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'दिल्ली सरकार के विज्ञापनों से मां की ममता गोल'
‘दिल्ली सरकार अपनी योजनाओं का प्रचार कर रही है, लेकिन उसे एहसास भी नहीं कि कैसे उसके विज्ञापन बच्चों के लालन-पालन में मां को योगदान पर परदा डाल देते हैं’ ये कहा हिंदी दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में छपे अपने आलेख के जरिए स्वतंत्र पत्रकार अलका आर्य ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘दिल्ली सरकार अपनी योजनाओं का प्रचार कर रही है, लेकिन उसे एहसास भी नहीं कि कैसे उसके विज्ञापन बच्चों के लालन-पालन में मां को योगदान पर परदा डाल देते हैं’ ये कहा हिंदी दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में छपे अपने आलेख के जरिए स्वतंत्र पत्रकार अलका आर्य ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
सरकार के विज्ञापनों से मां की मतता गोल
स्टूडेंट्स को पढ़ाई के लिए कर्ज मुहैया कराने से लाखों के लिए आगे बढ़ने की राह आसान हो जाती है या यह भी कहा ला सकता है कि उनकी कुछ दिक्कतें कम हो जाती हैं, पर सवाल यहां यह मौजूं है कि क्या पिता ही बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा का खर्च उठाते हैं? मांओं की इसमें कोई भूमिका नहीं होती?
क्या ये विज्ञापन उन महिलाओं के साथ अन्याय नहीं करते जो घर से बाहर निकल काम पर जाती हैं ताकि बच्चों को बेहतर जिंदगी जीने के मौके प्रदान कर सकें? ये विज्ञापन उन महिलाओं के योगदान को भी ब्लैक आउट कर रहे हैं जो विधवा होने के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं। ऐसी मां को भी जिसे उसके पति ने बच्चों के साथ छोड़ दिया है और उस मां को भी जो तलाकशुदा है। ऐसी तमाम महिलाओं को ये विज्ञापन तस्वीर से बाहर कर देते हैं जो मुश्किल हालात में बच्चों का भविष्य संवारने के लिए हर पल जोखिमों का सामना करने से घबराती नहीं।
और कमाने वाली मांओं से अलग एक सवाल यह भी है कि जो महिलाएं कमाती नहीं, क्या उनका अपने बच्चों के विकास में कोई योगदान नहीं होता? तपती गर्मी में स्कूल से लौट रहे बच्चों के इंतजार में बस स्टॉप पर खड़ी तमाम मांएं हम सबको रोज दिखती हैं। फिर उस बच्चे को गर्म खाना खिलाना, शाम को पढ़ाना, ट्यूशन के लिए भेजना आदि तमाम जिम्मेदारियां मां ही निभाती है। ऐसे लंबे कार्यों के लिए उसे कोई वेतन नहीं मिलता। शायद इसीलिए सरकार ने बच्चे की जिंदगी में मां के इन योगदानों को पहचानने से ही इनकार कर दिया। और यह उस पार्टी की सरकार है जो सकारात्मक बदलाव की राजनीति करने का दावा करती है।
दरअसल हुकूमत चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, उसका चरित्र कमोबेश पुरुष प्रधान ही रहता है। महिलाओं के प्रति पूर्वग्रहों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि संविधान में महिलाओं को दिए गए बराबरी के अधिकारों को रौंदने वाली खबरों से अक्सर हमारा वास्ता पड़ता रहता है। स्त्रियों के प्रति पूर्वग्रह, उन्हें कमतर आंकने वाले संस्कार हमारी दिनचर्या में इस तरह से शामिल हैं कि हम यह सोच भी नहीं पाते कि यह अंततः स्त्रियों के विरुद्ध जाता है। मगर स्त्रियों को वह सब झेलना तो पड़ता ही है।
मांएं जिंदगी के थपेड़ों को अकेले सहते हुए उफ्फ तक नहीं करतीं, मगर सत्ता को यह सब नजर क्यों नहीं आता? रोहित वेमुला, वह छात्र जिसने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में आत्महत्या कर ली थी, उसकी मां ने कपड़े सिलकर उसे बड़ा किया था। रोहित ने अपने एक खत में लिखा भी था कि मशीन की इस ताकत का एहसास उसे है। जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया की मां बिहार में एक आंगनबाड़ी वर्कर है। इन दो मांओं के जिक्र में उन लाखों महिलाओं का संघर्ष आंखों के सामने तैरने लगता है, जो दिल्ली सरकार के छात्रों को कर्ज मुहैया कराने वाले विज्ञापनों से अदृश्य हैं। क्या दिल्ली सरकार को अब भी अपनी इस गलती का ऐहसास होगा और वह इसमें सुधार करेगी?
(साभार: नवभारत टाइम्स)
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