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गंभीर के अहंकार ने टीम इंडिया को बर्बाद कर दिया: नीरज बधवार
आपने अपने सिरफिरे प्रयोगों से टीम का बेड़ा गर्क कर दिया। आपको अपने जवाबों में विनम्रता दिखानी चाहिए थी। बैकफ़ुट पर होना चाहिए था। आपका दुख भी झलकना चाहिए था।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
गंभीर की प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनी। गुस्ताख़ी माफ़ हो, मगर मानसिक रूप से इतना असंतुलित व्यक्ति को आप कोच कैसे बना सकते हैं? पिछले 7 साल में आप घर में 5 टेस्ट हार चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी 3-1 से हारे थे, अगर हैरी ब्रूक ने पाँचवें टेस्ट में खराब शॉट न खेला होता तो इंग्लैंड से भी 3-1 से हारकर आते। इस बीच जीते किससे? बांग्लादेश और वेस्टइंडीज़ से?
आपने अपने सिरफिरे प्रयोगों से टीम का बेड़ा गर्क कर दिया। आपको अपने जवाबों में विनम्रता दिखानी चाहिए थी। बैकफ़ुट पर होना चाहिए था। आपका दुख भी झलकना चाहिए था। बावजूद इसके आपकी सफ़ाई में भी इतना अहंकार है, इतना गुस्सा है। जैसे आप इस बात पर नाराज़ हों कि लोग इतनी बड़ी हार के बाद नाराज़ क्यों हैं।
कोच के तौर पर आपको खिलाड़ियों को खेल नहीं सिखाना होता, आपको उनके इमोशन्स मैनेज करने होते हैं। लेकिन अगर ख़ुद ही इतना भावनात्मक रूप से कमज़ोर और असुरक्षित हैं, तो खिलाड़ियों से कैसे डील करेंगे? यही वजह है कि अश्विन से लेकर कोहली, रोहित जिस-जिस खिलाड़ी में रीढ़ थी, गंभीर ने चुन-चुनकर उनको टीम से निकाल दिया। क्योंकि असुरक्षित इंसान को हर वक़्त अपनी अथॉरिटी दिखाने की ज़रूरत पड़ती है।
उसे ज़िंदा लोग अच्छे नहीं लगते, उसे अपने आसपास जी-हुज़ूरों का टोला चाहिए होता है जो अपनी ग़ैरत, अपना आत्मसम्मान, अपनी सोच-समझ उनके चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित कर दें। गंभीर बार-बार कहते हैं कि मैं बहुत निष्पक्ष हूँ। मैं सिर्फ़ टीम की बात करता हूँ, खिलाड़ियों की नहीं। उनका बार-बार यह दावा करना भी अहंकार का घृणित रूप है।
बार-बार ऐसा कहकर वे यह जतलाते हैं कि यह दुनिया कितनी नासमझ है और इस नासमझ दुनिया में मेरी नैतिकता कितनी ऊँची है। ऐसा बोलने से अंदर का अहंकारी आदमी ख़ुश होता है। वह अहंकारी आदमी जिसे यह तकलीफ़ है कि 2011 की जीत का क्रेडिट धोनी को क्यों मिलता है।
वह अहंकारी आदमी जिसे ऑस्ट्रेलिया में दो-दो बार टेस्ट सीरीज़ जितवाने वाले रवि शास्त्री की उपलब्धियों को भी कोई भाव नहीं देता। लेकिन एशिया कप जैसे थके हुए टूर्नामेंट में पाकिस्तानी जैसी पैदल टीम को हराने को वह अपने कोचिंग करियर की बड़ी सफलता मानता है।
गंभीर की साइकोलॉजिकल प्रोफ़ाइलिंग एक अहंकारी और भावनात्मक रूप से अस्थिर व्यक्ति की कहानी बयान करती है। ऑस्ट्रेलियाई टीम के हेड कोच एंड्र्यू मैकडॉनल्ड को देखिए। पहले तो बोलते ही कम हैं। जब भी बोलते हैं -एकदम नपा-तुला।
कहीं यह कोशिश नहीं कि अपने स्टेटमेंट से किसी को हैरान कर दूँ। अपनी मौजूदगी दर्ज करने के लिए कोई चमकदार बयान दे दूँ। कोच को ऐसा ही होना चाहिए। वो होते हुए भी दिखना नहीं चाहिए। दिखे भी तो बिना शोर-शराबे के निकल जाना चाहिए, क्योंकि यह उसका काम ही नहीं है।
लेकिन अहंकार को हर वक़्त मान्यता चाहिए होती है। इसलिए वह गंभीर की तरह लाउड और बड़बोला होता है।
गंभीर एक अच्छे खिलाड़ी ज़रूर थे, मगर वह सिरफिरे और अहंकारी कोच हैं। ऐसे कोच जिनके अहंकार ने टीम इंडिया का बेड़ा गर्क करके रख दिया है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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