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युवा संपादक अनुज खरे का व्यंग्य: बन जाइए वर्ल्डक्लास `सोशल` समालोचक.. !
अनुज खरे एडिटर, दैनिकभास्कर डॉट कॉम
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
अनुज खरे
एडिटर, दैनिकभास्कर डॉट कॉम
महोदय, आपकी बेहद मासूम सी, रचनात्मक, स्तरहीन और सपाट रचना को पढ़कर मेरा मन उत्साह से भर उठा। आप कह सकते हैं कि झूमने वगैरह भी लगा। उत्साह से इसलिए भरा कि आपकी इस अकेली रचना ने ही सोशल मीडिया पर लेखन का सपना देखने वाले हजारों लोगों को उत्प्रेरित कर दिया होगा। आपकी प्रेरणा भी उच्चस्तरीय खोजबीन का विषय है, क्योंकि साधारण प्रेरणा से इतना खूंखार लेखन संभव नहीं है।
आपकी रचना को पढ़कर साफ समझ में आता है कि एक बार शुरुआत करने के बाद आपने निश्चित ही माउस या अंगूठा तोड़कर फेंक ही दिया होगा, अन्यथा हिंदी की इतनी अशुद्धियों के अलावा शब्दों के रिपीटेशन में जितनी सहजता है, वह पलटकर पढ़ने पर संभव नहीं हो पाती। प्रूफ की इन गलतियों के चलते कई नए शब्द हिंदी भाषा को आपकी ओर से निजी तौर पर भी मिले हैं।
इस दौरान आपने भाषा के साथ भी आपने इस कदर खुलकर खेला है कि उई मां..! हाय दइया.! चोट्टा.! के अलावा किसी भांति दूसरे पक्ष के इमोशन व्यक्त नहीं किए जा सकते हैं। यह हुनर आजकल के बाकी सोशल मीडिया के लेखकों में कम ही देखने को मिलता है। रचना को पढ़कर साफ समझ में आता है कि यह पूरी तरह से मौलिक है, क्योंकि इस शैली में सरकारी किताबें लिखने वालों के अलावा नॉनवेज जोक्स, ट्रक के पीछे शायरी लिखने वाले उस्तादों को छोड़कर कोई माई का लाल लिख ही नहीं सकता है।
कई बार तो आपके साहित्य में इतनी भाषाओं के शब्द मिलते हैं कि पढ़कर लगता है कि आपने ठान ही लिया है कि या तो आप रहेंगे या साला साहित्य ही बचेगा। कई भाषाओं से इतने वजनी शब्द उठाने के लिए काफी अध्ययन और श्रम भी लगता है। लगता है आपने जोशोखरोश से वो लगाया भी है। कई बार तो आपका भाषा रिमिक्स कमाल का है लगता है शब्द अंग्रेजी डिक्शनरी से सीधे तमाचे मारते हुए यहां लाए गए हों। इसी तरह कई जगह तो आपने भारी मेहनत से भारी मात्रा में अंग्रेजी लिखकर अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश की है जो आप हिंदी में एक या दो शब्दों के सहारे ही लिख जाते।
वैसे, जब-जब आपके संदेशों में हास्य प्रसंग मिलते हैं जिनकी मार्मिकता दंग कर जाती है। मुश्किल हो जाती है कि रोएं या बाल नोचें। बाद में मोबाइल को सिर पर मारने से ही तसल्ली मिलती है। या इससे भी काम नहीं चले तो कंप्यूटर से लिपटकर रोने या फेसबुक के मालिक जुकरबर्ग को सिर की टक्कर मारने जैसे वहशी आइडिए ही तसल्ली दे पाते हैं।
यूंके आपका साहित्य भले ही दिमाग का दही कर दे। लेकिन जिस लगन से दही पीने के 10 तरीके वाला `जनहित` मैसेज लगातार भेजते हैं, उस प्रतिभा पर सोशल मीडिया का हिंदी साहित्य इस कदर भौचक्का है कि उसे मुंह छिपाने तक की जगह नहीं मिल रही है।
तो प्रैक्टिस कीजिए और बन जाइए वर्ल्डक्लास `सोशल` समालोचक.. !
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