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मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा-बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है

राजेश बादल 6 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हैदराबाद की डॉक्टर बेटी के साथ जो कुछ हुआ, वह हमें शर्मसार करता है। हमारे अनपढ़ पूर्वजों के भी अपने कुछ संस्कार थे, मगर जैसे-जैसे हम सभ्य होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अधिक क्रूर,जंगली,वहशी और उन्मादी नहीं हो रहे हैं? संयुक्त परिवार के बिखराव का दर्द लिए हम रेडियो और टीवी पर विज्ञापनों में अपनी बेटियों को समझाइश देते हैं  कि घर में करीबी पुरुष संबंधियों से बचो। उनके गुड टच और बैड टच में फर्क करना सीखो। यह कैसा समाज हम बना रहे हैं। हैदराबाद की नृशंस घटना इसका उदाहरण है।

अव्वल तो यह घटना ही हमारे माथे पर कलंक है। पुलिस ने अपराधियों को टपका दिया। पीड़ित परिवार और हम सबने कलेजे में ठंडक महसूस की। काश! हमारी अदालतें इतनी जल्दी न्याय करने लग जाएं। जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा या बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है ।

एक मीडियाकर्मी होने के नाते जहां अपराधियों के साथ इस सुलूक पर संतोष हो रहा है तो दूसरी तरफ कुछ गंभीर सवाल भी खड़े होते हैं। मीडिया में हम इसे मुठभेड़ कह रहे हैं। तकनीकी तौर पर यह मुठभेड़ कैसे है? भले ही वे मुजरिम थे, लेकिन दोष सिद्ध होने तक वे आरोपित थे। तो आरोपितों को रात तीन बजे चोरों की तरह पुलिस वारदात स्थल पर क्यों ले गई?

जाहिर है कि वे पुलिस हिरासत में थे तो हथकड़ी लगी थी। नाट्य रूपांतरण के लिए हथकड़ी खोली गई होंगी। यानी वे निहत्थे थे। मुठभेड़ तो तब होती है, जब दोनों ओर से गोलीबारी हो। अपराधी भी पुलिस पर फायरिंग कर रहे हों। निहत्थे आरोपित भाग भी रहे थे तो उन पर गोलीचालन मुठभेड़ नहीं कहा जाता। दूसरी बात, कानूनन भागते मुजरिमों पर सबसे पहले गोली पैरों पर मारी जाती है, ताकि वे भाग न सकें और पकड़ लिए जाएं। उनकी जान लेने का इरादा या अधिकार पुलिस को नहीं होता। यह कैसा अचूक निशाना था कि चारों मारे गए। कोई गंभीर रूप से घायल भी नहीं हुआ।

स्पष्ट है कि पुलिस, प्रशासन और सरकार पर इस शर्मनाक घटना का इतना सामाजिक दबाव था कि इस मामले में समूची पटकथा कानून के नजरिये से लचर ढंग से लिखी गई। जनभावना के मुताबिक काम करना एक बात है और कानून हाथ में लेना दूसरी बात। क्या अदालतों और भारतीय दण्ड संहिता का इस मामले में मखौल नहीं उड़ाया गया? अपनी भावनाएं परदे पर या अखबार के पन्नों पर प्रकट करने से पहले हमें वैधानिक स्वरूप का भी अध्ययन करना चाहिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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