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हवा को जो रुख है, उसमें बहुत कुछ टूट रहा है: जयंती रंगनाथन, वरिष्ठ पत्रकार
‘फिल्म और क्रिकेट हमेशा से हमें जोड़ते भी आए हैं, और तोड़ते भी। फिलहाल हवा का जो रुख है, उसमें बहुत कुछ टूट रहा है।’ ये कहना है हिन्दुस्तान की सीनियर फीचर एडिटर जयंती रंगनाथन का। हिन्दुस्तान में प्रकाशित उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं: न सरहद हो न सियासत
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘फिल्म और क्रिकेट हमेशा से हमें जोड़ते भी आए हैं, और तोड़ते भी। फिलहाल हवा का जो रुख है, उसमें बहुत कुछ टूट रहा है।’ ये कहना है हिन्दुस्तान की सीनियर फीचर एडिटर जयंती रंगनाथन का। हिन्दुस्तान में प्रकाशित उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
न सरहद हो न सियासत
मुंबई के फिल्मी गलियारों में कुछ अजीब सी फुसफुसाहटें हैं, माहौल में एक अजीब सी खामोशी है। इस सप्ताह प्रदर्शित होने वाली फिल्म मिर्जियां के रूहानी तसव्वुर से भरपूर गाने 'कारी-कारी' की कल तक जिन गलियों में वाहवाही हो रही थी, अब खुद फिल्म से जुड़े लोग यह बताने में हिचक रहे हैं कि इस सूफियाना तबीयत के गाने को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बलूचिस्तान के गायकों ने मिलकर गाया है।
सुबह ही एक अखबार में कल तक पाकिस्तानी, और अब हिन्दुस्तानी गायक अदनान सामी को कहते पाया, ‘मैं बहुत खुश हूं कि हिन्दुस्तान की सरकार ने पाकिस्तान के आतंकवादियों को मार गिराया। मेरा घर हिन्दुस्तान है और मैं यह शिद्दत से महसूस भी करता हूं।’ अदनान सामी को अगर मुंबई में रहकर काम करना है, तो उन्हें गाहे-बगाहे यह जताना पड़ेगा कि हिन्दुस्तान सरकार ने उन्हें नागरिकता देकर कोई गलती नहीं की।
वैसे भी कलाकारों को चाहे अपनी सरजमीन हो या पराई, साबित तो हर कहीं करना पड़ता है। बेशक वर्षों से कलाकारों की कौम यह कहती रही हो कि कलाकार का कोई मजहब नहीं होता, वे देश-दुनिया, सियासत, कौम से परे होते हैं, पर सच तो यह है कि जब बात देश की आती है, तो फिर देश की ही बात होती है, बाकी सब पीछे रह जाता है।
इस वक्त मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ पाकिस्तान के ही कलाकार काम नहीं कर रहे, बल्कि अन्य कई देशों के कलाकारों ने मुंबई को अपना घर बना लिया है। इस समय बॉलीवुड की शीर्ष की तीन नायिकाएं- कैटरीना कैफ, एमी जैकसन और जैकलीन फर्नांडिज तो ब्रिटेन और श्रीलंका से हैं। लेकिन फिलहाल पाकिस्तानी कलाकारों के बॉलीवुड फिल्मों में काम करने को लेकर ही देश में विरोध का माहौल बन रहा है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। पाकिस्तानी अभिनेताओं और गायकों का आना-जाना तो आजादी के बाद से लगा रहा है। बंटवारे के दौरान फिल्मी दुनिया के कई कलाकार और फनकार मुंबई से लाहौर चले गए, तो कुछ वहां से मुंबई आ गए। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर पर लिखी यतींद्र मिश्र की हालिया पुस्तक लता-सुर गाथा में भी म्यूजिक इंडस्ट्री में विभाजन की त्रासदी का वर्णन है। संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर साहब और गायिका नूरजहां की कमी लता जी को अरसे तक खलती रही। लता जी अपने एक साक्षात्कार में कहती हैं,‘भले ही पार्टीशन हो गया हो, पर हम कलाकारों के मन में कोई फांक किसी पाकिस्तानी कलाकार या नागरिक के लिए नहीं है, कभी आई भी नहीं। उसके साथ यह भी था कि कभी डर भी नहीं लगा। हमेशा यह लगा था कि सब अपने ही तो हैं और अपनों से कैसा परायों जैसा सोचना?’
आजादी के बाद की पीढ़ी जब युवा हो रही थी, उनकी जिंदगी के उतार-चढ़ावों को अल्फाज देने के लिए शमशाद बेगम, मल्लिका पुखराज, गुलाम अली, नूरजहां, मेहदी हसन, रेशमा, नुसरत फतेह अली खान, आबिदा परवीन, फरीदा खानम जैसे फनकार मौजूद और मौजूं थे। यह वह दौर था, जब हमारे कलाकार पाकिस्तान में और पाकिस्तानी फनकार हिन्दुस्तान के आवाम की अपनी आवाज बन रहे थे। अस्सी के दशक के युवाओं ने इश्क का दर्द रेशमा की लंबी जुदाई में महसूस किया और पाकिस्तान की अदाकारा सलमा आगा की हरी कंजी आंखों की बेचैनी शिद्दत से महसूस की।
शो मैन राज कपूर की आखिरी फिल्म हिना की नायिका पाकिस्तान की जेबा बख्तियार हिंदी फिल्मों में काम करने को लेकर बेहद उत्सुक थीं। फिल्म के प्रदर्शन के समय उनसे हुई एक लंबी बातचीत में वह बोली थीं, ‘हमारे मुल्क के हर कलाकार का सपना होता है हिंदी फिल्मों में काम करना। हम कलाकार हर वक्त यही बात करते हैं कि हमारे लिए सरहद की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए, कोई सियासत नहीं।’
बावजूद इसके दो-चार फिल्मों में काम करने के बाद जेबा जब पाकिस्तान लौटीं, तो उनके अंदर खलिश थी कि हमें फिल्म नगरी में मौके और सहूलियतें नहीं मिलतीं, दोनों मुल्कों के बीच जब भी तनाव होता है, गाज हम पर गिरती है। पिछले कुछ साल में हमारे यहां के कई कलाकारों ने पाकिस्तानी सीरियलों में काम किया, संगीत के कार्यक्रम दिए। जी टीवी का जिंदगी चैनल पाकिस्तान के धारावाहिकों की वजह से बहुत कम समय में लोकप्रिय हो गया। इन्हीं धारावाहिकों की वजह से फवाद खान, माहिरा, जावेद शेख, हुमइमा मलिक, मावरा जैसे कलाकारों को हिंदी फिल्मों में काम मिलने लगा।
उरी में भारतीय सैनिकों पर हुए पाकिस्तान के हमले के बाद से ही मायानगरी में पहले हौले-हौले, फिर कुछ तेज आवाजों में बात उठने लगी। हमेशा की तरह कुछ निर्माता-निर्देशकों और कलाकारों ने अपनी बात रखी-कला का कोई मजहब नहीं होता। इस वक्त मसला सियासत या मजहब का नहीं, संवेदनाओं का है। सोशल साइट पर युवा मुखर हैं, उद्दंडता से कह रहे हैं, राष्ट्र सबसे ऊपर है, कलाकार बाद में आते हैं। मुंबई में महाराष्ट्र नव निर्माण के कार्यकर्ताओं ने पाक कलाकारों के खिलाफ जंग छेड़ दी है। हवा का रुख कह रहा है कि जिस मुल्क में हमारा सम्मान है, हम उनके साथ रहेंगे। जहां नहीं है, हमें भी उनकी जरूरत नहीं है। पाकिस्तान में आनन-फानन थियेटरों और टीवी चैनलों में हिंदी फिल्में चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जबकि आलम यह है कि उनके थियेटरों में सबसे अधिक कमाई हिंदी फिल्मों से ही होती है। पाकिस्तानी अवाम हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों से अपने मनोरंजन की खुराक पूरी करती है। लगभग एक सी बोली और जीवनशैली की वजह से दोनों देशों को एक-दूसरे को अपनाने में सहजता होती है। तर्क यही है कि 69 वर्ष पहले तक हम एक ही तो थे।
फिल्म और क्रिकेट हमेशा से हमें जोड़ते भी आए हैं, और तोड़ते भी। भारत-पाक का क्रिकेट मैच विश्व में जहां कहीं भी हो रहा हो, सिर्फ खेल नहीं रह जाता। जब-जब दोनों मुल्कों की सीमाओं पर तनाव बढ़ता है, साझा क्रिकेट भी बंद हो जाता है। रोष दोनों तरफ से है। जैसे इस समय क्रिकेटर जावेद मियांदाद हिन्दुस्तान को युद्ध के लिए ललकार रहे हैं, तो पाकिस्तानी अदाकारा माहिरा रुई के फाहे का काम करते हुए यह कह रही हैं कि युद्ध समाधान नहीं है। हमारे यहां से करण जौहर, महेश भट्ट, सलमान खान पाक कलाकारों की तरफदारी कर रहे हैं, तो अनुपम खेर, नाना पाटेकर देश की संवदेनाओं को अहम बता रहे हैं। यह सच है कि इस वक्त जिनकी फिल्मों में पाकिस्तानी अभिनेता काम कर रहे हैं, वे अपनी फिल्म के प्रदर्शन पर आए संकट से भयभीत हैं।
ताजा खबरों के अनुसार, अधिकांश पाकिस्तानी कलाकार विवादों से बचते हुए और बिना कोई बयान दिए अपने मुल्क लौट चले हैं। अब तो बस इंतजार रहेगा...।
(साभार: हिन्दुस्तान)
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