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चुनावी जंग में कांग्रेस का घटता हौसला: समीर चौगांवकर

पिछले तीन चुनाव से आपका प्रतिद्वंद्वी मोदी आपको धूल चाटने पर मजबूर करता रहा है और 2029 में फिर वह आपको चारों खाने चित करने के लिए अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ कर रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

पीएम मोदी के 15 अगस्त के भाषण से कांग्रेस को चिंतित होना चाहिए। 2024 में 240 सांसदों पर सिमटे मोदी ने 2029 में फिर से सरकार बनाने के अपने संकल्प को संकेतों में बताया है। मोदी का भाषण भविष्य की बलवती वापसी से भरा हुआ था। मोदी ने अभी से 2029 की तैयारी शुरू कर दी है, और वहीं कांग्रेस चुनावी जंग के लिए कितनी तैयार है? इसके जनरलों और पैदल सैनिकों में कितना जोश है? इसके जनरल कौन-कौन हैं? सिर्फ़ मोदी को ‘वोट चोर’ कहकर मोदी सरकार को ठिकाने लगाने की उम्मीद राहुल गांधी कर रहे हैं। कांग्रेस आज क्या है? क्या वह एक राजनीतिक दल है, जो अपने जीवन-मरण की लड़ाई में उतरने जा रही है? या वह एक एनजीओ है, जो सिर्फ़ अपना फ़र्ज़ निभा रही है और यह उम्मीद कर रही है कि इतने भर से दिल्ली की सत्ता बदल जाएगी?

मेरे इस आकलन से कांग्रेस-समर्थक नाराज़ हो सकते हैं मगर इस नश्तर को घाव के अंदर घुमाना ज़रूरी है। पिछले तीन चुनाव से आपका प्रतिद्वंद्वी मोदी आपको धूल चाटने पर मजबूर करता रहा है और 2029 में फिर वह आपको चारों खाने चित करने के लिए अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ कर रहा है। राहुल गांधी को चिंतित होना चाहिए कि अगर इस बार फिर कांग्रेस की हार हुई तो इसके ‘मध्य’ से इसके कई हताश और पस्त सदस्य बाहर का रास्ता पकड़ लेंगे। लगातार 20 साल सत्ता से बाहर रहना कांग्रेस अफ़ोर्ड नहीं कर सकेगी। तब कांग्रेस का क्या बचा रहेगा?

संभावना यही है कि तब भी यह उन्हीं पुराने और जर्जर स्वयंभू चाणक्यों, मेकियावेलियों और दिग्गज बुद्धिजीवियों की जमात के रूप में बनी रहेगी, जिन सबकी एक ही विशेषता होगी। न कभी चुनाव लड़े और न कभी चुनाव जीते या उसे भी गंवा दिया जो कभी उनके ज़िम्मे सौंपा गया। किसी भी राजनीतिक दल का एक ही लक्ष्य और नारा होता है, ‘चुनाव जीतो’। इसके लिए कड़ी मेहनत और गहरी निष्ठा की ज़रूरत होती है। सफल रहे तो खूब इनाम पाओ, विफल रहे तो भारी कीमत चुकाओ।

संक्षेप में, सारा दारोमदार जवाबदेही पर है। अब आप बताइए कि आपके मुताबिक, क्या कांग्रेस में इधर ऐसा कुछ हो रहा है? इस सवाल का जवाब ‘ना’ में है। 2014 के बाद कांग्रेस ज़्यादा सामंतवादी हो गई है और योग्यता के प्रति उसका आग्रह घटता गया है। इसमें जुझारू, चुनावी प्रतिभा वाले नए नेता बहुत कम उभरे हैं। जो थे, वे पार्टी से जा चुके हैं। लेकिन चापलूस तत्व तमाम संकटों के बीच भी कांग्रेस में बचे और बने रहते हैं। गांधी परिवार सहित कुछ पुराने वंशज अपनी सिकुड़ती जागीर शायद ही बचा पाए हैं।

वे अपने क्षेत्र में अपनी पार्टी का विस्तार नहीं कर सकते, न ही वे नई प्रतिभाओं के लिए जगह खाली कर सकते हैं। कांग्रेस में ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने निरंतरता बनाए रखी। बेशक नाकामियों की। कांग्रेस में ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने प्रभारी के तौर पर जिस राज्य को छुआ उसे धूल बना दिया। कांग्रेस में राहुल टीम ऐसी है जो एक सिरे से पराजितों की परेड जैसी दिखती है।

राजनीति कड़ी मेहनत की मांग करती है, केवल ट्विटर के योद्धा बनकर कुछ नहीं होगा। कहीं ऐसा न हो कि 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ता राहुल गांधी को लेकर आमिर खान की फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स’ का यह गाना गुनगुनाते मिले,‘कहाँ से आया था वो, कहाँ गया उसे ढूँढ़ो’।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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