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जब सादगी ही ब्रैंड की असली पहचान बन जाए: शान्तोमय रॉय
परंपरागत ब्रैंड बनाने का तरीका पूरी तरह उल्टा हो गया है। दशकों तक कंपनियां अपने प्रॉडक्ट्स अलग दिखें, पहचान में आएं, इसके लिए बहुत पैसा और मेहनत करती थीं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
शान्तोमय रॉय, फाउंडर व डायरेक्टर, के-फैक्टर कम्युनिकेशंस ।।
एक युवा महिला एक कॉफी शॉप में प्रवेश करती है, हाथ में एक साधारण हल्के भूरे रंग का कपड़े का बैग लिए हुए। बैग पर कोई लोगो नहीं है, फिर भी कतार में खड़े हर व्यक्ति को यह तुरंत पहचान में आ जाता है। कॉफी बनाने वाला युवक उसकी ओर सिर हिलाता है। एक अन्य ग्राहक पूछता है कि उसने यह बैग कहां से खरीदा। इस बैग की कीमत डिजाइनर विकल्पों से अधिक है, जिन पर मोनोग्राम छपे होते हैं, लेकिन इसकी खासियत बिल्कुल विपरीत है: इसमें कोई भी स्पष्ट ब्रैंडिंग नहीं है। यह रोजमर्रा का एक आम दृश्य है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि आज के ब्रैंड्स सिर्फ दिखावे या लोगो पर भरोसा नहीं करते, बल्कि ग्राहकों से जुड़ाव और सांस्कृतिक महत्व बनाने के नए तरीके अपना रहे हैं।
परंपरागत ब्रैंड बनाने का तरीका पूरी तरह उल्टा हो गया है। दशकों तक कंपनियां अपने प्रॉडक्ट्स अलग दिखें, पहचान में आएं, इसके लिए बहुत पैसा और मेहनत करती थीं। इसके लिए लोगो, रंग और डिजाइन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। पुराने समय में Nike का ‘swoosh’, McDonald’s के ‘golden arches’ और Apple का ‘कट-सा लगा हुआ सेब’- ये सब इतने मशहूर हो गए कि पूरा ब्रैंड इनके इन लोगो से पहचान लिया जाता था। लेकिन अब एक नई तरह की कंपनियां कुछ उल्टा कर रही हैं। आज के मार्केट में हर जगह लोगो और विज्ञापन भरे हुए हैं, इसलिए कई ब्रैंड मानते हैं कि सबसे बड़ी लग्जरी वही है जो दिखने में बिल्कुल सादा हो, जहां कोई लोगो ही न हो।
ये 'इनविजिबल ब्रैंड्स' यानी बिना लोगो वाले ब्रैंड बिल्कुल अलग तरह से काम करते हैं। वे अपने प्रॉडक्ट पर बड़े लोगो या नाम नहीं लगाते। उनकी पहचान कुछ बहुत हल्के और खास संकेतों से होती है, जैसे एक अलग-सा ग्रे शेड, एक अनोखा मटेरियल या कोई विशिष्ट डिजाइन। ऐसे संकेत सिर्फ वे लोग पहचान पाते हैं जो इस ब्रैंड को समझते हैं, बाकी लोगों को पता भी नहीं चलता। इससे यह एक तरह का ‘इनसाइडर क्लब’ बन जाता है, जहां पहचानना ही एक तरह की 'एंट्री टिकट' होती है।
यह ट्रेंड फैशन से कहीं आगे बढ़ चुका है। टेक्नोलॉजी में कई लैपटॉप स्लीव्स और फोन केस बिना किसी लोगो के ही महंगे बिकते हैं। होम डेकोर और लाइफस्टाइल ब्रैंड साधारण, मिनिमलिस्ट सिरेमिक चीजें और लिनेन बनाते हैं, जिनकी खूबसूरती केवल उनकी क्वॉलिटी और डिजाइन में होती है। सप्लीमेंट कंपनियां भी पैकेजिंग इतनी सादी बनाती हैं कि नाम भी मुश्किल से दिखता है। यहां तक कि खाने-पीने के ब्रैंड भी बिना चमकदार पैकिंग के, सादा और भरोसा जगाने वाला डिजाइन इस्तेमाल करने लगे हैं।
लोग ऐसे प्रॉडक्ट्स पर ज्यादा पैसे क्यों खर्च करते हैं जिनमें ब्रैंड का नाम ही नहीं दिखता? वजह यह है कि आज के समय में 'लग्जरी' का मतलब बदल गया है। पहले महंगे ब्रैंड का बड़ा लोगो दिखाना ही स्टेटस माना जाता था, लेकिन अब जब लोगो हर जगह मिल जाते हैं, कॉपी में भी। लिहाजा असली खासियत कुछ और बन गई है। अब लोग दिखावे से ज्यादा समझदारी को अहमियत देते हैं। अब पहचान ये नहीं कि आपके पास कौन-सा लोगो है, बल्कि यह है कि आप बिना लोगो के भी अच्छा और असली प्रॉडक्ट पहचान सकते हैं। यही नया स्टेटस बन गया है।
इन ब्रैंड्स का प्रचार भी अलग तरीके से होता है। ये बड़े विज्ञापन नहीं चलाते। ये अपने ग्राहक समुदाय पर निर्भर रहते हैं, लोग एक-दूसरे को बताकर इन ब्रैंड्स को आगे बढ़ाते हैं। कभी ब्रैंड का फाउंडर अपनी सोच एक लंबे इंस्टाग्राम पोस्ट में समझा देता है। ग्राहक खुद दूसरों को ब्रैंड की कहानी बताते हैं। कई बार ये ब्रैंड अचानक किसी अनोखी जगह पर पॉप-अप शॉप खोल देते हैं, जिससे लोगों में एक तरह की खोज और 'इनसाइडर' होने की भावना बनती है। ये ब्रैंड जानबूझकर अपने आपको ढूंढने में थोड़ा मुश्किल रखते हैं और जल्दी-जल्दी बड़े मार्केट में नहीं जाते, ताकि उनका स्टाइल और पहचान खास बनी रहे।
इन 'इनविजिबल ब्रैंड्स' की लोकप्रियता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ये सिर्फ दिखावे पर नहीं, बल्कि गहरे मूल्यों और ईमानदार काम पर जोर देते हैं। ये ब्रैंड तेज फैशन और ज्यादा खरीदारी वाली संस्कृति के उलट काम करते हैं। ये लंबे समय तक चलने वाले, अच्छे से बनाए गए और सादगी वाले प्रॉडक्ट बनाते हैं। इनकी मार्केटिंग भी बहुत शांत और साधारण होती है। महंगे मॉडल या चमकीले ऐड्स नहीं, बल्कि असली कारीगरों और उनके काम की कहानी दिखाते हैं। जैसे कोई कपड़ों का ब्रैंड अपने फैब्रिक बनाने वाली जापानी मिल या हाथ से काम करने वाले कारीगरों का वीडियो दिखाता है। इससे ग्राहकों के साथ भरोसा और कनेक्शन बनता है।
भारत में ये ट्रेंड अपनी अलग ही तरह से बढ़ रहा है। मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली के युवा उद्यमी ऐसे ब्रैंड बना रहे हैं जो सादगी और आधुनिक डिजाइन को भारतीय पारंपरिक कारीगरी से जोड़ते हैं। वे गुजरात के बुनकरों या राजस्थान के ब्लॉक प्रिंटर्स के साथ मिलकर ऐसे प्रॉडक्ट बनाते हैं जिनमें पुरानी कला और नई सोच दोनों झलकती हैं। इनके ब्रैंडिंग में कोई बड़ी-बड़ी बातें या चमक-दमक नहीं होती, ये बस अपने काम की क्वॉलिटी और कारीगरों की कहानी को दिखाते हैं। इंस्टाग्राम पर भी ये अपनी लाइफस्टाइल नहीं दिखाते, बल्कि बताते हैं कि उनका कपड़ा कैसे बना, कौन-कौन से कारीगर जुड़े।
भारत में 'इनविजिबल ब्रैंडिंग' का मतलब सिर्फ बिना-लोगो वाले प्रॉडक्ट नहीं है, बल्कि उसके साथ एक सोच जुड़ी होती है- पर्यावरण बचाना, ईमानदार काम करना और दिखावे से दूर रहना। ये ब्रैंड खुद को तेज फैशन और लोगो से भरे पारंपरिक भारतीय ब्रैंड्स के विकल्प के तौर पर पेश करते हैं। आज की नई पीढ़ी, जो असली और नैतिक चीजों को महत्व देती है, लेकिन दिखावे वाली लाइफस्टाइल नहीं चाहती, उन्हीं को ये ब्रैंड पसंद आते हैं। एक सादी खादी की कुर्ता या पीतल का साधारण बर्तन भी अब सिर्फ चीज नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतीक बन जाता है।
शहरों में रहने वाले मिलेनियल्स और Gen Z ऐसे प्रॉडक्ट्स चाहते हैं जो एक साथ भारतीय भी हों और आधुनिक भी। इनविजिबल ब्रैंड इसी वजह से सफल होते हैं- उनके प्रॉडक्ट बांद्रा के कैफे में भी फिट बैठते हैं और बर्लिन की आर्ट गैलरी में भी और क्योंकि उन पर कोई बड़ा लोगो नहीं होता, लोग उन्हें अपने तरीके से समझते और अपनाते हैं; वे किसी एक संस्कृति में बंधे नहीं होते।
सोशल मीडिया भी इन ब्रैंड्स की ग्रोथ में जरूरी है, लेकिन ये कंपनियां सोशल मीडिया का इस्तेमाल अलग ढंग से करती हैं। ये लगातार ऐड नहीं डालते, बल्कि अपने अकाउंट को एक तरह की कहानी की तरह पेश करते हैं। असली लोगों के घरों में खींची तस्वीरें, कारीगरों की कहानी, प्रॉडक्ट बनाने की प्रक्रिया- ये सब मिलकर एक भरोसा बनाते हैं। उनके कमेंट सेक्शन भी मिनी-समुदाय बन जाते हैं, जहाँ ग्राहक अपने अनुभव और विचार साझा करते हैं। ब्रैंड का अकाउंट किसी बड़ी कंपनी की तरह नहीं बल्कि एक इंसान की तरह बातचीत करता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि बिना लोगोज के भी इन ब्रैंड्स की पहचान और भी तेज हो जाती है। एक बिल्कुल सादा काला कैप भी 'पहचान' का हिस्सा बन जाती है- उसे देखने वाला तुरंत समझ जाता है कि यह किस तरह के ब्रैंड और सोच को दर्शाता है। ये प्रॉडक्ट उन लोगों के बीच एक 'सीक्रेट सिग्नल' की तरह काम करते हैं जो इस तरह की चीजों को पहचानते हैं।
लोगों को इन ब्रैंड्स के प्रॉडक्ट इसलिए भी पसंद आते हैं क्योंकि वे उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं और वे खुद को व्यक्त करते हैं, किसी कंपनी का विज्ञापन नहीं बनते। लोग अपनी कहानी खुद इस प्रॉडक्ट से जोड़ते हैं, क्योंकि उस पर कोई लोगो नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि यह भी एक तरह की चालाक मार्केटिंग है- लोग अपनी जेब से ज्यादा पैसा देकर इन ब्रैंड्स का प्रचार खुद करते हैं। और भारत जैसे देश में जहाँ ज्यादातर लोग क़ीमत देखते हैं, ऐसे ब्रैंड सिर्फ एक छोटे वर्ग तक सीमित रहते हैं। लेकिन इनके चाहने वालों का कहना है कि ये ब्रैंड असली और ईमानदार काम दिखाते हैं, कारीगरों का सम्मान करते हैं और दिखावे वाली दुनिया से राहत देते हैं- इसलिए यह सब सिर्फ दिखावा नहीं, बल्कि एक नई सोच है।
अब बड़े-बड़े ब्रैंड भी इस ट्रेंड को कॉपी करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर सफल नहीं होते। वजह यह है कि 'इनविजिबल ब्रैंडिंग' केवल लोगो हटाने से नहीं आती- पूरी कंपनी को उसी सोच पर काम करना पड़ता है। ग्राहक बहुत जल्दी पहचान लेते हैं कि कौन असली है और कौन सिर्फ नकल कर रहा है।
आगे चलकर, जब लोग ज्यादा समझदारी से खरीदारी करेंगे और रोज-रोज के ब्रैंड शोर से थक जाएंगे, तब शायद ऐसी शांत और सादगी वाली ब्रैंडिंग एक नया मानक बन जाए। भारत के बड़े शहरों- मुंबई, दिल्ली- में यह बदलाव पहले ही साफ दिखने लगा है। नई पीढ़ी ब्रैंड को सिर्फ चीज नहीं, बल्कि एक सोच, एक पहचान और एक संस्कृति की तरह देख रही है।
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