घबरा गई।

हां, पाकिस्तान की घबराहट शायद पाक मीडिया में आई इस खबर से भी जाहिर है कि कैसे 45 वर्ष पूर्व बांग्लादेश निर्माण के दौरान इसी तरह जुझारु भाषणों की श्रृंखला चली थी, जैसी अब देखने को मिल रही है। यही वजह है कि पाक मीडिया इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को पूरी तरह घेरने में लग गया है और कह रहा है कि मोदी जी को पाक के आन्तरकि मामलों में दखल अंदाजी नहीं करनी चाहिए। पाक मीडिया की हां में हां मोदी जी के विपक्षी लोग भी मिलाते दिखाई दे रहे हैं।

गौरतलब है कि मोदी के 15 अगस्त के भाषण से बलूच नेता (जिनमें ज्यादातर विदेशों में पनाह लिये हुये हैं) खुलकर सामने आ गये हैं। ये लोग सिर्फ भारत के समर्थन में बयान दे रहे है बल्कि टीवी पर आकर तरह-तरह की बातें भी कर रहे हैं।

कुछ समझदार लोग मोदी जी का इस बात के लिये शुक्रिया अदा भी कर रहे हैं कि उन्होंने बलूचियोंबलूचियों का उनके स्वाधीनता संघर्ष में हाथ थामा है। इन लोगों के लिये अपनी ही सरकार के खिलाफ इस तरह का खुला विरोध अप्रत्याशित है।

मुझे आश्चर्य उस वक्त हुआ जब टीवी पर एवं बलूच नेता भारत के नक्शे के सामने हाथ जोड़कर भारत माता के नाम से सम्बोधित करता दिखाई दिया।

पाकिस्तान अलगाववादी बलूच नेताओं को अपने साथ जोड़ने की भावुक कोशिश कर रहा है। बहरहाल इस बात के कोई संकेत नहीं है कि विद्रोही बलूच नेता पाकिस्तान के इस प्रस्ताव के वाद पर लौटेंगे। जो विदेशों में है और उनसे वापसी की विनती की जा रही है।

प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने से तीन दिन पहले सर्वदलीय सम्मेलन जो हुआ था उससे ऐसा लगा था कि कश्मीर-बलूचिस्तान एवं समग्र पाकिस्तान नीतियों के संदर्भ में देश में राजनीतिक एकता कायम हो गई है और लग रहा था कि भारत पुनः एक नया इतिहास बनायेगा। बलूचों का राष्ट्रवादी आन्दोलन यदि आगे भारत की मदद से कामयाब हुआ तो पाकिस्तान की यह तीसरी हार ही नहीं होगी, बल्कि तीसरी बार विभाजित हो जायेगा।

हां, अगर वह विभाजित नहीं होता है तो वहां सिंध एवं खैबर पख्तूनख्बा तक में आजादी का आन्दोलन तेज होगा।

ज्यादातर लोगों की अपेक्षा यह है कि राजनीति दलों का स्वर एक हो। ताकि बाहर ऐसे मामलों पर देश की एकता का संदेश जाये। लेंकिन दुर्भाग्य है कि नेताओं के बयान ऐसे सुनाई देते हैं कि मानों भारत की ही नीति गलत है। शायद ऐसे नेताओं को यह नहीं मालूम है कि 1971 में इन्दिरा गांधी की सरकार ने बांग्लादेश में सैनिक हस्तक्षेप का निर्णय किया तो संयुक्त राष्ट्र के हमारे खिलाफ जाने की अधिक सम्भावना थी। उस समय हमारी गिनती गरीब और कमजोर देशों में भी की जाती थी परन्तु आज तो हमने अभी केवल बलूचिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन बलूचों के उत्पीड़न की ही बात की है। हमने अभी वहां कोई सैनिक हस्तक्षेप की बात नहीं की है।

खैर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 15 अगस्त के भाषण का सबसे चर्चित भाग था। ‘भारत की चिर-परिचित विदेश नीति में आकस्मिक बदलाव का होना-यह शतप्रतिशत सच है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण पाकिस्तान के वर्तमान रवैए के संदर्भ में केवल रस्मी बयान नहीं था। अपितु आने वाले समय के लिये भारत की विदेश और प्रतिरक्षा नीतियों की दिशा का संकेत भी था।

यह भी सबके सामने है कि कश्मीर में लगभग दो माह से अलगाववादी ताकतों की हिंसात्मक कार्यवाही चल रही है। उसके पीछे केन्द्र सरकार को पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सीज का हाथ दिखाई देता था और इस बात के भी संकेत मिलते थे कि आर्मी खुफिया एजेंसी और आतंकवादी गुटों की बीच कुचक्र है जबकि पाक अधिकारी इसके केवल स्थानीय बगावत कह रहे थे लेंकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भेजकर एक उम्दा कदम उठाया।

गृहमंत्री ने अपनी पैनी नजर से कश्मीर की वर्तमान स्थिति का जायजा लेकर जो रिपोर्ट देश की अवाम और देश की मीडिया के सामने रखी है। उससे सारी हकीकत सामने आ गई। अब प्रधानमंत्री मोदी की सूझबूझ भी सामने आ रही है। उनकी निगाह में केवल कश्मीर ही नहीं बल्कि पूरा भारत देश को सम्भालने की और खुशहाल बनाने की तथा पूरी तरह शान्ति सौहार्द और भाईचारा कायम रखने की जिम्मेदारी है।

उसको वह (मोदी) पूरी तरह अंजाम भी दे रहे हैं। बशर्ते विरोधी बेबजह भी अड़चन न डालें। मोदी जी की सोच देश के भविष्य पर है। वह चाहते हैं कि विश्व पटल पर भारत ‘नंबर-1’  बनकर उभरे।  ‘इन्शाअल्लाह’ उनकी सोच अवश्य ही कामयाब होगी। बस थोड़ी मेहनत और साथ की जरुरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये निजी विचार हैं)

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