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कंटेंट आने वाले दिनों में पतित ही रहेगा, ‘एक वर्ग’ आगे आकर इसे दिशा देगा!: अजय कुमार
आज की दुनिया में उस दौर से भी बुरा माहौल है। संस्थापक, संस्थान, न्यूजरूम, संपादक, डेस्क से लेकर रिपोर्टर तक, हर कोई सिर्फ बचाव की मुद्रा में है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
बड़ा ही मुश्किल सवाल है– आने वाले दिनों में पत्रकारिता का भविष्य कैसा और क्या दिखता है? ये सवाल ठीक वैसा ही है, जैसे सदियों पहले राजपुरोहितों से राजे-रजवाड़े पूछा करते थे– ‘पंडितजी, भविष्य तो ठीक है ना परिवार और राज्य का’। भला कितने राजपुरोहितों ने कटु-सत्य, सपाट और स्पष्ट अंदाज में राज परिवारों के सामने पेश किया होगा। कभी-कभी तो लगता है कहीं इसी वजह से दार्शनिक राजनीतिक परामर्श का इजाद तो नहीं हुआ। इशारों-इशारों में लाग-लपेट कर सच जैसा कुछ बोल दिया जाए, ताकि कल को किसी अनहोनी के होने पर उठने वाले सवालों का जवाब देते बने और मुंह छिपाने के लिए आधार भी तैयार रहे।
आज की दुनिया में उस दौर से भी बुरा माहौल है। संस्थापक, संस्थान, न्यूजरूम, संपादक, डेस्क से लेकर रिपोर्टर तक, हर कोई सिर्फ बचाव की मुद्रा में है। सत्ता के साथ खड़ा दिखना कभी भी अपराध नहीं था, ना ही सत्ता के खिलाफ स्टैंड लेने वालों को संस्थानों और पाठकों ने हमेशा माला ही पहनाए, लेकिन आज सोशल मीडिया के विस्फोटिकरण ने हर सोशल मीडिया यूजर को संपादक बना दिया है। हर कोई अपना संपादकीय लिखकर, आत्ममुग्धता में मस्त-मगन है। लिहाजा हर पत्रकार को कोई ना कोई धड़ा ‘पत्तलकार’ घोषित करता रहता है। तो चलिये आज के ‘पत्तलकारों’ कि बातें करते हैं।
कोरोना काल के बाद से डिजिटाइजेशन कि रफ्तार ने ट्रेडिशनल मीडिया के सामने मौजूदा सवाल खड़े किये। 90 के दशक में टीवी न्यूज चैनलों के विस्फोट ने प्रिंट मीडिया के सामने भी सवाल खड़े किये थे। अखबार में लिखी खबरों को पढ़कर दिमाग पर जोर डालकर, खबर का सार समझने वालों से सामने एक ‘इडियट बॉक्स’ था, जिस पर वीडियो और ऑडियो से साथ पेश की जा रही स्टोरी को समझने और उसके आधार पर राय कायम करने के लिए, दिमाग पर जोर डालने की जरूरत नहीं थी। विकल्प आसान था, सर्वमान्य था, सर्वहित में ही था- ऐसा दर्शकों ने माना। लिहाजा पाठकों ने अखबारों से तौबा तो नहीं किया, लेकिन पढ़ना कम कर, देखना ज्यादा शुरू किया।
मुझ जैसों के लिए टीवी न्यूज, एक नया परीक्षण था। पहचान जल्दी बन सकती थी। संस्थान की सीढ़ी जल्दी चढ़ने का मौका भी मिल सकता था और तनख्वाह तो काफी बेहतर थी ही। देखते-देखते, हम में कई रिपोर्टर व एंकर ने खुद को छोटे पर्दे का स्टार भी मान लिया। लेकिन करोड़ों के निवेश पर चलने वाले माध्यम की अपनी मजबूरियां भी थीं। न्यूज चैनलों के बेतहाशा विस्तार और विस्तार के साथ आने वाली आर्थिक मजबूरियों ने न्यूज चैनलों का नाश अगले 10–15 साल में कर ही दिया।
याद कीजिए वो क्रेजी वीडियो का जमाना– 2005 से 2008 तक। बड़े-बड़े न्यूज चैनल सभी मानदडों को ताख पर रखकर ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को जुटाने की तलाश में क्रेजी से क्रेजी वीडियो को टेलीकास्ट करने लगे। वो एलियन, उड़नतश्तरी, बिना ड्राइवर की कार, वाला दौर। दर्शकों ने खूब धोया, लताड़ा, रिमोट पटका, लेकिन किसी संपादक या टीवी मैनेजमेंट ने दर्शकों की रत्ती भर परवाह नहीं की। दरअसल टीवी न्यूज चैनल चलाना, कोई बच्चों का खेल थोड़े ही ना है। कम से कम 100 करोड़ का सालाना खर्च आता है, जनाब। हर साल पत्रकारों को सैलरी इंक्रीमेंट भी चाहिये था, तो पैसे के लिए तमाम चैनलों के संपादकों के साथ हमने भी उसी दिशा में घूमना शुरू कर दिया। वो एक ऐसा नाच था, जिसमें सभी नंगे थे, लेकिन एक-दूसरे को नग्न अवस्था में किसी भी संपादक और संस्थान ने नहीं देखा। हां, दर्शक देख रहा था, बाट जोह रहा था।
अगला दौर 2011-12 के बाद आया जब लचर हो चुकी न्यूजरूम पत्रकारिता ने टीवी चैनलों को डिबेट शो का रास्ता दिखाया। शोर-शराबा, चिल्लम-चिला, हंगामा, आरोप–प्रत्यारोप, फिर मार-पिटाई और अंत में एकालाप (Monologue) वाला डिबेट शो। घंटो तक प्रलाप चलता रहा, हिंदू-मुसलमान होता रहा, बलात्कार सही है या गलत– ये भी चलता रहा। यहां तक कि सुशांत प्रकरण में ‘मुझे ड्रग्स दो’ भी चला। न जाने कितने बेकसूर लोगों को टीवी डिबेट ने दोषी माना और तथाकथित दोष के आधार पर उनका चरित्रहरण करने का लाइसेंस भी ले लिया। संपादकों ने इस दौर में भी आगे बढ़ना शान से जारी रखा। संस्थानों मे भी इसे देखकर खूब पैसे कमाये और कुछ कर्मचारियों में बांटे भी।
दर्शक-मूक बना बैठा रहा। राह जोखता रहा। उसे इंतजार था, एक ऐसे माध्यम का जिसके जरिये वो टीवी पत्रकारिता के नाम पर परोसी जा रही व्यर्थता का मुंहतोड जवाब दे सके। दलों के प्रचार और प्रसार ने सोशल मीडिया नामक हथियार को दर्शकों के हाथों में सौंपा। और फिर क्या था। हमाम में नंगे सभी संपादकों की ‘पट्टीचढ़ी आंखों’ से एक-एक कर जनता ने सारी पट्टियां नोंच भेंकी। अखबार और टीवी का आधार रहा है एक तरफ संचार। डिजिटल की बुनियाद है, दोनों तरफा संचार। ‘मुझ को जो मांगता, देते हो तो दो, नहीं तो साहब दूसरी दुकान पर जाता– अगर वहां भी अपने को नहीं जमा, तो खुद की दुकान सजाता’- इस मुम्बईया सोच ने मीडिया जगत में भूचाल ला दिया।
2021 के बाद देश बदल चुका था और आने वाले लोकसभा चुनावों के बाद जून 2024 में भारत एक बार फिर बदलेगा। हाथ में स्मार्ट फोन लिये हर भारतीय अब रिपोर्टर है। जब वो कैमरे के सामने है, तो एंकर है। जब वो अपने फोन या लैपटाप पर लिखने बैठा है, तो वो संपादक है। जब वो सोशल मीडिया पर दूसरों के बनाये वीडियो देख रहा है तो वो दर्शक है। लेकिन हां, ये मूक दर्शक नहीं है। इसके पास दो तरफा संचार की आजादी है। ये दर्शक देखेगा- लाइक या डिस्लाइक करेगा और कॉन्टेंट उसकी सोच या तथाकथित विचारधारा के मुताबिक खरा नहीं पाया, तो गरियाएगा। फतेह की बात ये है इन दर्शक प्लस संपादकों को टीवी वाले संपादक बनने की जरूरत नहीं हैं, क्योंकि इन दर्शक प्लस संपादकों को अपने वीडियो के व्यूज के आधार पर, उन्हें पैसे मिल रहे हैं। इन्हें किसी संस्थान के रहमोकरम पर रहने की जरूरत नहीं है।
मेरे विचार में आने वाले समय में कंटेंट सबसे बलवान होगा, ऐसी अवधारणा न्यूज रूम में हमेशा संपादकों और संस्थानों ने रखी कि टीवी के लिए ‘Content is King’, लेकिन वो अवधारणा मात्र ही रहा। टीवी पर कंटेंट से कहीं ज्यादा डिस्ट्रीब्यूशन मायने रखता रहा है। लेकिन डिजिटाइजेशन ने टीवी न्यूज रूम के इस भ्रम को तोड़ दिया है। आने वाला जमाना कनेक्टेड टीवी का होने वाला है। टीवी पर ऐप के जरिये दर्शक कंटेंट कंज्यूम करेगा। DTH और Conventional केबल टीवी जल्द ही आत्महत्या कर लेंगे। अगर खुद नहीं करेंगे, तो दर्शक इन माध्यमों को बंद करा देगा। डिजिटल कंटेंट की दिशा और दशा, पारम्परिक नजरिये से पतित ही रहेगी। सुर्खियां, सेंशेसन, नाटक, नौटंकी, चीख-चिल्लाहट और नंगापन देखने को भरपूर मिलेगा, लेकिन एक वर्ग साफ-सुधरा, वास्तविकता आधारित, चेतना को जगाने वाला कंटेंट देखना पसंद करेगा। भविष्य इसी चेतनायुक्त वर्ग पर निर्भर करता है। ये वर्ग देश के भविष्य का निर्धारण तो करेगा ही, देश के चिंतन और विचार को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। उम्मीदें, इसी वर्ग के विस्तार और विकास पर टिकी हैं।
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