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मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल
सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
महाराष्ट्र का सियासी प्रहसन अभी जारी है। जितनी होड़ पक्ष और प्रतिपक्षी गठबंधनों में है, उससे अधिक टेलिविजन चैनलों में इस सप्ताह दिखाई दी। कुर्सी के लिए घमासान का एक केंद्र प्रदेश की राजधानी मुंबई, दूसरा देश की राजधानी दिल्ली, तीसरा भारत का सर्वोच्च न्याय मंदिर सुप्रीम कोर्ट और चौथा टीवी का परदा रहा। जितने तर्क, कुतर्क, वितर्क, नियम,कायदे,कानून सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जा रहे थे, चैनलों में उससे ज्यादा ही परोसे जा रहे थे। यहां तक कि अनेक हलकों में कहा गया कि इतना मीडिया ट्रायल भी ठीक नहीं है। मीडिया अदालत नहीं है। इसलिए छोटे परदे पर हो रहे शास्त्रार्थ सर्वोच्च अदालत का ध्यान भटका सकते हैं।
देखा जाए तो एक नजरिये से बात ठीक लगती है। सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता। दूसरी ओर अगर कार्यपालिका और विधायिका की गाड़ी पटरी से उतर गई हो तो क्या मीडिया को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए? हमारे राजनेता संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाएं भूलकर सड़कों पर गैरजिम्मेदारी का प्रदर्शन करें तो माफ कीजिए, मीडिया को एक बार नहीं, सौ बार मीडिया ट्रायल का अधिकार है। आज की पत्रकारिता के विकृत चेहरे के बावजूद समाज का बड़ा वर्ग इस पेशे के प्रति अच्छी धारणा रखता है। इसलिए कम से कम मैं तो मीडिया ट्रायल को उचित और जायज मानता हूं। इससे सत्ता प्रतिष्ठान अथवा प्रतिपक्ष खफा हो तो सौ बार हो जाए। अपनी बला से। हम तो मीडिया ट्रायल करते रहेंगे। राजनेताओं को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में वे नायक नहीं खलनायक के तौर पर देखे जाने लगे हैं।
लेकिन, मैं हमारे उन साथियों, पत्रकारों और एंकरों का कतई समर्थन नहीं करूंगा, जो बीते दिनों महाराष्ट्र के घटनाक्रम को लेकर अपने-अपने दिल की जबान से बोल रहे थे। वे एंकर कम पार्टी प्रवक्ता अधिक लग रहे थे। उनके इस विधवा विलाप का क्या अर्थ निकला? उनके कुतर्क से न किसी को बहुमत मिला और न किसी का छीना गया। फिर हमारे पत्रकार साथी अपनी दुर्गति अपने ही हाथों क्यों कर बैठते हैं। उन्हें समझना होगा कि जब वे अपने गढ़े गए तर्कों के साथ परदे पर बहस करते हैं तो माफ़ कीजिए,पत्रकार या एंकर कम, पार्टी के अभिभाषक अधिक लगते हैं। उन्हें यह भ्रम कतई नहीं होना चाहिए कि वे बैलगाड़ी के नीचे चल रहे हैं, इसलिए गाड़ी भी वही खींच रहे हैं। पत्रकारों के किसी दल के पक्ष या विपक्ष में बोलने से राजनीति की नाव उस दिशा में नहीं मुड़ जाती। यह भी सच है कि बहस का चरित्र निरपेक्ष और तटस्थ रखने के लिए उन्हें किसी डॉक्टर की पर्ची नहीं चाहिए। समझदार को इतना इशारा ही काफी है।
एक और अजीब-बेतुकी पत्रकारिता दो-चार दिनों में दिखी। दो-तीन समाचार चैनल ऐसे भी थे, जो महाराष्ट्र के इस शिखर घटनाक्रम के दिनों में भी उसके कवरेज से दर्शक को वंचित कर रहे थे। जब एक-एक मिनट दर्शक सांस साधे महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे को देख रहा था, तो ये चैनल चीन की चाल, पाक की मिसाइल या ऐसा ही कोई रिकॉर्ड किया हुआ मनोरंजन का कार्यक्रम दिखा रहे थे। ऐसा एकाध घंटे नहीं, पूरे तीन-चार दिन करते रहे। मैं आगाह करना चाहता हूं कि प्रतिष्ठा कमाने में बरसों लग जाते हैं और एक भी गलत फैसला धड़ाम से नीचे पटक देता है। दूसरी बात यह कि न्यूज चैनल ऑन एयर होने के बाद किसी की निजी संपत्ति नहीं रह जाता। वह दर्शक का हो जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे कोई अखबार छपने के बाद पाठकों का हो जाता है।
गनीमत है कि अच्छी सड़क, बिजली या पानी मांगने के लिए जिस तरह लोग सड़कों पर आ जाते हैं, उस तरह अखबारों और चैनलों से अच्छी खबरें मांगने के लिए सड़कों पर नहीं आते। जिस दिन उन्हें लगा कि पत्रकारिता के जरिये परोसी जा रही खबरें किसी सड़ी ब्रेड की तरह बदबूदार और पक्षपाती हैं, तो वे भी आपके खिलाफ आंदोलन पर उतर आएंगे। अपने उपभोक्ता अधिकार के लिए भी सड़कों पर लड़ने का उनका हक अभी जिंदा है मिस्टर मीडिया।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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