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नेताजी सियासत के मंझे खिलाड़ी नहीं हैं, यदि होते तो कबके...

नेताजी को लगता होगा, वे बेहतर कर रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा है, किस परिवार की बात करते हैं ? समाजवादी पार्टी की या निजी परिवार की…। या फिर इन दोनों की…। अपने आलेख के जरिए कहना है न्यूज पोर्टल कैम्पस पोस्ट के एडिटर बृजेन्द्र एस. पटेल का। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

नेताजी को लगता होगा, वे बेहतर कर रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा है, किस परिवार की बात करते हैं ? समाजवादी पार्टी की या निजी परिवार की…। या फिर इन दोनों की…। अपने आलेख के जरिए कहना है न्यूज पोर्टल कैम्पस पोस्ट के एडिटर बृजेन्द्र एस. पटेल का। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

सुल्तान पर सितम

जिंदा बाप का साया सर पर न हो….। जिसने बचपन में मां को पल पल मरते देखा हो….। सत्तर बसंत पार आंखों में काजल लगाए पालक बेवजह जिंदगी में सौतलेपन की तस्वीर दिखा दे….। तब क्या करेंगे आप? मर जाने का मन करेगा न? सभ्य भारतीय समाज में ऐसा बहुत कम होता है। या कहें, न के बराबर। जो ऐसा करते हैं, गोया कोई अपना दरख्त काटता हो।

सुल्तान के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। सुल्तान गद्दी पर जरुर हैं, पर जबरन उतारने की कवायद पिता कर रहा है, जिसने खुद बिठाया है। मैं इतिहास का विद्यार्थी तो नहीं पर ऐसा कभी सुना नहीं कि कोई शासक अपने बेटे को गद्दी पर बिठाकर उसे नीचे उतारने की कवायद में जुटा हो।

सुल्तान, मेरी तुम्हारी सियासत से रजामंद नहीं पर सितम पर हमदर्दी जरुर है। दिल से। वाकई। मैं नेताजी को 36 साल से जानता हूं। जब तुम धौलपुर में पढ़ते थे। चचा को तब से, जब वे जयपुर हाउस में दूल्हा बनकर आए थे। बेशक, नेताजी बेपनाह मुहब्बत करते हैं और खफा हों तो हद दर्जे का गुस्सा भी…। निजी जिंदगी हो या सियासत का सफर। भाई तुम भी, इसी लपेट में आ गए हो।।

बेशक इसमें तुम्हारा कसूर कम दिखता है। मुझे। मुमकिन है, मेरी गलत बयानी हो। तुम्हारी हुकूमत का काम कैसा रहा? ये अब आवाम खुद बता देगी। पर तुम्हें हटाने के लिए जो तरीका इस्तेमाल हो रहा है, वो तकलीफदेह है। नजर ए सियासत के चलन से भी। पारिवारिक विरासत की परंपरा से भी।

मैं भी किसी का बेटा हूं। मेरा भी बेटा है। इन दोनों के बीच की कड़ी में जब खुद को रखता हूं और फिर जो खौफनाक मंजर दिखाई देता है, रुह सिहर उठती है। लगता है, ईश्वर ने तुम्हारे से क्या कर दिया? सवाल ये नहीं कि पिता की विरासत में क्या है? जो भी हो…। विरासत तो विरासत है। दो गज जमीन हो या सल्तनत का तख्त…। हक बेटे का ही बनता है। सुल्तान को भी इसी परंपरा के तहत बजीर-ए-आला का ओहदा विरासत में सौंपा गया है। यकीनन। अगर नहीं, तो बताएं नेताजी ? नेताजी, उतारने पर उतारु हो तो लगे हाथ ये भी बता दो कि सुल्तान का काम बताएं, कैसा रहा? खराब या बेहतर? खराब, तो जिम्मेदार कौन? बेहतर, तो सुल्तान ‘ फिर ‘ क्यों नहीं…?

मैं नहीं मानता नेताजी सियासत के मंझे खिलाड़ी हैं। यदि होते तो कबके प्रधानमंत्री बन गए होते। न बन पाते तो कम से कम दिल्ली में बड़े ताकतवर नेता होते। जब कोई अति से ज्यादा महत्वाकांक्षी होता है, सही फैसला नहीं कर पाता। नेताजी नजीर हैं। निजी जिंदगी की जो तस्वीर पेश की,  देखेगा, हमदर्दी सुल्तान के पाले जाएगी। मंझदार में मांझी फैसला पलटता है तो  कश्ती में सवार सबको डुबोता है। समाजवादी पार्टी की कश्ती सियासत के बीच मझधार में है। नेताजी के कई सिपहसालार हैं जो शायद सुल्तान से खफा…।

सुल्तान, सच मानो, तुम 2017 की हारी लड़ाई लड़ोगे। अब। जिसका पिता ही, हार की विसात बिछा रहा हो, वो भला कैसे जीत सकता है।

नेताजी को लगता होगा, वे बेहतर कर रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा है, किस परिवार की बात करते हैं ? समाजवादी पार्टी की या निजी परिवार की…। या फिर इन दोनों की…। अपने बेटों को बहुतों ने सियासत की विरासत सौंपी है। या कहें उन्हें जिंदा रहते आगे बढ़ाया है।  इंदिरा ने पहले संजय को फिर राजीव को। सोनिया ने राहुल को। देवीलाल ने ओम प्रकाश चैटाला को। फारुख ने अब्दुल्ला ने उमर अब्दुल्ला को। बीजू पटनायक ने नवीन पटनायक को। एचडी देवगौड़ा ने बेटे एचडी कुमारस्वामी को…। और भी कई नाम हैं। मेरे मानस पटल पर नाम नहीं जिसने बेटे का राजतिलक कर नीचे उतारने की कवायद की हो। इतिहास में भी ऐसा नहीं सुना।

नेताजी ऐसा क्यों कर रहे हैं? समझ से परे है? खैर ये सियासत है। यहां हर बात मुमकिन और हुकमरान का हर फरमान कानून की तस्दीक...। यही रवायत नजीर बन जाया करती है। हां, एक बात और…., अब ये तो साफ हो गया। चचा तो बस मोहरा हैं। बाजी नेताजी चल रहे हैं। वो भी अपने सगे बेटे के खिलाफ। आज एक कदम और सुल्तान को पीछे धकेल दिया। सुल्तान भी मैदान में डटा है। मुगल-ए-आजम सा नजारा। फर्क बस इतना, यहां सुल्तान गद्दी पर और बाप बागी है। तब केंद्र में अनारकली और यहां सौतेले हैं। मुमकिन है, सुल्तान के सब वफादारों को टिकट न भी मिले। सुल्तान के लिए ये लड़ाई बहुत मुश्किल इसलिए भी है, सामने पिता हैं।

(साभार: कैम्पस पोस्ट)

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