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पश्चिमी देश मीडिया की आज़ादी के लिए अपना आईना देखें: आलोक मेहता

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की प्रेस स्वतंत्रता की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका 180 देशों में 57वें स्थान पर है, और प्रेस की स्वतंत्रता पिछले वर्षों की तुलना में कमज़ोर हुई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

भारत में अब भी अमेरिका और ब्रिटेन के लोकतंत्र और प्रेस की आज़ादी को महान समझने की गलतफहमी रखने वाले कुछ संगठन और नेता हैं। खासकर पश्चिमी देशों से भारी फंडिंग पाने वाली संस्थाएँ या विदेशी ज़मीन पर भारत की बुराई करके तालियाँ बजवाने वाले राहुल गांधी जैसे नेता, कथित एक्टिविस्ट किस्म के पत्रकार-लेखक विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स दिखाकर भारतीयों को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं।

जबकि भारत में जितने अख़बार, पत्रिकाएँ, टीवी न्यूज़ चैनल और वेबसाइट्स हैं, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं हैं। सारे दबाव, विरोध के बावजूद सैकड़ों पत्रकार, लेखक अंग्रेजी से अधिक हिंदी और भारतीय भाषाओं में लिख-बोलकर सत्ता व्यवस्था या अन्य सामाजिक-आर्थिक कमियों को उजागर कर रहे हैं। साल की समीक्षा करने वाले पश्चिमी देशों के साथ भारत में उनके पिछलग्गू लोगों को पश्चिम का आइना भी देखना चाहिए। तब समझ में आएगा कि उन्हें भारत को सबक सिखाने की ज़रूरत नहीं है। वे अपनी दुर्दशा सुधारने का प्रयास करें।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की प्रेस स्वतंत्रता की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका 180 देशों में 57वें स्थान पर है, और प्रेस की स्वतंत्रता पिछले वर्षों की तुलना में कमज़ोर हुई है। मुख्य कारणों में आर्थिक दबाव, समाचार संस्थानों की वित्तीय अनिश्चितता, पत्रकारों के ख़िलाफ़ प्रतिकूल माहौल शामिल हैं। मीडिया हाउस आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं, जिससे विरोधी आवाज़ों को दबाया जा रहा है। अमेरिकी मीडिया को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, खासकर जब राजनीति से जुड़े समूह और नेता मीडिया की आलोचना करते हैं। प्रेस स्वतंत्रता पर चिंता की एक वजह यह भी है कि मीडिया को समय-समय पर आर्थिक सहायता और संसाधन कटौती का सामना करना पड़ रहा है।

प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, आम अमेरिकियों में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर चिंता बनी हुई है। कई लोग मानते हैं कि समाचार स्वतंत्र रूप से रिपोर्ट नहीं हो पा रहा। ब्रिटेन की रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया कि अमेरिकी पेंटागन (सेना विभाग) ने मीडिया को कहा कि वे संवेदनशील सूचनाओं को प्रकाशित करने से पहले अनुमति प्राप्त करें, जिससे पत्रकारों के सामने सूचना स्वीकार्यता और रिपोर्टिंग स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हुए हैं। अमेरिका में मीडिया पर राजनीतिक और सामाजिक समूहों से आलोचना और दबाव बढ़ा है तथा कुछ समूह मीडिया को निष्पक्ष नहीं मानते।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने चेतावनी दी है कि प्रेस स्वतंत्रता इतिहास के सबसे निचले स्तर पर है, और अमेरिका समेत कई लोकतांत्रिक देशों में इस स्थिति का असर देखा जा रहा है। ब्रिटेन में (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने प्रेस लॉबी सिस्टम में बड़े बदलाव किए हैं, जिसमें परंपरागत दैनिक लंचब्रीफ़िंग (जहाँ पत्रकार सवाल पूछते हैं) अब हटाई जा रही है या सीमित की जा रही है।

पत्रकारों ने इसका विरोध किया है और कहा है कि इससे सरकारी जवाबदेही और पारदर्शिता कम होगी। भारत में एक वर्ग द्वारा 'आदर्श' बताई जाने वाले संस्थान बीबीसी के लिए 2025 में एक बड़ा विवाद हुआ, जहाँ यह आरोप लगा कि कुछ रिपोर्टिंग, खासकर राजनीतिक मुद्दों पर, राजनीतिक झुकाव प्रदर्शित कर रही थी। इसके बाद बीबीसी के वरिष्ठ नेतृत्व में इस्तीफे भी हुए और यह विवाद प्रेस स्वतंत्रता व न्यूज़ मीडिया के संपादकीय स्वतंत्रता पर बड़ा विषय बना। ब्रिटेन में प्रेस को लेकर सरकार और मीडिया के बीच बातचीत और संघर्ष जारी है, खासकर जब सरकारी संदेश और अफ़वाहों/भेदभाव मुद्दों को रिपोर्ट करना होता है।

विश्व स्तर पर प्रेस स्वतंत्रता सबसे अधिक दबाव में है। आर्थिक संकट, राजनीतिक दबाव, मीडिया मालिकाना संरचना इत्यादि ने पत्रकारिता को चुनौती दी है। दुनिया के लगभग आधे देशों में प्रेस स्वतंत्रता गंभीर रूप से कमज़ोर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दुनिया भर में करीब 10% गिरी है, और सरकारी/तकनीकी नियंत्रण में वृद्धि हुई है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर नियंत्रण भी एक बड़ा मुद्दा बन रहा है।

अमेरिकी राजनीति में मीडिया और सत्ता के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन 2025 में यह टकराव एक बार फिर तेज़ और आक्रामक रूप में सामने आया। डोनाल्ड ट्रम्प—चाहे चुनावी राजनीति में हों, अदालतों से जूझ रहे हों या अपने समर्थकों को संबोधित कर रहे हों—ने अमेरिकी मीडिया, विशेषकर सीएनएन को लगातार निशाने पर रखा।

यह टकराव केवल आलोचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें अपमानजनक भाषा, मीडिया की विश्वसनीयता पर सीधा हमला और पत्रकारों को ‘दुश्मन’ के रूप में पेश करने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखी। डोनाल्ड ट्रम्प का मीडिया से टकराव उनके पहले राष्ट्रपति कार्यकाल (2017–2021) से ही चर्चा में रहा है। उस समय उन्होंने कई बार मीडिया को “फेक न्यूज़” और “जनता का दुश्मन” कहा।

2025 में यह रवैया और तीखा हो गया, क्योंकि अमेरिका गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण से गुजर रहा है। चुनावी राजनीति फिर से केंद्र में है। ट्रम्प खुद को सर्वोच्च नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। इस माहौल में मीडिया, खासकर सीएनएन जैसे राष्ट्रीय नेटवर्क, ट्रम्प की रणनीति में प्रतिद्वंद्वी बन गए। सीएनएन को ट्रम्प बार-बार इसलिए निशाना बनाते रहे क्योंकि राष्ट्रीय और वैश्विक प्रभाव—सीएनएन अमेरिका ही नहीं, दुनिया भर में देखा जाता है।

उसकी जाँचपरक रिपोर्टिंग—ट्रम्प की नीतियों, बयानों और कानूनी मामलों पर सवाल उठाती है। जबकि ट्रम्प लॉबी सीएनएन को झूठ फैलाने वाला नेटवर्क, अमेरिका-विरोधी एजेंडा चलाने वाला मीडिया, जनता को गुमराह करने वाला संस्थान जैसे आरोपों से घेरती है। ट्रम्प की भाषा केवल आलोचनात्मक नहीं बल्कि वह व्यक्तिगत, तंजपूर्ण और अपमानजनक रही। कठोर और आक्रामक भाषा ट्रम्प के समर्थकों को यह संदेश देती है कि: “हम बनाम वे” की लड़ाई है। मीडिया अभिजात वर्ग का हिस्सा है। ट्रम्प अकेले “सच” बोल रहे हैं।

ट्रम्प और राहुल गांधी जैसे नेता द्वारा जब बार-बार मीडिया को झूठा कहा जाता है, तो जनता का भरोसा कमज़ोर होता है। तथ्य और राय के बीच अंतर धुंधला होता है। असहज सवालों से ध्यान हटाना—कानूनी मामलों, नीतिगत आलोचनाओं और राजनीतिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए मीडिया पर हमला एक प्रभावी हथियार बनता है। 2025 में ट्रम्प लॉबी ने केवल सीएनएन ही नहीं, बल्कि “मुख्यधारा मीडिया” पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया।

भीड़ के सामने उकसाने वाली भाषा का प्रयोग किया। इन हमलों का असर केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा; कई बार पत्रकारों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में शत्रुतापूर्ण माहौल का सामना करना पड़ा। अमेरिकी संविधान का पहला संशोधन प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसलिए 2025 में सवाल उठा है कि क्या शक्तिशाली राजनीतिक नेताओं द्वारा मीडिया पर लगातार हमले इस स्वतंत्रता को कमज़ोर कर रहे हैं?

क्या आलोचना और धमकी के बीच की रेखा धुंधली हो रही है? इसमें कोई शक नहीं है कि ट्रम्प की भाषा मीडिया संस्थानों पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ा सकती है। तभी तो हमारा कहना है कि हम अपनी आज़ादी और अधिकारों के लिए अपनी आचार संहिता बनाएँ, पुराने ब्रिटिश राज के नियम या उनके द्वारा अब हमारे लिए बताए जा रहे रास्तों के बजाय भारतीय नियम, परंपरा, कानूनों को तैयार करें और उनका पालन करें।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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