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सहारा में बस अंधकार सिर्फ मीडिया डिवीजन में है, बोले वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति

‘दुख तो इस बात का है कि सहारा के अन्य सभी विभागों में सब कुछ ठीक चल रहा है। अधिकारी नई नई गाड़ियां खरीद रहे है। बीमा के विज्ञापन हम हर चैनल में देख रहे हैं। बस अंधकार सिर्फ उस मीडिया डिवीजन में है, जो कभी उनका मुख्य अस्त्र हुआ करता था।’ अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए ये कहना है कि वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपती शर्मा का। उनक

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘दुख तो इस बात का है कि सहारा के अन्य सभी विभागों में सब कुछ ठीक चल रहा है। अधिकारी नई नई गाड़ियां खरीद रहे है। बीमा के विज्ञापन हम हर चैनल में देख रहे हैं। बस अंधकार सिर्फ उस मीडिया डिवीजन में है, जो कभी उनका मुख्य अस्त्र हुआ करता था।’ अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए ये कहना है कि वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपती शर्मा का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

श्री लगाने भर से कोई श्रीमान नहीं हो जाता सुब्रत राय, अपने कर्म सुधारिए अन्यथा... देर नहीं लगेगी

विद्यार्थी जीवन में जब मैं हरिश्चंद्र इंटर कालेज में कक्षा छह का विद्यार्थी था तब अंग्रेजी के अध्यापक महाशय ने बताया था प्रॉपर नाउन और कॉमन नाउन के बारे में। पता नहीं क्यों उन्होंने एक बात कही थी- "कॉमन नाउन से प्रॉपर नाउन बनाया जा सकता है"। हमने यह सुन कर सीखा।

सन 1982 के मार्च के प्रथम सप्ताह में मुझे गोरखपुर में पहली बार गुरुजी की वह बात फिर से याद आई। मैने उस समय कॉमन नॉउन को प्रॉपर नाउन बनने की छटपटाहट जिस शख्स में देखी थी उसका नाम था सुब्रत राय।

हुआ यूं कि गोरखपुर के तत्कालीन क्रिकेटर कलेक्टर बृज मोहन वोहरा ने एक डबल विकेट क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन किया था, जिसमें उस समय के सभी टेस्ट दिग्गज गावस्कर, कपिल, वेंगसरकर आदि ने भाग लिया। शाम को जिस शख्स के यहां डिनर था उनका नाम था सुब्रत राय। छोटे से बंगले के अहाते में शामियाना लगा कर पार्टी दी थी। मां सहित उनका पूरा परिवार मौजूद था। प्रेस के नाम पर मैं और जागरण व आज के महाप्रबंधक द्वय रिजवी और दिनेश श्रीवास्तव आमंत्रित थे। दोनों ही अधिकारी मेरे परम मित्र भी थे। वहां राय ने सभी खिलाड़ियों को हैवीवेट सुपर लार्ज वीआईपी सूटकेस उपहार में दिया।

यहां एक बात बता दूं कि दिलीप वेंगसरकर से जागरण ने करार किया और इस मैच की रिपोर्ट वेंगी ने लिखी। अपने कॉलम में उन्होंने इस डिनर की चर्चा करते हुए लिखा कि कोई सहारा वाले के यहां पार्टी में बड़ा आनंद आया एकनाथ सोल्कर जैसों ने मिमिक्री से हम सभी को हंसा कर लोट- पोट कर दिया था।

सुबह अखबार में कालम प्रकाशित हुआ। मैं उस समय जिलाधिकारी के बंगले में सुबह की चाय पी रहा था कि सुब्रत राय नमूदार हुए। सीधे मुझसे बोले कि यह क्या लिख दिया आपने? बीच में ही बात काट कर बोहरा ने, जो स्कूली जीवन में गावस्कर और अशोक मांकड़ के कप्तान हुआ करते थे, पूछा कि आप हैं कौन? जब परिचय जाना तब मुंह बिचकाते हुए फिर सवाल दागा कि वह सरदारजी के सहारा ऑफिस में कब्जे का जो मामला था, तुम्ही हो वह? फिर जवाब सुने बिना बोले कि पदम ने नहीं यह कॉलम वेंगसरकर ने लिखा है। वेंगी को क्या पता कि यहां दो सहारा है और पदमजी बनारस से आए हैं, उन्हें भी कोई जानकारी नहीं... खैर जाइए वेंगसरकर टीम के साथ बस से लखनऊ प्रस्थान करने वाला है। उससे पूछिए। राय वहां गए तब वेंगी बोला, 'क्या बाबा वो पदम से बोलो।' सुब्रत फिर लौटे तब मैनें कहा कि भाई आप जागरण को स्पष्टीकरण भेज दीजिए। रिजवी आपके मित्र हैं वह उसे छाप देंगे। मैं खुद ही बनारस के लिए अभी निकल रहा हूं। परसों होली है।

मैनें उस समय महसूस किया था कि इस शख्स की असीम महत्वाकांक्षा है। मैं गलत साबित नहीं हुआ। वह देखते ही देखते सफलता का आसमान छूने लगे। यानी वह हो गए प्रापर नाउन। जिस सहारा शब्द के लिए वह छटपटा रहे थे उसी को अपने नाम के आगे श्री जोड़ कर लिखने लगे। परंतु श्री लिखने से ही कोई श्रीमान नहीं होता। भारतीय नीति शास्त्र कहता है कि इसके लिए विवेकी, मित्र वत्सल, कृतज्ञ जैसे उसमे गुण भी होने चाहिए। इस कसौटी पर अगर सुब्रत राय को आंका जाए तो लकीर कहीं टूटी हुई दिखाई देने लगेगी। पिछले तीन वर्षों में जिन कर्मचारियों ने सहारा के पत्रकारिता से जुड़े विभागों में आधे वेतन पर अपमानित- लांक्षित होकर केवल अपना ही किसी तरह गुजर बसर नहीं किया, सुब्रत को सहारा भी दिया। सिर्फ उन्ही पर उन्होंने गाज गिराई।

दुख तो इस बात का है कि सहारा के अन्य सभी विभागों में सब कुछ ठीक चल रहा है। अधिकारी नई नई गाड़ियां खरीद रहे है। बीमा के विज्ञापन हम हर चैनल में देख रहे हैं। बस अंधकार सिर्फ उस मीडिया डिवीजन में है, जो कभी उनका मुख्य अस्त्र हुआ करता था। एक साल की सैलरी बकाया है। जब आंदोलन पर विवश हुए मीडियाकर्मी तो उनमें 21 को बर्खास्त कर शेष को खौफजदा कर दिया। एक कर्मचारी की तो जान भी चली गई।

कोई विश्वास करे या न करे हमारे धर्म ने तो नरक स्वीकारा है। आंशिक नरक यंत्रणा तो आप झेल चुके हैं तीन वर्षों के दौरान तिहाड़ में। मगर फिर भी जो अपराध आप कर रहे हैं, उससे आपकी अनुवांशिकी धारा में भी नरक सुनिश्चित हो रहा है। अरे, सावन आने को है। आप एक बार दिल खोल कर पश्चाताप करें आंसुओं के साथ और सुधारें अपने पिछले कर्मों को। हो सकता है कि जल प्रिय देनता शिव आपको माफ कर दें। अन्यथा शंकर किसी को भी कंकड़ बना सकते हैं। यानी फिर 1982 और पुर्नमूषको भव:

(साभार: फेसबुकल वॉल से)

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