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नोएडा में इंजीनियर की मौत हादसा नहीं हत्या: रजत शर्मा

वह मदद के लिए तीन घंटे तक चिल्लाता रहा, मौके पर पुलिस और फायर ब्रिगेड पहुंची, सौ से ज्यादा लोग मौजूद थे लेकिन फिर भी युवराज की जान नहीं बचा सके। वह डूब गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

रजत शर्मा, इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।

नोएडा में 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत नोएडा अथॉरिटी की घोर लापरवाही और प्रशासनिक नाकामी का परिणाम थी। तीन दिन पहले घने कोहरे की वजह से युवराज अपनी कार सहित सड़क के किनारे पानी से भरे करीब बीस फीट गहरे गड्ढे में गिर गया। यह गड्ढा कोई नया नहीं था, बल्कि पिछले दो साल से पानी से भरा हुआ था और पहले भी यहां हादसे हो चुके थे। हादसे के बाद युवराज करीब तीन घंटे तक मदद के लिए चिल्लाता रहा। पुलिस और फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंच गए, सौ से ज्यादा लोग भी वहां मौजूद थे, लेकिन इसके बावजूद युवराज की जान नहीं बचाई जा सकी और वह डूब गया।

गड्ढे में गिरने के तुरंत बाद युवराज ने अपने बुजुर्ग पिता राजकुमार मेहता को फोन किया। पिता मौके पर पहुंचे और बेटे ने मोबाइल की लाइट जलाकर अपनी लोकेशन दिखाई। कार धीरे-धीरे डूब रही थी, युवराज कार की छत पर लेटकर बचाने की गुहार लगाता रहा, लेकिन न तो फायर ब्रिगेड का कोई कर्मचारी पानी में उतरा, न कोई पुलिसकर्मी और न ही कोई प्रशिक्षित रेस्क्यूकर्मी। सब लोग दूर से रस्सियां फेंकते रहे। कुछ समय बाद एक डिलीवरी बॉय वहां से गुजरा और उसने पानी में कूदने की हिम्मत की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और युवराज डूब चुका था।

राजकुमार मेहता ने अपनी आंखों के सामने अपने इकलौते बेटे को खो दिया। हादसे के तीन दिन बाद, सोमवार को नोएडा अथॉरिटी हरकत में आई और उस रास्ते को बंद किया गया, बैरिकेड लगाए गए और एक जूनियर इंजीनियर को बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि जिस गहरे गड्ढे में गिरकर युवराज की मौत हुई, जिसमें सालों से पानी भरा था और जहां पहले भी दुर्घटनाएं हो चुकी थीं, उस पर समय रहते कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। वहां न कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया, न बैरिकेडिंग की गई और न ही स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की गई।

आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है। एक पिता के सामने उसका बेटा जान बचाने की गुहार लगाता रहा और वह कुछ भी नहीं कर सका, इससे बड़ा दुख कोई नहीं हो सकता। युवराज की मौत के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्रवाई करते हुए मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की, नोएडा अथॉरिटी के सीईओ लोकेश एम को पद से हटा दिया और पांच दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए। इस पर राजकुमार मेहता ने कहा कि कार्रवाई होना अच्छी बात है, लेकिन उनका बेटा वापस नहीं आएगा, कम से कम इतना सुनिश्चित हो कि किसी और के साथ ऐसा न हो।

उन्होंने बताया कि पुलिस पंद्रह मिनट में पहुंच गई थी और फायर ब्रिगेड भी आधे घंटे में आ गई थी, लेकिन उनके पास न लाइफ जैकेट थी, न नाव और न ही कोई उचित रेस्क्यू उपकरण। फायर ब्रिगेड के कर्मचारी ठंडे पानी में उतरने से डर रहे थे, इसलिए कोई पानी में नहीं उतरा और बेटा डूबकर मर गया। युवराज अपने पिता का अकेला बेटा था। पत्नी के निधन के बाद राजकुमार मेहता बेटे के साथ ही रहते थे, जबकि बेटी ब्रिटेन में रहती है। युवराज शुक्रवार रात गुरुग्राम स्थित अपने ऑफिस से नोएडा सेक्टर 150 स्थित घर लौट रहा था और घर के बेहद करीब पहुंच चुका था, लेकिन घने कोहरे में रास्ते का अंदाजा नहीं लगा और गाड़ी फिसलकर गड्ढे में गिर गई।

राजकुमार मेहता ने बताया कि कुछ दिन पहले एक ट्रक भी उसी गड्ढे में गिरा था और अगर उसी वक्त बैरिकेडिंग और चेतावनी संकेत लगा दिए गए होते, तो यह हादसा टल सकता था। सेक्टर 150 की टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी के निवासियों का आरोप है कि उन्होंने कई बार नोएडा अथॉरिटी से शिकायत की, लेकिन अथॉरिटी ने न सिर्फ गड्ढा खुला छोड़ा बल्कि एडिशनल सीईओ सतीशपाल सिंह ने शिकायत करने वालों को डांटकर बाहर भेज दिया और सुप्रीम कोर्ट जाने तक की बात कह दी।

युवराज की मौत के बाद नोएडा अथॉरिटी ने दो बिल्डर्स एमजे विशटाउन प्लानर्स और लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन के खिलाफ केस दर्ज किया और ट्रैफिक सेल के जूनियर इंजीनियर नवीन कुमार को बर्खास्त किया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर मेरठ जोन के कमिश्नर के नेतृत्व में तीन सदस्यीय एसआईटी बनाई गई है, जो हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की सिफारिश करेगी। यह मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि अधिकारियों की लापरवाही से हुई हत्या है।

संवेदनहीनता की हद तब पार हो गई जब मौके पर मौजूद करीब सौ लोग मदद करने के बजाय वीडियो और रील बनाकर सोशल मीडिया पर डालते रहे। किसी की जान जा रही थी और लोग तमाशा देखते रहे। ऐसे लोगों और इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना जरूरी है और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और पिता को अपने बेटे को इस तरह खोना न पड़े।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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