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370 के हटने के बाद वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक ने कुछ यूं जानी इमरान खान के ‘मन की बात’
मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
मेरी पाकिस्तान यात्रा और इमरान से मुलाकात
दिनेश पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
मैं कंफ्यूज था। समझ नहीं आ रहा था कि कश्मीर को लेकर जो हम हिंदुस्तानी सोच रहे थे, वह सही है या यह जो मैं देख रहा हूं। अब मैं इमरान साहब के सामने था। खैर-मकदम के बाद उन्होंने कुछ देर क्रिकेट, भारत-पाकिस्तान की बातें कीं। फिर मैंने पूछा-जम्मू-कश्मीर से 370 हटने के बाद पाकिस्तानी चैनल्स बड़े चिंतित हैं। चीख रहे हैं भारत की अवाम के खिलाफ, हमारी सरकार के खिलाफ।
हिंदुस्तान में तो यह भी चर्चा है कि आप भी काफी खफ़ा हैं मोदी सरकार के इस कदम से। इमरान बोले-हां, ख़फ़ा तो हूं, लेकिन कर क्या सकता हूं। मोदी जी ने तो मोटा भाई को लगा दिया है मेरी बैंड बजाने के लिए। वह बजा रहा है। देश अलग नहीं जीने दे रहा है। सेना भी सुबह-शाम पानी भर रही है। वह बाजवा, जब न तब धमकी देता रहता है। आतंकवादी भाई तो चौके-छक्के वाली बाल की तरह उछल रहे हैं।
पुराने दोस्त हो, इसलिए दिल का हाल बता रहा हूं। मोदी जी ने जो मेरी लंका लगाई है न, अब तक किसी ने नहीं लगाई। सब कुछ सुकून से चल रहा था। अब उन्होंने लगा दी है तो सब पीछे पड़े हैं। मुझे तो अपना भविष्य अंधकार में दिख रहा है लेकिन क्या करूं। जनता का हित देखते हुए चुप हूं। हमारी इंटेलिजेंस भी अब काम नहीं कर पा रही है। भारत से सूचनाएं लाने में इनके पसीने छूट रहे हैं। पूरी दुनिया हमारी ओर ही आंख तरेरे जा रही है। इतना बड़ा काण्ड हो गया, कहीं से किसी ने समर्थन नहीं किया। कोई हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ। अब तुम्हीं बताओ। मैं क्या करूं?
मैंने कहा, ‘मोदी जी से बात करके उन्हें मना क्यों नहीं लेते। पीओके, बलूचिस्तान जैसे इलाके ऑफर कर दीजिए।’ ‘अब तुम मजे ले रहे हो’, इमरान साहब ने कहा। मैंने कहा, ‘मैं तो दोनों देशों के बीच शांति चाहता हूं और मेरी नजर में यह समस्या हल भी हो सकती है। आप अपने आतंकी दोस्तों को शांत कर लो, चाहे गोली से या बातों से और सेना से कहो कि रोज-रोज सीज फायर का उल्लंघन न करे। क्योंकि अब मोटा भाई के हाथ में इंडिया की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा है। उस बंदे के पास डोवाल भी हैं। ये दोनों मिलकर वैसे ही घुस जाएंगे, जैसे पटेल जी ने हैदराबाद में निजाम के विरोध के बाद भी सेना भेज दी थी। मोटा भाई तो मोदी जी को यह काम करके ही बताएंगे। इन्हें हल्के में नहीं लेना।‘
मैंने कहा, ‘एक दिन मेरी बात हो रही थी मोटा भाई से। उनका बहुत बड़ा सपना है इंडिया को लेकर। वे वृहत्तर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं। बैंड बजाने को तैयार हैं। आपके सावधान रहने का वक्त है। दोस्ती में ही बता रहा हूं|’ इस पर इमरान खान बोले, ‘सही कह रहे हो। मैं क्रिकेटर ही अच्छा था। पूरी दुनिया में सम्मान था। प्रधानमंत्री होने के बाद घर के अंदर से लेकर बाहर तक बैंड बजी हुई है। सब हमें केवल और केवल राय देते हैं। क्या दिन थे, जब हम एक क्रिकेटर के रूप में इंडिया घूमते थे। आज जाने पर ही लफड़ा है।‘
इमरान का कहना था, ‘राजनयिक सम्बंध खत्म करने का दबाव था। कर दिया। फिर सबने कहा-व्यापारिक सम्बंध भी खत्म कर दो। वो भी कर दिया। इन्हें इतने से ही संतोष नहीं हुआ। समझौता एक्सप्रेस बंद करवा दिया। अब तो मेरा ये हाल है कि न घर में चल रही है और न ही देश में। मन में आ रहा है कि मैं भी कहीं चला जाऊं। या अल्लाह! किस मनहूस घड़ी में मैंने यह मुई कुर्सी संभाली थी। अब नहीं हो रहा मुझसे। ये आजवा-बाजवा किसी भी दिन मुझे लटका देंगे। मोदी जी और मोटा भाई भी नहीं सुनने को तैयार हैं। देश भी नहीं सुनने को तैयार हैं। सेना तो सुनती ही नहीं और आतंकी लफंगे तो अलग ही सरकार चला रहे हैं।’ मैं क्या करूं? यह कहते हुए इमरान साहब लिपट गए। बड़े असहज दिख रहे थे और मजबूर भी। मुझे तो बड़ी दया भी आ रही थी, लेकिन जब तक मैं कुछ करता, ससुरी आंख खुल गई।
नोट-यह मौजूदा व्यवस्था पर व्यंग्य है| इसे दिल पर न लें| पढ़ें। अच्छा लगे तो लेखक का उत्साहवर्द्धन करें, नहीं तो पढ़ने के बाद शान्ति से पतली गली से मुस्कुराते हुए निकल लें|
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