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वास्तविक कहानियों पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का फोकस : अनंत विजय
कोरोना महामारी के बाद भी एक वर्ष ब्रेस्ट क्रिटिक का अवार्ड घोषित नहीं किया गया। तब उसका कारण ये बताया गया था कि जूरी ने किसी भी प्रविष्टि को पुरस्कार के योग्य नहीं माना।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है। कोरोना महामारी के कारण राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा में विलंब हुआ है। शुक्रवार को घोषित यह पुरस्कार वर्ष 2023 के लिए हैं। पुरस्कारों में विषयवस्तु और चयन में विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। अभिनेता शाहरुख़ ख़ान को पहली बार किसी फ़िल्म में उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। उन्हें यह सम्मान फ़िल्म 'जवान' के लिए तथा विक्रांत मैसी को '12वीं फेल' के लिए संयुक्त रूप से दिया जाएगा।
अभिनेत्री रानी मुखर्जी को भी पहली बार उनकी फ़िल्म 'मिसेज़ चटर्जी वर्सेस नार्वे' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। रानी मुखर्जी ने पूर्व में 'ब्लैक' और 'हिचकी' जैसी अनेक उत्कृष्ट फ़िल्में की हैं, जिनमें उनके अभिनय को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार का पात्र माना जा सकता था। संभवतः उन वर्षों में किसी अन्य अभिनेत्री का अभिनय अधिक प्रभावशाली रहा हो। 'ब्लैक' और 'हिचकी' दो ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें रानी के अभिनय और फ़िल्म की प्रस्तुति के लिए याद किया जाता है। 'मिसेज़ चटर्जी वर्सेस नार्वे' रानी मुखर्जी के करियर की दूसरी पारी की एक सशक्त फ़िल्म मानी जा सकती है।
'हिचकी' में भी रानी ने जिस विषय को प्रस्तुत किया, वह कम चर्चित था। यह फ़िल्म ब्रैड कोहेन की आत्मकथा ‘फ्रंट ऑफ़ द क्लास: हाउ टॉरेट सिंड्रोम मेड मी द टीचर आई नेवर हैड’ पर आधारित थी। कहा जाता है कि इस फ़िल्म में अभिनय से पूर्व रानी मुखर्जी ने इस सिंड्रोम को समझने में घंटों का समय व्यतीत किया था। उन्होंने इससे पीड़ित लोगों के व्यवहार को समझने के लिए गहराई से अध्ययन किया था। पर्दे पर उनकी यह मेहनत स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। कहना आवश्यक है कि फ़िल्म की जूरी के सदस्यों का चयन भी सराहनीय है।
शाहरुख़ ख़ान को फ़िल्म 'जवान' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिलना निश्चित रूप से कई प्रश्न खड़े करता है। राष्ट्रीय पुरस्कारों के चयन में अभिनय प्रमुख आधार होता है, किंतु फ़िल्म की कहानी और समाज पर उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाता है। 'जवान' एक ऐसी फ़िल्म है जो व्यवस्थागत तंत्र को चुनौती देती है तथा संवैधानिक संस्थाओं की सीमाओं की ओर इशारा करती है।
इसमें देश की स्वास्थ्य सेवाओं की विफलताओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए मंत्री के अपहरण जैसी घटनाएँ चित्रित की गई हैं। यह फ़िल्म एक एक्शन थ्रिलर है जिसे दर्शकों ने व्यापक रूप से सराहा। बताया गया कि इस फ़िल्म ने ₹1,000 करोड़ से अधिक का व्यापार किया। हालांकि उस समय शाहरुख़ ख़ान के अभिनय की विशेष चर्चा नहीं हुई। संभवतः जूरी अध्यक्ष आशुतोष गोवारिकर और अन्य सदस्यों को उनके अभिनय में ऐसे गुण प्रतीत हुए जो अन्य समीक्षकों की दृष्टि से ओझल रह गए। यह सर्वविदित है कि शाहरुख़ एक उत्कृष्ट अभिनेता हैं और उन्होंने वर्षों के अभिनय से अपनी प्रतिभा सिद्ध की है।
वर्ष 2004 में जब उनकी फ़िल्म 'स्वदेश' प्रदर्शित हुई थी, तब उनके अभिनय की अत्यधिक सराहना हुई थी। परंतु उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार सैफ़ अली ख़ान को प्रदान किया गया था। एक अवसर पर शाहरुख़ ख़ान ने स्वदेश को लेकर यह व्यथा प्रकट भी की थी कि उन्हें उस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए था। उस वर्ष 'स्वदेश' और 'हम तुम' दो अलग प्रकार की फ़िल्में थीं। संयोग यह रहा कि जब सैफ़ को पुरस्कार मिला तब उनकी माता शर्मिला टैगोर सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष थीं।
वहीं अब शाहरुख़ ख़ान को पुरस्कार मिला है और जूरी अध्यक्ष वही आशुतोष गोवारिकर हैं, जिन्होंने 'स्वदेश' का निर्देशन किया था। इंटरनेट मीडिया पर इन दोनों संयोगों की व्यापक चर्चा हो रही है। परंतु 'स्वदेश' को उस समय पुरस्कार न मिलने का कारण कुछ और था। जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई, तब निर्देशक टी.एस. नागबर्ना ने आरोप लगाया था कि 'स्वदेश' उनकी कन्नड़ फ़िल्म 'चिगुरिदा कनासू' की नकल है। 2004 के पुरस्कारों की जूरी के अध्यक्ष सुधीर मिश्रा थे और टी.एस. नागबर्ना स्वयं भी जूरी में सम्मिलित थे। जब जूरी के समक्ष 'स्वदेश' प्रदर्शित की गई, तब नागबर्ना ने इसे अपनी फ़िल्म की नकल बताया।
तत्पश्चात जूरी को 'चिगुरिदा कनासू' भी दिखाई गई और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि 'स्वदेश' के लिए शाहरुख़ ख़ान को पुरस्कार नहीं दिया जा सकता। यह पहला अवसर नहीं था जब किसी फ़िल्म या कलाकार को नकल के आधार पर पुरस्कार से वंचित किया गया हो। अतः सैफ़ अली ख़ान को मिला पुरस्कार उनकी माता से जोड़ना अनुचित है।
'12वीं फेल' के लिए विक्रांत मैसी का चयन अत्यंत उपयुक्त है। उन्होंने अपने अभिनय कौशल से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है। उनकी हालिया फ़िल्म 'साबरमती रिपोर्ट' में भी उनका अभिनय प्रभावशाली रहा। 'द केरल स्टोरी' के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने मुख्यधारा से हटकर फ़िल्म निर्माण किया। इस फ़िल्म को लेकर अनेक विवाद हुए। मामला न्यायालय तक पहुँचा और कई राज्यों में यह फ़िल्म अघोषित रूप से प्रतिबंधित रही।
इसके बावजूद इस फ़िल्म ने समाज में 'लव जिहाद' जैसी ज्वलंत समस्या पर प्रकाश डाला। निर्देशक के रूप में सुदीप्तो सेन ने इस फ़िल्म से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उन्हें सम्मानित करना वैकल्पिक सिनेमा की स्वीकृति का संकेत है। एक अन्य उल्लेखनीय फ़िल्म 'कटहल' रही, जो सीमित बजट में बनी, किंतु अपने कथ्य और प्रस्तुति के कारण चर्चा में रही।
सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन का पुरस्कार असम के उत्पल दत्ता को मिला है, जो लंबे समय से अंग्रेज़ी और असमी भाषा में फ़िल्मों पर लेखन कर रहे हैं। इस श्रेणी में किसी पुस्तक का चयन न होना आश्चर्यजनक है। जूरी के समक्ष अंबरीश रायचौधरी की श्रीदेवी पर अंग्रेज़ी में लिखी पुस्तक, अमिताव नाग की सौमित्र चटर्जी पर पुस्तक, यतीन्द्र मिश्र की गुलज़ार पर लिखी पुस्तक सहित विभिन्न भाषाओं में दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रस्तुत थीं। पुरस्कार घोषणा के समय लेखन श्रेणी के जूरी अध्यक्ष गोपालकृष्ण पई अनुपस्थित थे।
मंत्री को अनुशंसा सौंपे जाने के समय की जो तस्वीरें जारी की गईं, उनमें भी जूरी अध्यक्ष या सदस्य दृष्टिगोचर नहीं हो रहे। यह अत्यंत दुर्लभ है कि किसी श्रेणी की जूरी के अध्यक्ष या उनके प्रतिनिधि मंत्री को अनुशंसा देने अथवा पुरस्कार घोषणा के समय उपस्थित न रहें। जूरी को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि किस कारणवश किसी पुस्तक का चयन नहीं किया गया। कोरोना महामारी के बाद एक वर्ष 'बेस्ट क्रिटिक' का पुरस्कार भी घोषित नहीं किया गया था।
उस समय कारण यह बताया गया था कि जूरी ने किसी प्रविष्टि को पुरस्कार योग्य नहीं माना। उस वर्ष मान्य प्रविष्टियों की संख्या अत्यंत सीमित थी। अब जबकि वर्ष 2023 के पुरस्कार घोषित हो चुके हैं, यह आवश्यक है कि 2024 के पुरस्कारों का चयन शीघ्र हो ताकि वर्ष 2025 के पुरस्कार समय पर घोषित किए जा सकें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।
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